सुल्तान ने महंगाई के शोर पर अप���े कान बंद कर लिए,
LPG के संकट पर अपनी आँखें मूँद लीं,
रुपये की गिरती कीमत पर अपनी ज़ुबान कसकर दबा ली।
और इसी सब के बीच…
हाथ जोड़कर आपसे आपका वोट मांगता रहा।
And the Darbaris? They applaud and say,
“What a great Sultan!”
बीजेपी में आगे बढ़ने के लिए अपने मालिक के चरण चूमने वाले इन भक्तों के लिए 2013 में रुपया सुबह की सैर से लेकर नाश्ते और फिर दोपहर के खाने तक गिरता ही रहता था।
और अब इन्हीं चरण-चाटुओं के लिए अमृतकाल का ऐसा सुनहरा मौसम चल रहा है कि चूहे की तरह बिल में घुसकर बैठे हैं बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रहे।
2. एक कहानी ऐसी भी
यूजीसी के समर्थन में बोलने के लिए पिछड़े, अति-पिछड़े और दलित वर्ग के लोग अब अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को ��ोज रहे हैं कि ये नेता, जो सामाजिक न्याय की पार्टियों से आते हैं, इस मुद्दे पर क्यों नहीं बोल रहे हैं।
सच यह है कि ये दोनों ही सामाजिक न्याय की पार्टियों के नेता हैं। सामाजिक न्याय के मुद्दों पर जितना खुलकर और स्पष्ट रुख तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव ने लिया है, उतना उत्तर भारत में किसी भी नेता या पार्टी ने नहीं लिया। तेजस्वी यादव ने जातिगत सर्वेक्षण कराया, आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 65% की। ओबीसी/एससी/��सटी के हर मुद्दे पर उन्होंने आवाज़ उठाई।
लेकिन जब चुनाव आता है, तो आज जो लोग अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को पुकार रहे हैं, वही लोग उन्हें केवल यादवों और मुसलमानों का नेता बताने लगते हैं। कोई अनुप्रिया पटेल को देखकर वोट दे देता है, जो सामाजिक न्याय के मुद्दों पर चुप रहती हैं। कोई ओमप्रकाश राजभर को देखकर वोट देता है, जो सामाजिक न्याय के सवालों पर मौन रहते हैं। कोई चिराग पासवान को देखकर वोट कर देता है, जो ओबीसी/एससी/एसटी के ��ुद्दों पर चुप रहते हैं। कोई जीतन राम मांझी को देखकर वोट करता है, जो दलितों पर कितना भी अत्याचार हो, चुप रहते हैं। कोई नीतीश कुमार को देखकर वोट करता है, जो ओबीसी/एससी/एसटी के मुद्दों पर मौन रहते हैं।
ये सभी लोग सत्ता में भी रहते हैं, खुद को सामाजिक न्याय का नेता भी बताते हैं, लेकिन यूजीसी के सवाल पर चुप हैं।
तो फिर आज गुहार सिर्फ अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव से ही क्यों?
जिन नेताओं को आपने वोट देक�� सत्ता में बैठाया है, उन्हें भी बुलाइए। उन्हें भी कुछ आवाज़ उठाने दीजिए, उन्हें भी कुछ काम करने दीजिए।
@yadavakhilesh @yadavtejashwi
1. एक कहानी ऐसी भी
आज तक की सबसे बड़ी एंकर अंजना ओम कश्यप और कंचना यादव के बीच एक लड़ाई शुरू हुई है। अंजना ओम कश्यप ऐसी एंकर हैं जो घोर जातिवादी हैं। भूमिहारों और ब्राह्मणों के लिए इनके मन में एक अलग तरह का प्रेम है। लेकिन ज्यादातर ओबीसी/एससी/एसटी इस बात को नहीं जानते और अंजना ओम कश्यप को एक संतुलित पत्रकार के रूप में देखते हैं। पिछड़े वर्ग के लोगों ने इनका शो देखकर इन्हें बहुत ब���़ा पत्रकार जैसा घोषित कर दिया है।
यूजीसी एक्ट जो पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए आया, उस पर अंजना ओम कश्यप बहस करवा रही थीं। इस एक्ट को बार-बार Natural Justice के खिलाफ बता रही थीं। इसी पर कंचना यादव ने उन्हें पकड़ लिया और उनके एक पुराने बयान की याद दिला दी, जिसमें अंजना कहती हैं..
“मैं व्यक्तिगत रूप से आरक्षण की विरोधी हूँ। मुझे लगता है कि आरक्षण सबसे बड़ा अन्याय है। ��ेरे पिता ओमप्रकाश तिवारी हैं। हम भूमिहार हैं, मेरे पति ब्राह्मण हैं। हम सभी ऐसे परिवेश में पले-बढ़े हैं जहाँ हम आरक्षण से घृणा करते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हमारा हिस्सा हमसे छीन लिया गया है।”
बस इसी पर अंजना ओम कश्यप भड़क गईं और कंचना यादव को धमकी देकर अपने शो से निकाल दिया।
शायद कंचना यादव का मकसद भी यही था इन्हें उजागर करना कि कैसे ये जातिवादी, मनुवादी लोग अपनी धूर्तता से सिस्टम में ब���ठे हुए हैं। आपके खिलाफ बोलते हैं, आपका हक छीनते हैं। ऐसे मनुवादियों से सावधान रहें। यह देश और यह सिस्टम इनकी जागीर नहीं है।
लश्कर भी तुम्हारा ह��� सरदार तुम्हारा है
तुम झूठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है।
इस दौर के फरियादी जायें तो कहां जायें,
कानून तुम्हारा है दरबार तुम्हारा है।
- UGC पर @ranjnayadav08