@Lovandfear The philosophers who truly understood life are: Dostoevsky, Schopenhauer, Camus, Satre & such kind! True observer would never acknowledge life as a positive phenomenon, it's all dark, suffering, psychological torment, physical bondage & cravings which untimely cause suffering!!
यूं तो महा तुच्छ हूं मैं, विक्षिप्त हूं मैं! जो भी हूं, जो भी कारण हो, सब की वजह मैं ख़ुद हूं, न किसी से शिकवा न ही शिक़ायत है! कोशिश तो बेमिसाल करता हूं सकारात्मक होने की पर शायद नकारात्मकता, अंधेरा, गहनता, उन्मादता, भावविहीनता, विक्षिप्तता और विचित्रता मेरी रगों में घुल गई है!
एक विचित्र स्तर का मनोरोगी हो गया हूं मैं! कोई भला किसी को बिना छुए, बिना बात के, बेवजह के, यहां तक अनजान होते हुए भी कैसे बर्बाद कर सकता है? उसने सिर्फ़ देखा ही तो था मुझे, सारी बर्बादी मेरी अपनी है: ख्याली पुलाव मैंने पकाए, सुबह, शाम, दिन रात, हर लम्हों में मैंने ही तो सोचा उसे
वही तुच्छ कारण या विषय उस ज्ञानी आदमी के बर्बादी का कारण होता है! नहीं, मैं ख़ुद को ज्ञानी की संज्ञा बिल्कुल नहीं देता, बस कुछ लोग जिनको भ्रम है कि मैं ज्ञानी हूं, ख़ैर, वो उनकी नासमझी है! मैं मनोरोगी हूं, मेरी बर्बादी, जिसे मैं बर्बादी की संज्ञा देता हूं उसके कारण हास्यास्पद है!
चंदर ने ठीक नहीं किया सुधा के साथ! सुधा: अगर पुनर्जन्म सच नहीं तो तुमने मुझे जन्मों जन्मांतर के लिए खो दिया है चंदर, मेरी आत्मा अनंतकाल तक तुम्हारी प्यासी रहेगी!
कितनी पवित्रता और श्रद्धा है सुधा के प्रेम में, अगर उसने चंदर को देवता माना है तो ख़ुद भी महादेवी से कम नहीं है।
धर्मवीर भारती जी ने इस उपन्यास की रचना ही इतनी गहनता और भाव विभोरता से की है मैं इसे शुरु से अंत करने के बीच में ज़्यादा रुक ही न सका!
महज़ 23 वर्ष के उम्र में हिंदी साहित्य की नींव कहे जाने वाली उपन्यास लिखना कोई अजूबे से कम नहीं है। इस उपन्यास ने मुझे रह रहकर रुलाया है।
जब से सुधा (उपन्यास की नायिका) की शादी की बात शुरू होती, इस उपन्यास का कायापलट भी वहीं से शुरू होता है और अंत तो मानों कलेजा चीर कर रख देने वाला त्रासदी से होता है!
दूसरी ओर कुछ लोग ज्ञानी तो हो जाते हैं पर उतने साहसी नहीं की ज्ञान बांट सके, उन्हें ज़िंदगी से थोड़ा लगाव रहता है और थोड़ा स्वार्थपन! वो जीना चाहते हैं इसलिए सच नहीं कहते, लोगों की सुनते हैं, अपने फायदे और स्वार्थ के लिए, ऐसे लोगों की ज्ञान की और ख़ुद इनकी कोई महत्व नहीं होती है!
पहला रूपांतरण है: सच को जानना!!
दूसरा रूपांतरण है: सच का प्रसारण!
बहुत ही कम लोग ज्ञानी और मानव हो पाते हैं, वो सोचते हैं सब के बारे में, सच के बारे में, समाज के बारे में, पूरी कायनात के बारे, ज्ञान हासिल करके वो पाखंड, अंधविश्वास, अधर्म, सामाजिक कुरीतियों पर निशाना साधते हैं...
वो फ़िर भी आवाज़ उठाता है, उसको पता होता है कि वो मारा जाएगा पर उसे मौत से बड़ी सच्चाई लगती है, साहस लगती है, आत्मज्ञान लगती है, आत्मसम्मान लगती है। असल में जीत हमेशा झूठ की होती है, पाखंड की होती है, बहुमत की होती है, मूर्ख समाज की होती है, और विशेष व्यक्ति की केवल मौत होती है..