रम्माण उत्सव भारत के उत्तराखंड राज्य के चमोली जनपद के जोशीमठ ब्लाक के सलूड गांव में अप्रैल महीने में मनाया जाता है । रम्माण उत्सव 11 से 13 दिन तक मनाया जाता है ।
गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बक:।
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक :।।
धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक:।
गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम।।
कुंडली से ग्रह दोष दूर करने के लिए प्रत्येक बुधवार इस मंत्र का 11 बार जाप करें। इस मंत्र में गणेश जी के 12 नामों का जाप किया जाता है। मान्यता है यदि आप इस मंत्र का जाप किसी मंदिर में भगवान गणेश के सामने बैठकर करेंगे तो आपको शुभ फल की प्राप्ति होगी। साथ ही जीवन में आ रही बढ़ाएं दूर होंगी।
एक ऊंटनी और उसका बच्चा एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे।
बच्चे ने पूछा, “माँ, हम ऊँटों का ये कूबड़ क्यों निकला रहता है ?”
“बेटा हम लोग रेगिस्तान के जानवर हैं, ऐसी जगहों पर खाना-पानी कम होता है, इसलिए भगवान ने हमें अधिक से अधिक फैट स्टोर करने के लिए ये कूबड़ दिया है। जब भी हमें खाना या पानी नहीं मिलता हम इसमें मौजूद फैट का इस्तेमाल कर खुद को जिंदा रख सकते हैं।”
ऊंटनी ने उत्तर दिया।
बच्चा कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, “अच्छा, हमारे पैर लम्बे और पंजे गोल क्यों हैं ???”
“इस तरह का आकार हम ऊँटों को रेत में आराम से लम्बी दूरी तय करने में मदद करता है, इसलिए।” माँ ने समझाया।
बच्चा फिर कुछ देर सोचता रहा और बोला, “अच्छा माँ ये बताओ कि हमारी पलकें इतनी घनी और लम्बी क्यों होती हैं ?”
“ताकि जब तेज हवाओं के कारण रेत उड़े तो वो हमारी आँखों के अन्दर ना जा सके।” माँ मुस्कुराते हुए बोली।
बच्चा थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला, “अच्छा तो ये कूबड़ फैट स्टोर करने के लिए हैं, लम्बे पैर रेगिस्तान में तेजी से बिना थके चलने के लिए है और पलकें रेत से बचाने के लिए है, तो फिर हम इस चिड़ियाघर में क्या कर रहे हैं मां?”
किन्तु इस बार मां कोई उत्तर नहीं दे पाई और निरुत्तर रह गई।
शिक्षा:- मित्रों, यही सवाल हमें खुद से पूछना चाहिए। ईश्वर ने हर एक इंसान को विशेष बनाया है। हर व्यक्ति में इतनी क्षमता है कि वह कुछ बड़ा और कुछ महान कर सकता है। लेकिन फिर भी ज्यादातर लोग चिड़ियाघर का ऊंट बन जाते हैं। अपने अन्दर मौजूद अपार योग्यताओं का प्रयोग ही नहीं करते। बेजुबान जानवर तो मजबूर हैं लेकिन एक इंसान होने के नाते हमें मजबूर नहीं मजबूत बनाना चाहिए और अपने अन्दर के गुणों को पहचान कर अपना सुंदर जीवन जीने की हर कोशिश करनी चाहिए।
INDEX OF हस्तरेखा विज्ञान कोर्स -
* रेखाओं का सामान्य परिचय https://t.co/Xvni3am7Zq
* पर्वतों का सामान्य परिचय https://t.co/6Mjb5k4AjT
* हस्तरेखा से संबंधित कुछ नियम https://t.co/Je8qTEYDfI
* ग्रहों का परिचय https://t.co/ju9dLAGKyl
* राहु केतु का परिचय
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* ग्रहों के उपाय https://t.co/YCVZ6frKbL
* जीवन रेखा https://t.co/ybAYSN9ZYi
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* हृदय रेखा https://t.co/c6cTGk5Ous
* भाग्य रेखा https://t.co/bZ5jbq2Wjg
* कुछ अन्य रेखाएं https://t.co/GnswXjAL0e
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* तर्जनी का महत्व https://t.co/OyKKiKozlN
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तिथि अनुसार भोजन ग्रहण करने के नियम, कृपया पूरा पढ़े 👇👇
हिन्दू धर्म में भोजन के करते वक्त भोजन के सात्विकता के अलावा अच्छी भावना और अच्छे वातावरण और आसन का बहुत महत्व माना गया है। यदि भोजन के सभी नियमों का पालन किया जाए तो व्यक्ति के जीवन में कभी भी किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता।
हिन्दू धर्म अनुसार भोजन शुद्ध होना चाहिए, उससे भी शुद्ध जल होना चाहिए और सबसे शुद्ध वायु होना चाहिए। यदि यह तीनों शुद्ध है तो व्यक्ति कम से कम 100 वर्ष तो जिंदा रहेगा।
आजो जानते हैं भोजन के कुछ खास नियम।
तिथि अनुसार भोजन करने से न केवल हमारे शरीर को सही पोषण मिलता है, बल्कि हमारे मन और आत्मा को भी शांति मिलती है।
यह प्राचीन भारतीय परंपरा हमें स्वस्थ, संतुलित और आध्यात्मिक जीवन जीने की दिशा में मार्गदर्शन करती है।
✴️ प्रतिपदा को कूष्माण्ड (कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है।
✴️द्वितीया को बृहती बैंगन या कटहल खाना निषिद्ध है।
✴️तृतीया को परवल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है।
✴️चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।
✴️पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है।
✴️षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।
✴️सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है था शरीर का नाश होता है।
✴️अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।
✴️नवमी को लौकी खाना गोमांस के समान है।
✴️एकादशी को शिम्बी(सेम), द्वादशी को पूतिका(पोई) अथवा त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड 27.29-34)
✴️अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि, दशमी एकादशी और द्वादशी, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण,ब्रह्म खंड 27.29-38)
✴️रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)
✴️सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए।
(मनु स्मृतिः 4.75)
✴️लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले को रात में दही और सत्तू नहीं खाना चाहिए। यह नरक की प्राप्ति कराने वाला है।
(महाभारतः अनु. 104.93)
✴️दूध के साथ नमक, दही, लहसुन, मूली, गुड़, तिल, नींबू, केला, पपीता आदि सभी प्रकार के फल, आइसक्रीम, तुलसी व अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए। यह विरूद्ध आहार है।
✴️दूध पीने के 2 घंटे पहले व बाद के अंतराल तक भोजन न करें। बुखार में दूध पीना साँप के जहर के समान है।
✴️काटकर देर तक रखे हुए फल तथा कच्चे फल जैसे कि आम, अमरूद, पपीता आदि न खायें।
फल भोजन के पहले और केवल सुबह नहाने के बाद पूजा पाठ यज्ञ etc कर के पहले 2-3 glass पानी पीएं फिर 1/2 घंटे बाद फल खायें फिर 1/2 घंटे बाद सुबह का भोजन लें । रात को फल नहीं खाने चाहिए।
अभक्ष्य-भक्षण करने (न खाने योग्य खाने) पर उससे उत्पन्न पाप के विनाश के लिए पाँच दिन तक गोमूत्र, गोमय, दूध, दही तथा घी का आहार करो।
भोजन करने संबंधी कुछ जरूरी नियम...
1. भोजन करने से पूर्व : 5 अंगों (2 हाथ, 2 पैर, मुख) को अच्छी तरह से धोकर ही भोजन करना चाहिए।
▪️ भोजन से पूर्व अन्नदेवता, अन्नपूर्णा माता की स्तुति करके उनका धन्यवाद देते हुए तथा 'सभी भूखों को भोजन प्राप्त हो', ईश्वर से ऐसी प्रार्थना करके भोजन करना चाहिए।
▪️ भोजन बनाने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाएं और सबसे पहले 3 रोटियां (गाय, कुत्ते और कौवे हेतु) अलग निकालकर फिर अग्निदेव को भोग लगाकर ही घर वालों को खिलाएं।
▪️ भोजन किचन में बैठकर ही सभी के साथ करें। प्रयास यही रहना चाहिए की परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिल बैठकर ही भोजन हो। नियम अनुसार अलग-अलग भोजन करने से परिवारिक सदस्यों में प्रेम और एकता कायम नहीं हो पाती।
2. भोजन समय :- प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है, क्योंकि पाचनक्रिया की जठराग्नि सूर्योदय से 2 घंटे बाद तक एवं सूर्यास्त से 2.30 घंटे पहले तक प्रबल रहती है।
जो व्यक्ति सिर्फ एक समय भोजन करता है वह योगी और जो दो समय करता है वह भोगी कहा गया है।
3. भोजन की दिशा :- भोजन पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुंह करके ही करना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है। पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है।
4. ऐसे में न करें भोजन :-
▪️ शैया पर, हाथ पर रखकर, टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन नहीं करना चाहिए।
▪️ मल-मूत्र का वेग होने पर, कलह के माहौल में, अधिक शोर में, पीपल, वटवृक्ष के नीचे भोजन नहीं करना चाहिए।
▪️ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए।
▪️ ईर्ष्या, भय, क्रोध, लोभ, रोग, दीनभाव, द्वेषभाव के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है।
▪️खड़े-खड़े, जूते पहनकर सिर ढंककर भोजन नहीं करना चाहिए।
5. ये भोजन न करें :-
▪️ गरिष्ठ भोजन कभी न करें।
▪️बहुत तीखा या बहुत मीठा भोजन न करें।
▪️किसी के द्वारा छोड़ा हुआ भोजन न करें।
▪️आधा खाया हुआ फल, मिठाइयां आदि पुनः नहीं खाना चाहिए।
▪️खाना छोड़कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए।
▪️जो ढिंढोरा पीटकर खिला रहा हो, वहां कभी न खाएं।
▪️पशु या कुत्ते का छुआ, रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला, बासी, मुंह से फूंक मारकर ठंडा किया, बाल गिरा हुआ भोजन न करें।
▪️अनादरयुक्त, अवहेलनापूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करें।
6. भोजन करते वक्त क्या करें :-
▪️ भोजन के समय मौन रहें।
▪️ रात्रि में भरपेट न खाएं।
▪️ बोलना जरूरी हो तो सिर्फ सकारात्मक बातें ही करें।
▪️ भोजन करते वक्त किसी भी प्रकार की समस्या पर चर्चा न करें।
▪️भोजन को बहुत चबा-चबाकर खाएं।
▪️गृहस्थ को 32 ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए।
▪️सबसे पहले मीठा, फिर नमकीन, अंत में कड़वा खाना चाहिए।
▪️सबसे पहले रसदार, बीच में गरिष्ठ, अंत में द्रव्य पदार्थ ग्रहण करें।
▪️थोड़ा खाने वाले को आरोग्य, आयु, बल, सुख, सुंदर संतान और सौंदर्य प्राप्त होता है।
7. भोजन के पश्चात क्या न करें :-
भोजन के तुरंत बाद पानी या चाय नहीं पीना चाहिए। भोजन के पश्चात घुड़सवारी, दौड़ना, बैठना, शौच आदि नहीं करना चाहिए।
8. भोजन के पश्चात क्या करें:-
भोजन के पश्चात दिन में टहलना एवं रात में सौ कदम टहलकर बाईं करवट लेटने अथवा वज्रासन में बैठने से भोजन का पाचन अच्छा होता है। भोजन के एक घंटे पश्चात मीठा दूध एवं फल खाने से भोजन का पाचन अच्छा होता है।
9. क्या-क्या न खाएं :-
▪️ रात्रि को दही, सत्तू, तिल एवं गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए।
▪️ दूध के साथ नमक, दही, खट्टे पदार्थ, मछली, कटहल का सेवन नहीं करना चाहिए।
▪️ शहद व घी का समान मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।
▪️ दूध-खीर के साथ खिचड़ी नहीं खाना चाहिए।
रुद्राक्ष माला 🧵
कृपया #Thraed को अंत तक पढ़े
🔺रुद्राक्ष की माला धारण करने के नियम
🔹रुद्राक्ष की माला कौन पहन सकता है ?
🔺रुद्राक्ष की माला कैसे धारण करें ?
🔹रुद्राक्ष के वैज्ञानिक फायदे क्या है?
🔺वास्त्विक रुद्राक्ष कहां मिलेगा ?
🔹महिलाओं के लिए रुद्राक्ष पहनने का नियम (7/7)
आपकी हस्त रेखा में कुछ तो होगा….! स्वयं जानिए
🔹हस्त शास्त्र के अनुसार हथेली की मुख्य हस्त रेखाओं का महत्व एवं सचित्र वर्णन —
#Thread
🪬सर्वप्रमुख हस्त रेखाएं🪬
हस्त रेखा विज्ञान के मुताबिक जीवन शक्ति का स्फूर्तमय वेग हथेली के माध्यम से ही सम्पन्न होता है। और यह वेग हथेली के माध्यम से रेखाओं और हस्त पर्वतों को एक ही सूत्र में ग्रंथित करता है। हाथ में पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का अपना महत्व होता है और वह रेखा किसी न किसी घटना को स्पष्ट करती ही है। हाथ का अध्ययन करने से पूर्व रेखाओं का सही सही परिचय ज्ञात कर लेता आवश्यक है, साथ ही रेखाओं का वास्तविक उद्गम स्थान भी ज्ञात करना अत्यंत महत्वपूर्ण है । हस्त शास्त्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में सात मुख्य रेखाएं होती हैं तथा बारह गौण रेखाएं या सहायक रेखाएं अथवा प्रवहित रेखाएं होती हैं। सात मुख्य रेखाएं निम्नांकित हैं -
मुख्य रेखाएं –
१. जीवन रेखा
२. मस्तिष्क रेक्षा
३. हृदय रेखा
४. सूर्य रेखा
५. भाग्य रेखा
६. स्वास्थ्य रेखा
७. विवाह रेखा
१. जीवन रेखा :- इसे अंग्रेजी में 'लाइफ लाइन' कहते हैं हिन्दी में कुछ विद्वान इसे पितृ रेखा या आयु रेखा के नाम से भी सम्बोधित करते हैं पूरी हथेली में इस रेखा का महत्त्व सबसे अधिक है, क्योंकि यदि जीवन है तो सब कुछ है जिस दिन जीवन ही समाप्त हो जायगा उस दिन बाकी रेखाओं का प्रभाव भी व्यर्थ हो जायगा। जीवन रेखा बृहस्पति पर्वत के नीचे हथेली की बगल से उठ कर तर्जनी और अंगूठे के बीच में से प्रारंभ होकर शुक्र पर्वत को घेरती हुई मणिबन्ध पर जाकर विश्राम करती है संसार में जितने भी प्राणी हैं उन सब के हाथों में यह रेखा यहीं पर दिखाई देती हैं इसी रेखा से व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, बीमारी, स्वास्थ्य आदि की जानकारी प्राप्त होती है।
सभी व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा एक-सी दिखाई नहीं देती कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा गहरी और लम्बी होती है तो कुछ रेखाएं व्यक्ति के शुक्र पर्वत को बहुत संकीर्ण बना लेती है, किसी-किसी व्यक्ति के हाथ में यह रेखा शुक्र पर्वत के पास में जाकर टूट-सी जाती है ऐसे व्यक्ति निश्चय ही कम आयु के होते हैं तथा उनकी मृत्यु दुर्घटना से होती है।
२. मस्तिष्क रेखा :- अंग्रेजी में इस रेखा को 'हेड-लाइन' हिंदी में इसको बुद्धि रेखा शीश रेखा, प्रज्ञा रेखा, अथवा मातृ रेखा के नाम से पुकारते हैं। मस्तिष्क रेखा का प्रारंभ वृहस्पति पर्वत के पास से या वृहस्पति पर्वत के ऊपर से होता है। अधिकांश हाथों में जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का उद्गम एक ही स्थान पर देखा है। परन्तु कई हाथों में यह उद्गम एक ही न होकर पास-पास होता देखा गया है। यह रेखा हथेली को दो भागों में बांटती हुई राहू और हर्षल क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई बुध क्षेत्र के नीचे तक चली जाती है, इस पूरी रेखा को मस्तिष्क रेखा कहते हैं।
इस रेखा की स्थिति अलग-अलग हाथों में अलग-अलग प्रकार से देखी जाती है। जिन व्यक्तियों का मस्तिष्क पैना, उर्वर, तथा क्रियाशील होता है या जो व्यक्ति मुख्यतः बुद्धिजीवी होते हैं उन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा लम्बी गहरी और स्पष्ट होती है। इसके विपरीत जो शारीरिक श्रम करने वाले होते हैं या जिनका मस्तिष्क कमजोर होता है अथवा जो श्रमजीवी होते हैं उनके हाथों में या तो यह रेखा धूमिल और अस्पष्ट-सी होती है अथवा यह रेखा बीच-बीच में कई स्थान पर टूटी हुई-सी दिखाई देती है। इस रेखा से मानव के मस्तिष्क का भलीभांति अध्ययन किया जा सकता है।
३. हृदय रेखा :- इस रेखा को अंग्रेजी में 'हार्ट लाइन' और भारत में इस रेखा को विचार रेखा कहते हैं। यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारंभ होकर बुध तथा प्रजापति के क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई तर्जनी के नीचे या गुरु पर्वत के नीचे तक पहुंच जाती है। सामान्यतः यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथों में दिखाई देती है क्योंकि इस रेखा का सीधा सम्बन्ध हृदय से होता है, परन्तु कुछ डाकुओं एवं हृदयहीन दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों के हाथों में इस रेखा का सर्वथा अभाव ही देखा गया है। जिन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा कमजोर होती है वस्तुतः वे व्यक्ति अमानवीय एवं क्रूर होते हैं।
अलग-अलग हाथों में यह रेखा अलग अलग लंबाई लिए हुई होती है। किसी हाथ में यह रेखा तर्जनी तक किसी हाथ में मध्यमा तक तो किसी हाथ में अनामिका तक ही जाकर समाप्त हो जाती है परन्तु कुछ हाथों में यह रेखा गुरु क्षेत्र को पार कर हथेली के दूसरे छोर तक पहुंचती हुई भी देखी है, परन्तु ऐसी लम्बी रेखा बहुत कम लोगों के हाथों में ही होती है।
This is wonderful to see! @sachin_rt’s lovely Jammu and Kashmir visit has two important takeaways for our youth:
One - to discover different parts of #IncredibleIndia.
Two- the importance of ‘Make in India.’
Together, let’s build a Viksit and Aatmanirbhar Bharat!
भव्य एवं दिव्य 'दीपोत्सव-2023' के पुण्य अवसर पर आज श्री अयोध्या धाम में माँ सरयू की आरती कर सबके कल्याण हेतु प्रार्थना की।
सरयू मइया अपनी पवित्र एवं निर्मल धारा से सबका उद्धार करें, यही कामना है।
जय सरयू मइया!
32- रावण जब विश्व विजय पर निकला तो उसका युद्ध अयोध्या के राजा अनरन्य के साथ हुआ । जिस में रावण विजयी रहा । राजा अनरन्य वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने मरते हुए श्राप दिया कि तेरी मृत्यु मेरे कुल के एक युवक द्वारा होगी।
33- हनुमान का 'मकर ध्वज' नाम का एक पुत्र था, जो रावण के सौतेले भाई पाताल लोक के शासक अहिरावण का वफादार सैनिक था । जब हनुमान अहिरावण द्वारा अपहरण कर लिए गए राम और लक्ष्मण को बचाने गए तो मकर ध्वज ने हनुमान को द्वंद्वयुद्ध में हरा दिया।
34- अहिरावण का वध हनुमान जी ने किया था। फिर उन्होंने अपने पुत्र मकर ध्वज को राजा बनाया और राम और लक्ष्मण के साथ चले गए
35- राम ने इंद्र से उन सभी वानरों को जीवित करने का अनुरोध किया, जिन्होंने युद्ध में अपनी जान गंवा दी थी। “वे सभी बहादुर थे, अपनी ऊर्जा साबित कर रहे थे और उन्होंने अपनी मृत्यु को ध्यान में नहीं रखा। उन्होंने कठिन प्रयास किये और मर गये। हे इन्द्र! उन्हें उनका जीवन लौटा दो।”
इसके बाद, वे सभी वानर-योद्धा, मानो नींद से उठे हों, और उनके सभी अंग घावों से पूरी तरह ठीक हो गये। सभी बंदर आश्चर्यचकित होकर एक दूसरे से कहने लगे, "यह कौन सा चमत्कार है?"।
36- रावण का मूल नाम दसग्रीव था, जिसका अर्थ है दस सिर वाला। शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को नीचे दबा दिया, जिससे दशग्रीव का हाथ कुचल गया। दासग्रीव ने पीड़ा में जोर से चीख निकाली, जिससे उसका नाम 'रावण' पड़ गया, जिसका अर्थ है 'दहाड़ने वाला या चिल्लाने वाला'।
37- शक्तिशाली राम के अलावा, रावण दो अन्य राजाओं से भी पराजित हुआ था। एक था वानर राजा, बाली, और दूसरा था कार्तवीर्य अर्जुन, महिष्मती का राजा जिसे हज़ार भुजाओं वाला भी कहा जाता था
38- वाल्मीकि रामायण के अनुसार , रावण को अकंपन नाम के राक्षस ने राम के बारे में बताया था। वह उस युद्ध में जीवित बचा एकमात्र व्यक्ति था, जिसमें राम ने 48 मिनट में रावण के 14,000 राक्षसों को मार डाला था , जिसमें उसके चचेरे भाई खर और दूषण भी शामिल थे।
39- राम और रावण के बीच अंतिम युद्ध में, रावण के सारथी ने देखा कि उसका राजा चल रहे द्वंद्व के कारण थक गया था। अपने स्वामी को कुछ राहत देने के लिए, उसने रथ को युद्ध के मैदान से दूर भगा दिया। रावण युद्ध से भागते हुए सारथी पर क्रोधित था क्योंकि उसने उसे कायर की तरह दिखाया था। सारथी ने शांति से कहा कि वह चाहता था कि लंका के स्वामी के प्रति अपनी वफादारी का आश्वासन देते हुए, पूरी तरह से सक्रिय होकर कार्रवाई में वापस आने से पहले रावण स्वस्थ हो जाए। अपने सारथी के शब्दों से प्रभावित होकर, रावण ने उसे एक रत्नजड़ित हस्त मुद्रिका भेंट किया और युद्ध के मैदान में वापस ले जाने का आदेश दिया।
40- भगवान राम ने पृथ्वी पर अपने कर्तव्यों को पूरा करने के बाद वैकुंठ लौटने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन हनुमान ने मृत्यु के देवता को राम से मिलने की अनुमति नहीं दी। हनुमान का ध्यान राम की अंगूठी लाने में लग गया जिसे उन्होंने पाताल में फेंक दिया था। यम इस शर्त पर आने के लिए सहमत हुए कि उनकी बातचीत गोपनीय होनी चाहिए और जो कोई भी कमरे में प्रवेश करेगा उसे मौत की सजा दी जानी चाहिए।
इसलिए, राम ने लक्ष्मण को कमरे की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा। लेकिन ऋषि दुर्वासा राम से मिलने आये। प्रारंभ में, लक्ष्मण ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया लेकिन अयोध्या को श्राप देने की धमकी मिलने के बाद, लक्ष्मण ने बैठक को बाधित करने का फैसला किया। राम के वचन को पूरा करने के लिए लक्ष्मण ने सरयू नदी के तट पर अपने प्राण त्याग दिए। राम की मृत्यु से पहले लक्ष्मण की मृत्यु हो गई क्योंकि वह शेषनाग के अवतार थे। उन्हें विष्णु से पहले वैकुंठ लौटना पड़ा।