IPS retd. A beginner with science, ended up with humanities. Finds peace in the cradles of literature. Poet,author, lyricist & singer. . Trustee,Yapanchitra Cal
भोजपुरी गायकी के प्रतिमान - मोहम्मद खलील .
- ई. एस डी ओझा
बात सन् 1977 के ह . गोरखपुर रेडियो स्टेशन से एगो भोजपुरी गीत आवत रहे . गीत के बोल रहे - आहि रे बालम चिरई . अइसन बुझाइल कि कान में मिश्री घोलाता . गायक रहले मोहम्मद खलील . तब से हम मोहम्मद खलील के मुरीद बन गईनी .
मोहम्मद खलील से हमार अचानक मुलाकात भइल लद्दाख में सन् 1987 में . ओह घरी ऊ लद्दाख महोत्सव में गावे खातिर आई रहले आ हमार लेह में पोस्टिंग रहे . ओइजा हम उनकरा से आपन मनपसन्द गीत आहि रे बालम चिरई गावे खातिर फरमाईस कयनि . गीत के फरमाईस पूरा कइके उ बेचारु हमरा के बहुत कृतार्थ कइले .
उनका से बातचीत कइला पर पता चलल कि उनकर घर बलिया ह . ओ घरी गाँव के भी नाव बतवले रहले . अब नइखे मन परत . भोजपुरी में अश्लीलता आ गइला से उ बहुत दुःखी रहले . ऊ रेलवे में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी रहले . ओ घरी बलिया में झंकार पार्टी के तूती बोलत रहे . उनकर पहिला गीत "अजब सनेहिया बा तोर निरमोहिया ..... हवे . ई गीत के लिखे वाला पंडित सीताराम चतुर्वेदी हवें . ओकरा बाद उ महेन्दर मिसिर के लिखल गीत "अंगुरी में डसले बिया नगिनिया , ए ननदी दीयरा जरा द ." गवले . ई गीत से ऊ बहुत मशहूर हो गइले .
सन् 1965 में उनकर ट्रांसफर इलाहाबाद हो गइल . इलाहाबाद आई के ऊ एकदम इलाहबाद के होके रहि गइले . यहाँ फेरु से झंकार पार्टी बनल . मोहम्मद खलील के हारमोनियम बजावे ना आवत रहल हा . ए कमी के दूर करे के खातिर उनकरा के साथी मिलले चन्दर परदेशी . भोला नाथ गहमरी के गीत " अहि रे बालम चिरई ..." के गाई के ऊ अमर कई दिहले . कहल जाला कि उनकर मखमली आवाज के चतुर चितेरा बॉलीवुड के महान संगीत निर्देशक नौशाद भी रहले . ई मोहम्मद खलील के गीतन के कमाल रहे कि लोग समझे लागल कि भोजपुरी में भी साहित्य बा , लालित्य बा . इहे कारण रहे कि हिंदी के मूर्धन्य गीतकार उमाकांत मालवीय , शम्भुनाथ सिंह , उमा शंकर तिवारी आदि लोग उनका दरबार में हाज़िरी देबे लागल लो .
मोहम्मद खलील के ई खासियत रहे कि ऊ आपन हर प्रोग्राम से पाहिले सरस्वती बन्दना करत रहले हा . ई भारत के गँगा जमुनि तहजीब के बेमिशाल उदाहरण बा . माँ शारदा के पुकार ऊ अपना गीतन में रस भरे खातिर करत रहले हा -
"माई मोरा गितिया में अस रस भरि दे ..."
उनकर गावल गीतन में महेंदर मिसिर , भोलानाथ गहमरी , मोती बी ए , हरि राम द्विवेदी , राहगीर बनारसी व बेकल उत्साही आदि गीतकार लो के प्रमुख योगदान रहे . मोहम्मद खलील जब तक जियले अश्लीलता से कभी समझौता ना कइले. हा कुछ लोग ई कहेला कि जनता जवन सुनल चाहेले उहे हमनी के सुनावे क परेला . खलील त कबो अश्लील ना गवले लेकिन जनता उनका के खूब सुनत रहलि हा .
ये गायक के जोड़ के आज ले तोड़ ना मिलल . उनकर मिश्री जइसन खनकदार आवाज अउर लय में उतार चढाव व एक सीमा पर जाई के ठहराव बड़ा अद्भुत रहल हा . आजु रउआ सभे के सुन के आश्चर्य होइ कि ये महान कलाकार के बाजार में कवनो सी डी / कैसेट उपलब्ध नइखे . हो सकेला की आकाशवाणी पटना या लखनऊ में कवनो इनकर गीतन के सी डी या कसेट होखे. भोजपुरी समाज से हमार अपील बा कि ये महान कलाकार के गीतन के संरक्षण व सम्बर्द्वन खातिर ठोस कदम उठावे .
मधुमेह के बिमारी के वजह से सन् 1991 में इनकर मात्र 55 साल के उमिर में मौत हो गईल . जब इलाहबाद में इनकर जनाजा उठल त ओमें समाज के हर तबका के लोग रहे . मीनाकुमारी के शब्दन में एगो श्रद्धान्जलि :-
राह देखा करेगा सदियों तक जमाना ,
छोड़ जायेंगे जब ये जहाँ तन्हा .
बहुत ही अच्छा आलेख, नवीन!... भाषाविद् या भाषा वैज्ञानिक कभी भी किसी भाषा को 'बोली' नहीं कहते। यह अधम आचरण केवल साहित्य के लोगों में प्रचलित है जो कुछ शोहरत पाते ही अपने को भाषाओं का पुरोधा मानने लगते हैं।
लिपि आ भोजपुरी के लिपि
जिसकी लिपि नहीं हैं उसे बोली कहने का रिवाज़ है. ऐसे में अगर देखें तो अंग्रेज़ी की भी लिपि नहीं है वह रोमन इस्तेमाल करती है.
- गणेश देवी ( मुख्य संयोजक, पीपुल लिंगुइस्टिक सर्वे )
लिपी के ले के भोजपुरी प भा अउरी कई गो भाषा प अक्सर लोग बोल फेंकेला , असल मे भारत मे अईसन कई गो भाषा बाड़ी स जवन देवनागरी मे लिखाली स , जईसे मराठी कोंकणी नेपाली मैथिली राजस्थानी आदि । हो सकेला भोजपुरी के जईसे कैथी लिपि रहे ओइसही एकनियो के लिपी होखे ( मैथिली के तिरहुता रहे) बाकि आज के डेट मे एकनी के देवनागरी मे बेसी लिखात बाड़ी स आ निकहा एकनी के संविधान के भा अकादमी के भषो बनल बाड़ी स ।
विश्व के सबसे बड़ भाषा अंगेजी के आपन लिपी नईखे, गणेश देवी जी एहि बात के कहे के कोशिश करत बानी , भारतो मे ढेर लोग रोमन लिपी मे हिन्दी लिखेला , बालीउड सिनेमा के लमसम मय स्क्रिप्ट रोमन मे लिपि मे रहेला , भारत के कतने नेता आपन भाषण रोमन लिपी मे लिखवा के देले । भोजपुरी के बिदेस में रोमन लिपि में लिखल जाला । (मूल रुप से सरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद एंड टोबैगो आ बहुत हद ले मॉरिसस तक में )
अंग्रेज साहित्यकार चाहें जब होखे अपना साहित्य मे भारतीय भाषा के रेफरेंस चाहे उ लोकगीत के होखे भा वाक्य के होखे रोमन लिपी मे देले बाड़े जवन कि साहित्य के हिस्सा बा । यानि कि भोजपुरी लोकगीत के रेफरेंस जदि हार्ले भा ग्रियर्सन देले बाडे त उ रोमन मे । इहे ना कइ गो भोजपुरिया साहित्यकार जे अंग्रेजी किताब भोजपुरी प लिखले बा ओह मे मय लोकगीत रोमन लिपि मे बा ।
खरोष्ठी आ ब्राम्ही लिपि भारत भा जम्बूद्वीप मे सबसे प्राचीन पुरातन लिपि ह , लोग हड़प्पा आ सिंधू से एह दुनो लिपि के जोड के देखेला । शायद , खरोष्ठी जवन प्राकृत भाषा के लिपि रहे , त ब्राम्ही संस्कृति भाषा के ।
ब्राम्ही से गुप्त लिपि से नागरी से देवनागरी लिपि बनि के आइल । जदि गुजराती , गुरुमुखी आ बंगाली लिपि के देखल जाउ त कैथी एह तीनो के मिलल रुप लउकेले ।
बंगाली लिपि मे , बंगाली , असमी आ मैनपुरी भाषा के लिखल जाला । नागरी के त मालुमे बा । दक्षिण मे सिंहला , मलयाली , ग्रंथ ( पल्लवा ) लिपि आदि रहे बाकि इ मय कुल्हि के उत्पति खरोष्ठी आ ब्राम्ही से ढेर प्रभावित बाड़ी स ।
एगो सिंधु लिपि कहाला जवन ब्राम्ही खरोष्ठी के गझिन रुप ह आ हो सकेला सिंधु के फैलाव ही ब्राम्ही आ खरोष्ठी ह ।
लिपि के ले के जानकारी बहुत गहिराह नइखे आ ना हम एह लिपि प गहिराह काम होत देखत बानी । बहुत सारा लिपि भारत मे मरि गइल बाडी स भा मरे के कगार प बाड़ी स ।
एहि से आगे से भोजपुरी के ले के लिपि- लिपि प लीपे वाला के लिबि लिबि कइ दिहल करीँ ।
- नबीन कुमार
फोटो मे - विश्व के कुछ अलग अलग भाषा के अलग अलग लिपि में लिखल गइल बा । लिपि से ना वाक्य के माने बदलेला ना भाव ! लिपि त भाषा के पढे के आ लिखे के तरिका ह , चिन्ह ह आकार ह ।
राम नाम रस बरसे रे, भीगे तनवा अउर मनवा
अलख निरंजन जागो रे, अपने भीतर हर जनवा...
पोथी-पतरी दूर धरो अब मन की गांठ उघारो
साहिब मिलीहें सहजे तुमको, भीतर झांकी मारो।
राम रहीम के एके धारा, नाम भले दो भाई,
सूफी सुर में तुलसी गावे, कबिरा तान लगाई।
नमन करत हमरो कुछ सबदन के अरग 💐🙂↕️
भोजपुरी के आदि कवि , कबीर दास जी के जयंती प बेर बेर नमन ।
कबीर के साहित्य के अध्ययन लगभग सब केहू कइले बा , बाकिर कबीर के भाषा के अध्ययन पुरहर रुप से शायदे केहू कइले होइ। दु चार पाना के जे भी अध्ययन कइले बा उ बेमेल भाषा / खिचड़ी / सधुक्कड़ी कहले बा आ जब आधुनिक भारत के जनम भइल त कबीर के भाषा के हिन्दी बतावल गइल ।
बेमेल भाषा , खिचडी भा सधुक्कड़ी भाषा के बात बुझाता बाकिर हिन्दी कवना आधार प कहल गइल एकर कवनो आधार नइखे । बेमेल भा खिचड़ी भा सधुक्कड़ी के माने कि क गो भाषा एक संगे । जाहिर बा कबीरदास अपना समय के धाकड़ गुरु रहले , घोषित ना आधिकारिक ना , अपना ज्ञान के वजह से गुरु रहले । कहे के माने इ बा कि कबीर से सीखे खातिर कइ जगह से लोग आइल आ उनुकर चेला बनल लो । जाहिर बा मय चेला लो बुझल लो कबीर के भाषा में बाकि जब उहे चीझू आगे परी बढल त केहू मे राजस्थानी जुड़ल केहू में ब्रज त केहू में पंजाबी त केहू में अवधी त केहू में हरियाणवी त केहू मे कुमाँयुनी आदि ।
बोली हमरी पुरब की , हमें लखे नहीं कोय ।
हमके तो सोई लखे ,धुर पुरब का होय ॥
रुचिकर बात बा कि एह दोहा के भी माने कतने साहित्यकार लो अपना अपना हिसाब से कइल । माने पुरब के माने का का निकालल एकर गिनती नइखे । असल में कबीरदास साहित्य जगत के मधु हवे आ साहित्यकार लो माछी । खैर हम निष्कर्ष ना निकालब कि कबीर के भाषा का ह , बाकि अतना तई बा आ एह बात के सिक्ख धर्म भी मनले बा कि कबीर के भाषा भोजपुरी ह , आ कबीर के भोजपुरी के आदिकवि के रुप में देखल जा सकेला । जदि कबीर के मोडिफाइड दोहा छन्द आ साखी आदि में कुछ अंश के छोड़ दिहल जाउ त लगभग मय के मय भोजपुरी में बा , उहो तब जब ओरिजनल होखे । फलानवा शर्मा आ चिलानवा दुबे भा फलानवा शुकुल उपधिया आदि के मुखारविंद आ लिखाड़विंद से जवन निकलल बा उ बस हिन्दी खाति अलगा से उपटल प्रेम के कारण निकलल बा ।
चली हमनी के बोलला से कुछ होखे वाला नइखे , जेकरा करेजा मे जवन बइठा दिहल बा उ जम्ह के दीया मतिन फफा के जरत बा । तबो , कबीर के पढत घरी , ज हाली त हाली कुछ नया जाने के मिलेला ! जइसे अब हई गीत देखी, दुर्गाशंकर प्रसाद जी कहत बानी कि जंतसार के राग ह । जंतसार के राग , जानकार आदमी एह प ढेर बताई बाकि जंतसार मे , एगो मेहरारु गीत कढावे ली , फेरु समूह में ओह के रिपीट कइल जाला , हर लाइन के अंतिम वाक्य में रेघारी पारल यानि कि घींचल जाला आ एह में उ मेहरारु ना गावेली जे कढवले रहेली ।
कबीरदास रहस्यवाद के साहित्यकार रहले , बुझौव्वल जइसन साहित्य के रचना कइले , यानि कि कबीर के बात बुझे खाति रउवा कबीर के लेखा सोचे के परी ।
त कबीरदास जी के एगो जंतसार के देखल जाउ - जंतसार में निर्गुण !
सुरति मकरिया गाड़हु हो सजनी - अहे सजनी ।
दुनो रे नयनवाँ जुअवा लखहु रे की ॥
मन धरु मन धरु मन धरु हे सजनी - अहे सजनी ।
अइसन समइया फिरि नहिं पावहु , रे की ॥
दिनदस रजनी हे सुख करु सजनी - अहे सजनी ।
एक दिन चांद छिपइहनि - रे की ॥
संगहि अछत पिय भरम भुलइलों - अहे सजनी ।
मोरे लेखे पिया परदेसहिं रे की ॥
नव दस नदिया अगम बहे सोतिया - अहे सजनी ।
बिचहिं पुरइन दल लागल , रे की ॥
फूल इक फूलले अनूप फूल सजनी - अहे सजनी ।
तेहि फूल भवँरा लोभाइल - रे की ॥
सब सखि हिलमिल निज घर जाइब - अहे सजनी ।
समुद लहरिया समाइब रे की ॥
दास कबीर यह गवलें लगनियाँ हो - अहे सजनी ।
अब तो पिया घरवा जाइबि - रे की ॥
कबीरदास के अधिकतर रचना भोजपुरी में बा , कबीर के सर्वोत्तम रचना निर्गुण ह । कबीरदास निर्गुण में सोहर लिखले बाडे , जंतसार लिखले बाडे निर्गुण के भाव में क गो पारम्परिक गीत लिखले बाड़े । एह सबके अलावा निर्गुण के भाव में निर्गुण लिखले बाडे । निर्गुण के भाव में बिदाई गीत करेजा काढे वाला होला जवनन से लगभग मय भोजपुरिया समाज के परिचय बा । नीचे दिहल गीत निर्गुण के भाव में ही बा , जवना में शुरु में विरह , फेरु सोहर , बाद में खेलौना आ अंत में समर्पण के भाव बा ।
छतिया से उठेली दरदिया पिया के जगाव बारी हो ननदी ।
सैंया मोहे सुते ए राम प्रेम के अटरिया ।
खोल ना केवरिया ए राम पुछी दिलवा के बतिया , बारी हो ननदी ।
आधी-आधी रतिया ए राम, धरमवा के बेरवा ।
जमले होरिलवा धगरिनि बोलाव बारी हो ननदी ॥
सब अभरनवा ए ननदी बान्हि ल ना मोटरिया ।
समुझि-समुझि के डेगवा डाल बारी हो ननदी ॥
बाड़ा ए सुदिनवा ए जमले होरिलवा ।
अझुरल केसिया सवार बारी हो ननदी ॥
दास कबीर ए राम गावे पद निरगुनवा ।
हरि के चरनिया अब चित लावहु रे ननदी ॥
बुझौव्वल, कहाउत से भरल दर्शन आ रहस्यवाद के अदभुत परतोख मिलेला कबीर दास के रचनन में । खास क के कबीर के गेयता वाला हर रचना के आधार भोजपुरी बड़ुवे ।
पागल कहेला ना रे लोगवा पगल कहेला ना,
हम ता नैहर के बनि रसिलि कि लोगवा पागल कहेला ना।
बारह गज के चोलि सिलवइनी, साठ गज के साड़ी,
तापर लोगवा मुड़ मुड़ देखे , जईसे बदन उघारि,
कि लोगवा पागल कहेला ना।
डोलिये में अइनि डोलिये मेंं गइनि, डोलिये मे रह गइले पेट,
सासु जे से कभी नाहिं बोलनी, बलमा से ना कभी भेंट,
कि लोगवा पागल कहेला ना।
कहत कबिर सुनो भाई साधो ,ये पद है निरबानि
जे येहि पद के अर्थ लगावे,वोहि पुरुस है ग्यानि..
कबीर के कुछ गीत जवन 600 बरिस बादो ओतने मारक, सामयिक आ सटीक बा, जे तब रहे -
1- मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा
मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।। टेक।
आसन मारि मंदिर में बैठे, नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।।
कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।।
जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले, काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।।
मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगौले, गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।।
कहहि कबीर सुनो भाई साधो, जम दरबजवाँ बाँधल जैवे पकरा।।
2-कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।। टेक।।
चंदन काठ कै वनल खटोलना, तापर दुलहिन सूतल हो।।
उठो री सखी मोरी माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूसल हो।।
आये जमराज पलंग चढ़ि बैठे, नैनन आँसू टूटल हो।।
चारि जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धू-धू उठल हो।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, जग से नाता टूटल हो।।
3- तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में
तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में।। टेक।।
कोई ढूँढे पूरब कोई पच्छिम, कोई ढूँढ़े पानी पथरे में।।
सुर नर अरु पीर औलिया, सब भूलल बाड़ै नखरे में।।
दास कबीर ये हीरा को परखै, बाँधि लिहलैं जतन से अँचरे में।।
4- का ले जैबो, ससुर घर ऐबो
का ले जैबो, ससुर घर ऐबो।। टेक।।
गाँव के लोग जब पूछन लगिहैं, तब तुम का रे बतैबो ।।
खोल घुंघट जब देखन लगिहैं, तब बहुतै सरमैबो ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, फिर सासुर नहिं पैबो ।।
5- कँवल से भँवरा विछुड़ल हो, जहँ कोइ न हमार
कँवल से भँवरा विछुड़ल हो, जहँ कोइ न हमार ।।
भौंजल नदिया भयावन हो, बिन जल कै धार ।।
ना देखूँ नाव ना बेड़ा हो, कैसे उतरब पार ।।
सत्त की नैया सिर्जावल हो, सुकिरत करि धार ।।
गुरु के सबद की नहरिया हो, खेइ उतरब पार ।।
दास कबीर निरगुन गावल हो, संत लेहु बिचार ।।
बेर बेर नमन भोजपुरी के आदि कवि के ।
भोजपुरी के संवैधानिक आ साहित्यिक (अकादमी) मान्यता
" एक हाली रउवा अपना छाती (करेजा / दिल ) प हाथ ध के आंख मुदि के सोची कि आज ग्रियर्सन जदि रहिते आ भोजपुरी भाषा वाला समाज के देखिते त का उहे बात कहिते जवन उ ओह घरी (1880-90 के आसपास) कहले रहले ? "
सोच लेहनी ? अच्छा ग्रियर्सन के बात मालूम नइखे ?
ग्रियर्सन तब कहले रहले कि -
" Bhojpuri is the practical language of an energetic race."
यानि कि
" भोजपुरी, एगो उर्जावान समूह / जाति के व्यवहारिक भाषा ह जिअतार भाषा ह"
उ आगे कहले रहले कि -
" जब हम भोजपुरिया क्षेत्र में गइनी आ ओजुगा के लोगन के देखनी त हमरा इ बुझाइल कि बिना कवनो ठोस आ गोट साहित्य के संरक्षण के इ भाषा अपना के जिअतार रखले बिआ । एगो अइसन भाषा जवना के राजकीय सहजोग नइखे , क्षेत्र के प्रबुद्ध वर्ग के समर्थन नइखे बावजूद एकरा , लोकभाषा के हर गुण धर्म के अपना भीतरी समेटले बिआ । इहे ना बिहारी भाषा में कम लिखित साहित्य भइला के बादो एह भाषा के बिकास सबसे बेसी भइल बा । "
अब एक हाली सोची कि ग्रियर्सन, भोजपुरी भाषा आ भोजपुरिया लोगन खातिर आज से 150 साल के आसपास जवन बात कहले रहले, उ बात आज कतना सांच बा ? एक हाली फेरु से आंखि मुदि के आ करेजा प तरहथी के साट के अपना दिल के धड़कन के महसूसियावत सोची कि, वर्तमान समय में भोजपुरी भाषा आ एह भाषा वाला लोग, एह भाषा के बारे में का सोचत बा ??
घबड़ाई जनि, गोड़ के चई, जमीनिये प सटल रही, धंसी - भंसी ना ।
असल में पिछला 20-21 बरिस से भोजपुरिया समाज के लोग भोजपुरी भाषा के ले के बस एकही चीज सोचेला उ ह, भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता । अइसन नइखे कि एह से पहिले भोजपुरिया समाज के लोग, संवैधानिक मान्यता के बात ना करत रहे, बाकिर अब लेखा ना ।
आखिर इ 'अब लेखा ना' के माने का हो गइल ?
असल में अब का होता कि, ना भोजपुरी में बोले के बा, ना भोजपुरी में आपन दैनिक बात-बतकही लिखे के बा, ना भोजपुरी के किताबिन के पढे के बा, बाकिर इ मय लो भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता जोहता ।
एक हाली फेरु अपना तरहथी के करेजा से साटि के बिना आंखि मुदले देखे के कोशिश करीं कि जवना भाषा में ना रउवा लिखब, ना रउवा पढब , ना रउवा बोलब ओह भाषा के संवैधानिक मान्यता रउवा काहें जोहत बानी ?
पहिले लोग संविधानिक आ साहित्यिक (साहित्य अकादमी) के मान्यता जोहत रहे काहें कि जवन भोजपुरी में लिखा पढा रहल बा ओह के संरक्षण मिले, ओह के बढावा मिले , ओह लिखलका पढलका के देस दुनिया सराहे, बड़ाई करे भा ओकर आलोचना करे । यानि कि जवन लिखात पढात बा उ सभका सोझा जाई तबे नू ओह में नीमन बाउर के बात होई ? त ओह घरी कुछुवे लोग रहे बाकिर एह दिसाई उ लोग लागल रहे । इहो बात बा कि उहे लोग भोजपुरी के संवैधानिक आ साहित्यिक मान्यता के बात करत रहे ।
अब, साहित्य अकादमी से नॉन-संवैधानिक भाषा सभ के जब से साहित्य अकादमी चुने लागल त भोजपुरी ओह में शामिल हो गइल, एह से एह में केहू के कवनो प्रयास नइखे, इ शुद्ध रुप से ओह घरी के सरकार के फैसला रहे, बाकिर रउवा यानि कि भोजपुरिया लो का करत बा ?
रउवा भोजपुरी के नाव प जतना संगठन बाड़न स, प्रकाशन (किताब / पत्रिका प्रकाशित करे वाला संस्था) वाला से ले के साहित्य आ भोजपुरी संस्कृति के नाव प बनल संस्था, इ कुल्ह मय के मय लो भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के बात करेला । प्रकाशन वाला लो त भोजपुरी में किताबियो प्रकाशित करेला । बाकिर ओह किताबिन के प्रचार (जवन भोजपुरी में लिखाइल बिआ), हिंदी में करेला । आखिर भोजपुरी में लिखाइल किताब के प्रचार हिंदी में काहें ?
एहि तरे भोजपुरी में बेहतर गीत गावे के दावा करे वाला लोग जब ओह गीत के सोसल मिडिया प डालेला त ओह के प्रचार प्रसार खातिर भोजपुरी छोड़ के दुनिया के मय भाषा के प्रयोग करेला । अइसन काहें ? रउवा भोजपुरी के अधिकतर गायक गायिका के देख लिहीं उ लो अपना भोजपुरी गीतन के बारे में भोजपुरी में लिखत - बोलत ना लउकी ।
भोजपुरी में बी ए एम ए ओ मे कइल अनेकन लोग बा, दिन रात उ सोसल मिडिया प लिखत पढत बा, उ लो कतना भोजपुरी में लिखेला पढेला ? रउवा खुद देखीं कि भोजपुरी के कवनो पोस्ट / लेख प भा विडियो आदि प रउवा जवन कमेंट करेनी का उ भोजपुरी में रहेला ??
असल में हकीकत त इहे नू बा कि :
- हम भोजपुरी में बोलब ना
- हम भोजपुरी में पढब ना
- हम भोजपुरी में लिखब ना
- हम भोजपुरी में रोज के लिखित - मौखिक बतकही ना करब
बाकिर हम चाहत बानी कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता मिल जाउ ?? आखिर काहें आ कइसे ?
भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता काहें खातिर मिलो ?
जब रउवा पढे लिखे बोले बतियावे के नइखे त फेरु काहें खातिर संविधान-संविधान चिचिलात बानी ।
संवैधानिक मान्यता कवनो समुंदर मंथन से निकलल अमरित ना ह कि भाषा सभ के चटा दिहल जाई त भाषा कुल्ह अमर हो जइहन स । संवैधानिक मान्यता त बस ओह भाषाई आगि वाला चुल्हा के जरा के राखेले जवना के जरा के राखे वाला लोग लवना-लकड़ी के जोगाड़ खुद करेला । सैंवधानिक मान्यता आ साहित्यिक मान्यता मात्र सहयोगी के भुमिका निभावे-निबाहे ले मुख्य भूमिका ना ।
रउवा अपना भाषा में रुचि बढाइब तबे संवैधानिक मान्यता आ साहित्यिक मान्यता के आनंद उठा सकेनी । भारत में अइसन 12-14 गो भाषा बाड़ी स जवनन के साहित्यिक आ संवैधानिक मान्यता मिलल बा, बाकिर ओह भाषा वाला लो के कम रुचि के वजह से उ भाषा कुल्ह सुस्त पड़ल बाड़ी स, परुआइल बाड़ी स। ओकनी के नावो चर्चा नइखे खास क के साहित्य आ संस्कृति के ले के ।
एह से रउवा तय करीं कि संवैधानिक मान्यता त सरकार के ओर से मिले वाला बा, रउवा अपना ओर से अपना मातृभाषा भोजपुरी खातिर का करत बानी ??
इ हम जानत बानी आ देखत बानी कि कुछ लोग, मात्र कुछ लोग बा जे लगातार भोजपुरी में लिखि पढ रहल बा, कोशिश क रहल बा, आपन खुन पसेना एक कइले बा, बाकिर एगो भाषा जवना जनसंख्या 14 करोड़ से बेसी बा, जवन भाषा 8-10 देसन में फइलल - पसरल बिआ, का ओह भाषा में कुछ लो के लिखला, पढला से हो जाई ?
बात नकारात्मक भइला के नइखे, बात के चिंतन करे सोचे गुने बुझे के जरुरत बा, आ सांच कहीं त भोजपुरी में लगातार लिखे पढे बोले के जरुरत बा । ध्यान रहे, हम जब लिखे के कहत बानी त, साहित्य लिखे के नइखे कहत, रोज के बात, जवन रउवा लिखत बानी दोसरा भाषा में ओह के भोजपुरी में लिखे के कहत बानी ।
हमनी के अपना मातृभाषा भोजपुरी में लिखे - पढे - बोले के चाहीं । एकरा खातिर ना दिन वार देखे के जरुरत बा ना कवनो ग्रह नछतर !
- नबीन कुमार
बीजू आम के सोझा मय फेल
मालदह से लंगड़ा ले , दशहरी से सबुजा ले , अलफांसो से ले के फजुली तकले, जर्दालु से गर्दालु ले जतना आम बाड़न स ओह मय के ले के लोगन के आपन आपन बतकही आ स्वाद बा । बाकिर हमार आपन सोच ह हमार आपन स्वाद बा आ जवन हम अनुभव राखत बानी आ जवना स्वाद के असर आत्मा के रोंवा रोंवा ले बसल बा उ इ कि जवन मजा बीजू आम यानि कि बड़का गांछि (फेंड़) के देसी आम के यानि कि फेंड़ प पकला के बाद चुवे वाला आम के खइला के होला उ मजा एह कलमी आमन में ना मिली । भले इ कुल्हि चिनियो से मीठ होखे सनेल के सेंट लेखा गमकत होखे ।
एगो छोटहन बगइचा रहे हमनी के ओह में 8-10 गो आम के फेंड़ रहे, अब नइखे आ उ कुल्ह मय फेंड़ गिर गइलन स । एह 8-10 गो फेंड़न में आम के मय भेराईटी रहे । बड़का, गुलाबजामुन, गोपिया, चिनियवा, भदइलवा, करवहिना, खटहवा आदि, जवन नाव हमरा मन परत बा । जइसन कि नाव ओइसन कि सवाद । जिनगी के 15-16 बरिस बीतल बा एह आमन के खात । हजारन से बेसी आम एक सीजन में आदमी खा लेत रहे । आ इ मय फेंड़ प के पाकल आम, अपने से चुअत आम, आंन्ही में चुवल आम, कवनो पकावल ना आ जदि पकावलो गइल त भुसा में तोपि के ।
बगइचा के एक एक आमन प जदि लिखे के शुरु करब त किताब लिखा जाई बाकिर हमरा कहे के माने बा, भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यमन, मिश्र, केन्या, फिलीपिंस, इंडोनेसिया, पाकिस्तान, आ अउरी कुछ देसन के आम हम खइले बानी, भारत के ओभर रेटेड अलफांसो पिछला क साल से खा रहल बानी, दशहरी उहो मलीहाबाद वाला सैकड़न हाली खइले बानी , मालदह, लंगड़ा, सफेदा, जर्दा, केशर आदि के इलाका में रहल बानी भा एकनी के भर सीकम खइले बानी बाकिर जवन बात जिनगी के शुरुवाती 14-15 साल के गांव के बीजू आम में रहे ना उ स्वाद आज ले मिलल ना उ रंगत आमन के देखे के मिलल जवन स्वाद के चिखि के आ रंगत के देखि के आत्मा जुडा जाउ ।
दुबई शारजाह में आम के 25 गो से बेसी भेराइटी मिल जाला भारत के लगभग हर बड़ शहर में भेराइटी के गांज लागल बा , बाकिर बीजू के जवन सर्वव्यापी, सर्वग्राही, भिन्नत्ता के खुबसुरती आ स्वाद के ले के जवन भाव बनल बा ओकरा आगे मय फेल बा।
बगइचा से मन परल कि हमनी के गांवे एगो बड़का बगइचा रहे, जवन अब कृषि जोत वाला जमीन बन गइल बा ठीक हमरे बगइचा लेखा जवना में आम जामून के गांज लगा देबे वाला फेंड़ रहे , बाकिर अब मय साफ बा । विकास अपना नाव प बहुत कुछ बिगाड़ देले बा , शायद स्वादो।
बीजू आम आ कलमी के अंतर माने कि गोइंठा प के लिट्टी आ कोइला प के लिट्टी भा बुझी कि गड़हा पोखरा दरियाव के मछरी कि समुंदर के मछरी।
अब बस इयाद बाकी बा।
- नबीन कुमार
फोटो - सोसल मिडिया
एम20-Milk बाजार में !
अखिल भारतीय दुग्ध संघ (ABDS) आज M10 आ M20-दुध के प्रोडक्ट लांच करत कहलस हिया कि जनता के हित के ध्यान में राखत M75- Milk आ M80-Milk ले आवल जा सकेला !
@Plchakraborty This is not only the corruption of a person or a party, it reflects the psyche of the mass who suffered all this but never went for an all out protest. Fear multiplied and empowered the tyrants even more.
@Plchakraborty She herself is bereft of all civility and can't even qualify to be a good citizen, forget about being a good leader... Good riddance.. and I hope she doesn't make the fresh pot of BJP also murky
स्मृतिशेष : शिकारी बाबा
- देवेंद्र नाथ तिवारी
शिवानंद मिश्र जी के जानेवाला लोग ‘शिकारी बाबा’ के नाम से जाने ला। उहाँ के एगो पहचान भावपूर्ण भजन रचइता के रहल हऽ। एक से एक अमर गीत-भजन उहाँ के रचले बानी। ‘बबुआ हमार डीएम होइहें…’ आ ‘कहियो दर्शन दिहें हो, भिलनइयो के राम…’ जइसन गीत-भजन आजो लोगन के जुबान पऽ बा। उहाँ के गीत-भजन, भोजपुरी संस्कृति के नया पहचान दिहलस। देश-बिदेस में बसल भोजपुरी भाषी लोग एह गीत के गुनगुनावेला। राजन जी महाराज, प्रेम भूषण जी महाराज, गौरांग गौरी जइसन कथावाचक लोग एह भजनन के मंच पर गावल। भरत शर्मा व्यास, गायत्री ठाकुर जइसन गायक लोग शिकारी बाबा के लिखल ‘छंद’ आ गीत गाके खूब मशहूर भइल। मगर शिकारी बाबा गुमनामी में रह गइलन।
आरा के पड़सौड़ा गाँव में जनमल शिकारी बाबा, गुजरात के एगो केंद्रीय विद्यालय में लाइब्रेरियन रहलन हऽ। सादगी से भरल जिनगी। पर, उनकर लेखनी भोजपुरी साहित्य के समृद्ध कइलस। उनकर लिखल भजन में भक्ति भाव, करूणा के उत्स दिखी। जिंदगी के चाह झलकी। भक्ति के गहराई समाइल बा। उनकर रचना, मानवीय बोध से समाज के प्रेरित करेला। शिकारी बाबा सामाजिक बदलाव के ख्वाहिश के शब्द देले। शृंगारिक गीत भी रचलें। भजन भी। पर, उनकर लिखल भजन आत्मिक शांति से जोड़ेला।
बावजूद एकर रचनाकार के नाम अक्सर गायब रहल। गायक आ कथावाचक लोग शायद ही कबो उनके ‘क्रेडिट’ दिहले। उनका गीतन के ऊपर दावा ठोके वाला अनेक लोग बा। कि इ हमार गीत हऽ, हमहीं एकरा के रचले बानी। जब रउआ अइसन लोग के असल गीतकार के नाम बताईं, तऽ रउए के झुठिआवे, चोटिआवे आ ट्रोल करे पऽ लाग जायी? अइसन में सवाल उठऽता, आखिर अइसन रचनाकार गुमनाम काहें रह जालें?
रचनाकारन के अनदेखी नया बात नइखे। गायक आ कथावाचक मंच पर रहेला। फ्रंट में। रचनाकार परदा के पीछे रह जाला। सुनइया प्रस्तुति के याद रखेला। रचनाकार के मेहनत भूल जाला। भोजपुरी संगीत के व्यापारीकरण, व्यावसायीकरण एह के और बढ़वले बा। डिजिटल मंच पर गीत वायरल होला। रचनाकार के नाम कतहु ना दिखेला। यूट्यूब, स्पॉटिफाई जइसन जगह पर गायक के नामे दिखी। एह तरे रचनाकार के योगदान गुमनामी में खो जाला।
भोजपुरी के अधिकतर रचनाकारन पृष्ठभूमि गँवई बा। शिकारी बाबा जइसन गीतकार के पास मंच ना रहल हऽ। गीत लिखले से घर-गृहस्थी तऽ ना चली, एह से उहाँ के लाइब्रेरियन के नौकरी करत रहनी हऽ। आत्म प्रचार के लकम भा आदत ना रहल हऽ। अपना बारे में कहे, बतावे से उहाँ के परहेज रहऽल हऽ। फिर भी उनकर लिखल गीत मिलियन-बिलियन व्यूज बटोरलस। पर, उनकर नाम पीछे रह गइल। बड़हन गायक आ कथावाचक लोग के पहुंच देश-दुनिया के मंच तक होखेला। पहुँच आ परिचय के दायरा व्यापक रहेला। ओहिजा रचनाकारन के सोझपन आ कम संसाधन उनका गुमनामी में डुबा देला। इ सामाजिक आ आर्थिक असमानता के परिणाम भी बा। हम बावला जी के एगो गीत पऽ काम करत बानी। रउआ इ जान के अचरज होई कि एगो मशहूर कथावाचक उनका नाम क्रेडिट लाइन में नइखन दिहले। बताईं जे भोजपुरी से नइखे जुड़ल, साहित्य से जुड़ाव नइखे, उ कइसे जानी इ केकर लिखल गीत हऽ। हजारों बार हमहीं ‘कहियो दर्शन दिहें, भिलनियों के राम’ या ‘जटा जूट बरवा लहरे...’ सुनले होखब। बाकिर अबहिन दू-तीन साल पहिले इ पता लागल हऽ। शिकारी बाबा के छोट भाई, उमेश गौतम मिश्रा जी से। इ शिकारी बाबा के लिखल रचना हऽ। रउआ एह से असल स्थिति के अंदाजा लगा सकत बानी।
भोजपुरी साहित्य के मुख्यधारा में भी भजन लेखक, लोकगीत के रचनाकार कमे जगह मिलऽल बा। चाहें इहो कह सकत बानी कि नइखे मिलऽल। हम इ उदाहरण के साथे बता सकत बानी। ओहिजे हिंदी के गीतकार के साहित्य के सबसे बड़ मंच पऽ बुलावल जाला। सबसे बड़ सम्मान भी मिलेला। बाकिर क्षेत्रीय भाषा के रचनाकार उपेक्षित रहि जाला। क्रेडिट देबे के परंपरा कमजोर बा। पश्चिमी देशन में गीतकार के सम्मान मिलेला। भारत में इ परंपरा कमजोर बा। पता ना उ कवन दबाव बा जेकरा चलते रचनाकार के योगदान भुला दिहल जाला। शिकारी बाबा के रचनन अमर बा। मगर उनकर गुमनामी समाज के उदासीनता देखावऽता।
अइसना में राहि का बा। चेते के होई। जागे के होई। आ टोके के होई। कि मूल गीतकार-रचनाकार के क्रेडिट द लोग। शिकारी बाबा के स्मृति के जिंदा रखल हमनी के जिम्मेदारी बा। गायक आ कथावाचक लोग के भी चाहीं कि उ रचनाकार के नाम उजागर करे। उनका बारे में बतावे। डिजिटल मंच पर रचनाकार के क्रेडिट दिहल जरूरी बा। भोजपुरी साहित्य के मंच पर भी। किताब आ पत्रिका में भी गुमनाम गीतकारन पऽ बात होखे। कम से कम लेख लिख के भी उनकर विरासत के सहेजल जा सकऽता। नया पीढ़ी रचनाकारन के जाने। उनकर कदर करे।
शिकारी बाबा के लिखल भा रचल गीत-भजन भोजपुरी के थाती बा। उहाँ के स्मृति में संकल्प लिहीं, रचनाकार के सम्मान मिले। उहाँ के रचना अमर बा। बाकिर उहाँ के नामो अमर होखे। शिकारी बाबा के स्मृतियन के सादर नमन।
(इ लेख देवेंद्र नाथ तिवारी जी के लिखल ह, जवन 2025 में आखर प पहिला हाली प्रकाशित भइल रहे)
आखर परिवार भोजपुरी गीत-संगीत जगत के नामी रचनाकार के स्मृतियन के बेर बेर नमन क रहल बा ।
भोजपुरी भाषा
1933 में डॉ उदय नारायण तिवारी जी एगो निबंध लिखनी ' नागरी प्रचारिणी पत्रिका ' में जवना के शीर्षक रहे ' भोजपुरी का नामकरण' आ इ पुरा जानकारी उहां के किताब ' भोजपुरी भाषा और साहित्य' आ " Origin and Development of Bhojpuri' में मिल जाई । भोजपुरी के नामकरण सबसे पहिला सरिहार के लिखाइल लेख इहे ह। बाकिर उदय जी से पहिले, ग्रियर्सन आ अउरी क गो अंग्रेज साहित्यकार लो भोजपुरी के नामकरण प आपन आपन शोध आ विचार के लिखले रहे । तबो हम उदय जी, श्रीधर मिश्र, कृष्णदेव उपध्याय जी के दिहल जानकारियन के आधार प समेटे के कोशिश करत बानी । एह लेख के अलग अलग हिस्सा पहिले लिखा चुकल बा, कुछ नया जोड़े के कोशिश होइ ।
[ मल्ल आ कशिका नाव राहुल सांकृत्यायन जी देले रहनी आ उहां के मल्ल आ कशिका के संगे संगे कोष्ठक में भोजपुरी लिखीं । एह विषय प हम अलग से एगो लेख लिखब कि राहुल जी कहाँ आ काहें गलत रहनी । एह के हम ना भोजपुरी हिंदी के विद्वान लो सिद्ध कइले बा । राहुल जी इ नाव, ग्रियसन के भोजपुरी के नामकरण के जवाब में आपन बात लिखले रहनी आ राहुल जी के एह कथन प अलग अलग विद्वान लो के अलग अलग मत बा। ओह में से कुछ जरुरी जानकारी के आगे लिखल जाई। ]
इमे भोजा अंगिरसो विरुपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीरा: ।
विश्वमित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्रतिरन्त आयु: ।
- ऋगवेद
इतिहासकार डा. ए बनर्जी ( शास्त्री ) सन् 1930 में भोजपुरी आ भोजपुर के चिन्हित करत ऋगवेद के एह ऋचा के आधार पर ना खाली बक्सर में खुदाई क के ताम्रयुग के कुछ वस्तु जुटावे के कोशिश कइनी बलुक भोजपुरी के नामकरण के आधार भी एह ऋचा के मननी ।
अइसे त एह श्लोक के माने अलग अलग विद्वान लो अलग अलग रुप में ले ला बाकिर तबो यदि राजा भोज आ राजा सुदास ( सिद्धेश्वर शास्त्री / आचार्य चतुरसेन शास्त्री के मत ) आ एह लो के पुरोहित विश्वामित्र के जिक्र एह ऋचा में बा तबो , अतना त बा कि भोजा शब्द के वेद में जिक्र बा ।
भोजनांवाचे लोक सुदासेचे अनुचर होते ।
सुदासनुचर भोज हे मला अश्वमेधामध्ये मदत करीत ।
इंद्र के भोज कहल जाला , भोज के माने वेद के हिसाब से अलग अलग विद्वान अलग अलग निकलले बाडे , इंद्र के अलावा दानी , बली , शत्रुअन प विजय पावे वाला , अनाज के कामना आ अनाज देबे वाला जइसन विशेषण भोजा शब्द खातिर प्रयोग भइल बा ।
भाषाई इतिहासकार भले एह कुल्ह चर्चा के एगो भाषा के आधार ना मानेलन बाकिर इ त बड़ले बा कि आखिर भोजपुरी कहाँ से आ कब , कइसे परिमार्जित भइल ? खास क के भोजपुरी के जवन खान-पान आ अलहदा पहिचान बा उ कइसे आइल ? सोचे के बात बा ।
भोजपुर के ' भोजपुर ' नामकरण भा 'भोजपुरी' नामकरण के पाछे अलग अलग विद्वान लो के अलग अलग मत बा । डॉ श्रीधर मिश्र जी अपना किताब ' भोजपुरी लोकसाहित्य : सांस्कृतिक अध्ययन' में एह चारो मत के विवेचना कइले बानी ।
1- मालवा के राजा भोजदेव के नाव प
शाबाद गजेटियर, ग्रियर्सन, दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह आदि लोगन के कहनाम रहे कि राजा भोजदेव एह क्षेत्र के जीतले रहले आ उहे 'भोजपुर' के स्थापना कइले रहले ।
2- गुर्जर प्रतिहार मिहिर भोज के नाव प
पृथ्वीसिंह मेहता के कहनाम बा कि गुर्जर प्रतिहार मिहिर भोज अपना नाम से भोजपुर किला के स्थापना कइले रहले । इहां के कहनाम रहे कि मालवा के राजा भोज महमूद गजनवी के समकालीन रहले आ उनुकर बिहार से कवनो कनेक्सन ना रहे ।
3- उज्जैन के भोज लोगन के नाव प
डॉ उदयनारायण तिवारी , डॉ कृष्णदेव उपाध्याय के मानना बा कि मालवा के उज्जैन भोजा लोगन के नाव प भोजपुर के नाव परल आ केहू व्यक्ति विशेष के नाव प भोजपुर के नाव नइखे धराइल । प्राचीन काल में एजुगे के सत्ता के कब्जा एह क्षेत्र प रहे आ ओह लोगन के व्यक्ति भोज ना होखे चिन्हासी भोज रहे ।
4- विश्वमित्र के यजमान 'भोजा' लो के नाव प
डॉ ए बनर्जी, शास्त्री आदि लोगन के कहनाम बा कि भोजपुर के नामकरण ऋषि विश्वमित्र के जजमान 'भोजा' लोगन प भइल बा । बक्सर, विश्वमित्र के तपभूमि रहल बा आ एजुगा जे विश्वमित्र के जजमान लोग रहे उ लो 'भोजा' कहाइल आ भोजा लोगन के पुर भोजपुर आ भाषा भोजपुरी बनल ।
जदि उपर लिखाइल जानकारियन के रउवा समेटब त मालूम चली कि भोजपुरी के ले के प्राचीन काल से ले के वर्तमान समय ले जतना जरुरी काम भइल ओकर केंद्र बिहार रहल बा । निःसंदेह एह में कवनो दू राय नइखे कि भोजपुरी बोले वाला लोगन के संख्या युपी के पुर्वांचल में बेसी बा, भोजपुरी में बहुत कुछ पहिल काम युपी में भइल बा बावजूद एह के उपर दिहल जानकारियन के वजह से भोजपुरी के बिहार के भाषा कहल जाला ।
जारी रही .....
- नबीन कुमार
रमेश चंद्र झा : जयंती विशेष
भोजपुरी, हिन्दी आ मैथिली के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, रचनाकार के जयंती प आखर परिवार, बेर बेर नमन क रहल बा ।
जयंती - 8 मई 1928
पुण्यतिथि - 7 अप्रैल 1994
रमेश चंद्र झा जी के जन्म 8 मई, 1928 के बिहार के पूर्वी चम्पारण जिला के फुलवरिया(सुगौली) में भइल रहे । इहां के 1942 के आंदोलन में बड़ा बढ-चढ के हिस्सा ले ले रहनी । भोजपुरी, मैथिली आ हिन्दी तीनो भाषा के पत्र-पत्रिकन में इहाँ के रचना लगातार प्रकाशित होत रहे ।
उपन्यास , जीवनी , बाल-साहित्य , कविता आदि अलग अलग विधा में इहां के लगभग पचास से बेसी किताब आ पत्र पत्रिका प्रकाशित बा । भोजपुरी में इहाँ के लिखल ऐतिहासिक उपन्यास 'सूरमा सगुन विचारे ना' अँजोर पत्रिका में धारावाहिक के रुप में प्रकाशित भइल रहे ।
एह के अलावा अउरी कुल्ह क गो किताबिन में चम्पारण की साहित्य साधना (1958),चम्पारण के साहित्य और साहित्यकार (1967),चम्पारण की साहित्य यात्रा (1988) किताब भी इहां के प्रमुख किताब ह ।
भोजपुरी के अलग अलग कोर्स के किताबिन में इहां के रचना आ लेख प्रकाशित बा । भोजपुरी के सुप्रसिद्ध नामी सर्वप्रिय इ साहित्यकार, हमनी के भोजपुरिया माटी के 7 अप्रैल 1994 के छोड़ के लमहर यात्रा प निकल गइनी ।
उहां के लिखले बानी -
जिनगी के एक लहर बीत गइल
हार गइल घोर अंधकार, किरन जीत गइल।
बदल गइल रंग, आज रंग असमान के,
निखर गइल रूप, रूप साँझ के, बिहान के,
सिहर गइल तार, हर सितार का बितान के,
आग भइल चिनगी से, साध जुगल जिनगी के
बिखर गइल हर सपना, अधरन से गीत गइल।
जिनगी....
बदल गइल परिभाषा आज शूल-फूल के,
रूप आसमान चढ़ल बाग का बबूल के,
परती ना पहिचाने धरती का धूल के,
आर-पार आँगन के, महक उठल चन्दन के,
आपन परतीत गइल, सपना बन मीत गइल।
जिनगी....
निखर उठी रूप नया-माटी का देह के,
भाग नया जाग उठी-खेत के सरेह के,
धरती पर समदरसी दिया जरी नेह के,
आपन बनके थाती, लहकी मुरझल बाती,
जोत नया जाग रहल, परस नया प्रीत गइल।
जिनगी....
आखर परिवार अपना सुप्रसिद्ध रचनाकार, कवि आ लेखक के जयंती प बेर बेर नमन क रहल बा ।
का भोजपुरी के आपन शब्दकोष, व्याकरण, लिपि, किताब नइखे ??
भोजपुरिया लोग हिंदी भाषा प्रेम में जब भोजपुरी भाषा के विरोध करेला त कहेला -
1- भोजपुरी के शब्दकोष नइखे
2- भोजपुरी के व्याकरण नइखे
3- भोजपुरी के आपन लिपि नइखे
4- भोजपुरी में किताब नइखी स
5- भोजपुरी में पढाई लिखाई नइखे
6- भोजपुरी कहीं के आधिकारिक भाषा ना ह
का इ आरोप सही बा ?
सामान्य रुप से पहिले इ आरोप फेसबुक प भोजपुरिया लोग लगावत रहेला, बाकिर ओह लोगन के हर बेर जवाब दिआइल आ फेरु से दिआता ।
त आई एह सवालन के जबाब जोहल जाउ ।
1- भोजपुरी में शब्दकोष त अइसे अंग्रेज विद्वान लो सन् 1850 के बाद से अपना किताबिन के एगो हिस्सा में लिखत रहे बाकिर तबो एह समय भोजपुरी शब्दकोष के 7-8 गो से बेसी किताब बाड़ी स जवना में 4-5 गो किताब भोजपुरी साहित्यांगन प फ्री मे पढे के आ डाउनलोड करे के मिल जाई।
( लिंक - https://t.co/2NaD93JSBO )
2- भोजपुरी भाषा के व्याकरण 1850 के बाद क गो अंग्रेज भाषाविद् लो लिखल बाकिर जदि 'भोजपुरी में भोजपुरी के व्याकरण' के बात होखी त सबसे पहिला व्याकरण सन् 1915 में शिवदास ओझा जी लिखले रहनी बाकिर इ किताब 1982 में प्रकाशित भइल। भोजपुरी साहित्यांगन प 15-16 गो से बेसी भोजपुरी व्याकरण के किताब फ्री में पढे आ डाउनलोड करे खातिर एह समय मिल जाई।
(लिंक - https://t.co/YxeZfIFmJ2 )
3- अइसे त लिपि कवनो भाषा के मुल्यांकन के तरिका ना ह, अंग्रेजी के लिपि रोमन, ओकर आपन ना ह, हिंदी के नागरी/देवनागरी एकर आपन ना ह । मराठी, नेपाली सहित भारत के दसन गो अइसन संवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा बाड़ी स जवनन के आधिकारिक रुप से लिपि देवनागरी ह । तबो भोजपुरी जवना लिपि में मध्यकालीन इतिहास के समयकाल में लिखात रहे उ लिपि 'कैथी' रहे। शासन के भाषा के लिपि भोजपुरी इलाका में कैथी रहे। कैथी प किताब के रुप में सबसे पहिला काम ग्रियर्सन (1880-90 के समय में) के रहे आ उ भोजपुरी आ बाकि के बिहारी भाषा के जाने बुझे खातिर कैथी लिपि के पढाई कइले आ फेरु किताब लिखले । रउवा सभ आर्काइव प एह किताब के जोहि के पढ सकेनी ।
( A KAYATHI HANDBOOK , 1st June 1881)
4- जानकारी के हिसाब से भोजपुरी के पहिला किताब, 1785 में आइल रहे जवना के नाव रहे " बारहमासी" आ इ किताब लाखन सेन के लिखल रहे, एह किताब के लिपि 'कैथी' रहे । आधिकारिक रुप से भोजपुरी के पहिला किताब, 1882 में छपल रहे । सुधाबुंद जवना में भोजपुरी आ ब्रजभाषा के प्रयोग रहे । एह किताब के बाद त भोजपुरी कई हजार किताब छपली स । भोजपुरी साहित्यांगन प एह समय 1242 गो किताब बाड़ी स । फ्री में एह किताबिन के फ्री में डाउनलोड कइल जा सकेला, पढ सकेनी।
( लिंक - https://t.co/YjUNsGQrPT )
5- भारत, नेपाल, मॉरिसस मिला के भोजपुरी भाषा में/भाषा के पढाई पिछला कइक साल से हो रहल बा। भारत के अनेकन गो विश्वविद्यालय आ कॉलेज में, नेपाल आ मॉरिसस में भोजपुरी भाषा के / भाषा में पढाई हो रहल बा । भारत के बिहार में जहाँ प्राइमरी स्कुल से ले के पीएचडी तक के सुविधा भोजपुरी में मिल रहल बा, भोजपुरी शिक्षक के नियुक्ति हो रहल बा ओहिजे युपी आ कुछ एक अउरी राज्यन में भोजपुरी आधारित उच्च शिक्षा के बेवस्था बा । यानि कि शिक्षा के पुरा बेवस्था बा ।
6-गलत ! भोजपुरी वर्तमान समय में नेपाल आ मॉरिसस के आधिकारिक भाषा बड़ुवे । भारत में भोजपुरी अबहीं संविधान में नइखे, बाकिर नेपाल आ मॉरिसस में भोजपुरी भाषा के आधिकारिक मान्यता मिलल बा । भारत के संविधान में शामिल होखे हर जरुरत के भोजपुरी पुरा क रहल बिआ आ संवैधानिक मान्यता खातिर संघर्ष हो रहल बा। भारत के कुछ एक राज्यन में (जइसे कि झारखंड) भोजपुरी के द्वीतीय भाषा के दरजा मिलल बा । बाकिर भोजपुरिया आ भोजपुरी के सोझा संवैधानिक मान्यता मुख्य संघर्ष बा आ एह खातिर रउरो सभ के साथ चाहीं ।
कहे के माने इहे बा कि हमनी के अपना मातृभाषा भोजपुरी में लिखित - मौखिक संवाद करे के चाहीं आ भोजपुरी भाषा, भाषाई रुप से कवनो क्षेत्र मे भारत के संविधान में शामिल भाषा सभ से जदि बीस नइखे त उनइसो नइखे । भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के मांग उठत रहे, चर्चा चलत रहे, सरकार प अपना मातृभाषा के संवैधानिक मान्यता आ भोजपुरी भाषा आधारित रोजगार आ शिक्षा के ले के दबाव बनावत रहे के चाहीं ।
बाकिर इ मय तबे हो पाई जब हमनी के अपना भाषा खातिर जागरुक होखब जा । हमनी के अपना मातृभाषा भोजपुरी में पढब-लिखल जा ।
- नबीन कुमार
सोरह आना साँच बात!... भोजपुरी भा कवनो एगो भासा एह फेंड़ प तबे तक लउकी जब ले हमनी के ओकरा के सींचब स... माने कि बोले-बतियावे आ लिखे-पढ़े के काम होत रहे के चाहीं। धन्यवाद नबीन @imbhojpuria एह सुंदर illustration खाती 💐💐🫡
भाषाई फेंड़ प भोजपुरी !
एगो भोजपुरी भाषी भइला के नाते, जदि रउवा निजी स्तर प भोजपुरी भाषा खातिर कुछ नीमन कइल चाहत बानी त एकरा खातिर भोजपुरी के ना कवनो संस्था के जरुरत बा, ना कवनो ग्रुप, पेज, व्हाट्स एप समूह के ।
भोजपुरिया भइला के नाते, भोजपुरी भाषा खातिर राउर सबसे बड़ योगदान कहाई, भोजपुरी में आपन रोज के चीजन के लिखल, भोजपुरी के किताबिन के, लेख आदि पढल, भोजपुरी में लिखित-मौखिक रुप से बतियावल । भोजपुरी में हर तरह के संवाद के अपनावल ! सांच पुछी त एगो भाषा खातिर एह ले बड़ योगदान अउरी कुछ ना हो सकेला ।
जानत बानी, साहित्य फेंड़ प ना फरे, एहि लिखलके में से जामेला । त, अपना रोज के जिनगी में लिखित-मौखिक रुप से भोजपुरी के ले आईं, बाकि मय अपने-आप हो जाई । एह भाषाई फेंड़ प भोजपुरी एह से लउकत बिआ काहें कि हमनी से पहिले के लोग भोजपुरी के करेजा से अपनवलस आ अपना एह मातृभाषा में हरत से लिखित - मौखिक संवाद कइल ।
कम से कम अतना त हमनी के अपना मातृभाषा भोजपुरी खातिर कइये सकेनी जा ।
उमिरिया ई झंझट बेसाहे में लागल
विविध लोग के चित्त थाहे में लागल
रहीं एक नोकर मिलल खूब ठोकर
भले दुष्ट लो के सराहे में लागल
सभा अउर संस्था में बीतल अवस्था
जिनिगिया ई चन्दा उगाहे में लागल
सफलता-विफलता कुछो ना बुझाइल
समय किन्तु काफी सराहे में लागल
मदत के भरोसा दिआइल खुशी से
मगर कुछ भला लोग डाहे में लागल
रहल चाह लेकिन ई कमजोर जीवन
बहुत बिघ्न के बान्ह ढाहे में लागल
फकत जोस में कान जे जे नधाइल
फँसे से ही से-से निबाहे में लागल
चलल एक ई बैल कोल्हू के जब से
ठहर ना सकल जन्म राहे में लागल
- महेंदर शास्त्री
" कुंवर सिंह के बैठलखाना " - हरेन्द्रदेव नारायण
भोजपुरी में सबसे पहिला महाकाव्य के रचे वाला हरेन्द्रदेव नारायण जी के लिखल महाकाव्य 'कुंअर सिंह" से कुछ पंक्ति आज के खास दिने । एह में कुंअर सिंह के ले के वर्णन भइल बा । एक हाली पढीं सभे एह कालजयी रचना के-
बैठलखाना कुँअर सिंह के बाहर खूब जमल बा,
झालर लागल बा, नफीस चंदोवा एक टँगल बा।।
दियाधार के दीपन से मृदु मन्द जोत आवत बा,
एक गुनी बैठल बा, सारंगी पर कुछ गावत बा।।
अइलन बाबू कुँअर सिंह सहसा भीतर से बाहर,
कोलाहल कुछ भइल, विपिन में बाहर आइल नाहर।।
हड्डी ठोस पेसानी दमकत, पुष्ट वृषभ कंधा बा,
अस्सी के बा उमर, भइल का ? कहे बूढ़, अन्धा बा।।
सिंह चलन रवि नयन जलत जुग सुगठित चंड भुजा बा,
अइसन डोलेला, जइसे डोलेला विजय पताका।।
नवजुग के हम दूत कहीं या जय के याकि विभा के,
केन्द-बिन्दु मानुस-सपना के, साहस, सत्य, प्रभा के।।
अइलन झोंका से बैठक में, जुग जइसे आवेला,
सांती बीच समर आ जाला, अमर सत्य आवेला।
या जइसे निकलेला दुख-सुख धरम के पुतला,
या कि मरन में अमर बनल आवे अनित्य के पुतला।।
छोटन रागन के समाज में महाराग आवेला,
फूसन के ढेरन में जइसे कहीं आग आवेला।।
जिनगी के अँधियाली में या पुन्न भाग आवेला,
कोलाहल भय स्वार्थ बीच जइसे विराग आवेला।।
बइसे अइलन कुँअर सिंह जी,’जय जय, जय जय’ गूँजल,
ब्राह्मन-कुल वो बन्दी जन के चिर मंगल लय गूँजल।।
जइसे अइला से प्रभात के चिड़िया-कुल चहकेला,
भोरहरी के हवा चले तो कमल फूल महकेला।।
जिनकर हड्डी में सिमटल होखे जोती के सागर,
जिनकर मांस-पेसियन में सूतल हो अमित प्रभाकर।।
जिनकर चमकत नयन-पुत्तली में सूरज-चन्दा हो,
वंक भौंह में सब कुभाल के जहाँ मरन-फंदा हो।।
जे हो महासिन्धु साहस के जहाँ गिरे सब धारा,
जे असीम गौरव हो जेकरा में ना कहीं किनारा।।
अइसन माँझी जे आँधी में नौका खोल चलेला,
तलहथ्थी में भाग मले, ओकरा के वृद्ध कहेला।