लेकिन इस पूरे आंदोलन के बीच एक अत्यंत जरूरी बात दोनों पक्षों को याद रखनी चाहिए—अहिंसा। किसी भी बड़े प्रदर्शन से पहले लंबे समय तक नॉन-वायलेंस का अभ्यास होना चाहिए। आंदोलनकारी समूहों को स्वयंसेवी अनुशासन-दल, आचार-संहिता, उकसावे से बचने का प्रशिक्षण और संवाद-प्रतिनिधि तय करने चाहिए। क्योंकि जैसे ही पत्थर, धक्का-मुक्की या उग्रता आती है, सबसे पहले आंदोलन का नैतिक बल कमजोर होता है। भोले-भाले लोग बहक जाते हैं और फिर असली सवाल पीछे छूट जाता है।
उधर पुलिस को भी याद रखना चाहिए कि सामने कोई दुश्मन सेना नहीं, अपने ही समाज के वंचित नागरिक खड़े होते हैं। पुलिस में भर्ती जवान भी आम राजस्थानियों के बेटे-बेटियां हैं। इसलिए यह रिश्ता हमेशा दोनों तरफ के लोग याद रखें—एक तरफ अधिकार मांगने वाले नागरिक, दूसरी तरफ व्यवस्था संभालने वाले नागरिक। टकराव नहीं, संवाद इस रिश्ते का आधार होना चाहिए।
DNT समाज की यह लड़ाई भारतीय लोकतंत्र से एक मूल प्रश्न पूछती है: क्या विकास का अर्थ केवल स्थायी, दस्तावेजधारी, संगठित समाजों का विकास है? या उन लोगों का भी, जो सदियों से चलते रहे, पर राज्य की नीतियों में रुके रह गए? अब जवाब नारे से नहीं, नीति से देना होगा।
DNT घुमंतू समाज की 11 मांगें और वर्तमान समय का प्रश्न: अब न्याय को टाला नहीं जा सकता
राजस्थान नाथ समाज एवं डीएनटी संघर्ष समिति ने यह साफ कर दिया है कि यह आंदोलन अब केवल एक सामान्य ज्ञापन या प्रतीकात्मक धरने का मामला नहीं रह गया है। “विधानसभा घेराव” से आगे बढ़कर अब “जेल भरो महा आंदोलन” की घोषणा इस बात का संकेत है कि घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त (DNT) समाज अपने सवालों को राज्य की राजनीति के केंद्र में लाना चाहते हैं। 1 जुलाई 2026 को जयपुर में प्रस्तावित यह आंदोलन केवल भीड़ जुटाने का आह्वान नहीं, दशकों की उपेक्षा, असमानता और प्रशासनिक अदृश्यता के विरुद्ध संगठित प्रतिवाद है।
यह आंदोलन किसी एक लाभ या एक पद के लिए नहीं, जीवन के पूरे ढांचे—पहचान, शिक्षा, आवास, रोजगार, प्रतिनिधित्व और सम्मान—को लेकर है। सबसे पहली मांग जातिगत विसंगतियों को दूर करने की है। सरकारी रिकॉर्ड में सूचीबद्ध 32 जातियों के नामों, उपनामों और स्थानीय पहचानों में जो गड़बड़ियां हैं, वे इन समुदायों को प्रमाणपत्र, योजनाओं और आरक्षण से वंचित कर देती हैं। यह मांग अत्यंत तार्किक है। जब राज्य की सूची ही अस्पष्ट होगी, तब नागरिक अपने अधिकार तक कैसे पहुंचेगा?
दूसरी और सबसे प्रमुख मांग 10 प्रतिशत आरक्षण की है। इसे केवल भावनात्मक मांग मानना गलत होगा। घुमंतू और विमुक्त समाजों को लेकर बनी विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों ने यह रेखांकित किया है कि ये समुदाय बहुस्तरीय वंचना के शिकार हैं। वे कई श्रेणियों में बंटे जरूर हैं, परंतु वास्तविक लाभ तक उनकी पहुंच बहुत कम है। इसलिए अलग पहचान और उपयुक्त आरक्षण व्यवस्था की मांग सामाजिक न्याय की बुनियादी मांग है। यदि राजस्थान में इनकी आबादी महत्वपूर्ण है, तो उनकी हिस्सेदारी भी ठोस रूप में दिखनी चाहिए।
तीसरी मांग राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी है। पंचायतों और शहरी निकायों में 10 प्रतिशत सीट आरक्षित करने की बात इसलिए उठी है क्योंकि घुमंतू समाज बिखरा हुआ है, एक जगह सघन नहीं है। इस कारण लोकतांत्रिक संख्या होने पर भी उसका प्रतिनिधित्व नहीं बन पाता। लोकतंत्र में जो दिखाई नहीं देता, वह बजट, नीतियों और योजनाओं में भी पीछे छूट जाता है। इस मांग को राज्य को गंभीरता से सुनना चाहिए।
चौथी और पांचवीं मांग आवास, पट्टों और जमीन से जुड़ी है। जहां ये समुदाय बरसों से बसे हैं, वहां उन्हें वैध पट्टे दिए जाएं; शहरों में 100 वर्ग गज, गांवों में 300 वर्ग गज आवासीय भूमि और पशुओं के बाड़े के लिए अलग जगह मिले। यह कोई असंगत मांग नहीं है। घुमंतू समाज का जीवन सिर्फ मकान से नहीं, पशुधन, श्रम और जीविका से भी जुड़ा होता है। जिस समाज के पास स्थायी पता नहीं, उसकी नागरिकता भी अधूरी रह जाती है। राशन कार्ड, स्कूल प्रवेश, वोटर सूची, बैंकिंग सब कुछ ठहर जाता है।
शिक्षा को लेकर उनकी मांगें अत्यंत आधुनिक और दूरदर्शी हैं। शिक्षा बजट का 10 प्रतिशत हिस्सा अलग से, आवासीय विद्यालय, छात्रावास, कौशल कॉलेज, आंगनबाड़ी, कला महाविद्यालय और “anywhere education” जैसी व्यवस्था यह दिखाती है कि वे अपने जीवन की वास्तविकता के अनुरूप शिक्षा चाहते हैं। जो परिवार गतिशील है, उसके बच्चे के लिए स्थिर विद्यालय-ढांचा पर्याप्त नहीं होता। इसीलिए मोबाइल शिक्षा, आवासीय स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा-अधिकार के तहत प्राथमिकता जैसी मांगें समयोचित हैं।
महिलाओं और युवाओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, मैन्युफैक्चरिंग और अन्य आधुनिक क्षेत्रों में प्रशिक्षण की मांग विशेष महत्व रखती है। यह पोस्टर स्पष्ट रूप से बताता है कि समाज केवल परंपरागत पेशों में कैद नहीं रहना चाहता; वह नई अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक भागीदारी चाहता है। प्रति वर्ष 1000 विद्यार्थियों को विदेश में शिक्षा के लिए भेजने की मांग भले महत्वाकांक्षी लगे, पर इसके पीछे संदेश स्पष्ट है—यह समाज अवसरों की समान दुनिया चाहता है, दया की छांव नहीं। जब सरकार आईएएस आईपीएस के बच्चों को विदेश शिक्षा के लिए भेज रही है तो इनकी माँग ग़लत कैसे है?
अलग मंत्रालय, वित्त निगम और ऋण-सुविधा की मांग भी पूरी तरह तार्किक है। जब तक संस्थागत ढांचा नहीं बनेगा, तब तक ये मांगें घोषणाओं में घूमती रहेंगी। साथ ही अंतिम मांग—जैसे जोगी और कालबेलिया जैसे समुदायों के लिए दफन या श्मशान भूमि की व्यवस्था यह याद दिलाती है कि यह संघर्ष जीवन ही नहीं, मृत्यु में भी गरिमा का संघर्ष है।
अपने संवैधानिक हक और अधिकारो के लिए घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त DNT(डीएनटी) समाजों द्वारा दिनांक 01/07/2025.
1 जुलाई 2025 महा-बहिष्कार आंदोलन, जयपुर में अवश्य भाग लेवे और समाज की भावी पीढ़ी के भविष्य के लिए इस महायज्ञ में जरूर आहुति देवे
#घुमन्तु_बहिष्कार_आंदोलन@laljiraika01
मोर बोलै रे....
कभी-कभी संदेह होता है कि मैथिली ठाकुर का राजस्थान से कोई सीधा कनेक्शन है। लेकिन ऐसा है नहीं। वे विशुद्ध बिहारी हैं लेकिन अन्य भाषा के गीत गाते हुए उच्चारण में ऐसी शुद्धता बहुत कठिन काम होता है और वो भी इतनी कम उम्र में। निश्चित ही मैथिली पर मां सरस्वती की विशेष कृपा है। राजस्थान के ही एक हिस्से का व्यक्ति राजस्थान के दूसरे हिस्से की बोली बोलने में जोर खा जाता है। पिछले दिनों मैथिली ने राजस्थानी गीत "कंठी पर मोर बोलै, पण आ बनड़ी ना बोलै" गीत भी इसी शुद्धता के साथ पेश किया था। शायद वे हर भाषा के गीत समान शुद्धता के साथ गाती होंगी।
ढेर सारी शुभकामनाएं। आप आनंद लीजिए
@maithilithakur
माननीय मंत्रीजी @madandilawar जी घुमन्तु परिवार घुमक्कड़ जीवन जीते है और वे स्थाई नही बस सके इसलिए उनके पास 39 वर्ष पुराने दस्तावेज उपलब्ध होना मुमकिन नही है और इस कारण से वे इस योजना में भूखण्ड आवंटन और पट्टो से वंचित हो रहे है। अत: इसमे समय सीमा कम कर 15-20 वर्ष का प्रावधान हो
माननीय मंत्रीजी @madandilawar आपके प्रयासों से विभाग द्वारा घुमन्तु अर्धघुमन्तु परिवारों को भूखण्ड आवंटन एव पट्टे दिए जाने की प्रक्रिया जारी है लेकिन अब इसमे ऐसे परिवार जो चरागाह, गोचर में रहते है उनके 39 वर्ष पुराने सन1986 से पूर्व के दस्तावेज मांगे जा रहे है जो उपलब्ध नही है।
हम सब देशवासियों के लिए विनेश फोगाट गोल्डन गर्ल है अब मेडल मायने नही रखता ।
मैं चाहता हु उसका ग्रांड वेलकम हो और सरकार उसके लिए कुछ स्पेशल करें।
जो मेडल जीतने पर खिलाड़ी के लिए घोषणाएं होती है विनेश उनकी हकदार है।
#VineshPhogat#विनेश_देश_की_शान#ParisOlympics2024