नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।मन का #विश्वास रगों में साहस भरता है,चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
---सोहनलाल द्विवेदी
#विश्वास#लेखनी✍️
रखते अभी तक नाड़ियों में पूर्वजों का #रक्त हैं।
ऐसा नहीं कि मनुष्य रूपी और कोई जंतु हैं,
अब भी हमारे मस्तकों में ज्ञान के कुछ तंतु हैं॥
--मैथलीशरण गुप्त
#रक्त#लेखनी✍️
जभी पानी बरसता है तभी घर की याद आती है
यह नहीं कि वहाँ हमारी प्रिया, बिरहिन, धर्मपत्नी है—
यह नहीं कि वहाँ खुला कुछ है पड़ा जो भीग जाएगा—
बल्कि यह कि वहाँ सभी कमरों-कुठरियों की दिवालों पर उठी #छत है ।
--रघुवीर सहाय
#छत#लेखनी✍️
या गर्मियों की रात जो
पुरवईया चले
या गर्मियों की रात जो
पुरवईया चले
ठंडी सफ़ेद चादरों पे
जागे देर तक
तारो को देखते रहे
#छत पर पड़े हुए
दिल ढूंढता है फिर वही
फुर्सत के रात दिन
__गुलज़ार
#छत#लेखनी✍️