गर्व का क्षण!
कम्पोजिट विद्यालय तरौली मुबारकपुर, ब्लॉक बसखारी, जनपद अम्बेडकर नगर की छात्रा कु. आंचल का चयन अण्डर-14 बालिका बॉलीबाल में प्रदेश टीम में हुआ है।
@basicshiksha_up@AmbedkarnagarDM
रोंगटे खड़े करने वाला संवाद है— सुनिएगा ज़रूर
कलियुग के शतरंज मै राम नियम है, तो कृष्ण चाल है
मर्यादा मै रहना है तो श्री राम से सीखो
और मर्यादा मै रखना है तो श्री कृष्ण से सीखो
हरे कृष्ण - हरे राम !!
फ्लू का टीका ले सकते हैं, अगर हाई रिस्क हैं तो डॉक्टरको अभी पूछेंगे की हमें फ्लू हुवा तो क्या ओसेल्टामी ले सकते हैं, और अगर ज़बाब हाँ हैं तो दवाईका बंदोबस्त भी अभी कर सकते हैं! करेंगे कुछ नहीं, एक चीज़ हमसे अच्छा कोई नहीं कर सकता, बातें!
#GangaExpresswayTollTaxScam
गंगा एक्सप्रेसवे पर लहरावन/बहजोई से लखनऊ के लिए यात्रा करने पर किलोमीटर 123 से किलोमीटर 378 तक कुल 255 किलोमीटर की दूरी तय करने पर ₹835 का टोल टैक्स दो हिस्सों में काटा जाता है। जिसमें लहरावन से करनपुर तक ₹55 और करनपुर से आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे तक ₹780 काटा जाता है। इसी प्रकार वापसी में भी आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे से गंगा एक्सप्रेसवे पर प्रवेश करने पर किमी 378 से लेकर चंदोई/करणपुर तक ₹780 काटा जाता है। लेकिन लहरावन पर जो टोल टैक्स वाला ठेकेदार है, वह लगातार धांधली कर रहा है। और वह ₹55 के स्थान पर ₹400 काटता है। जब आप उसके पास शिकायत के लिए जाइए तो वह अपने 10-20 फालतू मुस्टंडों के साथ प्रकट होता है और आपसे दो टूक जवाब देता है कि यदि ज्यादा कट गया है तो आप उसकी शिकायत कर दीजिए। आपको वापस मिल जाएगा। अब सवाल यह है कि कितने परसेंट लोग हैं जो इस ऑनलाइन वापसी की प्रक्रिया को पूरा करते हैं ।जब सम्पूर्ण सिस्टम ऑनलाइन है और किमी 378 से किमी 146 तक सिस्टम ऑटो रीड करके ₹780 काटता है तो स्पष्ट है कि वाहन लखनऊ दिशा से आ रहा है इसलिए किमी 146 से 123 तक ₹55 काटने के स्थान पर जानबूझ कर विपरीत दिशा में स्थित मेरठ से लहरावन तक का ₹ 400 काटने वाले ठेकेदार का उत्तर दायित्व निर्धारण होगा या नहीं ।
एक तो गंगा एक्सप्रेसवे पर पहले से ही उत्तर प्रदेश के अन्य एक्सप्रेसवे की तुलना में ज्यादा टोल टैक्स की दर निर्धारित की जा चुकी है। आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर 50 किलोमीटर चलने पर अर्थात् किलोमीटर 352 सेकिमी 302 तक चलने पर ₹95 काटा जाता है। जिसकी दर ₹1.90/km है। वहीं गंगा एक्सप्रेसवे पर लहरावन से लखनऊ तक 255 किलोमीटर चलने पर कुल भुगतान ₹835 लिया जाता है। जो कि ₹3.27 प्रति किलोमीटर बैठता है। इसी प्रकार यदि लहरावन से हापुड़ या दिल्ली जाते हैं तो 88 किमी की यात्रा हेतु ₹310 का भुगतान ₹3.52/ किमी की दर से किया जाता है लेकिन शिकायत अधिक दर निर्धारण की नहीं है क्योंकि एक्सप्रेस वे पर चलना अनिवार्य न होकर वैकल्पिक है क्योंकि यदि आपको मंहगा लगता तो आप एक्सप्रेस वे पर न चलकर उन सड़कों पर चलिये जिन पर चलने के लिए आपने वाहन पंजीकरण के समय 7 से 10 प्रतिशत की दर से रोड टैक्स दिया था
मेरे शिकायत यह कि गंगा एक्सप्रेस वे पर निर्धारित टोल टैक्स से अधिक वसूली वार वार क्यों की जा रही है और ऐसे ठेकेदार के विरूद्ध क्या दण्ड निर्धारित है
आप फास्टैग न होने पर दो गुने टोल टैक्स वसूली कर रहे हैं तो क्या इस प्रकार की व्यवस्था इन बेईमान ठेकेदार के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए ।
हमारा अनुरोध है कि इन बेईमान ठेकेदारों पर लगाम लगाने के लिए अधिक बसूली गई धनराशि का १० गुना रिफण्ड निर्धारित हो और यदि इस प्रकार के अधिक बसूली के १० से अधिक मामले हों तो इनका टेण्डर निरस्त किया जाए ।क्योंकि आज इस प्रकार की व्यवस्था न होने का ही लाभ यह लोग उठा रहे हैं यह जानते हैं कि रिफण्ड हुआ तो ठीक नहीं तो यह हज़म कर लेते हैं ।
यह आज इस लिए लिखा कि तमाम लोगों के साथ मैं स्वयं भी लगातार इस बेईमानी से पीड़ित हूँ।
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ज्वाइंट मजिस्ट्रेट थनिगईयरसन टी ने पी.एम. श्री विद्यालय सूरापुर, टांडा में खगोल विज्ञान प्रयोगशाला का निरीक्षण किया तथा बच्चों संग मध्याह्न भोजन कर गुणवत्ता की जानकारी ली। @InfoDeptUP@UPGovt@CMOfficeUP
भारत में शिक्षा को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया गया कि “निजीकरण” यानी गुणवत्ता, और “सरकारी” यानी असफलता। पिछले तीन चार दशकों में उदारीकरण और बाजारवाद ने शिक्षा को धीरे-धीरे अधिकार से हटाकर उत्पाद बना दिया। अब स्कूल ज्ञान के केंद्र कम और ब्रांडेड सर्विस सेंटर ज्यादा दिखाई देते हैं। ऐसे में “प्राइवेट स्कूलों के सरकारीकरण” का सवाल भले आज की राजनीति में असंभव लगे, लेकिन यह सवाल उठना इसलिए जरूरी है क्योंकि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु नहीं हो सकती।
जब संविधान शिक्षा को मौलिक अधिकार मानता है, तब यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि गुणवत्ता पर केवल अमीरों का कब्जा न हो। आज देश में दो शिक्षा व्यवस्थाएँ साफ दिखाई देती हैं—एक वह जहाँ स्मार्ट क्लास, AC बसें, इंटरनेशनल टैग और लाखों की फीस है; दूसरी वह जहाँ एक या दो शिक्षक पाँच कक्षाएँ संभाल रहा है। यह केवल संस्थागत अंतर नहीं, यह लोकतंत्र के भीतर पैदा हुई शैक्षिक असमानता की खाई है।
आखिर सवाल यह क्यों न पूछा जाए कि अगर शिक्षा समाज निर्माण का माध्यम है तो उसे पूरी तरह बाजार के हवाले क्यों कर दिया गया? कोई भी निजी स्कूल चाहे जितनी फीस बढ़ा दे, चाहे बच्चों और अभिभावकों पर कितना भी आर्थिक दबाव डाले, उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। लेकिन सरकारी स्कूलों के लिए हर साल “विलय”, “समायोजन”, “कम छात्र संख्या” और “अप्रासंगिकता” जैसे शब्द तैयार रहते हैं। यानी जो संस्थान गरीब के बच्चे को पढ़ाता है, वही हमेशा कटघरे में खड़ा किया जाता है।
सच यह है कि निजी स्कूलों की सफलता का बड़ा हिस्सा शिक्षा से ज्यादा “इमेज मैनेजमेंट” पर आधारित है। कुछ टॉपर बच्चे, भारी विज्ञापन, अखबारों के पूरे-पूरे परिशिष्ट, चमकदार इमारतें और अंग्रेजी बोलता हुआ वातावरण—इन्हीं के आधार पर शिक्षा की गुणवत्ता मापी जाने लगी। कोई यह नहीं पूछता कि इन स्कूलों में औसत और कमजोर बच्चों के साथ क्या होता है, मानसिक दबाव कितना है, फीस संरचना कितनी पारदर्शी है, और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति क्या है।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सरकारी स्कूलों पर RTI लागू है, सामाजिक जवाबदेही है, मीडिया की निगरानी है, अदालतों की टिप्पणियाँ हैं, लेकिन निजी स्कूलों के मामले में वही समाज अचानक “स्वायत्तता” और “संस्थान की स्वतंत्रता” की बात करने लगता है। आखिर क्यों? यदि शिक्षा सार्वजनिक महत्व का विषय है, तो हर स्कूल सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में क्यों न आए? क्यों न निजी स्कूलों को भी पारदर्शी भर्ती, फीस नियमन, सामाजिक ऑडिट और कठोर उत्तरदायित्व व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए?
असल में समस्या केवल शिक्षा की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। क्या आज का राजनीतिक नेतृत्व इतना साहस रखता है कि शिक्षा के मामले में अमीर और गरीब के साथ एक जैसा व्यवहार कर सके? क्या कोई नेता अपने बच्चे को उसी सरकारी स्कूल में भेजने का नैतिक उदाहरण देगा जहाँ गरीब का बच्चा पढ़ता है? जब तक सत्ता, नौकरशाही और प्रभावशाली वर्ग खुद सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक सरकारी स्कूलों को सुधारने की वास्तविक राजनीतिक प्रतिबद्धता पैदा ही नहीं होगी।
यह भी समझना होगा कि सरकारीकरण का अर्थ केवल भवनों पर सरकारी ताला लगाना नहीं है। इसका अर्थ है—शिक्षा को बाजार के बजाय सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत पर खड़ा करना। दुनिया के कई विकसित देशों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा इसलिए मजबूत है क्योंकि वहाँ शिक्षा को “निवेश” नहीं, “समानता का आधार” माना गया। भारत में उल्टा हो रहा है—अच्छी शिक्षा धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता की गुलाम बनती जा रही है।
यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में शिक्षा केवल वर्ग विभाजन का सबसे बड़ा औजार बन जाएगी। एक वर्ग नेतृत्व करेगा क्योंकि उसने महंगे संस्थानों से पढ़ाई की होगी, और दूसरा वर्ग केवल श्रम करेगा क्योंकि उसके हिस्से में संसाधनहीन शिक्षा आई होगी। यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, लोकतंत्र की जड़ों के लिए खतरा है।
इसलिए यह सवाल पूरी गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या देश में शिक्षा का उद्देश्य नागरिक बनाना है या ग्राहक? यदि उद्देश्य नागरिक बनाना है, तो फिर शिक्षा व्यवस्था को समानता, जवाबदेही और सार्वजनिक नियंत्रण की दिशा में ले जाना ही होगा। क्योंकि जिस देश में स्कूल भी वर्ग देखकर अलग-अलग गुणवत्ता देने लगें, वहाँ संविधान की “समान अवसर” वाली आत्मा धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
प्रवीण त्रिवेदी
#शिक्षा #PrivateEducation #indianeducation #IndianEducationSystem
जब समाज और व्यवस्था का हर स्तंभ भ्रष्टाचार और लापरवाही की चपेट में है, तो सिर्फ प्राइमरी स्कूलों या शिक्षकों के प्रति नाकारात्मक माहौल बनाना कहाँ तक सही है? ज़रा अन्य विभागों पर भी ध्यान दीजिए..
👉 स्वास्थ्य विभाग
स्वास्थ्य विभाग का सीधा संबंध इंसान की जिंदगी से है, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का देरी से आना या गायब रहना आम बात है। दूर-दराज से आए गरीब मरीज घंटों लाइनों में खड़े रहते हैं।
कई सरकारी डॉक्टर ड्यूटी के समय अपने निजी क्लीनिक या प्राइवेट अस्पतालों पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
अस्पतालों में मुफ्त दवाइयां कागजों में उपलब्ध होती हैं, लेकिन मरीजों को बाहर के मेडिकल स्टोर से दवा लेने को कहा जाता है।
👉पुलिस और कानून व्यवस्था
रिश्वत लेकर एफआईआर दर्ज न करना, या धाराएं बदल देना आम शिकायत है।
आम आदमी अपनी शिकायत लेकर जाने में डरता है, जबकि रसूखदार और पैसे वाले लोगों की तुरंत सुनवाई होती है।
पैसों के दबाव में कई बार वास्तविक पीड़ित को ही आरोपी बना दिया जाता है और दोषी साफ बच निकलता है।
👉 बिजली विभाग
गलत और भारी-भरकम बिल भेजना, और फिर उसे ठीक कराने के नाम पर चक्कर कटवाना या रिश्वत मांगना।
बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों या दबंगों की बिजली चोरी पर ढील देना और आम उपभोक्ताओं पर जुर्माना लगाना।
नया ट्रांसफार्मर लगवाने या नया कनेक्शन लेने के लिए लंबा इंतजार और टेबल के नीचे का लेन-देन।
👉 न्यायपालिका और कचहरी
न्याय की चौखट पर देरी और खर्च आम इंसान की कमर तोड़ देते हैं।
"तारीख पर तारीख" मुकदमे दशकों तक खिंचते रहते हैं। इंसाफ में देरी, इंसाफ न मिलने के बराबर है।
कोर्ट के पेशकारों, क्लर्कों और वकीलों के नेटवर्क के बिना कागजात आगे नहीं बढ़ते।
वकील की भारी फीस और अदालती चक्करों के कारण गरीब आदमी इंसाफ की उम्मीद ही छोड़ देता है।
👉 नगर निकाय और राजस्व विभाग
यह विभाग नागरिकों की बुनियादी कागजी जरूरतों से जुड़ा होने के कारण यहाँ भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा होता है।
कागजात जारी करने में रिश्वत: जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, आय/जाति प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी दस्तावेजों के लिए भी क्लर्कों को सुविधा शुल्क देना पड़ता है।
दाखिल-खारिज और भू-अभिलेख: जमीनों का नामांतरण बिना दलालों और पैसों के महीनों लटकाया जाता है।
नालियों की सफाई, कचरा प्रबंधन और सड़कों की मरम्मत के नाम पर बजट का बड़ा हिस्सा कागजों में ही खर्च हो जाता है।
क्या सिर्फ प्राथमिक विद्यालयों पर उंगली उठाना सही है?
प्राथमिक विद्यालयों में कई शिक्षक कठिन परिस्थितियों में, कम संसाधनों के बावजूद, और गैर-शैक्षणिक कार्यों (जैसे जनगणना, चुनाव, राशन वितरण) के बोझ के बीच काम करते हैं।
जब पूरी व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, तो केवल शिक्षकों या प्राइमरी स्कूलों को निशाना बनाना पक्षपातपूर्ण है।
यह सच है कि भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता एक सर्वांगीण बीमारी बन चुकी है।
सुधार की शुरुआत सिर्फ प्राथमिक विद्यालयों से नहीं, बल्कि थाने, अस्पताल, कचहरी, बिजली विभाग और नगरपालिकाओं से एक साथ होनी चाहिए।
@AbhijeetDipike@CJP_for_India
@SarfarazZain01 संबंधित अधिकारियों को सूचित किया जा रहा है।
@Drm_fzr@Drm_mb
हम आपसे अनुरोध करते हैं कि कृपया मोबाइल नंबर वैकल्पिक रूप से DM के माध्यम से हमारे साथ साझा करें। आप अपनी शिकायत सीधे https://t.co/AmJ5X4ydf8 पर भी शीघ्र निवारण के लिए रजिस्टर कर सकते हैं।
https://t.co/utEzIqB89U
मैं Ludhiana Jn से Varanasi Jn तक यात्रा कर रहा हूँ। मेरा टिकट RAC/S7/31 है
कोच में 3 बर्थ खाली थीं। मैंने ड्यूटी पर मौजूद TTE से अपनी RAC सीट confirm करने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने “देखते हैं” कहकर टाल दिया। इसके बाद Waiting List यात्रियों से फाइन/किराया लेकर खाली बर्थ allot किए जाने की जानकारी मिली।
जब RAC यात्री मौजूद है और बर्थ उपलब्ध हैं, तो उसे प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई? कृपया TTE की berth allotment एवं संबंधित records/receipts की जांच कर उचित कार्रवाई करें।
Train: 14624 S G VARANASI EXP
PNR: 2361133085
Coach/Seat: S7/31 (RAC)
Route: Ludhiana Jn → Varanasi Jn
@RailwaySeva@IRCTCofficial@RailMinIndia@RailwayNorthern@jagograhakjago
यदि @CJP_for_India परिषदीय विद्यालयों में वास्तविक सुधार लाना चाहते है, तो वे विद्यालय के प्रधानाध्यापकों से संपर्क कर विद्यालय की समस्याओं पर चर्चा कर सभी समस्याओं को विद्यालय वार सूचीबद्ध कर प्रदेश के शिक्षामंत्रियों से उन समस्याओं के तत्काल निराकरण हेतु मांग करें।
परिषदीय विद्यालय में इतने संसाधन नहीं होते, की सभी समस्याओं का निराकरण विद्यालय स्तर पर किया जा सके।
अनेक समस्याएं तो ऐसी है जिनका निराकरण विद्यालय स्तर से संभव भी नहीं है, यथा: विद्यालय की साफ सफाई हेतु सफाईकर्मी की व्यवस्था, आवश्यकतानुरूप शिक्षकों की नियुक्ति, लिपिक एवं चौकीदार की नियुक्ति, बच्चों के बैठने हेतु बेंचों की व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल एवं निर्बाध विद्युत आपूर्ति हेतु इनवर्टर आदि।
यदि इस प्रकार से वे अपने अभियान को संचालित करते है, तभी सकारात्मक परिणाम मिल सकेंगे। अन्यथा केवल विद्यालय में जाकर शिक्षकों से बहस करके वीडियो पोस्ट करेंगे, तो इनका ये अभियान केवल पब्लिसिटी स्टंट ही माना जाएगा।
@abhijeet_dipke
🇮🇳 80वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर जनपद के विभिन्न परिषदीय विद्यालयों के बच्चों ने हाथों में तिरंगा लेकर देशभक्ति एवं राष्ट्रप्रेम के नारों के साथ प्रभात फेरियां निकालीं। उत्साह और उमंग से गूंजा पूरा जनपद। @UPGovt@CMOfficeUP@InfoDeptUP
🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस पर PM श्री विद्यालय, सूरापुर, टांडा में नक्षत्रशाला व ICT लैब का उद्घाटन किया। बच्चों संग दूरदर्शी से तारों का अवलोकन कर उन्हें विज्ञान के प्रति जिज्ञासु बनने और सितारों की तरह जीवन में चमकने हेतु कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। @InfoDeptUP@CMOfficeUP
🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर मा. मत्स्य मंत्री श्री संजय निषाद जी ने उच्च प्राथमिक विद्यालय खासपुर, टांडा में नक्षत्रशाला का उद्घाटन किया। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा हेतु प्रेरित किया। @CMOfficeUP
न कोई पूर्व। सूचना न पहले से कोई तैयारी। विद्यालय का आकस्मिक निरीक्षण सुबह हर घर तिरंगा। यात्रा के लिए घर से जल्दी निकलना पड़ा था। नास्ता भी नहीं किया। भूख बहुत तेज लगी थी भी,लेकिन जब स्कूल में एमडीएम देखा तो अपने आपको रोक नहीं सका। बच्चों के साथ बैठ गया, मेनू के अनुसार आज रोटी दाल बनी थी। इतना बेहतर स्वाद आया वैसा शायद ही किसी बड़े होटल में मिले जब मुझे ताजारसोई का बना व्यंजन मिलता है।
तो? बरबस बचपन याद आ जाता है और इस खाने में रसोइयों की मेहनत, प्रधानाध्यापक का त्याग, किसान की मेहनत सब कुछ एक साथ शामिल होते हैं। इसलिए इसमें स्वाद कुछ अधिक होता है। कुछ लोगों को स्कूलों का एमडीएम बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। ऐसा नहीं है कि एमडीएम अच्छा नहीं बनता है, बनता है। लगभग सभी स्कूलों में अच्छा बनता है, लेकिन कुछ लोगों ने अपने चश्मे का कलर ब्लैक एंड वाइट कर लिया है, उनको लगता है कि हम अच्छा रंगीन कुछ भी नहीं देखेंगे। जो देखेंगे गलत ही देखेंगे अगर अच्छा भी है तो उसे हम ब्लैक एंड फाइट ही देखेंगे। कुछ लोगों को लगता है कि हमारी ये व्यक्तिगत सोच की सरकारी स्कूल कमतर है या कि उन्हें कैसे बदनाम किया जाए।और अपनी सोच को सभी तक प्रेषित करना चाहते उसके लिए उन्हें सबसे आसान और सरल माध्यम स्कूल ही मिलता है, और कैसे भी करके शिक्षकों द्वारा किए जा रहे अच्छे कार्यों को कमतर साबित करना चाहिए। यह विद्यालय पठन पाठन के केन्द्र है है। किसी अन्य तरह की महत्वाकांक्षा को पूर्ति करने के साधन नहीं। कृपया उन गुरुओं का सम्मान करें जिन्होंने आपको पढ़ा लिखा कर इस लायक बनाया है कि आप फोटो खींच सकें। वीडियो बना सकें हां, स्कूलों में कोई कमी आपको दिखती है तो उसके सुधार के लिए आप सुझाव दे सकते हैं, सहयोग दे सकते हैं। स्कूल को मजबूत कैसे किया जाए, इस पर मनन और चिंतन कर सकते हैं, न कि पूर्वाग्रह से ग्रसित हो करके कुछ चिन्हित वीडियो बना करके। शिक्षक समाज को बदनाम करके, मुझे तो इस सरकारी स्कूल का एमडीएम इतना अच्छा लगा कि रोटी खाने के बाद दाल बच गई थी, लेकिन उसका भी मोह नहीं छोड़ नहीं पाया और दाल को पी गया। आपको प्राथमिक स्कूल का एमडीएम कैसा लगा लगता है बताइए हमारी शिक्षा व्यवस्था में हमारे एमडीएम में कुछ कमियां होंगी तो हम सभी मिलकर से सही करेंगे। राकेश सिंह जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी आगरा 13/8/26