मेरी इनके लिए कोई हमदर्दी नहीं और न ही मैं कभी कश्मीर जाऊंगा इनके रोजगार में अपना पैसा खर्च करके बढ़ावा देने।
बाकी मोदी जी ने हमारा बहुत पैसा बर्बाद कर दिया इनके विकास पर।
ये जो मोमबत्ती जलाकर विरोध किया जा रहा है ये सिर्फ अपने रोजगार को बचाने के लिए किया जा रहा है मोमिनों द्वारा न की पर्यटकों की हत्या के विरोध में,इन्हें इतनी ही फिक्र होती देश की तो ये एक सैनिक के शहीद होने पर भी विरोध प्रदर्शन करते न कि सुरक्षाबलों पर पथराव।
तो ज्योतिबाबा फुले को छी, उत्तराखंडक लिजी के करो येल ?
@pushkardhami जी, कुछ नाम उत्तराखंड के अमर बलिदानियों, महापुरुषों के नाम पर भी रख देते। इन नामों से ऐसा प्रतीत होता की सिर्फ, राजनीतिक समीकरण और अपने आकाओं को खुश करने के लिए ये रखें गए हैं।
पहाड़ बनाम मैदान हम कर रहे या आप?
टीम #JACFILPS के आदर्श, गढ़ - कुमाऊं गौरव, भारत के प्रथम सीडीएस और भारतीय थल सेनाध्यक्ष, पद्म विभूषण से अलंकृत स्व. जनरल बिपिन रावत जी की जयंती पर उन्हें सादर वंदन।
जय गढ़ - जय कुमाऊं
पहाड़ों से टकराने वाले बादल हमेशा पराजित होकर लौटते हैं, कोई भी पहाड़ को पार नहीं कर सकता।
हिमालय हैं हम और हमसे ही सब हैं, क्योंकि हम मुकुट हैं भारत का।
#इनरलाइनपरमिटसिस्टम#मूलनिवास1950#अनुच्छेद371
अपने लोकगीत पर झूम कर नृत्य कर रही।
शायद में गलत हो सकता हूं लेकिन मुझे लगता पहाड़ से पलायन कर चुके पहाड़ी अपने पहाड़ के प्रति समर्पित हैं।
चेली (बिटिया) की lipsing पर ध्यान दीजिए वो भी वही गाना गा रही ।
कुमाऊनी गीत ही सही लेकिन पहाड़ से पलायन कर चुके इनके पालनहार, फिर भी पीढ़ी इन गीतों के माध्यम से अपने पहाड़ से जुड़े हैं।
जैसा आप अपनी आने वाले पीढ़ी को बताओगे/सिखाओगे वही उन्हें समझ आयेगा।
और पहाड़ से हजारों किलोमीटर जन्म लिए बच्चों को आज भी ईजा- बाज्यू का मतलब पता है।
पहाड़ में ईजा - बाज्यू इतिहास हों लेकिन मैंने इनका आस्तित्व पहाड़ से दूर मैदान में भी जिंदा रखा है।
ये छोटी बच्ची जिसे पता नहीं पहाड़ और अपनी बोली के बारे में लेकिन आज
जो इनका प्रयोग करेगा वो श्रद्धालु नहीं भोग विलासिता जीने वाला प्राणी, एक प्रकृति और आस्था से खिलवाड़,दूजा जो थोड़ा रोजगार पहाड़ियों का था उसे भी छीन लो,बाहरियों के लिए तो पिकनिक स्पॉट हुआ,रील बनाएंगे,मांस खायेंगे,मधुमास मनाएंगे।
#इनरलाइनपरमिटसिस्टम#अनुच्छेद371#मूलनिवास1950
ये केदारखंड-मानसखंड हमारा है, ये पहाड़ हमारा है, उत्तराखंड 2000 में अस्तित्व में आया लेकिन हम यहां सदियों से हैं।
हमने उत्तराखंड अपने लिए मांगा है, अपनी मातृ शक्ति, अपने बच्चों, अपने भविष्य के लिए मांगा है न कि किसी से गाली खाने को।
सदन में बैठे सत्ताधारी दल के झाड़ू उत्तराखंडी नेता तो छोड़ो विपक्ष में बैठे मूल पहाड़ी नेताओं ने भी इसे फतोड़ने की हिम्मत नहीं करी।
ऊपर से धाड़क इसके बचाव में सिर्फ इतना बोलकर निकल गया उत्तराखंड सबका है।