।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः।सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ।।१२।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का तृतीय अध्याय साधक को क्रमशः परमात्मा की सर्वव्यापकता, सर्वान्तर्यामित्व तथा अद्वितीय स्वरूप का बोध कराते हुए अन्ततः आत्मसाक्षात्कार की चरम अवस्था तक ले जाता है। पूर्ववर्ती मन्त्रों में उपनिषद् ने उद्घोष क���या कि परमात्मा समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित है तथा सम्पूर्ण विश्व उसी से व्याप्त है। प्रस्तुत मन्त्र उस परम तत्त्व के एक और दिव्य आयाम का उद्घाटन करता है। यहाँ उसे महान्, प्रभु, पुरुष, सत्त्वस्य प्रवर्तक, ईशान, अव्यय ज्योति तथा निर्मल प्राप्ति का प्रदाता कहा गया है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि यहाँ वर्णित पुरुष कोई सीमित जीव अथवा देहधारी सत्ता नहीं है, ���ल्कि वही परमब्रह्म है, जो समस्त जगत् का आधार, समस्त चेतना का अधिष्ठान तथा समस्त आध्यात्मिक उत्कर्ष का कारण है। यह मन्त्र साधक को यह बोध कराता है कि आत्मज्ञान किसी बाह्य उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि अन्तःकरण की निर्मलता के माध्यम से अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव है।
‘महान् प्रभुः’ अनन्त और सर्वाधिपति परमात्मा -
मन्त्र का प्रथम पद है - “महान् प्रभुर्वै पुरुषः।” मह��न् अर्थात् जो समस्त सीमाओं से परे है; जो देश, काल और वस्तु की मर्यादाओं से अतीत है। वह किसी एक स्थान, रूप या काल में सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व का अधिष्ठान है।”प्रभुः” अर्थात् सर्वशक्तिमान, सर्वनियन्ता। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा की प्रभुता किसी बाह्य शासन के अर्थ में नहीं है; उसकी प्रभुता इस तथ्य में है कि उसी के कारण समस्त जगत् का अस्तित्व सम्भव है। सूर्य का प्रकाश जैसे बिना प्रयास सबको प्रकाशित करता है, वैसे ही ब्रह्म अपनी सत्ता से सम्पूर्ण विश्व को अस्तित्व प्रदान करता है।
‘पुरुषः’ जो समस्त में पूर्ण रूप से व्याप्त है ! वेदान्त में ‘पुरुष’ शब्द का अत्यन्त गम्भीर अर्थ है। यह केवल मनुष्य का सूचक नहीं है। आदि शंकराचार्य के अनुसार ‘पुरुष’ वह है, जो समस्त ‘पुर’ अर्थात् शरीरों में स्थित है और साथ ही जो सम्पूर्ण विश्व में पूर्णतया व्याप्त है। वही प्रत्येक जीव का आत्मस्वरूप है। शरीर बदलते हैं, मन बदलते हैं, विचार बदलते हैं, किन्तु जो इन सब परिवर्तनों का साक्षी है, वही पुरुष है। वही न जन्म लेता है, न मरता है, न परिवर्तित होता है।
‘सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः’ शुद्ध अन्तःकरण और ज्ञान का प्रेरक ! इस मन्त्र का अत्यन्त सूक्ष्म पद है- “सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः।” यहाँ ‘सत्त्व’ का तात्पर्य केवल प्रकृति के त्रिगुणों में से एक सत्त्वगुण नहीं है, बल्कि उस निर्मल अन्तःकरण से है, जो आत्मज्ञान के योग्य बनता है। परमात्मा ही समस्त ज्ञान का मूल प्रकाश है। बुद्धि स्वयं प्रकाशमान नहीं होती; वह आत्मचैतन्य से प्रकाशित होकर ही जानने का सामर्थ्य प्राप्त करती है। अतः जो विवेक, वैराग्य, श्रद्धा, भक्ति, करुणा और आत्मबोध की प्रेरणा साधक के भीतर जागृत होती है, उसका परम स्रोत वही परमेश्वर है। अतः आध्यात्मिक जागरण किसी अहंकारजनित उपलब्धि का परिणाम नहीं, ब��्कि ईश्वरकृपा और अन्तःकरण-शुद्धि का प्रस्फुटन है।
‘सुनिर्मलामिमां प्राप्तिम्’ मोक्ष ही परम निर्मल अवस्था ! मन्त्र कहता है कि वही परमेश्वर साधक को सुनिर्मल प्राप्ति प्रदान करता है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यह प्राप्ति किसी नवीन वस्तु की उपलब्धि नहीं है। आत्मा तो सदा सिद्ध है। ‘प्राप्ति’ का अर्थ है - अविद्या का नाश और अपने नित्य स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव। जिस प्रकार धूल हट जाने प�� दर्पण अपनी स्वाभाविक चमक प्रकट कर देता है, उसी प्रकार अज्ञान, राग, द्वेष, अहंकार और वासनाओं के क्षीण होने पर आत्मा का निर्मल प्रकाश स्वतः प्रकट हो जाता है। यही मोक्ष है ! किसी स्थान विशेष को प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाना।
‘ईशानो ज्योतिरव्ययः’ अविनाशी आत्मप्रकाश ! मन्त्र का अन्तिम पद कहता है कि “ईशानो ज्योतिरव्ययः।” वह परमेश्वर अविनाशी ज्योति है। यह ज्यो��ि भौतिक प्रकाश नहीं है। सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा का प्रकाश भी उसी आत्मप्रकाश से प्रकाशित होता है। इसी सत्य को कठोपनिषद् और मुण्डकोपनिषद् उद्घोषित करते हैं -
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।।"
भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य कहते हैं कि आत्मा स्वयंप्रकाश है। उसे प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य प्���माण या प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः।
सर्वव्यापी स भगवान्तस्मात् सर्वगतः शिवः ।।११।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषदों का उद्देश्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना है। वे केवल दार्शनिक ग्रन्थ नहीं, अपितु आत्मसाक्षात्कार की दिव्य मार्गदर्शिकाए��� हैं। वे बाह्य जगत् की विविधताओं के भीतर स्थित उस एकमेव चैतन्य सत्ता का उद्घाटन करते हैं, जो समस्त नाम-रूपों का अधिष्ठान, कारण तथा प्रकाशक है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उसी परमात्मतत्त्व का उद्घोष करता है कि "सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः।
सर्वव्यापी स भगवान्तस्मात् सर्वगतः शिवः।।"
यहाँ ‘शिव’ किसी सीमित देवता का नहीं, बल्कि परम मंगलमय, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी ब्रह्म ��ा बोधक है। भगवान आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि यहाँ प्रयुक्त सभी विशेषण निर्गुण ब्रह्म की सर्वव्यापक सत्ता को उपासना और तत्त्वबोध के अनुकूल भाषा में व्यक्त करते हैं।
‘सर्वाननशिरोग्रीवः’ का तात्पर्य है कि समस्त प्राणियों के मुख, मस्तक और कण्ठ उसी परमात्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं। प्रत्येक जीव में जो चेतना देखती, सुनती, बोलती और विचार करती है, वही एक आत्मतत्त्व सबमें सम��न रूप से प्रकाशित है। इसी सत्य को भगवद्गीता में भी कहा गया है - “सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्…”। वस्तुतः गीता का यह श्लोक इसी उपनिषद्-विचार का विस्तार है।
‘सर्वभूतगुहाशयः’ का अर्थ है कि परमात्मा प्रत्येक प्राणी की हृदयगुहा में स्थित है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार ‘गुहा’ से अभिप्राय बुद्धि का वह सूक्ष्म प्रदेश है, जहाँ आत्मा का अनुभव सम्भव होता है। परमात्मा कहीं दूर नहीं है; वह प्रत्येक जीव के अन्तरतम में आत्मस्वरूप से सदा विद्यमान है। उपनिषद् कहता है “एषः सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते।” आत्मा अप्राप्त नहीं, केवल अविद्या के कारण अप्रकट प्रतीत होती है; जैसे बादल सूर्य को नहीं मिटाते, केवल दृष्टि से ओझल कर देते हैं।
‘सर्वव्यापी स भगवान्’ ब्रह्म देश, काल और वस्तु की सभी सीमाओं से परे है। छान्दोग्य उपनिषद् का उद्घोष है “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इसी सत्य की पुष्टि करता है। अद्वैत वेदान्त क��� अनुसार ब्रह्म किसी वस्तु में प्रवेश नहीं करता, क्योंकि उसके अतिरिक्त कोई दूसरी सत्ता है ही नहीं। समस्त जगत् उसी एक सत्य पर अध्यारोपित नाम-रूप है।
‘तस्मात् सर्वगतः शिवः’ इसलिए वही सर्वत्र स्थित कल्याणस्वरूप शिव है। यहाँ ‘शिव’ का अर्थ है - मंगलमय, शुद्ध, ��िष्कलुष और आनन्दस्वरूप ब्रह्म। यही कारण है कि अद्वैत वेदान्त “अहं ब्रह्मास्मि” तथा “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्यों के माध्यम से जीव और ब्रह्म की अभिन्नता का प्रतिपादन करता है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार अनेकता का अनुभव अविद्या का परिणाम है। शरीर, मन और अहंकार के साथ तादात्म्य होने पर ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद उत्पन्न होता है। वास्तव में चेतना एक ही है; जैसे एक सूर्य अनेक जलाशयों में प्���तिबिम्बित होकर अनेक प्रतीत होता है, वैसे ही एक आत्मा अनेक जीवों के रूप में दिखाई देती है।
यह मन्त्र केवल दार्शनिक चिन्तन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण नैतिक जीवन का आधार भी है। यदि प्रत्येक जीव में वही परमात्मा स्थित है, तो हिंसा, द्वेष, छल और घृणा का कोई औचित्य नहीं रह जाता। आत्मदृष्टि से ही करुणा, सेवा, मैत्री, क्षमा और विश्वबन्धुत्व का जन्म होता है। दूसरे की सेवा वस्तुतः ईश्वर की सेवा है।
साधना क��� लक्ष्य भी यही अनुभूति है कि वही चेतना मेरे भीतर और सम्पूर्ण विश्व में समान रूप से विद्यमान है। जब यह अनुभव दृढ़ हो जाता है, तब भय, शोक और मोह स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उपनिषद् का वचन है- “द्वितीयाद्वै भयं भवति” जहाँ द्वैत है, वहीं भय है।
आज का संसार विभाजन, संकीर्णता, हिंसा और अहंकार से पीड़ित है। ऐसे समय में यह मन्त्र सम्पूर्ण मानवता को स्मरण कराता है कि समस्त जीवन एक ही परम चेतना की अभिव्यक्ति है। जब प्रत्येक प्राणी में उसी शिवतत्त्व का दर्शन होगा, तभी समरसता, करुणा और शान्ति का वास्तविक उदय होगा।
इस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र अद्वैत वेदान्त का अत्यन्त सशक्त उद्घोष है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार परमात्मा किसी विशेष स्थान या रूप में सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के हृदय में आत्मस्वरूप से स्थित, सम्पूर्ण विश्व में एकरस होकर व्याप्त है। जब साधक इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है कि सर्वत्र वही एक शिवतत्त्व प्रकाशित है, तब उसके लिए सम्पूर्ण जगत् ब्रह्ममय हो जाता है। यही आत्मज्ञान की पूर्णता, अद्वैत की परम अनुभूति और उपनिषदों का अमर सन्देश है।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
याभिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे।
शिवा�� गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ।।६।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र वैदिक रुद्रभावना का उपनिषदात्मक विस्तार है। इसमें साधक भगवान् रुद्र से प्रार्थना करता है कि हे गिरिशन्त ! आपके हाथ में जो बाण है, वह हमारे लिए कल्याणकारी हो जाए और किसी भी प्राणी को पीड़ा न पहुँचाए।
भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ बाण ईश्वर की दण्डशक्ति का प्रतीक है, जो अधर्म, अविद्या और अहंकार के विनाश के लिए है। ईश्वर का दण्ड द्वेष से प्रेरित नहीं होता; वह कर्मफल का निष्पक्ष विधान और अन्ततः जीव के कल्याण का साधन है। इसलिए साधक यह नहीं चाहता कि ईश्वर न्याय छोड़ दें, बल्कि यह प्रार्थना करता है कि प्रभु की कृपा से उसके भीतर ऐसा विवेक जागे कि दण्ड की आवश्यकता ही न रहे।
‘गिरिशन्त’ और ‘गिरित्र’ शब्द परमात्मा के विश्वाधिष्ठाता और विश्वरक्षक स्वरूप को प्रकट करते हैं। अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से यह कोई पृथक् देवता नहीं, बल्कि वही निर्गुण ब्रह्म है, जो उपासना के लिए सगुण रुद्ररूप से प्रकट होता है। इस मन्त्र में ईश्वर का बाण गहरा दार्शनिक प्रतीक है। वह बाह्य हिंसा का नहीं, अपितु अविद्या, अहंकार, ममता और अधर्म के उन्मूलन का संकेत है। जैसे - शल्यचिकित्सक का उपकरण शरीर को काटकर भी जीवन की रक्षा करता है, वैसे ही ईश्वर का बाण जीव के अहंकार को भ��दकर आत्मस्वरूप का प्रकाश करता है।
“शिवां तां कुरु” का अर्थ है - हे प्रभो ! दण्ड भी अनुग्रह बन जाए, दुःख भी अन्तःकरण-शुद्धि का साधन बन जाए और प्रतिकूलता भी आत्मजागरण का द्वार बन जाए। ज्ञानी हर परिस्थिति में ईश्वर की करुणा देखता है।
“मा हिंसीः पुरुषं जगत्” उपनिषद् की सार्वभौम करुणा का उद्घोष है। यहाँ साधक केवल अपनी रक्षा नहीं चाहता, बल्कि सम्पूर्ण जगत् के कल्याण की प्रार्थना करता है। यही भारतीय अध्यात्म की विश्वमंगलमयी दृष्टि है।
अद्वैत वेदान्त के अनुसार वास्तविक विनाश आत्मा का नहीं होता; नष्ट होता है केवल अज्ञान, देहाभिमान, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और अहंकार। अतः यह मन्त्र बाह्य हिंसा से रक्षा की अपेक्षा आन्तरिक अज्ञान के विनाश की प्रार्थना है। आज के जीवन में भी यह मन्त्र अत्यन्त प्रासंगिक है। मनुष्य बाहरी अस्त्रों से अधिक भीतर के क्रोध, लोभ, भय, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार से घा���ल है। इसलिए सच्ची प्रार्थना यही है; हे शिव ! मेरे भीतर की हिंसा को करुणा में, द्वेष को प्रेम में और अज्ञान को आत्मज्ञान में रूपान्तरित कर दीजिए।
अन्ततः ज्ञानी के लिए यह सम्पूर्ण प्रार्थना एक ही सत्य में विलीन हो जाती है - जो रुद्र है, वही शिव है; जो शिव है, वही ब्रह्म है; और वही ब्रह्म प्रत्येक जीव के अन्तरतम आत्मस्वरूप के रूप में स्वयं प्रकाशित है। अतः वास्तविक संरक्षण बाह्य अस्त्रों से नहीं, ��त्मज्ञान से प्राप्त होता है। जब अविद्या का अन्धकार विदीर्ण होता है, तभी ईश्वर का बाण करुणा बन जाता है, दण्ड अनुग्रह बन जाता है, और साधक अनुभव करता है कि “नायमात्मा हन्यते, न हन्ति कञ्चन; स एव शिवः, स एव आत्मा, स एव परं ब्रह्म।” यही इस मन्त्र का परम अद्वैतार्थ, यही उसका दार्शनिक सौन्दर्य और यही उसका सनातन सन्देश है।
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।। "श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ।।४।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का तृतीय अध्याय परमात्मा की अद्वितीय, सर्वव्यापक एवं सर्वाधार सत्ता का प्रतिपादन करता है। पूर्ववर्ती मन्त्र में उपनिषद् ने उद्घोष किया है - “���को हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः”, अर्थात् एकमात्र रुद्र ही समस्त जगत् का परम अधिष्ठाता है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। वर्तमान मन्त्र उसी सत्य को और अधिक स्पष्ट करता है।
भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ “रुद्र” शब्द किसी सीमित देवता का नहीं, अपितु समस्त देवताओं के भी अधिष्ठानभूत परब्रह्म का वाचक है। उपनिषद् कहती है कि जो देवताओं की उत्पत्ति का क���रण है, जो उनके अस्तित्व और शक्ति का आधार है, वही सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है। इससे स्पष्ट होता है कि देवता भी स्वतन्त्र नहीं हैं; उनकी सत्ता भी परम ब्रह्म पर आश्रित है।
मन्त्र में परमात्मा को “विश्वाधिपः” कहा गया है। भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार इसका अर्थ यह नहीं कि वह किसी राजा की भाँति बाहर से शासन करता है, बल्कि सम्पूर्ण जगत् उसकी सत्ता पर आश्रित है। जैसे स्वप्न के सभी दृश्य स्वप्नद्रष्टा के चित्त पर आधारित होते हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म पर आश्रित है।
“रुद्र” शब्द का एक गूढ़ अर्थ है - “रुदं द्रावयति इति रुद्रः”, अर्थात् जो दुःख का नाश करता है - वही रुद्र है। अतः यहाँ रुद्र वह परम तत्त्व है, जो अविद्या, शोक और संसार-बन्धन का विनाश करता है। उसके ज्ञान से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है।
म���्त्र में परमात्मा को “महर्षिः” भी कहा गया है। भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य इसके द्वारा उसकी सर्वज्ञता का प्रतिपादन करते हैं। वह समस्त भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञाता है तथा प्रत्येक जीव के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
इसके पश्चात् उपनिषद् कहती है - “हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वम्”। हिरण्यगर्भ सृष्टि की प्रथम प्रकट चेतना तथा समष्टि सूक्ष्म सत्ता का नाम है। किन्तु उपनिष��् स्पष्ट करती है कि हिरण्यगर्भ भी परम कारण नहीं है; उसका भी कारण वही परब्रह्म है। इस प्रकार यह मन्त्र ब्रह्म को हिरण्यगर्भ से भी परे और समस्त सृष्टि का आदिकारण सिद्ध करता है।
मन्त्र का अन्त अत्यन्त मार्मिक प्रार्थना से होता है - “स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु”, अर्थात् वह परमात्मा हमें शुभ बुद्धि से युक्त करे। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ शुभ बुद्धि का अर्थ केवल नैतिक सद्बुद्धि नहीं, बल्कि वह विवेकयुक्त बुद्धि है, जो नित्य और अनित्य, आत्मा और अनात्मा का भेद कर सके तथा साधक को ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर करे। यही बुद्धि मोक्ष का द्वार है।
अतः यह मन्त्र शाङ्करवेदान्त के अनुसार इस सत्य का उद्घोष करता है कि परमात्मा ही देवताओं का कारण, विश्व का अधिपति, हिरण्यगर्भ का भी उत्पादक तथा समस्त ज्ञान का स्रोत है। वही दुःख का नाश करने वाला रुद्र है और वही साधक को शुभ बुद्धि प्रदान कर आत्मज्ञान एवं मोक्ष के पथ पर अग्रसर करता है।
यही इस मन्त्र का सार है - परमात्मा ही समस्त कारणों का कारण, समस्त शक्तियों का आधार और समस्त अस्तित्व का परम अधिष्ठान है; वही हमें शुभ बुद्धि प्रदान कर सत्य और मोक्ष की ओर ले जाए।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो
विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
सं बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रै-
र्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ।।३।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह महामन्त्र परमात्मा की सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और अद्वितीय सत्ता का दिव्य उद्घोष है। उपनिषद् यहाँ उस एक परमदेव का ��िरूपण करती है, जो समस्त जगत् में व्याप्त होकर भी जगत् से परे है; जो सबका आधार है, सबमें अन्तर्यामी रूप से स्थित है, और सम्पूर्ण सृष्टि को धारण, संचालित तथा प्रकाशित करता है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार इस मन्त्र में वर्णित सर्वत्र नेत्र, मुख, भुजाएँ और चरण किसी स्थूल देहधारी ईश्वर के अंग नहीं हैं। परमात्मा निराकार, निरवयव, अखण्ड और चैतन्यस्वरूप है। अतः ये सब उपाधियाँ ��्रतीकात्मक हैं। इनका तात्पर्य यह है कि संसार में जहाँ कहीं भी ज्ञान, वाणी, कर्म और गति है, वहाँ उसी एक ब्रह्म की चेतना शक्ति कार्य कर रही है।
‘विश्वतश्चक्षुः’ का अर्थ है - समस्त नेत्रों में देखने वाली मूल चेतना वही है। नेत्र स्वयं नहीं देखते; वे आत्मचैतन्य से प्रकाशित होकर देखने में समर्थ होते हैं। इसी भाव को केनोपनिषद् “चक्षुषश्चक्षुः” कहकर प्रकट करती है।
‘विश्वतोमुखः’ का अभिप्राय है - ���मस्त वाणियों, मन्त्रों, प्रार्थनाओं, उपदेशों और अभिव्यक्तियों का मूलाधार वही परमात्मा है। वह स्वयं वाणी से परे है, फिर भी वाणी की शक्ति उसी से उत्पन्न होती है।
‘विश्वतोबाहुः’ समस्त कर्मशक्ति का प्रतीक है। जीव जो कुछ करता है, उसकी क्रियाशीलता का अन्तिम आधार वही परम ब्रह्म है। शरीर, इन्द्रियाँ और मन उसी चेतन सत्ता की उपस्थिति से कार्य करने में समर्थ होते हैं।
‘विश्वतस्पात्’ सम्पूर्ण गत��शील जगत् के नियन्ता का बोध कराता है। पृथ्वी की गति, नदियों का प्रवाह, वायु का स्पन्दन, समय की धारा और प्राणियों की चेष्टा - सब उसी अचल ब्रह्म की सत्ता पर आश्रित हैं। वह स्वयं नित्य और अपरिवर्तनशील है, परन्तु उसी के आधार पर सम्पूर्ण परिवर्तनशील जगत् चलता है।
मन्त्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद है - “देव एकः”। यही अद्वैत वेदान्त का हृदय है। अनेक नाम-रूपों के पीछे सत्ता एक ही है। भेद केवल दृष्टि क��� है; सत्य एक अद्वितीय ब्रह्म है। जब अविद्या का आवरण हटता है, तब ज्ञानी सर्वत्र उसी एक परमात्मा का दर्शन करता है।
यह मन्त्र साधक को समदृष्टि, करुणा, अहंकार-शून्यता और आत्मैक्य की ओर ले जाता है। जब यह बोध जागृत होता है कि प्रत्येक प्राणी में वही परमात्मा स्थित है, तब द्वेष मिटता है, प्रेम प्रकट होता है और जीवन साधना बन जाता है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र परमात्मा की सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता तथा अद्वितीय सत्ता का अनुपम घोष है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ वर्णित सर्वत्र नेत्र, मुख, भुजा और चरण किसी स्थूल ईश्वर के अंग नहीं, बल्कि उस अखण्ड ब्रह्म की सर्वव्यापी चेतना के प्रतीक हैं, जो समस्त जगत् में अन्तर्यामी रूप से विराजमान है। यह मन्त्र साधक को बाह्य विविधता के पार जाकर उस एक परम सत्य का साक्षात्कार करने की प्रेरणा देता है। जब ज्ञा���ी यह अनुभव करता है कि देखने वाला, बोलने वाला, कर्म करने वाला और गति देने वाला एक ही परमात्मा है, तब समस्त भेद मिट जाते हैं और उपनिषद् का महान् उद्घोष उसके अन्तःकरण में प्रतिध्वनित होने लगता है - “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।” एक ही परम देव समस्त प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से विराजमान है। यही इस मन्त्र का सार है, यही शाङ्करवेदान्त का निष्कर्ष है, और यही आत्मसाक्षात्कार की परम उपलब्धि है।
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।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः
य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सञ्चुकोचान्तकाले
संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः।।२।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृ���ीयोऽध्यायः)
उपनिषद्-साहित्य का समग्र प्रयोजन मनुष्य को बाह्य जगत् की बहुलता से उठाकर उस परम अद्वितीय सत्य के साक्षात्कार तक पहुँचाना है, जो समस्त अस्तित्व का मूलाधार है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उसी परम तत्त्व का महिमामय उद्घोष है। यहाँ ‘रुद्र’ शब्द किसी सीमित देवता का द्योतक नहीं, अपितु उस परम ब्रह्म का वाचक है, जो समस्त विश्व का कारण, अधिष्ठान, नियन्ता तथा अन्तःस्थित आत्मस्वरूप है।
भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि यहाँ रुद्र का अर्थ सर्वव्यापक परमात्मा है। ‘रुद्र’ वह है जो अज्ञान, दुःख, शोक और संसारबन्धन का निवारण करता है। जो जीवों के रुदन का अन्त करता है, वही रुद्र है। अतः यहाँ रुद्र कोई सीमित सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म का द्योतक है।
मन्त्र का प्रथम वाक्य- "एको हि रुद्रः” सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त का सार है। उपनिषद् यहाँ उद्घोष करता है कि सत्य केवल एक है। उसके अतिरिक्त दूसरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यह वही उद्घोष है जो छान्दोग्योपनिषद् में “एकमेवाद्वितीयम्” के रूप में प्रकट हुआ है और बृहदारण्यकोपनिषद् में “नेह नानास्ति किञ्चन” के रूप में।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार बहुलता केवल व्यवहारिक स्तर पर प्रतीत होती है; परमार्थतः एक ही चैतन्य सर्वत्र व्याप्त है। जिस प्रकार अनेक तरंगें समुद्��� से पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म से पृथक् नहीं है। जीव, जगत् और ईश्वर का भेद अज्ञानजन्य है; ज्ञान की दृष्टि से सर्वत्र एक ही सत्य विद्यमान है।
मन्त्र का अगला पद “न द्वितीयाय तस्थुः” अत्यन्त गहन दार्शनिक अर्थ रखता है। इसका आशय है कि उस परम सत्ता के समकक्ष, उसके समान या उसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं ठहर सकती। द्वैत का सम्पूर्ण आधार अविद्या है। जब तक मनुष्य न���म-रूपों में उलझा रहता है, तब तक उसे अनेकता दिखाई देती है; किन्तु जब ज्ञान का प्रकाश उदित होता है, तब वह अनुभव करता है कि सम्पूर्ण अस्तित्व एक अखण्ड चैतन्य की अभिव्यक्ति है।
यहाँ उपनिषद् किसी सम्प्रदायगत एकेश्वरवाद का प्रतिपादन नहीं कर रहा, बल्कि अद्वैत की परम दार्शनिक अनुभूति का उद्घाटन कर रहा है। यह एकत्व केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार का विषय है।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है- “य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः”। अर्थात् वही एक परमात्मा अपनी विविध शासनशक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों का नियमन करता है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, दिशा, काल, कर्म और प्रकृति - सभी उसी परम सत्ता के अधीन कार्य करते हैं।
ब्रह्माण्ड में जो आश्चर्यजनक अनुशासन दिखाई देता है, वह किसी अन्धे संयोग का परिणाम नहीं है। ग्रहों की गति, ऋतुओं का क्रम, जन्म और मृत्यु क�� विधान, कर्मफल का अचूक नियम तथा प्रकृति की समस्त शक्तियाँ उस एक परम चेतना के शासन में कार्यरत हैं। यही कारण है कि उपनिषद् उसे ‘ईश्वर’ और ‘अन्तर्यामी’ कहकर सम्बोधित करते हैं।
मन्त्र का अगला भाग “प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति” विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ उपनिषद् यह उद्घोष करता है कि वह परमात्मा केवल विश्व का बाह्य नियन्ता नहीं है, अपितु प्रत्येक प्राणी के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अद्वैत में ईश्वर कोई दूरस्थ सत्ता नहीं है। वह प्रत्येक जीव के अन्तःकरण का प्रकाश है। वही देखने वाले की दृष्टि है, सुनने वाले की श्रुति है, विचार करने वाले की बुद्धि है और अनुभव करने वाले की चेतना है। कठोपनिषद् का वचन स्मरणीय है-
“एषः सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते।”
अर्थात्, यह आत्मा सभी प्राणियों में गुप्तरूप से स्थित है। यही कारण है कि आत्मज्ञान का मार���ग बाहर नहीं, भीतर की ओर जाता है। परमात्मा की प्राप्ति किसी स्थान-विशेष में नहीं, अपितु अपने आत्मस्वरूप में होती है।
मन्त्र आगे कहता है- “सञ्चुकोच अन्तकाले”। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार प्रलयकाल में वही परमात्मा सम्पूर्ण नाम-रूपात्मक जगत् को अपने भीतर समेट लेता है। जिस प्रकार मकड़ी अपने द्वारा निर्मित जाल को पुनः अपने भीतर समेट लेती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व अन्ततः उसी परम ब्रह्�� में लीन हो जाता है।
यहाँ प्रलय का अर्थ केवल ब्रह्माण्डीय विनाश नहीं है। यह उस सत्य का भी संकेत है कि सम्पूर्ण नाम-रूप अनित्य हैं। जो कुछ उत्पन्न हुआ है, वह परिवर्तनशील है और जो परिवर्तनशील है वह अन्ततः अपने कारण में विलीन हो जाता है। केवल ब्रह्म ही नित्य है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
“य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ।।१।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषदों का समस्त ईश्वरीय साहित्य मानव-चेतना की उस महायात्रा का इतिहास है, जिसमें साधक दृश्य से अदृश्य की ओर, परिवर्तनशील से नित्य की ओर और बहुलता से अद्वैत की ओर अग्रसर होता है। उ���निषद् का यह मन्त्र उसी दिव्य यात्रा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सोपान है। यहाँ ऋषि उस परम सत्य का उद्घाटन करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् की विविधता के भीतर एकमात्र अविच्छिन्न सत्ता के रूप में विराजमान है।
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र को केवल ईश्वर की स्तुति के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मविद्या के गहनतम रहस्य के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार यह मन्त्र सम्पूर्ण वेदा���्त का सार प्रस्तुत करता है कि सत्य एक है, वही ब्रह्म है, वही ईश्वर है, वही आत्मा है और वही सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठान है।
मन्त्र का प्रथम शब्द “एकः” सम्पूर्ण उपनिषद् के हृदय की धड़कन है। यह ‘एक’ संख्या का बोधक नहीं, अपितु अद्वितीय सत्ता का संकेतक है। यह वह एकत्व है, जिसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यही कारण है कि उपनिषद् उद्घोष करते हैं- “नेह नानास्ति किञ्चन”। जहाँ ज्ञान का ���्रकाश है, वहाँ द्वैत का अस्तित्व नहीं रहता। भिन्नता केवल नाम और रूप की है; तत्त्वतः सम्पूर्ण अस्तित्व एक ही चैतन्य की अभिव्यक्ति है।
मन्त्र में परमात्मा को “जालवान्” कहा गया है। भगवान आदि शंकराचार्य इस शब्द की व्याख्या मायाशक्ति से सम्पन्न ईश्वर के रूप में करते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व एक विराट् रहस्य है। इसकी अनन्त विविधताएँ, असंख्य जीव, असंख्य लोक, काल का अखण्ड प्रवाह, जन्म और मृत्यु का ���क्र ये सभी उसी परम सत्ता की मायाशक्ति के विलक्षण प्रपञ्च हैं। किन्तु यह माया परम सत्य नहीं है; वह ब्रह्माश्रिता है। वह स्वयं प्रकाशित नहीं, अपितु ब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित है। जैसे स्वप्न स्वप्नद्रष्टा पर आश्रित होता है, वैसे ही यह जगत् ब्रह्म पर आश्रित है।
भगवत्पादाचार्य के अनुसार ईश्वर केवल सृष्टिकर्ता ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व का अन्तर्यामी नियन्ता भी है। मन्त्र में “ईशनीभिः��� शब्द इसी शासनशक्ति की ओर संकेत करता है। सूर्य का नियत पथ पर चलना, ऋतुओं का परिवर्तन, ग्रहों का संतुलन, कर्मफल का अचूक विधान और जीवन के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान व्यवस्था ये सब किसी अन्धे संयोग का परिणाम नहीं हैं। इनके पीछे एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी चेतना कार्यरत है। वही विश्व का अन्तःस्थ नियन्ता है, जिसे उपनिषद् “अन्तर्यामि” कहते हैं।
मन्त्र आगे कहता है- “य एवैक उद्भवे सम्भ���े च।” अर्थात् वही एक परमात्मा सृष्टि के उद्भव में भी है और उसकी स्थिति में भी। वेदान्त के अनुसार कारण और कार्य वस्तुतः अभिन्न हैं। जिस प्रकार मिट्टी से बने असंख्य पात्र अन्ततः मिट्टी ही हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म का ही नाम-रूपात्मक विस्तार है। सृष्टि ब्रह्म से पृथक् कोई सत्ता नहीं है। ब्रह्म ही कारणरूप में सत्य है और जगत् उसी का कार्यरूप प्रतीत होने वाला नाम-रूपात्मक प्रपञ्च है।
यहीं से भगवान आदि शंकराचार्य का अद्वैत अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँचता है। यदि सम्पूर्ण जगत् का आधार एक ही ब्रह्म है, तो जीव भी उसी ब्रह्म से भिन्न नहीं हो सकता। जीव की पृथकता केवल अज्ञानजन्य है। जब मनुष्य स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि तक सीमित मानता है, तब वह संसार, दुःख और मृत्यु के बन्धन में पड़ जाता है। किन्तु जब आत्मज्ञान के द्वारा उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है, तब वह जान लेता ��ै कि वह सीमित जीव नहीं, अपितु वही अनन्त चैतन्य है जो समस्त विश्व में व्याप्त है।
इसीलिए मन्त्र का उपसंहार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है- “य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।” जो इस सत्य को जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। यहाँ अमृतत्व का अर्थ किसी स्वर्गलोक की प्राप्ति नहीं है और न ही शरीर की अनन्त आयु। अमृतत्व का वास्तविक अर्थ है- अविद्या का पूर्ण क्षय और आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा। जब ज्ञानी यह अनुभ�� कर लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप जन्म और मृत्यु से परे है, तब उसके लिए मृत्यु का भय सदा-सर्वदा समाप्त हो जाता है।
यही कारण है कि उपनिषदों की समस्त साधना का लक्ष्य बाह्य जगत् की उपलब्धियाँ नहीं, अपितु आत्मस्वरूप की अनुभूति है। मनुष्य का परम पुरुषार्थ न धन है, न यश, न भोग और न स्वर्ग; उसका परम पुरुषार्थ उस एकमेवाद्वितीय सत्य का साक्षात्कार है जो समस्त लोकों का आधार, समस्त शक्तियों का स्रोत और समस्त अस्तित्व का अन्तिम तत्त्व है।
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