भगवान शिव की एक और नगरी है माहिष्मति (महेश्वर)...
महेश्वर मध्य प्रदेश के खरगौन ज़िले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर तथा प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह नर्मदा नदी के किनारे पर बसा है। प्राचीन समय में यह शहर होल्कर राज्य की राजधानी था। महेश्वर धार्मिक महत्त्व का शहर है तथा वर्ष भर लोग यहाँ घूमने आते रहते हैं। यह शहर अपनी 'महेश्वरी साड़ियों' के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध रहा है। महेश्वर को 'महिष्मति' नाम से भी जाना जाता है। महेश्वर का हिन्दू धार्मिक ग्रंथों 'रामायण' तथा 'महाभारत' में भी उल्लेख मिलता है। देवी अहिल्याबाई होल्कर के कालखंड में बनाये गए यहाँ के घाट बहुत सुन्दर हैं और इनका प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देता है। महेश्वर इंदौर से सबसे नजदीक है।
महेश्वर शहर मध्य प्रदेश के खरगौन ज़िले में स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 3 (आगरा मुंबई राजमार्ग) से पूर्व में 13 किलोमीटर अन्दर की ओर बसा हुआ है तथा मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर से 91 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह नगर नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। शहर आज़ादी से पहले होल्कर वंश के मराठा शासकों के इंदौर राज्य की राजधानी था। इस शहर का नाम 'महेश्वर' भगवान शिव के ही एक अन्य नाम 'महेश' के आधार पर पड़ा है। अतः महेश्वर का शाब्दिक अर्थ है, "भगवान शिव का घर"।
इतिहास...
महेश्वर प्रसिद्ध नगरों में से एक रहा है। निमाड़ एवं महेश्वर का इतिहास लगभग 4500 वर्ष पुराना है। रामायण काल में महेश्वर को 'माहिष्मती' के नाम से जाना जाता था। उस समय 'महिष्मति' हैहय वंश के बलशाली शासक सहस्रार्जुन की राजधानी हुआ करता था, जिसने बलशाली लंका के राजा रावण को भी परास्त किया था। महाभारत काल में यह शहर अनूप जनपद की राजधानी बनाया गया था। सहस्रार्जुन द्वारा ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण उनके पुत्र भगवान परशुराम ने सहस्त्रार्जुन का वध किया था। कालांतर में यह शहर होल्कर वंश की महान् महारानी देवी अहिल्याबाई की राजधानी रहा।
प्राचीन नाम 'माहिष्मति'...
महेश्वर को प्राचीन समय में 'माहिष्मति' कहा जाता था। तब माहिष्मति चेदि जनपद की राजधानी हुआ करती थी, जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित थी। महाभारत के समय यहाँ राजा नील का राज्य था, जिसे सहदेव ने युद्ध में परास्त किया था।
'ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ। तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभ:।'
राजा नील महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बौद्ध साहित्य में माहिष्मति को दक्षिण अवंति जनपद का मुख्य नगर बताया गया है। बुद्ध काल में यह नगरी समृद्धिशाली थी तथा व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्यात थी। तत्पश्चात् उज्जयिनी की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ साथ इस नगरी का गौरव कम होता गया। फिर भी गुप्त काल में 5वीं शती तक माहिष्मति का बराबर उल्लेख मिलता है। कालिदास ने 'रघुवंश' में इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में नर्मदा तट पर स्थित माहिष्मति का वर्णन किया है और यहाँ के राजा का नाम 'प्रतीप' बताया है:
'अस्यांकलक्ष्मीभवदीर्घबाहो माहिष्मतीवप्रनितंबकांचीम् प्रासाद-जालैर्जलवेणि रम्यां रेवा यदि प्रेक्षितुमस्तिकाम:।'
चोली महेश्वर...
महेश्वर को 'चोली महेश्वर' भी कहा जाता है, प्राचीन स्थल माहेश्वरी पर स्थित यह स्थान हैहय राजा अर्जुन कर्तवीर्य (लगभग 200 ई.पू.) की राजधानी था, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत और कुछ पुराणों में भी मिलता है। महेश्वर भारत के उन कुछ विशिष्ट नगरों में से है, जिनका ईस्वी सन् के आरंभ से आधुनिक काल तक का सुप्रमाणित इतिहास उपलब्ध है, विशेषज्ञों द्वारा की गई खुदाई से विभिन्न संस्कृतियों का पता चला है, जो आरंभिक पाषाण युग से 18वीं शताब्दी तक के हैं। आरंभिक और मध्य पाषाण युग के लगभग 400 पुरापाषाण युग के औज़ार यहां पाए गए हैं। खुदाई के आधार पर इसे महाकाव्यों में वर्णित माहिष्मती नामक स्थान के रूप में पहचाना गया है। नर्मदा नदी से क़िले, मंदिरों और अहिल्याबाई के महल तक जाते हुए सीढ़ीदार घाट हैं।
अहिल्याबाई ने 1767 में महेश्वर को अपनी राजधानी के रूप में चुना था। 16वीं शताब्दी की एक मस्जिद भी ऐतिहासिक महत्त्व की है। नर्मदा नदी के दूसरे तट पर नवदाटोली का प्राचीन स्थल है, जहां खुदाई में मिट्टी के रंगीन बर्तन और अन्य कलाशिल्प प्राप्त हुए हैं। यह शहर कृषि विपणन केंद्र है, जो व्यापार और खुदरा बाज़ार के लिए महत्त्वपूर्ण है। यहां की हथकरघा साड़ियां और पीतल से बने घर में काम आने वाले बर्तन भी प्रसिद्ध हैं।
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वो माँ की मीठी लोरियाँ वो दादी की अबूझ कहानियाँ
वो सर्द रातों की गर्मियाँ वो सुबह की अलसायी मस्तियाँ
वो अनगिनत शरारतें वो कबड्डी वो कितकित का खेल
वो मिट्टी के खिलौने वो त्योहारों के उमंग दिवाली का घरौंदा
वो माँ के हाथ की खीर पूरियां एक बार मुझे लौटा दो कोई मेरा बचपन लौटा दो 🌺
झूठों के गॉव में ,
एक सच्चा आ गया ,
सब हैरानी से पूछने लगे
ये कौन आया ये कौन आया !
न जाने यह क्या बोलता है ?
कमबख़्त ! को झूठ बोलना नहीं आता ,
इसे कोई झूठ बोलना सिखा दो ।
नहीं तो यह मर जाएगा |
इसे जीना सिखा दो ।
सभ्य समाज का ये दुर्भाग्य है कि उसमें रहने वाला इंसान हमेशा एक दवाब में जीता है की लोग क्या कहेंगे।
प्रेम विहीन शादियां समाज में एक आदर्श स्थापित करती है, जबकि प्रेमविवाह आज भी शक की नजरों से देखा जाता है।
हालांकि शादियां दोनों ही कामयाब, नाकामयाब होती है।
#बज्म#काव्योदय
मेरे हमसफ़र,
क्या तुझे मालूम है?
मेरा दर्द मेरा इंतज़ार
मेरा खालीपन
जो अब भरता ही नहीं है।
मेरा खाली वक्त
अब अक्सर मुझसे
कई सवाल करता है?
मेरे खामोश लफ्ज़
मेरा मुँह ताकते है।
मेरे शब्द भी अब अक्सर
कैसेले से हो जाते है
मेरी आँख का दाना
अब यूं पिघलता है,
जैसे कोई ग्लेशियर।
#नील