मनुष्य जो होना चाहता है, वह होने से उसे क्या रोकता है? समाज, परिवार या शायद उसकी अपनी सीमाएँ। वह न हो पाना उसे घुन लगी लकड़ी की तरह कमज़ोर बना देता है — जर्जर और अर्थहीन।
• ईशा झा
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इशिगुरों का ‘नेवर लेट मी गो’ एक ऐसा उपन्यास है जिसके अनेक पाठ किये गए हैं। कुछ लोगों को ये एक डिस्टोपियन नॉवेल लगता है, कुछ को साई-फाई, कुछ लोग इसे बहुत विचलित करने वाला बताते हैं तो कुछ इसे एक प्रेम कथा कहते हैं।
— संजय व्यास
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