I've been facing pathetic internet speed and call connectivity issues from last 15 days. Multiple complaints got no solution, 108 n 199 are chatbot only & had been completely unhelpful. Anyone hearing or porting out is only solution ? @reliancejio@JioCare
Chaudhary Bansilal was the architect of modern Haryana. His thought process was clear: no caste, no religion, no narratives of अल्पसंख्यक, वंचित, पिछड़ा,शोषित or दलित समाज. These were the people who brought prosperity through peace and harmony. Only development. Today, however, we only hear about reservations, caste- and religion-based politics and freebies. Such inclusive politics has no place anymore. Modern politics is full of divisive tactics, appeasement, and practices of corruption that must be challenged. We need more Bansilal.
१. सामान्य वर्ग के निर्धन विद्यार्थियों को फॉर्म की फीस में छूट हो, हॉस्टल/एडमिशन सहित हर उस जगह छूट हो जहाँ अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को छूट मिलती है। आप हर समाज को जाति के आधार पर आरक्षण भी देते हैं और फिर उसे उसी जाति के आधार पर निर्धन मान कर फीस में भी छूट। सामान्य वर्ग को कम से कम आर्थिक आधार पर सरकार हर स्तर पर वैसी ही आर्थिक छूट दें जो SC/ST को उपलब्ध है।
२. सीटें बढ़ी हैं, यह सत्य है, पर जनसंख्या और साक्षरता भी बढ़ी है। और सीट इसलिए नहीं बढ़ी थी कि भविष्य में भरेंगी, बल्कि इसलिए कि पहले बहुत ही कम थीं। इसलिए, प्रतिभाहीन लोगों को जबरन सरकारी कॉलेजों में चार नंबर पर भरने की जगह, उन सीटों की एक न्यूनतम पात्रता निर्धारित हो, यदि आरक्षित उसे पूरा करते हैं तो उत्तम, अन्यथा अनारक्षित से उसे भरा जाना चाहिए।
३. धर्मेन्द्र प्रधान जैसे नकारों को नकारे मंत्रालय दें, न कि ऐसा जिससे भारत का भविष्य तय होता है। ऐसे हर मंत्री जो निकम्मे हैं, उनसे त्यागपत्र तो ले ही लिया जाना चाहिए।
४. यह स्वीकारिए कि आपने एक कुकृत्य किया है, और लगातार सामान्य वर्ग उसका शिकार होता रहा है। अपने भाषणों से ‘पीड़ित, वंचित, शोषित’ का सामूहिक गायन बंद कीजिए। अपने भाषणों को सही अर्थों में सर्व समावेशी बनाइए।
५. आपके लाभार्थी वर्ग में, अब सामान्य वर्ग के निर्धन छात्र-छात्राएँ होने ही चाहिए। उन्हें 40% पर समेट कर आप विकसित भारत का झुनझुना नहीं बजा सकते।
६. हर राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह पास होते सामान्य वर्ग के हिन्दुओं को अपराधी बनाने वाले कानून पर आपकी पार्टी के वकील उसका प्रतिकार कोर्ट में करें। यदि आप ऐसा नहीं कर पाते तो यह सत्य हो जाता है कि आप सामान्य वर्ग की प्रतिभा का सामूहिक संहार करना चाहते हैं।
७. सामान्य वर्ग एक बहुत बड़े हिस्से का मोहभंग हो चुका है। उनका विश्वास यूजीसी पर मोदी/भाजपा की चुप्पी के कारण डिग चुका है। बाकी का ‘सत्कार्य’ आपके आइटी सेल के गिरहकट लोगों ने वैयक्तिक आक्षेप से ले कर, तार्किक काउंटर की जगह, निजी जीवन को निशाना बना कर कर ही दिया है। तार्किक काउंटर लोग भूल जाते हैं, पर्सनल अटैक याद रहता है।
८. सामान्य वर्ग अब किसी भी प्रकार का चूरण नहीं फाँकेगा, उसे तंत्रगत सुधार चाहिए। ‘बदला लेंगे’ की बात कितनी उचित है, वह चर्चा का विषय है, पर उन्होंने ऐसा सोच लिया है, इससे आप इनकार नहीं कर सकते। उसे अब मोदी/भाजपा की हार, अपमान आदि पहले की तरह ‘पर्सनल’ नहीं लगते। वो कह रहा है कि जब हमारा भविष्य ही नहीं रहेगा तो हम तुम्हारे नेतृत्व का करेंगे क्या?
९. जो बेचारे ‘इन्हें पार्टी का काम मत दो’ की धमकी दे रहे हैं, वो ऐसा करवा कर देख लें, लोगों के घर के चूल्हे बंद नहीं होंगे। वैसे भी पार्टी का विश्वास लल्लनटॉप जैसों पर अधिक है, वो लोग काम कर ही देंगे।
यदि आपको हर बार यह लिखना पड़ रहा है कि ‘ये सब तो इसलिए हो रहा है क्योंकि विपक्षी दरार बढ़ाना चाहते हैं, फलाँ राज्य में हराना चाह रहे हैं, षड्यंत्र समझो’, तो आप बार-बार वही क्यों कर रहे हैं जिससे दरार बढ़ने की संभावना होती है?
कब तक अपनी घटिया नीतियों को ऐसे छुपाते रहोगे कि ‘वो तो यही चाहते हैं कि हम लड़ जाएँ’। तो भाई वैसा करना बंद कर दो। नहीं करोगे और कोई जाति आपको नकार देगी, तो यह दोष उस जाति का नहीं है, आपका है कि आपने वह कारण दिया। कारण देना बंद करो। नियम लाने से पहले सोचो कि यदि यह आया तो क्या होगा।
SC/ST Act को केवल पलटा भी जा सकता था, लेकिन आपने उसे और घटिया बनाया। वही काम अभी भी किया गया है। बात यह नहीं है कि ऐसे कानूनों का क्या होता है, बात यह है कि आप ऐसे हथियार बनाते क्यों हो जो मिसयूज हो?
मध्यप्रदेश में ‘हत्यारा जातिवादी राम’ का एफिडेविट कैसे बचा लोगे? UGC वाले को ले कर जितनी भी गोल-गोल बातें कर लो, यह केवल और केवल कॉन्ग्रेस के रोहित वेमुला एक्ट का विस्तारीकरण है। ध्यान रहे कि भाजपा का कोई नेता इस एक्ट को ले कर कोर्ट नहीं गया है कि कैसे कोई राज्य यह कानून बना सकता है।
तो @BJP4India के इंटेंट पर संदेह होना ही चाहिए। इन्होंने हर उस जाति समूह को अपना दास मान लिया है, जो प्रतिकार नहीं कर पाते। ये लोग प्रतिभा-विरोधी, अम्बेडकरवादी पार्टी हैं।
Pathetic @flipkartsupport experience 😅 My order’s been stuck at the local @shadowfax_in office & they show fake delivery attempt daily by giving a missed call at 10pm. don’t send by shadowfaX and use e-kart instead, please.
@help_delhivery Package is returning bcoz ur agent refused to deliver in a week and asked for pickup from office . So u better close ur office if u wanna keep such agents
A Haryana roadways bus takes maximum 5 hours from Delhi NCR to reach Fatehabad but @shadowfax_in shipment haven’t reached in 9 days and still on the ways.. perhaps @shadowfax_in uses bullock cart in days of drones for delivery.. pathetic service
After reading countless stories of businessmen harassed or extorted by customs, one thing is clear: bureaucracy thrives on complexity.
Complex rules aren’t inefficiency, they are actually designed that way. Every ambiguity, overlapping clause, and poorly defined term becomes a tool for selective interpretation. The more confusing the system, the greater the control of those who made them, and the wider the opportunity for corruption.
Suppose you import an electronic device with batteries included in the box. Logically, it should be treated as one unit for duty. But the ambiguity allows an officer to claim the batteries fall under a different clause and attract separate duty. Since you assumed they were part of the device, you didn’t pay extra, now the officer seizes it and demands a bribe to release it.
Consider taxation, it's so complex that even trained accountants debate exemptions and credits. Property registration, licensing, fire or environmental clearances, rules are so tangled that a simple application can take months, repeated visits, and opaque “fees” that mysteriously smooth the process.
माननीयों की कोठी में लगे झूमर का एक नट बोल्ट भी गिर जाये तो लगाने वाले की खाल खिंचवा लेते हैं,
लेकिन सरकारी स्कूल की पूरी पूरी छत भसक जाती है एक इस्तीफ़ा तक नहीं होता।
बेहया!!
छत चार खंभों पर टिकी होती है👨🎨👨🎨
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और
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चारों खंभों में जंग लग चुका है।🙂↕️
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अफ़सोस हर खंभा ख़ुद के बचाव की बजाय दूसरे के पतन को देखकर ख़ुश है 🤔#लोकतंत्र
मैं राजनीति पर लिखना बहुत अवॉयड करता हूं पर बात जब अस्तित्व की हो तो लिखना मजबूरी है।
1947 से 1991 के भारत और 1991 से बाद के भारत में बहुत फर्क आया है।
ये फर्क आया मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद।
न सिर्फ उन खेती किसानी में मजबूत जातियों को आरक्षण मिला जिनसे जमीन के मामले में दलितों के हित सीधे टकराते थे, बल्कि मुस्लिम संप्रदाय को भी ओबीसी सर्टिफिकेट बनवा के आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी तंत्र में घुसने का ज्यादा मौका मिला।
इस्लाम में जाति नहीं का भांडा केवल इसी बात से फूट जाता है जब आप अन्य पिछड़ी जातियों के तहत बने नद्दाफ धुनिया, दर्जी, चिक, शेख मंसूरी के बने जाति प्रमाणपत्र देख लेते हैं।
अब मुस्लिमों में जातिबोध जाति गर्व ऐसा है कि अनुसूचित जाति के खुद को बोल नहीं सकते, पर ओबीसी बनने में शर्म नहीं आती।
1991 के बाद ओबीसी मुस्लिमों की सरकारी तंत्र में घुसपैठ का प्रभाव ही था जकात फाउंडेशन जैसे केवल मुस्लिम विद्यार्थियों को यूपीएससी परीक्षा की तैयार करने को पढ़ाने वाले संस्थानों की सफलता।
खैर!
मंडल आयोग की सफलता के बाद भारतीय समाज में जातिवाद का जो जहर बोया गया, वोट बैंक की राजनीति के लिये, उसमें सामान्य जातियों के लोगों को नीचा दिखाना और परेशान करना एकमुश्त वोट बैंक पाने की गारंटी शुदा योजना हो गया।
ओबीसी और दलित दोनों जातियों की राजनीति करने वाले दलों के वोट बैंक भले जमीन पर एक दूसरे से भिड़ रहे होते हों, पर उन्हें नीचा केवल सामान्य जातियों को दिखाना था वोट के लिये।
देश का प्रधानमंत्री खुल के अपने को पिछड़ा जाति बताने लगा।
बाबा रामदेव जैसे हर जाति के आइडियल योगाचार्य जीत टीवी पर अपनी जीवनी में दिखाने लगे कि उन्हें ब्राह्मणों ने पानी नहीं पीने दिया।
मैं आज भी ऐसे गांव की तलाश में हूं जहां ब्राह्मण यादवों को अपने यहां पानी न पीने देते हों।
खैर।
एस सी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के जांच से पहले गिरफ्तार न करने वाले आदेश को पलट देने के लिये विधेयक ला देने वाले भाजपाई जब सामान्य जातियों के लिये कष्टकर साबित हो सकने वाले कर्नाटक के रोहित वेमुला एक्ट पर सामान्य जाति के लोगों से सड़कों पर उतरने को कहते हैं तो हँसी को भी हँसी आ जाती है।
भाई मंडल आंदोलन , सामाजिक न्याय के पुरोधा तो तुम भाजपाई 1991 से हो, सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर सामान्य जाति का उत्पीड़न तुमने ही शुरू किया,neet का आरक्षण मसला अभी का ही था। ये सब तो तुमने ही किया था न?
सामान्य जातियां जैसे तब सर्वाइव कर गईं, अब भी कर ही जायेंगी।
हमें पता है कि कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और पार्टी, सब हमारे खून के प्यासे हैं अपनी सत्ता के लिये।
तो हम अपना देख लेंगे।
हमारी चिंता मत करो।
हम हमारे लिये आपकी चिंता वो एस सी एक्ट वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश में देख चुके हैं।
हम कुछ न कुछ हल निकाल लेंगे, भले वो हल देश छोड़ने का क्यों ही न हो।