1. समिति का चूरन नहीं चाहिए, वापस लो, संशोधित करो
2. स्पष्ट लिखो कि किसी पर भी जातीय टिप्पणी, राजनैतिक नारेबाज़ी, दीवारों पर ग्रैफ़िटी पर समान दंड होगा, कोई भी 'विशेष कर' जैसे शब्द नहीं
3. जाँच होने तक सुरक्षा दो, बच्चे निलंबित न किए जाएँ
4. कैंपस में पुलिस नहीं चाहिए, जब तक अपराध जघन्य/गंभीर ना हो
5. झूठा केस बनाने वाले को कॉलेज से निकाला जाए, आर्थिक दंड और जेल (क्योंकि उद्देश्य भविष्य की हत्या होती है)
कैंपस में किसी भी प्रकार का जातिगत भेदभाव गलत है, और भारत में पहले ही कई छात्र इसके दुष्परिणाम झेल चुके हैं। लेकिन क्या कानून को समावेशी नहीं होना चाहिए और यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि सभी को समान रूप से संरक्षण मिले? फिर कानून के लागू होने में यह भेदभाव क्यों? झूठे मामलों की स्थिति में क्या होगा? दोष का निर्धारण कैसे किया जाएगा? भेदभाव को कैसे परिभाषित किया जाए- शब्दों से, कार्यों से या धारणाओं से?
कानून की लागू होने की प्रक्रिया स्पष्ट, सटीक और सभी के लिए समान होनी चाहिए।
अतः कैंपस में नकारात्मक माहौल बनाने के बजाय, मैं आग्रह करती हूँ कि UGC की यह अधिसूचना या तो वापस ली जाए या उसमें आवश्यक संशोधन किया जाए।