निशु आजाद के एक-एक ट्वीट पर हर जिले में ईशनिंदा कानून के तहत BNS 299/IPC 295A में केस होना चाहिए। ‘हिन्दू लीगल फंड’ को इसमें मोबिलाइज किया जाए।
इसके बाप पर काउंटर FIR होनी चाहिए। उसको बहुत ‘दो मिनट पुलिस नहीं आती’ करना है न, क्या @DelhiPolice इतनी नकारी है कि कोई भी गुंडा प्रवृत्ति का व्यक्ति खुलेआम वीडियो बना कर धमकी देगा?
जब इनको FIR-FIR ही खेलना है, तो यही सही। फिर देखते हैं कि रावण और राहुल कितने थाने घेर लेता है। नरेन्द्र मोदी ने जो बवासीर बना दिया है, वह अब हिन्दू समाज हर दिन झेल रहा है। दुर्भाग्य यह है कि जो इसका प्रयोग कर रहे हैं वो मोदी के वोटर हैं ही नहीं।
आज का लाइव ऐसा होगा
फिर कभी नहीं जैसा होगा
एट्रोसिटी एक्ट के खोलेंगे धागे
रख कर दलितों को ही आगे
चुन-चुन कर वीडियो लाएँगे
सब तथ्य दिखाए जाएँगे
मंचों के बोल भी आएँगे
हर इमेज सजाए जाएँगे
सवर्णों की भी बेटी होती है
उसकी भी इज्जत होती है
वो राह चलती वेश्या नहीं
मैं चुप सुनने वाला प्रेश्या नहीं
हर रंग दिखाऊँगा तुमको
धो-धो के सुखाऊँगा सबको
—
मित्रों, आप सबके स्नेह और समर्थन का आभार! मेरी बहन आपकी भी बहन है, और आपकी बहन मेरी भी बहन है। मेरे वचन तब कटु हुए जब किसी ने उसे राह चलती किसी वस्तु की तरह देखा। मेरी बहन का ऑब्जेक्टिफिकेशन किसी नारीवादी को नहीं दिखा, पर जब एक कथित रावण समर्थक को मैंने लक्षित करके कुछ कहा तो तुम्हें ध्यान आया कि मेरी मानसिकता सड़ी हुई है।
मैं जहाँ से आता हूँ, यदि यह बात मुझे कोई सामने से कहता तो मेरे ऊपर यह धाराएँ नहीं लगती, वो कोई और धारा होती। मैं आत्मनियंत्रण वाला व्यक्ति हूँ और ट्रोल की ट्रोलिंग को उसी तरह से थामना जानता हूँ।
बाकी, जो भी होगा वह प्रारब्ध है। पर हाँ, सवर्णों की बेटियाँ किसी भी शोषित-वंचित के डिजिटल उपभोग या विकृत यौन मानसिकता के प्रयोग की वस्तु नहीं।
RHA को ले कर सरकार से कुछ बात और माँगें
सरकार अपने स्तर से हर आंदोलन को फूट, समझौता, बल-प्रयोग, समझदारी, मिसइन्फॉर्मेशन कैम्पेन या कायरता दिखा कर कर समाप्त करना चाहती है। और वही उनका कार्य भी है। RHA का नाम ले कर कुछ लोगों ने आंदोलन के लिए जनता को बुलाया और लगभग 7000 की भीड़ जंतर मंतर पर भीतर दिखी, उतने को ही बाहर होल्ड किया गया या लौटा दिया गया।
मैंने केवल दिल्ली पुलिस की बकलोली की अवज्ञा के लिए इसमें भाग लेने की बात की और फिर बहुत लोग मेरे आने पर भी आए। फिर दुबे को पाठक जी ने नेता मान कर एक ऐसे पत्र पर चर्चा के लिए आश्वासन दिया जिसमें आरक्षण शब्द ही नहीं है।
खैर, मैं ये सब तकनीक देखता और जानता आया हूँ। मुझे इस विषय पर सरकार को भीड़ दिखाने की आवश्यकता न पहले थी, न आज है, पर जब चाहूँ वह भी कर सकता हूँ। अगली बार बिना अनुमति के भी ऐसा किया जा सकता है यदि प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट चाहिए, तो वह भी दिखा देंगे। पर मेरा लक्ष्य वह है ही नहीं।
सरकार को ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से इसलिए नहीं डरना चाहिए क्योंकि एक भीड़ पूरे कनॉट प्लेस को घर कर पत्थरबाजी करते हुए संसद घेर लेगी। सरकार को इसलिए डरना चाहिए कि ऐसी कोई भीड़ ही नहीं है, न ही हम संसद को घेरने की योजना बना रहे हैं।
आंदोलन की तपन केवल जलती हुई कार की आग और अराजक भीड़ की ही नहीं होती। एक तपन ऐसी भी होती है जब जनमानस को वैचारिक रूप से इतना सक्षम बना दिया जाता है कि वह स्वयं ही अपने लिए वह निर्णय कर ले, जो वो कल तक किसी दूसरे बहकावे में आ कर कर रहा था।
हमारी माँगें:
१. आरक्षण पर श्वेत-पत्र: क्या लाभ हुआ, किन जातियों को अनुपात से अधिक लाभ लगातार मिला, कौन सी जातियाँ पूर्णतः छूट गईं। आरक्षण किस तरह से देश या समाज के उत्थान में सहायक है, उसके लिए आँकड़े क्या कहते हैं आदि आदि! इस से जुड़ी हर वह रिपोर्ट और सर्वेक्षण जो सार्वजनिक नहीं हुई।
२. EWS को हर वह आर्थिक सहायता दी जाए जो SC को मिलती है। निःशुल्क कोचिंग, निःशुल्क फॉर्म, शून्य हॉस्टल और कोर्स फीस। फिर भी लोन यदि लेना पड़े तो उसमें भी सुविधा।
३. तीनों ही आरक्षित वर्ग में ‘कोटा विदिन कोटा’ लागू हो ताकि वास्तविक दलित-पीड़ित-वंचित जातियों तक लाभ पहुँचे। अभी SC और OBC में हजार-हजार जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें नगण्य आरक्षण मिला है। और 4-5 जातियाँ ऐसी हैं जो 70-80% आरक्षण खा रही हैं। इसका आधार पारिवारिक आय हो, न कि वैयक्तिक और दुरुपयोग की संभावना न रहे।
४. मेरिट का सम्मान हो। आरक्षित वर्ग का कटऑफ किसी भी हालत में सामान्य वर्ग के कटऑफ के (से नहीं) 10% के रेंज से बाहर न जाए। और यह भी आज की परीक्षा के अधिकतम आयु सीमा वाले बच्चों की आयु के बाद समाप्त किया जाए। न्यूनतम क्वालिफाइंग मार्क्स तो तय होना ही चाहिए।
५. सरकार यह सर्वेक्षण करे कि क्या गरीबी, भेदभाव या पिछड़ेपन से किसी की बौद्धिक क्षमता घट या बढ़ सकती है? इम्पीरिकल एविडेंस सार्वजनिक करें और उसी आधार पर आरक्षण की नीतियाँ बनें।
६. एक व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिले। एक परिवार को एक बार आरक्षण मिले।
७. दशकीय समीक्षा हो। समाप्ति के लिए एक ‘सनसेट क्लॉज’ या रोडमैप कि कब तक रहेगा।
८. कॉलेज/यूनिवर्सिटी पुस्तकालयों में पुस्तकों के अलॉटमेंट का आरक्षण तत्काल निरस्त हो। इसका कोई लॉजिक नहीं है। यह आरक्षण से लड़ कर वहाँ पहुँचे बच्चों को सताने की व्यवस्था मात्र है। या आप पुस्तकों की मात्रा दोगुनी कीजिए और वहाँ ‘आरक्षित सेक्शन’ लिख दीजिए।
—-
अन्य माँगें:
९. यूजीसी नियमावली निरस्त हो या समीक्षा कर के हर जाति समूह को इसमें सम्मिलित किया जाए।
१०. SC/ST Act की तर्ज पर ‘सवर्ण उत्पीड़न (रोकथाम) कानून पास’ हो। दोनों ही कानून में केस झूठा पाए जाने पर, उस केस में होने वाला दंड आरोप लगाने वाले को झेलना पड़े। आर्थिक जुर्माना भी वसूला जाए।
—-
सरकार और सुधिजन देख लें। बाकी, चाहे आप दुबे, शेखावत या अन्य को मैनेज कर लें, आंदोलन चलता रहेगा।
अब चला सोने। सुबह दूबे और भाजपा आइटी सेल वालों को यूजीसी पर पेलना भी है। इन्हें लगा था कि दो दिन हल्ला होगा, फिर सब शांत हो जाएगा।
ये हाल के दिनों का सबसे लम्बा खिंचने वाला विषय है जो @PMOIndia के मीडिया मैनेजमेंट के बाद भी थम नहीं रहा, बड़ा ही होता जा रहा है। अभी भी किसी चैनल ने इस पर लम्बे डिबेट नहीं किए हैं, जो बताता है कि एडिटोरियल मीटिंग में तय होता होगा कि ‘बहुत प्रेशर है, इसे छूना भी नहीं है’।
आइटी सेल वालों से जब डिफेंड नहीं हो पा रहा, तो अब वो हम सब को सोरोस का एजेंट बता रहे हैं। कोई बात नहीं, कभी सपाई, कभी कॉन्ग्रेसी, कभी विधर्मी अ-हिन्दू, तो कभी वामपंथी तो बताया जा ही चुका हूँ, पर तथ्य पर तो काट नहीं पाए।
हम पेलते रहेंगे, जब तक वापस नहीं होगा, या संशोधित नहीं होगा कि ‘ब्राह्मणों की कब्र खुदेगी’, ‘इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों पर जेल होगी। प्रधान की सारी प्रधानी निकल जाएगी और दूबे को अबे न बना दिया फिर कहना। उसकी इतनी पेलाई कॉन्ग्रेस वालों ने भी नहीं की होगी।
दो कौड़ी के बिके हुए, विचारहीन मूढ़! स्टैंड लेना सीखो या मलद्वार पर पूँछ रख कर दोनों पैर से चाँप कर बैठो।
@BJP4India को अपना नाम भारतीय जनता पार्टी से बदलकर भीम जनता पार्टी कर लेना चाहिए।
चुनाव के समय ये ,एक हैं तो सेफ हैं, बंटेंगे तो कटेंगे जैसे नारे देते हैं इनको सब हिंदू दिखते हैं। चुनाव बाद sc,st,obc, general करने लगते हैं।
छेनी-हथौड़ी थी तो कुआँ खोद लेते पगले!
कलम पकड़ी तो 90% ला कर कम्पीट करते, 30% पर ‘हक’ नहीं माँगते फिरते।
हथियार उठा सकते तो हर बात पर विक्टिम कार्ड न निकाल रहे होते।
सत्य यह है कि दशरथ माँझी की इच्छाशक्ति किसी दलित की इच्छाशक्ति नहीं, मानव मात्र की थी, जो तुम में होती तो तुम सच में कलम उठा लेते। अम्बेडकर को कलम भी ब्राह्मण ने ही पकड़ाया और वो कई संविधान निर्माताओं में से एक थे। जहाँ तक हथियार उठाने की बात है तो हरिजन एक्ट से बाहर आओ, विक्टिम कार्ड मत खेलो।
सत्य यह है कि तुमने स्वयं को, और आने वाली पीढ़ियों को लाचार, पंगु और अपाहिज जैसा बता कर उनके साथ धोखा किया है। तुम्हारे जैसा हर चिरकुट, हर दलित के लिए विष है जो उसके स्वाभिमान की हत्या कर रहा है, जो उसे समझाता है कि वह हीन है, वह सवर्णों से कम बुद्धि वाला है, वो कम्पीट कर ही नहीं सकता।
जी नहीं, बाबा साहेब की कृपा नहीं मेरे पिताजी के खून पसीने की कमाई से मैंने पढ़ाई की है और अपनी शिक्षा पूरी की है।
ये मेहरबानी उनके ऊपर है जो आरक्षण के दम पर शिक्षा और नौकरी पाते होंगे, आर्थिक सहायता भी, छात्रवृत्ति भी। हम पर इसकी धौंस जमाने की आवश्यकता नहीं है। न हम मानते हैं।
G 20 in India | United Kingdom Prime Minister Rishi Sunak and his wife Akshata Murthy at Delhi's Akshardham temple.
(Source: Swaminarayan Akshardham's Twitter)
मनोज पहले ब्राह्मण होने को छुपाते थे क्योंकि उन्हें लगा यह तो पैसे कमाने में आड़े आ जाएगा। ‘मुंतशिर’ लगाया क्योंकि बिना उर्दू उपनाम के ‘शायर’ कैसे बनते, गैंग में स्वीकार्यता कैसे मिलती कि हाँ, अब ये सेकुलर हुआ है।
फिर इन्होंने देखा कि अब समय पलट गया है तो ‘शुक्ला’ हो गए। जो व्यक्ति समय के साथ बाप बदलता हो, उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।