11 वी सदी में जातिवाद आ चुका था इसके बारे अलबरूनी ने अपना आँखो देखा डिटेल्स में लिखा।
अलबरूनी की नज़र में भारतीय जाति-व्यवस्था: जन्म, वर्ण और बहिष्कार
अलबरूनी के वर्णन से स्पष्ट होता है कि भारतीय जाति-व्यवस्था केवल सामाजिक बँटवारा नहीं थी, बल्कि उसे धार्मिक कल्पनाओं के सहारे वैधता दी गई थी। शरीर के अलग-अलग अंगों से अलग-अलग वर्णों की उत्पत्ति बताकर समाज में ऊँच-नीच को प्राकृतिक और ईश्वरीय व्यवस्था की तरह प्रस्तुत किया गया।
इस व्यवस्था में ब्राह्मणों को ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न माना गया, इसलिए उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया गया। क्षत्रियों को कंधों और हाथों से उत्पन्न बताया गया, इसलिए उन्हें शक्ति और शासन से जोड़ा गया। वैश्यों को जाँघों से उत्पन्न माना गया और उन्हें व्यापार, कृषि तथा उत्पादन से संबंधित किया गया। शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताकर सेवा-कार्य तक सीमित रखा गया। यानी मनुष्य का स्थान उसकी योग्यता या कर्म से नहीं, बल्कि जन्म से तय कर दिया गया।
अलबरूनी बताते हैं कि पहले दो वर्णों में बहुत बड़ा सामाजिक अंतर नहीं दिखता था। वे एक ही नगर और गाँव में रहते थे। लेकिन शूद्रों और उनसे नीचे माने गए समूहों की स्थिति अलग थी। शूद्रों के बाद कई ऐसी जातियाँ थीं जिन्हें चार वर्णों में स्थान ही नहीं दिया गया। इनमें धोबी, मोची, जुलाहे, मदारी, टोकरी बनाने वाले, ढाल बनाने वाले, मछली पकड़ने वाले और शिकार करने वाले जैसे श्रमजीवी समुदाय शामिल थे।
यहाँ जाति-व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। जिन लोगों के श्रम से समाज चलता था, उन्हें ही सम्मानजनक स्थान नहीं दिया गया। उनके काम समाज के लिए आवश्यक थे, लेकिन उनके साथ बराबरी का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाता था। वे चार वर्णों के गाँवों और नगरों के बाहर रहते थे। इससे पता चलता है कि जाति केवल धार्मिक पहचान नहीं थी, बल्कि निवास, पेशा और सामाजिक संबंधों को भी नियंत्रित करती थी।
अलबरूनी कुछ समुदायों का वर्णन और भी अधिक बहिष्कृत रूप में करते हैं। हाड़ी, चंडाल और बधतौ जैसे समूहों को किसी वर्ण या जाति में भी गिना नहीं जाता था। उनका काम गाँव की सफाई, मृत पशुओं को उठाना और समाज द्वारा अपमानजनक माने गए कार्य करना था। इन्हें अछूत समझा जाता था। लोकमत में इनके बारे में अपमानजनक कहानियाँ गढ़ी गईं, ताकि उनके बहिष्कार को धार्मिक और नैतिक आधार दिया जा सके।
भोजन और छुआछूत के नियमों में भी जातिगत दूरी साफ दिखाई देती है। ब्राह्मण भोजन करते समय अलग मंडली बनाकर बैठते थे। अलग-अलग वर्णों के लोग एक साथ नहीं बैठ सकते थे। यदि दो लोगों के आसन पास भी हों, तो उनके बीच तख्ता, कपड़ा या कोई आड़ रखी जाती थी। एक लकीर खींच देने मात्र से भी वे अपने को अलग मानते थे। भोजन में भी यदि कोई एक थाली से खा ले, तो बचा हुआ भोजन दूसरे के लिए झूठा माना जाता था। यह दिखाता है कि जाति-व्यवस्था शरीर, स्पर्श और भोजन तक को नियंत्रित करती थी।
अलबरूनी का यह वर्णन बताता है कि भारतीय जाति-व्यवस्था केवल चार वर्णों का सिद्धांत नहीं थी। उसके नीचे अनेक जातियाँ, उपजातियाँ और बहिष्कृत समुदाय मौजूद थे। इस व्यवस्था में जन्म के आधार पर ऊँच-नीच तय की गई, श्रम करने वालों को नीचा माना गया और कुछ समूहों को सामान्य मानव समाज से भी बाहर कर दिया गया।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अलबरूनी की किताब भारतीय जाति-व्यवस्था की कठोरता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। यह व्यवस्था केवल पहचान नहीं थी, बल्कि सम्मान, निवास, भोजन, पेशा और मानवीय संबंधों पर नियंत्रण रखने वाली सामाजिक संरचना थी। अलबरूनी का यह विवरण भारतीय समाज में जन्म-आधारित असमानता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य है।
राम मंदिर तो अब लूटा है, लौह पुरुष सरदार पटेल को बेंच कर पहले ही खा गए थे..कथित राष्ट्रभक्त!
3000 करोड़ की बताई गई सरदार साहब की मूर्ति मात्र 324 करोड़ की थी और बाकी कमीशन राष्ट्रवादी पार्टी और गुजरातियों की जेब में चल गया।
बहुत बड़े बड़े चमत्कार कर रखें है इन संघियो ने!
ScienceJourney2
आप सही कह रहे हैं। संलग्न पोस्ट की बड़ी “Proto-Shiva” मूर्ति/सील फर्जी या AI-जनरेटेड है। मूल Pashupati सील मोहनजोदड़ो से मिली एक छोटी steatite सील (~3.5 cm) है, जो नेशनल म्यूजियम दिल्ली में रखी है।
ये बड़ी वाली डिस्प्ले वाली इमेज वायरल फेक वर्जन है। मूल मोटिफ असली है और कुछ विद्वान इसे Proto-Shiva मानते हैं, लेकिन पोस्ट की इमेज misleading है।
“Longest Running Civilization” वाला क्लेम सांस्कृतिक निरंतरता पर आधारित हो सकता है, पर इमेज गलत है।
हिंदू धर्म के आराध्य प्रतीकों का मज़ाक आख़िर कौन बना रहा है?
अपने रोड शो में गाड़ियों के आगे उनका रूप धराकर लोगों को कौन नचवा रहा है?
धर्म की रक्षा का ठेका भी इन्हीं के पास है और धर्म को चुनावी तमाशा बनाने का अधिकार भी! बाक़ी कोई सवाल उठा दे, तो तुरंत धर्म ख़तरे में आ जाता है।
जंतर मंतर पर डरपोक लोग बैठे हुए हैं जो धर्मेंद्र प्रधान मुर्दाबाद का नारा लगा रहे हैं लेकिन नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद बोलते ही घबरा जाते हैं।
और इधर प्रयागराज के छात्र शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की अर्थी निकाल दी!
हालांकि धर्मेंद्र प्रधान अभी अपने प्रधान मोदी के साथ आम चूसने में व्यस्त हैं।
यह बहुत बुरा विनाश है ☠️🔥
अंधभक्त : "जब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी, तो हमारे माता-पिता हमें कॉलेज भेजने से डरते थे"
आलोक शर्मा : "पिछली बार जब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी, तो यह 35 साल पहले की बात है। और आप में से कोई भी उस समय पैदा नहीं हुआ था। इसलिए BJP से सवाल पूछिए" 🤣🤣
एक मिनट में WhatsApp यूनिवर्सिटी का पर्दाफाश 🗿
वाल्मीकि समाज की एक बहन को चंडीगढ़ में कुछ जातिवादियों द्वारा लगातार परेशान किया जा रहा है, जातिसूचक गालियां दीं जा रही हैं। शिकायत दर्ज कराने के बाद भी पुलिस-प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाही आरोपियों के खिलाफ नहीं हुई👇🏻
अब क्या गरीब ब्राह्मण लवकुश मिश्रा राम मंदिर के चोरी के पैसों 1 करोड़ का घर भी नहीं बना सकता है 😁
गरीब ब्राह्मण पर आखिर कब तक 16 हजार रुपये की नॉकरी करता आखिर उसने अपने भविष्य के बारे में सोचा और चोरी किया ..6 महीने की सजा देकर रिहा किया जाये धार्मिक जन
आक्रांता आर्य आए और हमारे ख़ूबसूरत राष्ट्र पर कब्ज़ा करके बैठ गए, जातियां बनाई, मनोहर कहानियां सुनाई, भगवान बनाए और देश की मुलनिवासी भोली जनता को मूर्ख बनाया,
आर्य विदेशी है यह बात तथ्यात्मक रूप से सही भी है 🔥🔥
आप प्रतिनिधि चुनते है जो सरकार चलाए लेकिन जब धर्मनिरपेक्ष देश में एक धर्मविशेष के कर्मकांडी, काल्पनिक कथाकहानी वाचक जो की किसी भी संवैधानिक पद पर न हो फिर भी उसके सामने सदन में प्रतिनिधि झुकता नजर आए आर्शीवाद लेता आये तो क्या डेमोक्रेसी का अपमान है?
या प्रतिनिधि का ग़लत चुनाव हुआ है?