दरभंगा सवर्ण बाहुल्य क्षेत्र है, BJP ने यहाँ से सवर्ण उम्मीदवार भी उतारा था, ये BJP के प्रदेश अध्यक्ष का क्षेत्र है, उसके बावजूद यहाँ RJD प्रत्याशी जीते! उसके 2 बड़े कारण:-
- भरत तिवारी एनकाउंटर
- UGC को लेकर अभी तक लोगों के मन में आक्रोश।
दरभंगा में शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर पराजय के बाद @BJP4India को कायदे से बिहार के प्रदेश अध्यक्ष @sanjay_saraogi को नाप देना चाहिए। सरावगी यहीं से आते हैं।
पर नापेगा कौन, क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष @NitinNabin की बांकीपुर सीट पर हार भी ज्यादा पुरानी बात नहीं है।
इस शानदार प्रदर्शन के बाद @Office_Of_NN भारत मंडपम् में भोज करेगा।
मिथिला के चाणक्य ने मगध वाली पार्टी का क्या हाल कर दिया - 4 सीट में सिर्फ़ 1 सीट पर जीत।
ऊपर से JDU के कार्यकारी अध्यक्ष के गृह क्षेत्र - दरभंगा स्नातक चुनाव में JDU प्रत्याशी चौथे नंबर पर आया - ECI का ऑफिशियल डेटा…👇
और इनके भरोसे नीरज बिहार में मंत्री बनने को बेताब है…😂
दरभंगा में सर्वेश कुमार जी हार गए। भाजपा के थे। संजय सरावगी ने पूछा कि क्या चल रहा है, क्या अंडरएस्टिमेट किया भाजपा ने, क्यों पीछे चल रहे? उनका उत्तर था: यूजीसी अभी भी लोगों को याद है, बहुत क्रोध में हैं।
अभी, प्रशासन द्वारा हर उपाय करने के बाद, हजारों वोट इन्वेलिड बताने के बाद भी, राजद के अनिल झा की जीत हुई। कहा जा रहा है कि पहले 3,000 वोट अवैध बनाए गए, फिर 5,000 अवैध हुए, फिर भी जीत अनिल झा की हुई।
ब्राह्मण बनाम भूमिहार था, पर लोगों ने राजद को वोट दिया। यह कभी नहीं होता था। यादवों की पार्टी, चारा चोर, ललुआ की पार्टी, गुंडों की पार्टी कह कर राजद में लोग सटते नहीं थे।
भाजपा की यही उपलब्धि है कि उसने सवर्णों को उधर ढकेल दिया, जहाँ हमने सोचा नहीं था। बाकी, चटुआ गिरोह जितना इजरायल चुनावों पर फोकस रखे, चाहे मोदी ट्रोल बन जाएँ, सत्य बिहार और यूपी सहित नागपुर के परिणाम में है।
“ई इतिहासई है कि मुस्लिम के यहाँ ई लोग अपनी बेटी-बहु को दिया है”……….
वो बयान जिसके कारण पटना शिक्षक MLC चुनाव BJP उम्मीदवार नवल यादव हार गए
BJP को नवल यादव, नागमणि कुशवाहा जैसे नेताओं को प्रशिक्षण शिविर लगाकर बताना चाहिए कि समाज को संगठित कैसे करते हैं, ना समझें तो इन्हें पार्टी से बाहर करें
टिकट देंगे तो ये आपकी झोली में हार ही डालेंगे।
क्या जेडीयू का किला ढहने लगा है ? नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के 6 महीने बाद ही पार्टी में स्थिति विस्फोटक हो चुकी है । नीतीश कुमार अगर सियासी तौर पर सक्रिय होते तो ऐसी स्थिति शायद नहीं बनती । अगर बनती भी तो उसे वो अपनी सियासी रणकौशल से काबू कर लेते । कुचल देते । लेकिन नीतीश सक्रिय तौर पर सक्रिय नहीं हैं । लिहाजा पार्टी की स्थिति भयानक होती जा रही है ।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि नीतीश पार्टी के सर्वेसर्वा हैं । लोकप्रिय और जननेता हैं । उनके अलावा पार्टी में इस वक्त कोई दूसरा नहीं है जो पार्टी को अपने नाम और चेहरे की बदौलत सींच सके । निशांत को उत्तराधिकारी जरूर बनाया गया । लेकिन निशांत न तो परिपक्व हुए हैं और ना ही उनके पीछे कोई भीड़ है या सर्वसमाज की कोई सहानुभूति । इसलिए निशांत अभी तो जननेता बनने से कोसों दूर हैं । शायद यही वजह है कि पार्टी के इस विद्रोह को वो संभाल नहीं सके । उनके पास खुद को साबित करने का मौका था लेकिन सियासी चक्रव्यूह में फंसकर उन्होंने इस मौके को गंवा दिया ।
जेडीयू में बगावत या पार्टी के खिलाफ काम करने का ये कोई पहला मौका नहीं है । इससे पहले के शायद ही कोई ऐसी कहानी होगी जिसको बिना गूगल सर्च किये जान सकते हैं । 2006 की बात है । विधानसभा के रिजल्ट के बाद जेडीयू के विधायक सुनील पांडेय ने होटल में हंगामा किया था । तब तत्कालीन अध्यक्ष जॉर्ज फर्नांडीस ने उन्हें पार्टी से निकाला था । बाद में फिर से वो पार्टी में लौटे और विधायक बने । 2020 के चुनाव में एमएलसी दिनेश सिंह की बेटी कोमल सिंह एलजेपी से चुनाव लड़ी । दिनेश सिंह ने बेटी के लिये प्रचार किया तो जेडीयू ने उन्हें बाहर निकाल दिया । लेकिन कुछ समय बाद ही ससम्मान वापसी हुई । फिर दिनेश सिंह जेडीयू से एमएलसी बन गये । बेटी कोमल अब जे़डीयू से ही विधायक हैं ।
इसके अलावा महेश्वर हजारी, गिरधारी यादव दो उदाहरण हैं जिनके खिलाफ पार्टी ने किसी तरह की कोई निष्कासन, निलंबन जैसी कार्रवाई नहीं की ।
सवाल यहां ये है कि क्या जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व ने अनंत सिंह से उनकी नाराजगी जानने की कोशिश की ? क्यों नेतृत्व संभालने की राह पर निकले निशांत ने विधायक अनंत सिंह को बुलाकर बात करना जरूरी नहीं समझा ? संजय झा से अनंत सिंह ने वन टू वन बात क्यों नहीं की ? अनंत सिंह की नीतीश से मुलाकात क्यों नहीं करवाई गई ? जबकि अनंत सिंह ने कहा था कि नीतीश जी कहेंगे तो वो मान जाएंगे ।
ये वो सवाल हैं जो शक पैदा करता है कि क्या जेडीयू के अंदर ही कुछ ऐसा तंत्र काम कर रहा है जो निशांत को मजबूत होने नहीं दे रहा ?
अगर अनंत सिंह पार्टी के लिये चुनौती बन रहे थे तो फिर नेृतृत्व की तरफ से उनसे बात करने की कोशिश क्यों नहीं हुई ? एक बार मीटिंग हुई भी तो उसका नेतृत्व उमेश कुशवाहा ने किया । जबकि सबको पता था कि अनंत सिंह इस स्तर पर मानने वाले नहीं हैं ।
अनंत सिंह एपिसोड से निशांत मजबूत हुए हैं या कमजोर ? ये सवाल बड़ा है । हर विश्लेषक अपनी अपनी सुविधा से विश्लेषण करने में लगा है ।
अनुशासन और नेतृत्व की पहली परीक्षा में निशांत फेल हुए हैं । इसके पीछे उनका अपना तंत्र है या फिर पार्टी में उन्हें सलाह देने वाले लोग...बेहतर उनको पता होगा । अब ललन सिंह को लपेटा जा रहा है... पहले संजय झा लपेटे जा रहे थे । इसमें कोई शक नहीं है कि राजनीति निष्ठुर होती है । सबको पता है कि अनंत सिंह को जेल से निकलने के बाद घर बुलाकर टिकट नीतीश कुमान ने दिया था । ललन सिंह के कहने पर दिया..अशोक चौधरी के कहने पर दिया या फिर खुद से दिया ये लेने देने वालों को पता होगा । लेकिन अनंत सिंह का इतिहास भूगोल जानते हुए एनडीए ने उन्हें टिकट दिया । यहां तक कि 2024 में जब नीतीश को सरकार बचाने की जरूरत महसूस हुई तो इन्हीं अनंत सिंह की पत्नी को आरजेडी से तोड़कर लाये थे ।
महत्वपूर्ण टाइमिंग होती है । इस वक्त जेडीयू अपने सबसे कमजोर दौर में है । चुनाव में हार होगी या जीत । लेकिन पार्टी और कैडर में जो मैसेजिंग है वो अंदरखाने बहुत मजबूत नहीं है ।
हर किसी को पता है कि नीतीश के बाद कोई नेता पार्टी में नहीं है जो इसे आगे ले जा सके । संजय झा मासलीडर नहीं हैं । 14 साल पहले पार्टी में आए हैं । ललन सिंह रणनीतिकार हैं मासलीडर वाली छवि उनकी भी नहीं है । 2010 में नीतीश का साथ छोड़कर अपनी सियासी हैसियत नाप चुके हैं । केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर हों या फिर बिहार में श्रवण कुमार, उमेश कुशवाहा । नीतीश कुमार के टैग की वजह से इनकी सियासी हैसियत या फिर पहचान है ।
हां इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी के बिना पार्टी रुकती नहीं है । प्रशांत किशोर, शरद यादव, उपेंद्र कुशवाहा, आरसीपी भी कभी जेडीयू में थे ।
RJD की सरकार 2004 में अनंत सिंह के गाँव लदमा में STF सबेरे एंकाउंटर किया था जिसमें कुल 8-9 लोगों की हत्या हुई थी। उसी क्रम में इनके आंख के पास भी गोली लगा था जिसका कारण ये काला चश्मा है।
इसी वीडियो में वो यही कह रहे हैं उन्होंने अपने 9 लोगों का क़ुर्बानी दिया है। वो अलग बात है की जो STF आया था, उसके पीछे विवेका पहलवान का परिवार था। और अब दोनों परिवार में सुलह हो गया है।
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