@Meesho_Official यह मेरा ऑर्डर है और +9175687 59448 इस नंबर से सोनू यादव मीशो हेड झुनझुनू (333023)राजस्थान में डिलीवरी एजेंट है और गाली गलोच और अभद्र व्यवहार कर रहा है ।
कृपया इसपर आवश्यक कार्यवाही करे ।
RSMSSB के चेयरमैन और छात्रों की स्थिति
1. पुराने चेयरमैन (हरिप्रसाद और बी.एल. जाटावत जी का समय)
उस दौर में एक-दो परीक्षा सही हुई थीं, कुछ exam की merit भी सामान्य रही। लेकिन उसके बाद जो पैसा चेयरमैन बनने के लिए लगाया गया था, उसकी वसूली शुरू कर दी।
2. फिर MLA बनने का लालच
जब वो पैसा पूरा हो गया तो MLA बनने के लिए नई उगाही शुरू हुई। नतीजा यह हुआ कि मुंह काला करवाकर विदा होना पड़ा।
3. अबके साहब का समय
इस बार वाले साहब के समय तो एक भी cut-off सही और न्यायसंगत नज़र नहीं आती। लगता है इनका टारगेट सीधे MP बनना है।
4. Twitter वाले "किसान जी" का खेल
सुनने में आ रहा है कि एक ट्विटरिए नेता, जिन्हें "किसान जी" कहा जाता है, सरकार और साहब के साथ मिलकर bulk में बच्चे देते हैं और काम हो जाता है। मेहनती छात्र वहीं किताबें उठाकर एक-एक चीज़ रटने में लग जाते हैं।
5. मेहनती छात्रों की मानसिक स्थिति
पढ़ाई करने वाले छात्र दिन-रात बिना थके पढ़ाई कर रहे हैं, यहाँ तक कि अपनी मानसिक स्थिति भी बिगाड़ लेते हैं। उनके माता-पिता भी इतनी परेशानी झेल रहे हैं कि बाहर वाले कल्पना तक नहीं कर सकते।
6. न्याय की पुकार
पढ़ने वाले बच्चों के साथ इतना बुरा हो रहा है कि दिल से लगता है—अगर इन बच्चों के साथ ऐसा अन्याय बंद कराने के लिए मुझे काले पानी की सज़ा भी काटनी पड़े, तो वो मंज़ूर है। लेकिन इन छात्रों के साथ ये बर्बर खेल और नहीं होना चाहिए।
7. कठोर संकल्प (करो या मरो का आंदोलन)
मैंने ठान लिया है कि अब ये करो या मरो का आंदोलन है। इस सिस्टम को सही करना ही होगा।
इसलिए मेरा संदेश आप सबकी ज़िम्मेदारी है कि हर बच्चे और उनके माता-पिता तक पहुँचे, ताकि इस लड़ाई को हम एक झटके में जीतें और ऐसा सिस्टम बना दें जिसमें पैसों के लेन-देन का मौका ही ना मिले।
इंक़लाब ज़िंदाबाद।
@BhajanlalBjp@RajCMO@RajGovOfficial@blsanthosh@alokrajRSSB
Alok Raj जी से छात्रों के सवाल
हम उम्मीद करते हैं कि आप इनका जवाब देंगे :
1.Paper easy आने पर भी मेहनती छात्र नाखुश क्यों हैं?
क्योंकि पढ़ने वाले बच्चों की मेहनत के बावजूद नौकरी नहीं लग रही।
2.Experts से सेटिंग और पैसों का खेल
छात्रों का आरोप है कि कुछ लोग experts के ज़रिये सवाल delete या सही-गलत करवाते हैं।
3.Programmers का खेल
जिनसे सेटिंग होती है, उनके नंबर अचानक बढ़ा दिए जाते हैं।
4.OMR शीट का खेल
RSSB में पहले से चल रही OMR manipulation अब भी जारी है। ऊपर से ट्विटर पर पारदर्शिता का दिखावा किया जाता है।
5.समय पर परिणाम क्यों नहीं?
अब तक एक भी परीक्षा का परिणाम समय पर घोषित नहीं हुआ। जबकि RPSC 7 दिन में answer key और डेढ़ महीने में result जारी कर देती है। यहाँ की merit और वहाँ की merit में इतना अंतर क्यों है?
6.भविष्य की चिंता
अगर समय रहते बदलाव नहीं हुआ तो REET और 4th Grade भर्ती में लाखों बच्चों का भविष्य सबसे ज़्यादा खतरे में है।
7.स्टाफ और पारदर्शिता पर सवाल
अगर आपके पास staff कम है और सरकार से माँगा है, तो उसका आधिकारिक पत्र सार्वजनिक कीजिए। ताकि छात्रों को साफ़ पता चले कि जिम्मेदारी किसकी है – सरकार की या बोर्ड की?
8.आपकी पोस्टिंग पर सवाल
यह चर्चा भी तेज़ है कि आपको यह posting किस प्रक्रिया से मिली। @BhajanlalBjp@RajCMO@RajGovOfficial@alokrajRSSB@blsanthosh
आलोक राज जी, आप अपने आप को आइंस्टीन समझ रहे हो क्या? मेरिट को रॉकेट की तरह बढ़ाकर छात्रों का मज़ाक बना रहे हो। ट्विटर पर आकर ऐसे ज्ञान देते हो जैसे आपसे बड़ा इंसान कोई है ही नहीं।
JEN परीक्षा इसका ताज़ा उदाहरण है। इस बार करीब 10–15 हज़ार बच्चों ने परीक्षा दी और इस बार की मेरिट बिल्कुल उस बार जैसी है जब पेपर पूरा लीक हो गया था। ज़रा सोचो—120 नंबर के पेपर में 90 नंबर से ऊपर 700 बच्चे कहाँ से आ गए? और 2022 में जब इस बार से भी ज़्यादा बच्चे बैठे थे, तब मेरिट सिर्फ़ 79 पर रुकी थी। यानी आपने करीब 18 नंबर ऊपर बढ़ा दी। ये कौन-सा खेल है बाबूजी?
JEN के बच्चे अच्छी तरह समझते हैं लोकतंत्र को। वो जानते हैं कि असली राजा वो हैं, और आलोक राज सिर्फ़ उनकी नौकरी करने वाले नौकर हैं।
हज़ारों बच्चे ऐसे हैं जो काबिल हैं, पढ़ाई में तेज़ हैं और पहले भी DV करवा चुके हैं। लेकिन जब तक आप बेवजह सवाल डिलीट करते रहोगे, सही जवाब को ग़लत मानते रहोगे और जानबूझकर आउट ऑफ़ सिलेबस सवाल पेपर में डालोगे—तब तक उनका हक़ मारते रहोगे। और फिर उन्हीं सवालों को अपनी सहूलियत से डिलीट कर देना, साफ़ दिख रहा है कि आप गेम खेल रहे हो।
अगर हमारी बातों से आपकी आँखें नहीं खुल रहीं, तो एक बार जाटावत जी से मिल लो। और याद रखो—अब आगे REET और फ़ोर्थ ग्रेड की परीक्षा है। ये खेल बंद करो, वरना हमें ही रोकना पड़ेगा, और उस दिन ये खेल आपको ही बहुत महँगा पड़ेगा।
@alokrajRSSB@BhajanlalBjp@RajCMO@RajGovOfficial@blsanthosh
तस्कर
कबाड़ी वाला
ट्रक ड्राइवर के बाद ———
अब दूध बेचने वाला बना थानेदार
मुख्यमंत्री गहलोत के PSO राजकुमार ने मोहल्ले में दूध बेचने वाले रवींद्र को भी दिया पेपर ।
रवींद्र का 156 वीं रैंक के साथ चयन ।
आइए.. वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठाएं
वोट चोरी रोकें और अपना मताधिकार बचाएं
Rahul Gandhi जी के कैंपेन से जुड़ने के लिए-
👉 9650003420 पर मिस्ड कॉल दें
👉 https://t.co/v2byFhRRjn पर क्लिक करें
राहुल गांधी की Oath बनाम EC का स्वप्रेरणा से संज्ञान - कौन ज़्यादा ताक़तवर ?
राहुल गांधी का आरोप
मतदाता सूची में गंभीर गड़बड़ी –
•फर्जी नाम
•डुप्लीकेट वोट
•हेरफेर के सबूत
EC का तरीका
•पहले नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से Signed Oath मांगा जाएगा, जबकि यह नियमों में ज़रूरी नहीं है।
•Oath के नाम पर जनता में भ्रम फैलाया जाएगा।
फिर Rules of Registration of Electors rules 1960 के तहत व्यक्तिगत शिकायत के नियम लगाए जाएंगे:
•Rule 12: शिकायत ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के 30 दिन के भीतर (या EC द्वारा तय न्यूनतम 15 दिन में) होनी चाहिए।
•Rule 17: समय सीमा पार होने पर शिकायत Time-Barred घोषित कर सीधे खारिज।
•नतीजा – शिकायत बिना तथ्यों की जांच किए रद्द।
EC के स्वप्रेरणा से संज्ञान की ताकत
•Rule 12 और Rule 17 केवल शिकायतकर्ता को बाधते हैं, चुनाव आयोग को नहीं।
•EC चाहे तो किसी भी समय स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर जांच शुरू कर सकता है।
•कोई नियम EC को ऐसा करने से नहीं रोकता, बस मंशा चाहिए।
निष्कर्ष
•Signed Oath अनिवार्य नहीं है, यह सिर्फ़ विवेकाधिकार है।
•अगर EC ईमानदारी से काम करे तो समय सीमा का बहाना छोड़कर खुद जांच शुरू कर सकता है।
•सवाल यही है — क्या EC सच्चाई जानना चाहता है, या सिर्फ़ प्रक्रिया का बहाना बनाना चाहता है?
यशवर्धन सिंह
प्रवक्ता,
प्रदेश कांग्रेस कमेटी, राजस्थान
चुनाव आयोग और फर्जी वोटर :-
लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सबूत सहित जनता को बताया कि किस तरह चुनाव आयोग की भूमिका संदिग्ध है ।
अब चुनाव आयोग चाहता है ( या निर्देशित किया गया है ) कि सदन के नेता प्रतिपक्ष से signed oath माँगो ।
Rule 20(3)(b) का सच
कानून की भाषा:
Rule 20(3)(b), Registration of Electors Rules, 1960 कहता है:
“The registration officer may, in his discretion – (a) require any claimant… to appear in person…; (b) require that the evidence… shall be given on oath…”
यहाँ दो शब्द अहम हैं: “may” और “in his discretion”।
“May” का मतलब “Must” नहीं होता –
कानूनी अर्थ:
•“May” का मतलब है कर सकता है, यानी ज़रूरी नहीं है ।
•अगर कानून में “shall” लिखा होता तो वह अनिवार्य (compulsory) होता।
•साथ ही “in his discretion” का मतलब है कि अधिकारी इसे अपनी समझ और परिस्थिति के अनुसार लागू करेगा, न कि हर स्थिति में।
नतीजा:
Election Commission का राहुल गांधी से signed oath मांगना कानून में अनिवार्य नहीं है।
Rule 20(3)(b) सिर्फ़ यह कहता है कि EC चाहे तो मांग सकता है, लेकिन अगर साक्ष्य पर्याप्त है या मामला prima facie स्पष्ट है, तो oath के बिना भी आगे बढ़ सकता है।
Yashvardhan Singh
Spokesperson
PCC , Rajasthan
@GovindDotasra@INCRajasthan
@RajatSharmaLive@indiatvnews@IndiaTVHindi आरोपी चुनाव आयोग चाहता है कि आरोप लगाने वाला , आरोपी को प्रार्थना पत्र दे ताकि आरोपी स्वयं की जाँच कर ख़ुद को निर्दोष साबित करें !
ये ही होगा मेरे भाई जब सिस्टम के गुलाम बनकर उनके गुणगान करोगे तो
समय समय पर सिस्टम को आईना दिखाना जरूरी होता है |
जब मुगल का हटाया तो बड़े खुश हो रहे थे आज ये खुशी गम मे बदल गई वाह
राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी के सरकारी स्कूल में एक कमरे की छत गिरने से सात बच्चों की मौत पर शुरू हुआ हाहाकार आज भी थमा नहीं है। थमना चाहिए भी नहीं था।
दरअसल, वो स्कूल की छत नहीं गिरी थी। हमारी समझदारी और हमारे मानवीय सरोकार गिरे थे। हमारी सामूहिक मूर्खताएं नींव से लेकर कंगूरों और चहारदीवारी तक फैली पड़ी हैं।
झालावाड़ के पिपलोदी गाँव में जब एक सरकारी स्कूल की छत गिरी तो नीचे सात मासूम बच्चे नहीं दबे, दरअसल, वहाँ हमारा नैतिक पतन, हमारी लोकतांत्रिक कायरता और हमारी मूर्खतापूर्ण प्राथमिकताएँ उस स्कूल की छत पर तांडव करने लगीं और हम उसमें आनंदित होने लगे तो हमारी बुद्धिमत्ता, लोकन्याय, लोकतांत्रिक चेतना और नागरिक सरोकारों की पट्टियां गिर गईं और उनके नीचे हमारे सात सुकुमार बच्चे दफ़न हो गए।
यह केवल सरकारी लापरवाही या राजनेताओं की कोताही भर नहीं है।
यह उस महान् जनता की चुनी हुई बर्बरता भी है, जो हर चुनाव में स्कूल, अस्पताल, सड़क, पानी, शिक्षा, जन सराेेकारों और रोज़गार जैसे ज़रूरी सवालों और मुद्दों को 'कमज़ोर एजेंडा' समझकर किनारे फेंक देती है और हिन्दू-मुसलमान और जाति-बिरादरी के नाम पर या पैसे लेकर अपने वोट बेच देती है। जो नेताओं से सवाल नहीं करती और उनको माई बाप समझकर उनके सामने बिछी रहती है।
हम अगर धर्म और जाति के आधार पर वोट करेंगे तो हमारे हिस्से अपने बच्चों की चीखें और अश्रुधाराएं ही आएँगी। हमारे अपने बच्चों की मौत के भागीदार कोई और नहीं, हम ख़ुद ही हैं। किसी और को दोष देना ग़लत है। आप जिन्हें ज़हर फैलाने और मौत का तांडव करने के लिए चुनते हैं, उनसे किसी अच्छे जीवन सरोकारों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
आप बनाइए, मंदिर!
बचाइए, मस्जिदें; लेकिन अपने बच्चों की फिक्र मत कीजिए।
आप मंदिरों में घण्टे बजा सकते हैं, लेकिन क्या आपके गाँव के स्कूल या अस्पताल की या आपके आसपास के वनों की, वन्यजीवों की और पर्यावरण की थोड़ी सी भी चिंता आपको है?
आपको किसी कुएं, बावड़ी या खत्म होती किसी बरसाती नदी की जरा चिंता है? आपको किसी पहाड़ या पर्वत की है कुछ फिक्र?
आप जात-पात की बोटी-बोटी करके नारे लगा सकते हैं, लेकिन क्या आपके बच्चों के सिर पर स्कूल की छत सलामत बचेगी?
क्या लोक सरोकारों की खोजखबर है आपको? आपके आसपास की खेजड़ियां काटी जा रही हैं और आपके भविष्य की पीढ़ियों के लिए अंधेरे बिछाए जा रहे हैं, कुछ होश है आपको?
हम वो जो वोट ईवीएम में डालते हैं, उसका मलबा इन बच्चों की किताबों और हड्डियों पर गिरा है। कभी सोचा इस बारे में? किसी पंच ने? किसी सरपंच ने़ किसी प्रधान ने? किसी जिला प्रमुख ने़ किसी पंचायत समिति या जिला परिषद के सदस्य ने? किसी कलक्टर या एडीएम ने? किसी एसडीएम या किसी पटवारी, बाबू या जिलेदार ने? किसी रेवेन्यू इंस्पेक्टर ने? सरकारें दोषी हैं, हाँ। ये सब भी कुसूरवार हैं; लेकिन उससे ज़्यादा दोषी है हमारी वह भीड़, जो नेताओं से विकास नहीं, बदले की भाषा माँगती है। लिंचिंग की छूट चाहती है? किसी निरीह कन्हैयालाल को बर्बरता से मार डालना या किसी मोहम्मद अफराजुल को चौड़े-धाड़े काट डालना और उसके बाद हम सबका अमानुषिक व्यवहार!
जाने क्यों सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल नहीं आया कि अगर कन्हैयालाल किसी फ़िल्म का विषय है तो अफ़राज़ल क्यों नहीं है? क्या सच में इस फ़िल्म के दो पार्ट नहीं होने चाहिए थे? एक में अफ़राज़ुल और एक में कन्हैयालाल और जांच में जो कुछ भी सच पाया जाए, उसे उसी तरह से उतनी ही कड़ी सज़ाएं दी जाएं। लेकिन इस तरह की घटनाओं के बाद हम लोगों की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि हम अपने महान् देश की उस विरासत को भुला रहे हैं, जिसमें शासकीय जिम्मेदारी और लोक में न्यायशीलता की भावना सर्वोपरि रही है।
हम मुसलमान से नफ़रत करके समझते हैं कि हिंदू सुरक्षित हो गया। और एक निरीह हिन्दू को काट कर सोचते हैं कि इस्लाम की रक्षा हो गई! या फिर हम जात के नाम पर छककर ज़हर पीते हैं और फिर पूछते हैं कि क्यों मरे हमारे ये बच्चे?
ये बच्चे हमारी बेहोशी से मरे हैं। ये बच्चे हमारे हर उस वोट की वजह से मारे गए हैं, जो नफ़रत को वैधता देता है और शिक्षा जैसे जरूरी सवालों को छोड़ देती है। हमारी हर उस चुप्पी की वजह से हमारे ये बच्चे मारे गए हैं, जो नेताओं को उनके अज्ञान की ताकत और प्रशासन की क्रूरता को खुले आम छूट देती है। कितना लज्जाजनक है कि शिक्षक देने वाले स्कूलों में जाकर पढ़ाने से अधिक वेतन लेने पर ध्यान रखते हैं और इस तरह के धराशायी होते भवन के नीचे बच्चों को तो बैठने पर विवश करते हैं और ख़ुद टहलकर जीवन बचाते हैं।
क्या कहें उस राष्ट्रवाद की वक़ालत करते उन वाचाल लोगों पर जो स्कूल में लापरवाही के कारण काल कवलित हुए बच्चों की गिनती पर गहरी जम्हाइयाँ लेता है! शर्म है उस समाज पर जो चांदी के मुकुटों को सिर पर रखता है; लेकिन बच्चों की ज़िंदगी को दीवार की एक चुटकी भर चूना समझता है।
यह हादसा नहीं; आत्महत्या है, पूरे समाज की।
और सबसे बड़ा अपराध यह है कि हम अब भी नहीं सुधरेंगे।
कल फिर कोई नारा गूँजेगा, कोई बटन दबेगा, और कोई नई छत किसी और स्कूल में अपने शिकार का इंतज़ार करेगी। किसी सड़क पर तेज़ दौड़ती गाड़ी आपमें से किसी के परिजन को कुचलकर आगे बढ़ जाएगी और आप उसे एक दुर्घटना समझकर मौन हो जाएंगे। हम सरकार में बैठे नेताओं की चुप्पी को सहर्ष देखेंगे और प्रतिपक्ष की उस बेशर्मी को कंठहार पहनाएंगे, जो कल सत्ता में थे और आगे फिर इसी तरह सत्ता में आने के लिए ऐसी घटनाओं को सीढ़ी बनाएंगे। हम प्रश्नपत्र बेचने वालों को आरपीएससी सौंपेंगे और उनकी जाँच पर जाँच पर जाँच पर जाँच और न्याय और इनसाफ़ की ऐसी इबारत लिखेंगे कि अन्याय और अत्याचार न्याय और नफ़ासत मिलकर एकाकार हो जाएंगे! कुछ भी होता रहे, मंदिर वहीं बनाएंगे, सरकार वही लाएंगे, अपनी ही जाति का नेता चुनेंगे, चाहे वह हमारे सरोकारों का क्रियाकर्म ही क्यों न कर दे! नेता हमारे ही धर्म का होगा, भले वह दूसरे धर्म वालों से कहीं अधिक क्रूर और गंदा हो।
जाने हम अपने इन बच्चों की हत्या करके रोते क्यों हैं? क्या रोना भी चाहिए? हो सकता है, मैंने कुछ ग़लत कहा हो; लेकिन आप क्या कहते हैं? मुझे आपको सुनना है? मुझे आप सबकी प्रतिक्रिया चाहिए? आप कुछ कहें; यह नहीं कि मेरी बात का समर्थन कर दें या इसकी निंदा कर दें। लेकिन अपने पक्ष को सबलता और सतर्कता से रखें ताकि हम किसी अर्थपूर्ण नतीजे तक पहुंच पाएं!
#jhalawad
स्कूल की छत नहीं गिरी, राजनीति का चरित्र गिरा है और व्यवस्था की नैतिकता पतन हुआ है,
सात बच्चे नहीं मरे, राजनीति, प्रशासन, शिक्षा तंत्र और हम सबकी नैतिकता का पानी मरा है
कल्पना कीजिए...
सरकार कांग्रेस की होती। मुख्यमंत्री कांग्रेस का होता। और भाजपा विपक्ष में।
और यही हादसा झालावाड़ नहीं, जोधपुर में होता!
तो आज के शिक्षा मंत्री उस वक़्त क्या कहते? वे सदन में खड़े होकर चिल्ला रहे होते; यह कांग्रेस सरकार बच्चों की जान की कीमत नहीं समझती! यह हत्यारी सरकार है। शिक्षा मंत्री को अभी जेल भेजो!
कोई एक साहेब का बयान छपता, मैं सत्ता में होता तो इन बच्चों की मौत के जिम्मेदार लोगों को सबक सिखाता। क्या सरकार नाम की कोई चीज़ है? सोशल मीडिया पर उनके बयान रीपोस्ट हो रहे होते और लाइक्स के बजाय क्रोध वाली इमोजीज की बाढ़ आ रही होती।
भाजपा के कार्यकर्ता कह रहे होते, "सरकार ग़ैरज़िम्मेदार है, इस्तीफ़ा दो!"
कोई एक साहेब पीसी कर रहे होते: "सरकार बच्चों की लाशों पर खामोश क्यों है?" और प्रदेश अध्यक्ष शायद धरने पर बैठ जाते, विधानसभा की सीढ़ियों पर मोमबत्तियाँ जलतीं और मांग होती, "शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें। मुख्यमंत्री नैतिक ज़िम्मेदारी लें।"
अब कल्पना कीजिए इस स्थिति को उल्टा कर दीजिए, जैसा कि आज है।
सरकार भाजपा की है। और विपक्ष कांग्रेस है। और देखिए, कैसी गूंगी शांति है।
कोई उनसे पूछे कि आपने इतना पैसा इस तरह लुटाया, ऐसे जर्जर स्कूलों की मरम्मत क्यों नहीं करवाई?
आज ही मैं देख रहा था कि पत्रकारिता की दो छात्राएं सोडाला के पास रो रही थीं कि करोड़ों रुपए लगाकर एक विश्वविद्यालय बना दिया; लेकिन वहाँ ले जाने वाली बस नहीं है। काश हॉस्टल ही बना दिया जाता। आपने आलीशान और एलीट लोगों के लिए एक फाइव स्टार क्लब बना दिया, लेकिन बच्चियों के लिए एक छात्रावास नहीं बनाया। परीक्षा देने में देर होने वाले उन छात्राओं के चेहरे रोते हुए थे।
विपक्ष में हर वह बात याद आ जाएगी और सत्ता में आते ही हर बात भूल जाएंगे, भले ही किसी की सांसों की डोर उससे जुड़ी रहे।
यह राजनीतिक चरित्र सिर्फ़ राजनेताओं के पास ही हो, ऐसा नहीं है। यह हम सबकी थाती है; क्योंकि कोई भी जिम्मेदारी और जवाबदेही को उतनी संवेदनशीलता से नहीं समझता। इसलिए मौन ही सबसे ज़्यादा चीख़ता है।
हम सबने देखा है, जो आज शिक्षा मंत्री हैं, कल विपक्ष में थे, जो आज विपक्ष में हैं, वे कल सत्ता में थे। पर दीवारें उन्हीं की गिरती रहीं जिन्हें सत्ता नहीं, बस स्कूल की छत के नीचे बैठकर पढ़ना होता है।
न तो राजनेताओं को सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने जाना होता और न ही सरकारी स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ते। इसीलिए सरकारी स्कूल आजकल उपेक्षा के शिकार हैं।
क्या यह सब वैसा ही नहीं लगता जैसे नाटकों में अभिनेता कभी मूंछ रखकर रावण बन जाते हैं और अगले दृश्य में वही मूंछ मुड़ाकर मंदोदरी का अभिनय करते हैं? भूमिकाएँ बदल जाती हैं, अभिनय वही रहता है।
असल में इस हादसे का दोष सिर्फ एक सरकार या एक दल का नहीं है। झालावाड़ की वह छत वर्षों में गिरी है—हर उस साल, हर उस दिन जब किसी शिक्षा मंत्री ने जर्जर स्कूलों की फाइल पर दस्तख़त नहीं किए, जब किसी शिक्षा सचिव ने बजट की पहली पंक्ति से दूसरी पंक्ति तक आँखें घुमा दीं, जब किसी जिला शिक्षा अधिकारी ने बिना निरीक्षण के रिपोर्ट भेज दी, जब सरपंच ने स्कूल के हालात जानकर भी चुप्पी साध ली, जब पंचायत समिति ने प्रस्ताव पास नहीं किया, जब बीडीओ ने फाइल दबा दी, जब पत्रकारों ने ‘छोटी खबर’ समझकर अनदेखा किया।
झालावाड़ में जो छत गिरी, वह ईंटों से बनी नहीं थी।वह बनी थी इस लोकतांत्रिक उपेक्षा से, जो धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय लापरवाही में बदल चुकी है।
तो इस बार न कोई इस्तीफा माँगिए, न किसी एक पर दोष डालिए। स्तर पर उत्तरदायित्व की माँग कीजिए।
अगर लोकतंत्र की सबसे नर्म छाया में पलने वाला बच्चा भी सुरक्षित नहीं है तो फिर हम किस ‘विकास’ की बात करते हैं?
अगर किसी स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत होती है तो कलक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी, सरपंच, प्रधान, विधायक, सांसद और मंत्री का इस्तीफा तो बनता है! इसलिए कि इससे छोटी घटनाओं पर वे अतीत में अपने प्रतिद्वंद्वियों से यह मांगें कर चुके हैं!
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