यूं तो दुनिया जीत ले पर अपनों से
हार जाता है तभी तो मर्द है
मर्द की मर्दानगी है बोलना
सर उठाता है तभी तो मर्द है
इश्क़ ने बच्चा बना कर रक्खा था
मात खाता है तभी तो मर्द है
~ नीरज नीर
@neerajthepoet
नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!
हरिवंशराय बच्चन
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
-दुष्यंत कुमार
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में
उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
बहादुर शाह ज़फ़र
वर्ना मर जाएगा बच्चा ही मेरे अन्दर का
तितलियां रोज़ पकड़ना मिरी मजबूरी है
- शकील आज़मी
@PoetShakeelAzmi
ورنہ مر جائے گا بچہ ہی میرے اندر کا
تتلیاں روز پکڑنا مری مجبوری ہے
شکیل اعظمی