#RealityOfMaharshiDayanand
सत्यार्थ प्रकाश नहीं झूठार्थ प्रकाश!
महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 8 पृष्ठ 197-198 पर लिखा है कि सूर्य पर पथ्वी की तरह सब प्रजा बसती हैं। इसी प्रकार सर्व पदार्थ हैं। इन्हीं वेदों को सूर्य पर रहने वाले मनुष्य पढ़ते हैं।
*#RealityOfMaharshiDa
#RealityOfMaharshiDayanan
दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास तेरह में पृष्ठ 414, 425, 428 429, 418, 426,436 पर ईसा जी तथा इसाई धर्म पर अभद्र टिप्पणियां की है।
ईसा जी व ईसाईयों के ईश्वर को ईसाईयों जैसा दूसरों के धन को हड़पने वाला कहा है तथा ईसा जी के अनुयाईय
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दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास तेरह में पृष्ठ 414, 425, 428 429, 418, 426,436 पर ईसा जी तथा इसाई धर्म पर अभद्र टिप्पणियां की है।
ईसा जी व ईसाईयों के ईश्वर को ईसाईयों जैसा दूसरों के धन को हड़पने वाला कहा है तथा ईसा जी के अनुयाईय
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दयानंद सरस्वती बने परमेश्वर कबीर साहेब व प्रभु दृष्टा संतों की निंदा तथा मिथ्या भाषण के महादोष के पात्र।
दयानंद सरस्वती ने संत रामदास जी पर अभद्र टिपण्णी की और गाली दी।
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दयानंद की जीवनी में लिखा है कि दयानंद भांग पीता था, तम्बाकू खाता था, तम्बाकू सूंघता था,
हुक्का पीता था। दयानंद के भक्तों का कहना है कि बाद में भांग पीना, हुक्का पीना, तम्बाकू खाना, छोड़ दिये थे।
विचार करें:- यदि कोई चोर था उसने बुराई छोड़ दी तथा भक्त बन
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दयानंद की अज्ञानता
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 7 पृष्ठ 155 तथा 163 पर लिखा है कि परमात्मा साधक के पाप नाश नहीं कर सकता। जबकि यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में छः बार लिखा है कि परमात्मा दान देने वाले अपने भक्त के घोर पाप को भी नाश कर देता है।
*#RealityOf
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समाज सुधार का दावा करने वाले श्री दयानन्द
सरस्वती समाज बिगाड़ करते थे”
- पृष्ठ138 पर लिखा हैं कि स्वामी दयानन्द जी (तम्बाकू सूंघा करते) नसवार लिया करते थे, कहते थे शरीर स्वस्थ करने के लिए तम्बाकू सूंघना पाप नहीं।
- राजाओं को विशेष आदर देते थे। अपने बराब
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महर्षि दयानन्द को न तो वेदों का ज्ञान था न श्रीमद्भगवत गीता का, इसलिए हठयोग करके भांग आदि नशीली वस्तुओं का सेवन करके दीवार से कमर
लगा कर बैठा रहता। जनता भोली थी वह यह सोचते कि बड़ा योगी पुरूष है और यह फोड़ रहा था अपने भाग्य को। - संत रामपाल जी महाराज
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महर्षि दयानन्द को न तो वेदों का ज्ञान था न श्रीमद्भगवत गीता का, इसलिए हठयोग करके भांग आदि नशीली वस्तुओं का सेवन करके दीवार से कमर
लगा कर बैठा रहता। जनता भोली थी वह यह सोचते कि बड़ा योगी पुरूष है और यह फोड़ रहा था अपने भाग्य को। - संत रामपाल जी महाराज
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दयानंद की अज्ञानता
पिता के एक गोत्र माता की छः पीढ़ी के गोत्र में विवाह
करना अच्छा नहीं। समीप देश (स्थान) में भी विवाह करना अच्छा नहीं ? फिर कहा है कि दस कुल (गोत्र) भी छोड़ दें। जिनको खांसी, दमा, मिर्गी, बवासीर आदि-2 रोग हों। विचार करें यदि विवाह के
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दयानंद विधवा के पुनविर्वाह का विरोधी या उसके लिए नियोग का प्रावधान किया है। विधवा स्त्री तथा जिस पुरूष की स्त्री मर जाए वे दोनों पुनविर्वाह न करें। अपितु नियोग करें।
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दयानंद की अज्ञानता
समुल्लास 4 के पृष्ठ 101 पर अज्ञानी महर्षि ने लिखा है कि एक स्त्री नियोग ग्यारह व्यक्तियों तक कर सकती है। इसी प्रकार पुरूष भी ग्यारह स्त्रियों से नियोग (अभ्रद कर्म) कर सकता है।
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महर्षि दयानन्द ने नियोग के लाभ तथा पुनविर्वाह के दोष बताते हुए कहा है कि ‘‘पुनविर्वाह करने से दोनों साथ-2 एक घर में रहेंगे। जिस कारण से उन दोनों का प्रेम कम हो जाएगा। पुनविर्वाह का एक दोष और बताया है कि स्त्री का पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
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अज्ञानी महर्षि ने समुल्लास 4 पृष्ठ 97 में लिखा है कि विधवा स्त्री किसी अन्य पुरूष से नियोग करके अपने लिए दो सन्तान उत्पन्न करे। नियोग नियमानुसार अकेली स्त्री ही बच्चों का पालन करे। इसी प्रकार वह स्त्री दो सन्तान उस पुरूष के लिए उत्पन्न करे तथा दो-तीन
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सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 14 के पृष्ठ 470 पर दयानंद सरस्वती ने कहा है कि मुहम्मद साहेब ने अज्ञानियों को फंसाया है।
फिर पृष्ठ 472 पर कहा है कि जब मुसलमानों का खुदा ही धोखेबाज है तो मुसलमान धोखेबाज क्यों न हों ?*#RealityOfMaharshiDayanand*
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सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 14 में दयानंद सरस्वती ने
मुस्लमान धर्म तथा हजरत मुहम्मद जी को मूर्ख, जंगली बताया है। सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 14 के पृष्ठ 455, 477, 480, 483, 485 तथा 467 पर कहा है कि मुसलमानों का खुदा अन्यायकारी, बेसमझ है।*#RealityOfMaharshi
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सत्यार्थ प्रकाश ग्यारहवां समुल्लास
पृष्ठ 307 से 309 तक समुल्लास-11 में दयानंद सरस्वती ने सिख धर्म के प्रवर्तक श्री गुरु नानक देव जी को मूर्ख, (दम्भी) ढोंगी, अभिमानी लिखा है तथा श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी को मिथ्या गपोंड़ों का संग्रह लिखा है कि उसमें लिखा
*#RealKnowledgeOfBuddhism*
महात्मा बुद्ध एक पुण्य कर्मी आत्मा थे। सही मार्गदर्शन न मिलने के कारण उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के विरुद्ध घोर तपस्या की। जिसे गीता में मूर्खों की साधना बताया है।