Keep your eyes open. Question. Critique. Ask. Don't be a cheer leader. Don't be a blind supporter. Your questioning doesn't bring down a govt. Your critique is not a vote. A good citizen votes every 5 years and questions every day. Open your eyes. Ask. Worry. Speak up. Speak out.
ये भी एक प्रकार का गुंडा राज है!
भाई इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? सरकार से पूछ ना! जनता को बता रहे हो कि दवा महँगी है, असली होने की भी गारंटी नहीं है- तो जनता अब करे क्या? दवा ख़ुद जाँचे, माफिया भी ख़ुद पकड़े और इलाज भी ख़ुद करे?
दवाओं के मानक और नियामक समन्वय के लिए CDSCO, निर्माण-बिक्री की निगरानी के लिए राज्य के औषधि विभाग और कीमतों के नियमन के लिए NPPA है- इनसे जवाब कौन माँगेगा?
अफ़सर हैं, स्वास्थ्य मंत्री हैं- उनसे पूछो कि ये सब उनकी निगरानी में कैसे हो रहा है? किस ज़िम्मेदार अफ़सर पर कार्रवाई हुई?
माफिया के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे हो। अब एक एपिसोड उन्हें रोकने की ज़िम्मेदारी उठाने वालों पर भी बनाओ। या सवाल पूछने की सारी हिम्मत सरकार का नाम आते ही ख़त्म हो जाती है?
कैंसर की दवा के मार्जिन को लेकर देशभर में बवाल... राजस्थान में महंगी दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय, ₹370 की दवा 9762 रु. में बिक रही; डिस्ट्रीब्यूटर-अस्पताल मरीजों को लूट रहे
#CancerTreatment#MedicinePrices#DrugPricing#Rajasthan#Healthcare
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WhatsApp पर 'NO' वाला स्कैम आया है जिसको लेकर हैदराबाद सिटी पुलिस कमिश्नर ने चेतावनी दी है. उन्होंने WhatsApp के इस नए स्कैम के बारे में बताया, इसमें न तो कोई OTP शेयर किया जाता है और न ही किसी लिंक पर क्लिक किया जाता है. फिर भी अकाउंट खाली हो जाता है. क्या है ये नया स्कैम?
WhatsApp | Scam
पूरा वीडियो अंत तक देखिए
निहत्थे छोटे छोटे बच्चों को 6-6 बैरिकेड लगाकर रोकने वाली दिल्ली पुलिस हथियारों और डंडों से भरी गाड़ी को गुंडों समेत सेफ्टी से निकाल रही है।
पत्रकार और पास खड़े लोग बार बार पुलिस के जवानों को गाड़ी की तलाशी लेने को कहते हैं, लेकिन वो उसे भगा देते हैं।
@AjitSinghRathi Sir, looks like judges are treated as god. They may give any decision they may release day time murderer without any guilt because murder is paying them money. May I am giving a sweeping statement. But I have seen this informant of me. Apart from going to high court no way
फर्जी नियुक्ति को लेकर जहां हो हल्ला हो रहा है। उस राज्य में एक मेरा दोस्त है IPS है 2023 बैच का।
कल उसने कहा कि बिना करप्शन किए महीने के हमारे टेबल तक 1.5 करोड़ तक रुपए आ जाते हैं।
हमारा पोस्ट निरंतर वो देखता है, ये पोस्ट देखकर ये मत समझना कि वो ब्लाक कर देगा। वो खुद अच्छा इंसान है लेकिन क्या करें मंत्रिपरिषद तक पैसा जाना होता है।
#awareness
The most expensive part of a hospital bill may never touch the hospital at all.
A patient admitted for care has no way of knowing whether the price on a medical consumable reflects its actual cost or a markup fixed long before it ever reached the ward. That gap in information is, at its core, a public health issue.
A survey of hospital consumables in Maharashtra found an IV infusion set with a trade price of ₹11.05 carrying a printed MRP of ₹325 ; a markup of 2,841%. A syringe procured at ₹6.75 carried an MRP of ₹57.20. A catheter procured at ₹29.41 carried an MRP of ₹310.
These are not elective purchases. Patients cannot compare prices, seek alternatives, or question a number printed on a box while receiving care and the MRP itself is often fixed upstream by manufacturers and distributors, disconnected from the trade price by a wide, unexplained margin. The result is a system where the party bearing the cost has the least information to evaluate it.
The regulatory gap is structural: scheduled medicines are capped under the Drugs (Prices Control) Order, 2013. Most medical devices and consumables are not leaving both the pricing and the information around it almost entirely unmonitored.
A review of these findings and clear guidelines on the permissible gap between trade procurement price and declared MRP have been recommended to the Department of Pharmaceuticals and the NPPA ; a step toward closing not just a pricing gap, but the information gap patients are left to bear alone.
#PublicHealth #GoodGovernance #Leadership #TukaramMundhe
https://t.co/Ye9CVzr8qU
Golmaal is back! Watch till the end!
Here are 4 companies trying to fool consumers by their marketing!
If any company mentioned in this video is planning to send me a defamation suit, just remember, I will send you a defamation suit back for misleading Indian customers!
POSITIVE AGGRESSION!
Share this video and let's make India healthy again!
@malpani@grok Job security and bribe main reason behind,
I was thinking judiciary is away from bribe but one of the incident change my opinion.
one of my friends brothers murdered by a goon, he is hearing judge already has done settlement in case of ipc 302, its disgusting. How??
2014 में एक पिता ने अपनी बेटी के ऑपरेशन के लिए AIIMS में पैसे और खून जमा कराया था। उसे भरोसा था कि अब उसकी बेटी ठीक हो जाएगी लेकिन 12 साल तक अस्पताल के चक्कर लगाने के बाद सर्जरी नहीं हुई और उसकी बेटी की 2026 में अभी मौत हो गई।
12 साल तक तारीखें मिलती रहीं, जांचें होती रहीं, शिकायतें होती रहीं और एक पिता अपनी बेटी को लेकर AIIMS के चक्कर लगाता रहा।
2026 में उसकी 15 साल की बेटी की मौत हो गई।
यह कहानी है मुकेश परियानी और उनकी बेटी की, जिसके इलाज को लेकर पिता ने AIIMS पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
मुकेश के मुताबिक, वह पहली बार 10 अक्टूबर 2012 को अपनी बेटी को लेकर AIIMS की OPD पहुंचे थे। बच्ची के इलाज के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे तक भेजा गया और शुरुआती जांचों में करीब एक साल लग गया।
बाद में उन्हें डॉ. सचिन तलवार के पास भेजा गया। पिता के अनुसार, डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए पैसे और खून जमा कराने को कहा। उन्होंने 4 अप्रैल 2014 को पैसे और खून दोनों जमा करा दिए।
फिर आई 2 सितंबर 2015 की तारीख। पिता ऑपरेशन की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन उन्हें बताया गया कि ऑपरेशन दिवाली के बाद होगा।
इसके बाद उनका आरोप है कि ऑपरेशन की तारीख लगातार टलती रही।
उन्होंने PMO में शिकायत की। शिकायत के बाद अस्पताल से बुलाया गया। लेकिन पिता का आरोप है कि डॉक्टर ने शिकायत वापस लेने तक ऑपरेशन करने से इनकार कर दिया।
2018 में फिर जांचें हुईं। 2023 में फिर AIIMS पहुंचे। 2025 में दोबारा शिकायत की। 28 जुलाई 2025 को अस्पताल बुलाया गया, लेकिन डॉक्टर छुट्टी पर थे। बाद में परिवार से कहा गया कि बच्ची दवाइयों से संभाल सकती है।
9 फरवरी 2026 को पिता ने फिर शिकायत की। जांचें चलती रहीं, लेकिन उनके मुताबिक ऑपरेशन नहीं हुआ।
और फिर वह दिन आया, जिसका डर एक पिता को सबसे ज्यादा होता है।
उसकी 15 साल की बेटी की मौत हो गई।
अब मुकेश का सवाल है—अगर 2015, 2016 या 2017 में ऑपरेशन से बेटी ठीक हो सकती थी, तो इतने साल तक ऑपरेशन क्यों नहीं हुआ?
क्या इलाज में देरी हुई? क्या समय पर ऑपरेशन से बच्ची की जान बचाई जा सकती थी? इतने वर्षों में अस्पताल और डॉक्टरों की ओर से क्या-क्या कदम उठाए गए?
पिता के आरोप बेहद गंभीर हैं। इनका सच सामने आना जरूरी है।
AIIMS और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर 2012 से 2026 के बीच इस बच्ची के इलाज में क्या हुआ और उसकी मौत के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह कौन है?
यह ‘लॉजिस्टिक चैलेंज’ हाई स्पीड डीजल और हाई स्पीड पेट्रोल देने में कभी नहीं होता। उसका पैसा जो ज़्यादा है। न ही ARAI रिसर्च की रिपोर्ट साझा की जाती है। न ही SIAM की पुरानी चिट्ठी पर कुछ बोला जाता है।