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ट्विशा शर्मा और सेलेक्टिव ह्यूमैनिटी
अतुल सुभाष याद है? सुसाइड नोट छोड़कर जाता है, कितनी बातें हुई थीं, लेकिन आरोपी पत्नी बाहर घूम रही है। जज रीता कौशिक पर सवाल उठे, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ। जज अमन शर्मा ने पत्नी के सामने फांसी लगा ली थी। आखिरी शब्दों में पत्नी की प्रताड़ना लिखकर चले जाते हैं, लेकिन क्योंकि आरोपी महिला है और न्यायिक सेवा में ही है तो पूरा सिस्टम फुसफुसाने लगता है। निशांत बरनवाल की हत्या होती है। सीसीटीवी में पत्नी शव घसीटती दिखती है। फिर भी वैसी राष्ट्रीय बहस नहीं होती, जैसे किसी पुरुष आरोपी के मामले में होती है।
सोनम रघुवंशी को जमानत मिल चुकी है और सोशल मीडिया ब्लू ड्रम पर मीम्स अभी भी चल रहे। सोचिए अगर यही केस उल्टा होता तो? अगर किसी महिला की लाश ड्रम में मिलती और आरोपी पुरुष होता, तो क्या तब भी लोग चुटकुले बना रहे होते? क्या तब भी डार्क ह्यूमर चल रहा होता?
कड़वा है, लेकिन अब यही हो रहा। अब इंसाफ की बात पहचान देखकर की जा रही है। अगर आरोपी पुरुष होता है तो पूरा सिस्टम पितृसत्ता, टॉक्सिक मर्द जैसे शब्दों से नवाजने लगता है। लेकिन जब आरोपों में घेरे में महिला होती है तो पूरी बहस मेंटल हेल्थ, प्राइवेट मैटर और दोनों पक्षों की कहानी बन जाती है।
इसे ही सेलेक्टिव ह्यूमैनिटी कहा जाता है। जहां दर्द का मूल्य जेंडर देखकर तय होता है। बात अगर पीड़ित का पक्ष लेने की होती है तो इसका कायदे से पालन होना चाहिए। संवेदनाएं अगर सच में इंसानी हैं तो उनका कोई जेंडर नहीं होना चाहिए।
Why are you not lodging FIR in this case @DCPCentralNoida@noidapolice@Uppolice ?
Is marriage a license for a wife & her family to assault husband and his senior citizen parents like this? Uncle has a fracture. It is a case of grievous hurt. You'd have immediately arrested if a husband did this. You can do better.
@myogiadityanath@myogioffice@dgpup@shalabhmani Kindly see