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स्मार्ट सिटी जयपुर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बड़ा धमाका: जल्द ही फिक्स टाइमर होगा बंद, सड़कों पर लाइव ट्रैफिक देखकर खुद सिग्नल बदलेगा AI ITMS
• रामबाग सर्किल पर 39 दिनों का महा-ट्रायल 100% सफल; बिना इंसानी दखल के 48 लाख से ज्यादा गाड़ियां हुईं क्लियर, हर लेन में बचे 8 से 45 सेकंड
जयपुर 13 जुलाई। गुलाबी नगरी जयपुर की सड़कों को जाममुक्त और प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए महानिदेशक पुलिस श्री राजीव कुमार शर्मा की पहल पर राजस्थान पुलिस ट्रैफिक मैनेजमेंट के क्षेत्र में एक अत्याधुनिक तकनीक की शुरुआत करने जा रही है। जल्द ही शहर का ट्रैफिक पारंपरिक फिक्स टाइमर के भरोसे नहीं, बल्कि पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से संचालित होगा। जयपुर ट्रैफिक पुलिस द्वारा 'डेटा कोर इन्फोटेक' के सहयोग से जयपुर के सबसे व्यस्त रामबाग सर्किल पर किया गया 39 दिनों का महा-ट्रायल पूरी तरह सफल रहा है।
ट्रायल की सफलता के बाद अब पुलिस कमिश्नरेट जयपुर शहर के 423 चौराहों में से 253 प्रमुख चौराहों को इस एआई-आधारित स्मार्ट कैमरे और इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) से जोड़ने जा रही है। ट्रैफिक डीसीपी श्री ��ोगेश गोयल के नेतृत्व में इस पूरी परियोजना की मॉनिटरिंग की गई और ट्रायल के ऐतिहासिक नतीजों के बाद अब इसे पूरे शहर में विस्तार देने का निर्णय लिया गया है।
क्या है AI-ITMS और यह पारंपरिक सिग्नल से अलग क्यों है:
डेटा कोर इन्फोटेक के निदेशक बसंत गोस्वामी और ओजस शुक्ला ने बताया कि अभी तक चौराहों पर लाल और हरी बत्ती के लिए समय (जैसे 60 या 90 सेकंड) तय रहता है, चाहे किसी एक सड़क पर ट्रैफिक खाली हो और दूसरी पर 1 ��िलोमीटर लंबा जाम हो। लेकिन नया एआई-पावर्ड आईटीएमएस (ITMS) इससे बिल्कुल अलग है। चौराहे पर लगे एआई कैमरे चौबीसों घंटे लाइव वाहनों की संख्या और कतार की लंबाई को स्वतः मापते हैं। जिस सड़क पर वाहनों का दबाव ज्यादा होगा, एआई सिस्टम खुद-ब-खुद वहां का ग्रीन टाइम बढ़ा देगा और खाली सड़क का समय घटा देगा। इस सिस्टम को चलाने के लिए किसी ट्रैफिक पुलिसकर्मी को रिमोट या बटन दबाने की जरूरत नहीं पड़ती, यह 24 घंटे पूरी तरह ऑटोमैटिक काम करता है।
हर वाहनधारी के 8-45 सेकण्ड समय की हुई बचत :
3 जून 2026 से 11 जुलाई के बीच रामबाग सर्किल पर किए गए पायलट प्रोजेक्ट के दौरान एआई सिस्टम ने बेहतरीन परिणाम दिए हैं। इस दौरान सिस्टम ने बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के 4,88,140 से अधिक वाहनों को सुगमता से पार करवाया। एआई नियंत्रण के कारण वाहन चालकों को प्रत्येक लेन में 8 से 45 सेकंड की सीधी बचत हुई और औसत लेन ग्रीन टाइम 33.63 सेकंड रिकॉर्ड किया गया। चौराहों पर वाहनों के कम समय रुकने और स्मूथ ट्रैफिक फ्लो के कारण 39 दिनों में कुल 2,535 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन कम हुआ, जो दैनिक स्तर पर 65 किलोग्राम की बचत है।
पेंडिंग चालान भी पकड़ेगा सिस्टम:
यह एआई सिस्टम केवल ट्रैफिक ही मैनेज नहीं करे��ा, बल्कि चौराहों पर अनुशासन भी बनाए रखेगा। ट्रायल के दौरान सामने आया कि एक कैमरा रोजाना करीब 4200 गाड़ियों को रीड करता है, जिसमें से औसतन 450 वाहनों के चालान की सटीक जानकारी सिस्टम स्वतः दर्ज कर लेता है। इसके लागू होने से ओवरस्पीडिंग, रेड लाइट जंप, रॉन्ग साइड ड्राइविंग और लेन उल्लंघन करने वाले वाहन अब बच नहीं पाएंगे। इसके अलावा, यदि किसी वाहन पर पहले से कोई चालान बकाया या लंबित है, तो एआई कैमरा उस ग���ड़ी के नंबर प्लेट को स्कैन करते ही उसकी पूरी जानकारी तुरंत कंट्रोल रूम को उपलब्ध करा देगा।
भविष्य का रोडमैप: एम्बुलेंस को मिलेगी ग्रीन कॉरिडोर प्राथमिकता:
डेटा कोर इन्फोटेक के निदेशक बसंत गोस्वामी और ओजस शुक्ला के अनुसार, इस सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे भविष्य में पूरे स्मार्ट सिटी मिशन से जोड़ा जा सके। वर्तमान में सिंगल जंक्शन पर पूर्ण स्वायत्त एआई कंट्रोल का पहला चरण (रामबाग ट्रायल) सफल रहा है। निकट भविष्य में दूसरे चरण के तहत मल्टी-जंक्शन सिंक्रोनाइजेशन किया जाएगा, यानी एक चौराहे का एआई दूसरे चौराहे के एआई से बात करके पूरे रूट का ट्रैफिक खुद साफ करेगा। इसके बाद अगले चरणों में वीआईपी मूवमेंट, फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस जैसी आपातकालीन गाड़ियों को ऑटोमैटिक प्रायोरिटी ग्रीन सिग्नल देने की व्यवस्था की जाएगी ताकि मरीजों को जाम में न फंसना पड़े।
इस नई त��नीक के लागू होने से जहां एक ओर आमजन के सफर का समय बचेगा और ईंधन की बचत होगी, वहीं दूसरी ओर ट्रैफिक पुलिस का ध्यान चौराहों पर खड़े रहने के बजाय जाम, दुर्घटना संभावित क्षेत्रों, स्कूलों और बाजारों जैसे संवेदनशील स्थानों पर अधिक केंद्रित हो सकेगा।
#RajasthanPolice
#JaipurTrafficPolice
#JaipurSmartCity
This speech will go down as one of the best written and spoken by Jeff Daniel. These words are as important and as relevant today as when he said them.
असफलताओं के बीच जलता हुआ सपना: एक अभ्यर्थी की कहानी💔
कल RAS 2024 का अंतिम परिणाम आया। कई चेहरों पर मुस्कान थी, कई घरों में जश्न था और सोशल मीडिया से लेकर गाँव-गाँव तक सफल अभ्यर्थियों की चर्चाएँ जोरों पर थीं। यह स्वाभाविक भी है। समाज हमेशा सफलता का उत्सव मनाता है। लेकिन इसी भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं, जिनकी आँखों ��ें नमी होती है, जिनकी मेहनत अनकही रह जाती है और जिनकी कहानी कहीं दर्ज नहीं होती।
मैं उन्हीं में से एक हूँ।
मैं भी उन अभ्यर्थियों में रहा हूँ, जो दिन-रात अपने सपनों के लिए जीते हैं। जो समाज से, रिश्तों से, और कभी-कभी खुद से भी दूरी बना लेते हैं। जिनके लिए कुछ समय तक सिर्फ एक लक्ष्य होता है - RAS
मैंने भी वही किया। शादी-ब्याह छोड़े, पारिवारिक कार्यक्रम छोड़े, दोस्तों की खुशियाँ छोड़ीं। किराए के छोट��� कमरों में, लाइब्रेरी की खामोशी में, अनगिनत रातें किताबों के साथ बिताईं।
2018 में पहला प्रयास दिया। प्रिलिम्स कभी बाधा नहीं बना, सीधे मेंस तक पहुँचा। Mains में 219 अंक आए। मेहनत में कमी नहीं थी, लेकिन परिणाम मेरे पक्ष में नहीं था। पहली बार असफलता मिली और सच कहूँ तो, वह बहुत चुभी।
2021 में फिर प्रयास किया। इस बार 237 अंक आए। उम्मीद थी कि इस बार शायद मंज़िल मिल जाएगी, लेकिन असफलता ने फिर दस्तक दी। आँखें फिर नम थीं लेकिन दर्द अब थोड़ा गहरा हो चुका था।
2023 में तीसरी ��ार Mains लिखा। 202 अंक आए लेकिन इस बार असफलता ने सिर्फ दरवाज़ा नहीं खटखटाया, उसने भीतर तक तोड़ दिया समाज के ताने, परिवार की बातें, ये पढ़ता नहीं है, मौज करता है, इससे नहीं होगा!
ये शब्द किसी भी रिज़ल्ट से ज़्यादा चोट देते हैं क्योंकि जो बंद कमरों की रातें नहीं देखता, वो मेहनत को कभी समझ नहीं सकता।
तीन असफलताओं के बाद मैं टूट ��या था। 2024 का प्रयास मैंने छोड़ दिया। मैंने खुद को समझा लिया कि शायद अब यह रास्ता मेरे लिए नहीं है।
लेकिन सच्चाई यह है, कुछ सपने छोड़े नहीं जाते, वो भीतर जिंदा रहते हैं।
आज भी जब रात होती है, वो सपना मुझे जगाता है। एक कसक हमेशा रहती है, शायद मुझसे हो जाता… और यही कसक अब मेरी ताकत बन रही है।
पिछले कुछ महीनों से मैंने खुद को फिर से तैयार करना शुरू किया है। सोशल मीडिया से दूरी बना ली है और एक बार फिर उ���ी जुनून के साथ किताबों में लौट आया हूँ।
इस बार फर्क सिर्फ इतना है। पहले मैं सिर्फ मेहनत करता था, अब मैं अनुभव के साथ मेहनत कर रहा हूँ। आज मैं खुद से एक वादा कर रहा हूँ, मैं एक बार फिर प्रयास करूँगा। पूरी लगन, पूरी ईमानदारी और पूरे आत्मविश्वास के साथ।
परिणाम क्या होगा, यह भविष्य बताएगा लेकिन इस बार मैं पीछे हटने वाला नहीं हूँ। क्योंकि अब मैं जान चुका हूँ, असफलता अंत नहीं होती, वो सिर्फ एक कठिन शिक्षक होती है, जो हमें मजबूत बनाती है।
शायद कुछ समय के लिए मैं ��हीं दिखाई न दूँ, लेकिन यह गायब होना हार नहीं बल्कि एक नई तैयारी का संकेत होगा।
मैं लौट रहा हूँ, अपने सपने की ओर, अपने संघर्ष की ओर, और उस मंज़िल की ओर जो अभी भी मेरा इंतजार कर रही है।
Shri Bishnu Charan Mallick (IAS), Director Census Operations appeals to the residents of Rajasthan State for active participation in the first phase of Census 2027 #census2027
श्री बिष्णु चरण मल्लिक (IAS), निदेशक जनगणना कार्य की राजस्थान राज्य के निवासियों से जनगणना 2027 के प्रथम चरण में सक्रिय सहभागिता के लिए अपील #census2027
रवीन्द्र नाथ टैगोर जी ये लाइन सुनिए SDM राहुल सिन्हा सर से....
84 लाख जन्म के बाद यह जीवन मिला है तो यह जीवन इसलिए नहीं है कि किसी गुलामी में बिता दें!
इस देश के हर दफ्तर में मीटिंग-मीटिंग खेला जाता है ... समझ नहीं आता है कि जब गरीबों की सुनवाई नहीं तो इन मीटिंग्स का हासिल क्या है ... तस्वीर इंदौर की है ... ज़रा सोचिये कितने दिनों की पीड़ा और व्यथा समेटे है ये शख्स ...
1974 to 1978 I studied in Sri Ramakrishna Misson Vidyalaya, Coimbatore.
Reason to go there :
City colleges fees: Rs 1000 to 3000.
Hotel fees : 200 per month.
In SRMV: (25 kms from city)
College fees: 300
Hotel fees : 75 per month.
Reason to travel by train:
I could not afford even that Hostel fees.
I found a Govt Harijan hostel in city which was free.
But bus fare was 60 paise one way. Monthly Rs. 30.
That also sounded too costly.
A passenger train used to run in that route and its student quarterly pass was Rs. 7.
Reason to talk about this platform:
Train
In: Dep : 5:50 am. Arrival: 6:25 am.
Out: Departure: 6:10 pm. Arrival 6:45 pm.
College started at 9:00 am. Ended any time.
Time to kill:
6:30 am to 9:00 am.
Any time to 6:00 pm.
Average daily 6 hrs.
What I did:
Sat in this Railway platform and studied Maths Physics Chemistry
How did I get BARC job:
My 1000 days and 6000 man hours intense focus on Avagadros, Ohms and Pythagoras
Those days my mother was only earning member of family. Rs. 3 a day. So I had to do all sacrifice to get a degree without denting her arithmetics much. She gave her 4 bangles to pay my college fees.
What I wish to say is:
“Fortunately I was poor”.
Be it college or Career or business
“Patience, Focus, Frugality and Discipline “ Gives slow but sustainable success.
I took my wife to show how a railway platform made a Scientist. Pic :2015.
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मार्क टुल्ली: जब एक आवाज़ ने माइक्रोफ़ोन छोड़ा, लेकिन भारत नहीं छोड़ा
यह ख़बरों के महानायक की कहानी है, जो आज खबरों के अनश्वर संसार से सदा के लिए जीवित रहते हुए चला गया।
25 जनवरी 2026 को जब दिल्ली में ख़ामोशी कुछ ज़्यादा ही सलीके से फैली थी; जैसे शहर ने जानबूझकर अपनी आवाज़ धीमी कर ली हो। किसी परिचित स्वर का अचानक ग़ायब हो जाना, वैसा ही एहसास था। सर विलियम मार्क टुल्ली नहीं रहे। लेकिन यह वाक्य अधूरा है। सच यह है कि मार्क टुल्ली बहुत पहले यानी जुलाई 1994 में ही ख़बरों के लोक से परे हो गए थे, उस दिन, जब उन्होंने बीबीसी से बहुत क्षुब्ध होकर त्यागपत्र दे दिया था; लेकिन उसी क्षण उन्होंने एक नया ही जन्म लिया।
वे जेएलएफ में कई बार जयपुर आए तो बिना किसी मित्रता और बिना किसी पहचान के इतनी आत्मीयता से कोई घंटा भर बतियाते रहे। मार्क टुल्ली से उस मुलाकात ने साबित किया कि पत्रकार के भीतर का इनसान बड़ा ���ोता है, सितारा छवि नहीं।
मार्क टुल्ली की मृत्यु कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं है; वह एक विराम है—एक ऐसा विराम, जिसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी में स्वयं बहुत पहले लगा दिया था। और जैसा कि उन्होंने "नो फुलस्टॉप्स इन इंडिया" में लिखा था, भारत में पूर्ण विराम होते ही नहीं। उनकी मृत्यु भी एक अप���र्ण वाक्य की तरह है, जो अब स्मृतियों में अपनी अनुगूंज बनाए रहेगा।
मैं बीबीसी का दीवाना रहा हूँ और सन् 1975 से, जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था।
1994। लंदन में बीबीसी के दफ़्तरों में चमकती हुई चुप्पियाँ थीं। जॉन बर्ट का युग, जहाँ प्रबंधन की भाषा में भय एक तकनीक था और गोपनीयता एक नीति। टुल्ली के लिए यह असहनीय था। वे उस पत्रकारिता से आए थे, जिसमें सवाल आदेश से ज़्यादा पवित्र होता है। उन्होंने कहा था, बीबीसी एक “गुप्त मोनोलिथ” बनती जा रही है, जहाँ रेटिंग्स की पूजा है और आत्मा निर्वासित। पत्रकारिता में आत्मा के निर्वासन का यह सिलसिला पत्रकारिता के महानतम शिखर से शुरू हुआ था और आज हम पूरी दुनिया में बिना आत्मा वाली देहें देख रहे हैं, जो प्रेत बन चुकी हैं।
उस इस्तीफ़े में कोई नाटकीयता नहीं थी, बस एक गहरी नै��िक थकान थी। यह वह क्षण था जब लेखक ने अपनी कलम नहीं, मेज़ छोड़ दी। माइक्रोफ़ोन से हटते हुए भी टुल्ली आवाज़ बने रहे।
भारत उनके लिए कोई पोस्टिंग नहीं था; वह एक स्मृति थी, जो बचपन से चली आ रही थी। कलकत्ता का टॉलीगंज, दार्जिलिंग का बोर्डिंग स्कूल, फिर इंग्लैंड, जहाँ भारत से दूर रखकर भारत सिखाया गया। यह इतिहास की विडंबना थी कि जिस देश से उन्हें सामाजिक दूरी पर रखा गया, उसी देश ने उन्हें सबसे निकट से अप���ाया।
वे कहते थे, “इस देश के लिए यह बहुत शर्म की बात है कि जब मैं हिंदी में बात करता हूँ तो लोग अंगरेज़ी में जवाब देते हैं।” यह शिकायत नहीं थी, यह पीड़ा थी, एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने भारत को भाषा से नहीं, संवेदना से सीखा था। और मैंने जब-जब उनसे बातचीत की थी, उसमें उनकी भाषा सुकून देती थी।
टुल्ली भारत को घटना की तरह नहीं, प्रक्रिया की तरह देखते थे। भोपाल ��ैस त्रासदी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, सिख-विरोधी दंगे, बाबरी मस्जिद का विध्वंस, ये उनके लिए समाचार नहीं, सभ्यता की दरारें थीं। 1992 में अयोध्या में जब भीड़ “डेथ टू मार्क टुल्ली” के नारे लगा रही थी, तब वे एक कमरे में बंद थे, न केवल शारीरिक रूप से, उस भारत के भीतर भी, जो स्वयं को बंद कर रहा था।
उन्होंने बाद में कहा था—बाबरी मस्जिद का गिरना स्वतंत्र भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वप्न की सबसे बड़ी पराजय थी। यह विश्लेषण नहीं था, यह एक शोक-वाक्य था। हम देख रहे हैं कि आज की पत्रकारिता में धर्म निरपेक्षता की वही पराजय एक नए विजयनाथ के रूप में प्रस्तुत की जाती है। आत्महीना पत्रकारिता इसके अलावा और करे भी क्या?
1994 के बाद उन्होंने बीबीसी छोड़ा, लेकिन भारत नहीं। वे दिल्ली में रहे, रेलगाड़ियों में भटके, गाँवों में रुके, रेडियो पर बोले, किताबों में साँस ली। "इन इंडिया इन स्लो मोशन" जैसे शीर्षक दरअसल उनके जीवन-दर्शन थे—भारत को जल्दी में समझा ही नहीं जा सकता।
उनकी दोस्ती चौधरी देवीलाल से महान् ज़मीनी नेता से थी और उस दोस्ती में भारतीय राजनीति का एक अनोखा हास्य छिपा था। एक बार चुनाव के दौरान देवीलाल ने उनसे कहा, “मैं बहुत बोर हो गया हूँ।” टुल्ली ने कहा—घोषणापत्र तो अच्छा है। देवीलाल हँसे, “बेवकूफ़, मैंने एक भी घोषणापत्र नहीं पढ़ा।” फिर जोड़ा, “लेकिन गाँव का हर आदमी मुझ��� जानता है।” टुल्ली इस वाक्य को लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा मानते थे।
उन्हें राजीव गांधी बेहद पसंद थे। उनका मानना था : अगर राजीव गांधी की हत्या न होती तो भारत कहीं आगे होता। “उन्हें पता था कि क्या करना है,” टुल्ली कहते थे—और उस वाक्य में अफ़सोस भी था, उम्मीद भी।
वे क्रिकेट में भारतीय टीम के समर्थक थे, बिना किसी औपचारिकता के। महेंद्र सिंह धोनी को उन्होंने पहली नज़र में पहचान लिया था। “मैंने तभी कह दिया था, यह लड़का बहुत आगे जाएगा।” यह कथन किसी क्रिकेट विश्लेषक का नहीं, किसी कथाकार का था, जो चरित्र पढ़ लेता है।
हिंदी फ़िल्मों से उनका प्रेम लगभग घरेलू था—ओंकारा, तारे ज़मीं पर, नया दौर। अमरीश पुरी, नसीरुद्दीन शाह, सैफ़ अली ख़ान, बोमन ईरानी—वे कलाकारों को उनके अभिनय से पहले उनकी आत्मा से देखते थे। अमरीश पुरी से जुड़ा एक सपना था—नाइटहुड मिलने पर उन्होंने कह��� था कि वे किसी हिंदी फ़िल्म में छोटी भूमिका करना चाहते हैं, बस अमरीश पुरी हों। कुछ दिन बाद अमरीश का फ़ोन आया—और कुछ समय बाद उनका निधन। वह सपना अधूरा रह गया—जैसे टुल्ली की बहुत-सी इच्छाएँ।
उन्हें जाने कितने ही फिल्मी गीत याद थे। टुल्ली साहब को दक्षिणपंथी माना जाता था; लेकिन उनका पसंदीदा गीत था—सारे जहाँ से अच्छा, घनन घनन, धीमे-धीमे, आज रंग है—जैसे ये गीत ��हीं, उनके निजी डायरी के पन्ने हों।
मार्क टुल्ली को “भारत को समझने वाला विदेशी” कहा गया। यह वाक्य उनके साथ अन्याय करता है। वे भारत को समझते नहीं थे—वे भारत में रहते थे। समझना दूरी माँगता है; रहना जोखिम।
1994 में उन्होंने बीबीसी को वैसे का वैसे बिना शोरशराबे छोड़ दिया और आज 2026 में उन्होंने अपने शरीर को जस की तस धर दीनी चदरिया।
बीच के वर्षों में उन्होंने हमें यह सिखाया कि पत्रकारिता संस्था से न���ीं, विवेक से चलती है।
मार्क टुल्ली चले गए।
लेकिन भारत में—आज भी—कोई पूर्ण विराम नहीं लगा। मार्क टुल्ली दैहिक रूप से ज़रूर चले गए हैं; लेकिन उनकी आत्मा हमारी पत्रकारिता को सदैव समृद्ध करती रहेगी।
फोटो : पार्थिव शाह, राजकमल प्रकाशन और परवेज़ आलमसाहब
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