لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ
یا اللہ ۔۔۔ یہ سعادت ہر مسلمان کے نصیب میں کر دے آمین۔
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> *حضرت بلال حبشی سید نہیں تھے🌸*
*کالے تھے سفید نہیں تھے🌻*
*غریب تھے امیر نہیں تھے🌼*
*غلام تھے آزاد نہیں تھے🌷*
*لیکن ان کے تقویٰ کا یہ عالم تھا آپ مکہ کی سر زمین پر چلتے جبکہ قدموں کی آہٹ جنت میں سنائی دیتی تھی ۔۔۔۔۔۔۔)*
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लेबनान और शाम के कुछ इलाक़ों में लोगों ने गाड़ियों पर लगे लाउडस्पीकरों के ज़रिये रमज़ान मुबारक की एक ख़ास पैग़ामात प्रसारित कीं, जिसमें शहीद कमांडर हुदैफ़ा समीर अब्दुल्लाह अल-कहलूत रह० “अबू उबैदा” की और से अरब और इस्लामी उम्मत को मुबारकबाद पेश की गई।
इस पैग़ाम में नक़ाबपोश शख़्स ने अपने लहू की क़ुर्बानी को उम्मत के नाम सलाम के तौर पर पेश किया और रमज़ान के मुक़द्दस महीने की आमद पर दुआ, सब्र और इस्तिक़ामत का पैग़ाम दिया।
यह मंज़र बहुतों के लिए सिर्फ़ एक ऐलान नहीं था, बल्कि एक जज़्बाती इज़हार था, जिसमें याद, एहतराम और रमज़ान की रूहानी फ़िज़ा आपस में घुल-मिल गई, पैग़ाम सूनने के बाद हर कोई गमज़दा हों गया।
इसी सिलसिले में शहीद अबू उबैदा रह० की जद्दोजहद भी याद आई, जिनकी ज़िंदगी सब्र, यक़ीन और क़ुर्बानी की ज़िंदा मिसाल थी, उनका नाम आज भी उन लोगों के दिलों में ज़िंदा है जो मानते हैं कि शहादत कोई मौत नहीं, बल्कि जन्नत की तरफ़ जाने वाला दरवाज़ा है।
यह पैग़ाम दरअसल इसी यक़ीन की तजदीद था, कि जो लोग हक़ के रास्ते में अपनी जान पेश करते हैं, वे मिटते नहीं, बल्कि यादों, दुआओं और यक़ीन की शक्ल में ज़िंदा रहते हैं, और याद्दाश्त के तौर पर रमज़ान जैसे मुक़द्दस महीने में उन शहीद जाँबाजों की क़ुर्बानी और भी ज़्यादा मायने रखती है। #AbuObaida #FreePalestine
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"अमेरिका को पैगंबर मुहम्मद (PBUH) से सीख लेनी चाहिए"
मामदानी ने Prophet Muhammad (PBUH) के हिज्र की कहानी सुनाई और उनके नक्शे–कदम पर चलने की सलाह दी!