हवा से भरा गुब्बारा हवा मे उड़ने लगता है
पर भीतर की हवा खुद को गुब्बारा समझने लगती है
बिल्कुल वैसे ही हम खुद को मनुष्य समझ रहें हैं। जबकि भीतर बाहर सब परमात्मा ही परमात्मा हैं।
शिकारी था वो मुहब्बत का फरिश्ता जो दिख रहा था,
भोलेपन का जाल बड़ी सतर्कता से बिछा रहा था।
बड़ी शराफत से मुहब्बत की कीमत छुपा रहा था,
लुट चुके तो समझे वो नकाब बदल बदल के ठग रहा था।।
प्रेम महामृत्यु है क्योंकि मिट जाना होताहै तभी प्रेम उगताहै
जब संपूर्ण अस्तित्व प्रेमी में खो जाए तब प्रेम उदय होताहै
इस से कम सब दिखावा है प्रेम नहीं।
बारिश की बूंद समंदर में गिरी और समंदर हो गई।कहीं से नदिया कोई लहरा के गिरी वो भी समंदर हो गई। सागर सोचता रहा🤔 कि मैं कहां ?
ये बूंद समंदर है या नदिया?
मुझे खुद का नहीं पता ये मुझ में आके कौन मैं हो रहा है।