NTA का दावा है कि छात्र ने खुद Abu Dhabi सेंटर चुना।
ठीक है, फिर फीस रसीद भी दिखा दीजिए। विदेशी परीक्षा केंद्र की फीस भारतीय केंद्रों से काफी ज्यादा होती है।
अगर फीस भी विदेशी केंद्र वाली जमा हुई है तो छात्र की गलती,
और अगर नहीं हुई तो फिर सवाल NTA से पूछा जाएगा।
Application Form और Fee Receipt दोनों सार्वजनिक करिए, बहस खत्म।
#NTA #NEET
कौन सा विधायक टूटेगा, कौन सा सांसद रूठेगा, कौन किस पार्टी में जाएगा...
अगर यही खबरें चलती रहीं तो देश के असली मुद्दे कौन उठाएगा?
पेपर लीक पर बहस करो, रोजगार पर बात करो, महंगाई पर सवाल पूछो।
राजनीतिक जोड़-तोड़ से TRP मिल सकती है, देश आगे नहीं बढ़ेगा।
क्रॉस वोटिंग को अंतरात्मा की आवाज कहा जाता है, लेकिन जब यह लगातार और एकतरफा दिखे तो जनता के मन में सवाल उठते हैं।
क्या जनप्रतिनिधि जनता की इच्छा से वोट दे रहे हैं या किसी और दबाव और प्रलोभन से?
जब विपक्ष के नेता सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होते हैं तो इसे 'विकास की राजनीति' कहा जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता ने उन्हें इसी उद्देश्य से चुना था?
जनादेश का सम्मान लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
जिन हाथों ने पहचान दी, उन्हीं हाथों को छोड़ चले,
सियासत की राह में कुछ रिश्ते भी तोड़ चले।
मंच, मुकाम, शोहरत सब मिली जिस कारवां से,
वक्त बदला तो उसी कारवां से मुंह मोड़ चले।
दिल्ली में टीएमसी के बागी सांसदों की भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई बैठक ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी से नाराज सांसद किसी क्षेत्रीय दल के साथ विलय कर एनडीए को समर्थन दे सकते हैं। वहीं, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष की लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
#TMC #TrinamoolCongress #BJP #BhupenderYadav #MamataBanerjee #NDA #WestBengalPolitics #ATCard #AajTakSocial
अगर नेहरू जी के सामने कोई चुनौती नहीं थी, तो फिर विभाजन, शरणार्थी संकट, कश्मीर युद्ध, रियासतों का विलय और खाली खजाना किस देश में था?
मोदी जी विकसित होती अर्थव्यवस्था के प्रधानमंत्री बने, नेहरू जी ने बिखरे हुए भारत को राष्ट्र बनाया।
नेताओं का सम्मान कीजिए, इतिहास का अपमान मत कीजिए।
#तथ्य@PMOIndia के तौर पर @narendramodi और #JawaharLalNehru की तुलना बेमानी है। नेहरू जी के सामने न विरोध था, न विपक्षी थे, न जनता की अकांक्षाएं थीं, न विदेशी साजिशें थीं और सबसे बड़ी बात अंग्रेज भी उनके ही पक्ष में थे और मोदी जी के लिए सारी चुनौतियाँ थीं/हैं। मोदी जी की उपलब्धि बहुत बड़ी है।
क्षेत्र
नेहरू का योगदान
राष्ट्र निर्माण
विभाजन, शरणार्थी संकट और रियासतों के एकीकरण के बाद देश को स्थिर लोकतंत्र बनाया।
लोकतंत्र
सेना या तानाशाही की बजाय संसदीय लोकतंत्र को मजबूत किया, जबकि कई नए स्वतंत्र देशों में लोकतंत्र टिक नहीं पाया।
शिक्षा
IIT, AIIMS, UGC, IIM की अवधारणा, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा।
उद्योग
भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर जैसे स्टील प्लांट; BHEL, ONGC जैसी संस्थाओं की नींव।
विज्ञान
ISRO का आधार, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, DRDO का विस्तार।
सिंचाई
भाखड़ा नांगल, हीराकुंड, नागार्जुन सागर जैसे बड़े बांध।
विदेश नीति
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के प्रमुख नेता बने।
संवैधानिक संस्थाएँ
चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, स्वतंत्र प्रेस और संसद की परंपराओं को मजबूत किया।
धीरे धीरे चाकू घुसेड़ कर मारिए या घप्प से मार दीजिए, इंसान मर तो दोनों केस में रहा ही है। वैसे ही सरकार ये रोज़ थोड़ा थोड़ा पेट्रोल की कीमत बढ़ाते बढ़ाते जो 80 रुपए पर ले आई है उसको सीधा एक बार में ही बढ़ाकर 100 रुपए कर दे। मिडिल क्लास तो बना ही 'मरने' के लिए है, मार दीजिए।
पहले कहते थे — “काला धन आएगा तो टैक्स खत्म हो जाएगा…”
अब हालत ये है कि
मरने के बाद अगर यमराज मिल जाएं,
तो शायद वहाँ भी GST की रसीद मांग लें।
वादे इतने बड़े थे कि
अब पुराने ट्वीट ही सबसे बड़ा मज़ाक लगते हैं।
2013 में कहा था — हर गाँव अमेरिका बनेगा।
2026 आते-आते हालत ये है कि
लोग गैस सिलेंडर, नौकरी और बिजली के बिल से ही लड़ रहे हैं।
काला धन तो नहीं आया,
लेकिन जनता का सफेद धन जरूर निचोड़ लिया गया।
भारत में Free Data जितना सस्ता हुआ,
युवाओं का समय उतना महंगा बर्बाद होने लगा।
जहाँ किताबें खुलनी चाहिए थीं
वहाँ दिनभर reels खुल रही हैं।
हर हाथ में इंटरनेट देना विकास नहीं होता
जब तक उसके इस्तेमाल की समझ ना हो।
कल तक जो जनता के दर्द पर भाषण देते थे,
आज सत्ता की चौखट पर जाकर खामोश बैठे हैं।
जब AAP में थे तो कहते थे —
“मुझे जनता के मुद्दे उठाने नहीं दिए जाते…”
अब सरकार में जाकर ऐसी खामोशी ओढ़ ली,
कि NEET पेपर लीक पर भी एक लफ़्ज़ नहीं निकला।
सवाल पार्टी का नहीं था साहब,
सवाल नीयत का था…
कुर्सी मिलते ही मुद्दे बदल गए,
और जनता फिर वहीँ खड़ी रह गई।
ये कहानी कम, सिस्टम पर तमाचा ज़्यादा लगती है।
“19,300 रुपये निकालने के लिए इंसान अपनी बहन का कंकाल कंधे पर उठा कर 5 किलोमीटर चलता है… और हम कहते हैं—डिजिटल इंडिया, विकसित भारत!”
कागज़ माँगने वाली व्यवस्था इतनी बेशर्म हो चुकी है कि उसे इंसान की मजबूरी नहीं, सिर्फ फाइल पूरी चाहिए।
जिंदा इंसान की बात पर भरोसा नहीं… लेकिन कंकाल दिखाओ तो शायद मान लें!
ये गुस्सा सिर्फ गरीबी पर नहीं है—ये उस सोच पर है जहाँ नियम इंसान से बड़े हो गए हैं।
जहाँ बैंक कहता है “प्रूफ लाओ”,
और ज़िन्दगी पूछती है—“और कितना प्रूफ चाहिए कि मैं टूट चुका हूँ?”
और फिर टीवी पर बहस होगी—GDP, रैंकिंग, ग्रोथ…
पर ज़मीन पर सच्चाई यही है:
“यहाँ इंसान नहीं, कागज़ ज़िंदा हैं।”
सच में, अगर ये ‘असली भारत’ है…
तो फिर ये तरक्की नहीं, बहुत बड़ी शर्म है।
ये जीतू मुंडा हैं. इनके कंधे पर इनकी बहन कालरा मुंडा का कंकाल है.
दरअसल, जीतू की बहन कालरा की 2 महीने पहले मौत हो गई.
कालरा जीतू को बता गईं कि उनके बैंक खाते में 19,300 रुपए हैं, जिसे जीतू निकाल लें.
जीतू ओडिशा ग्रामीण बैंक पहुंचे. बैंक के कर्मचारियों न कहा- जिसका खाता है उसे लाओ या डेथ सर्टिफिकेट और कानूनी वारिस होने का प्रमाण दो.
सर्टिफिकेट बनवाना गरीब जीतू के लिए पहाड़ चढ़ने सा था, उन्होंने आसान रास्ता चुना.
जीतू ने बहन की कब्र खोदी, कंकाल को बोरी में भरा और कंधे पर कंकाल को लादकर बैंक पहुंच गए. इस दौरान जीतू 5 किलोमीटर ऐसे ही चलते रहे. रास्ते में जिसने भी ये देखा, वो स्तब्ध रह गया.
सोचिए.. अपने देश में ये है गरीबी का हाल, 19,300 रुपए के लिए लोग ऐसा खौफनाक कदम उठा रहे हैं.
फिर आएंगे न्यूज एंकर जो चिल्लाएंगे कि हम चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं... सॉरी, अब तो छठवीं अर्थव्यवस्था हो गए हैं.
ये है असल भारत
नारी वंदन बिल – वादा बड़ा, टाइमिंग उससे भी बड़ी! 😄
कहते हैं राजनीति में timing बहुत मायने रखती है…
और इस बिल ने तो ये बात साबित भी कर दी!
सालों से इंतज़ार में पड़ा था,
पर जैसे ही चुनाव का मौसम आया —
“नारी सम्मान” का मौसम भी आ गया 🌸
बिल कहता है 33% आरक्षण मिलेगा,
पर साथ में एक छोटा सा Terms & Conditions भी है:
➡️ पहले जनगणना
➡️ फिर परिसीमन
➡️ फिर कभी लागू होगा
मतलब अभी के लिए सिर्फ घोषणा का आनंद लें 😄
नेताओं का logic भी गजब है —
“आज वादा कर देते हैं,
कल की सरकार देख लेगी!”
फिर भी उम्मीद तो रखनी पड़ेगी,
क्योंकि अगर ये सच में लागू हुआ,
तो वही वादा सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाएगा।
तब तक —
नारी सम्मान का ऐलान जारी है,
और लागू होने की तारीख ‘जल्द ही’ पर अटकी है! 😉