।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ।।८।।
(चतुर्थोऽध्यायः)
वैदिक वाङ्मय का परम प्रयोजन केवल कर्मकाण्ड, शब्द-पाण्डित्य अथवा बौद्धिक तुष्टि नहीं, अपितु मनुष्य को उस परम सत्य तक पहुँचाना है जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और अद्वितीय है। श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह दिव्य मन्त्र उद्घोष करता है कि समस्त ऋचाएँ, समस्त देवशक्तियाँ और सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान जिस अक्षरब्रह्म में प्रतिष्ठित हैं, यदि मनुष्य उसी को नहीं जानता, तो केवल वेदमन्त्रों का अध्ययन उसके लिए क्या कर सकेगा?
भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि वेद का प्रयोजन शब्दों का संग्रह नहीं, अपितु ब्रह्मसाक्षात्कार है। वेद प्रमाण हैं, पर उनका वास्तविक महत्त्व तभी है जब वे साधक को आत्मविद्या की ओर ले जाएँ। यदि वेदाध्ययन आत्मबोध में परिणत न हो, तो वह केवल स्मरणशक्ति का अलंकार बनकर रह जाता है, मोक्ष का साधन नहीं।
मन्त्र का “अक्षरे” शब्द अद्वैत वेदान्त का मूल तत्त्व है। अक्षर वह है जो कभी क्षरित नहीं होता, जो जन्म, परिवर्तन और विनाश से सर्वथा रहित है। यही ब्रह्म समस्त नाम-रूपों का अधिष्ठान है। जगत्, शरीर और मन निरन्तर परिवर्तनशील हैं, किन्तु जो इन सबका साक्षी है, वही अक्षर ब्रह्म नित्य और अविकार है।
इसी प्रकार “परमे व्योमन्” किसी भौतिक आकाश का बोधक नहीं, बल्कि परम चैतन्य का प्रतीक है। शंकराचार्य के अनुसार यही वह अनन्त सत्ता है जिसमें सम्पूर्ण विश्व तथा समस्त अनुभूतियाँ प्रतिष्ठित हैं। यह हृदयगुहा में प्रकाशित आत्मस्वरूप है। जैसे घटाकाश महाकाश से भिन्न नहीं होता, वैसे ही जीवात्मा भी ब्रह्म से पृथक् नहीं है; भिन्नता केवल अविद्या की कल्पना है।
मन्त्र का कथन है - “यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः” यह प्रतिपादित करता है कि समस्त देवशक्तियाँ उसी एक परम ब्रह्म में प्रतिष्ठित हैं। अद्वैत के अनुसार अग्नि, सूर्य, वायु, इन्द्र अथवा अन्य देवता स्वतंत्र परमसत्ताएँ नहीं, बल्कि उसी एक ब्रह्म की विविध शक्तियों की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसलिए समस्त उपासना अन्ततः उसी एक परम सत्य की उपासना है।
इसके पश्चात् उपनिषद् अत्यन्त मार्मिक प्रश्न करता है - “यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति?” यदि मनुष्य उस परम सत्य को ही नहीं जानता, तो ऋचाएँ उसके लिए क्या कर लेंगी? इसका आशय वेदों का निषेध नहीं, बल्कि उनका सर्वोच्च सम्मान है। वेद साधन हैं, साध्य नहीं; दीपक हैं, लक्ष्य नहीं। जो दीपक के प्रकाश में मार्ग ही न चले, उसके लिए दीपक भी निष्फल सिद्ध होता है।
भगवत्पादाचार्य इसी सत्य को सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त का निष्कर्ष बताते हैं कि कर्म चित्तशुद्धि देता है, उपासना मन को एकाग्र करती है, किन्तु अविद्या का पूर्ण नाश केवल ब्रह्मज्ञान से होता है। इसलिए उपनिषदों के महावाक्य - “तत्त्वमसि”, “अहं ब्रह्मास्मि”, “प्रज्ञानं ब्रह्म” तथा “अयमात्मा ब्रह्म” वेद का चरम प्रतिपाद्य हैं।
“य इत्तद्विदुस्त इमे समासते”- जो इस सत्य को जान लेते हैं, वे उसी में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। इसका अर्थ किसी स्थान-विशेष में पहुँचना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में स्थित हो जाना है। ज्ञान के उपरान्त कोई नई वस्तु प्राप्त नहीं होती; केवल अविद्या का आवरण हट जाता है; जैसे - बादलों के हटते ही सूर्य स्वयं प्रकाशित हो उठता है।
आज मनुष्य के पास सूचनाओं का विशाल भण्डार है, किन्तु आत्मबोध का अभाव है। शास्त्रों का अध्ययन बढ़ा है, पर आत्मानुभूति दुर्लभ होती जा रही है। यह मन्त्र स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य ज्ञान एकत्र करना नहीं, अपितु ज्ञानस्वरूप बन जाना है।
अतः यह मन्त्र उद्घोष करता है कि समस्त वेदों का सार, समस्त ऋषियों की तपस्या का फल तथा समस्त साधना का परम लक्ष्य अक्षरब्रह्म की अनुभूति है। वही परमे व्योम है, वही समस्त देवताओं का अधिष्ठान, वही आत्मा और वही ब्रह्म है। उसे जान लेने पर जानने और पाने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता, क्योंकि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों उसी अद्वितीय ब्रह्म में अभिन्न रूप से प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यही भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष तथा उपनिषदों की अमर वाणी का शाश्वत सन्देश है।
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।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यन-
श्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।६।।
(चतुर्थोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उपनिषद्-साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं गहन प्रतीकों में से एक है। यही मन्त्र ऋग्वेद तथा मुण्डकोपनिषद् में भी प्राप्त होता है। भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य ने अपने शांकरभाष्य में इसे जीव, ईश्वर तथा आत्मसाक्षात्कार के रहस्य को उद्घाटित करने वाला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मन्त्र माना है। अद्वैत वेदान्त की सम्पूर्ण साधना का सार इस एक प्रतीक में समाहित है।
उपनिषद् कहता है कि एक ही वृक्ष पर दो सुन्दर पक्षी अभिन्न मित्रों की भाँति निवास करते हैं। उनमें से एक वृक्ष के मधुर फलों का आस्वादन करता है, जबकि दूसरा कुछ भी भोगे बिना केवल साक्षीभाव से सब कुछ देखता रहता है। यह केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव जीवन का आध्यात्मिक रूपक है।
भगवत्पादाचार्य के अनुसार यह वृक्ष संसार है। व्यापक अर्थ में यह शरीर, मन, बुद्धि तथा कर्मों से निर्मित संसार-वृक्ष है, जिसकी जड़ अविद्या है, शाखाएँ कर्म हैं और फल सुख-दुःख, हर्ष-विषाद तथा जन्म-मरण के विविध अनुभव हैं। यही अश्वत्थ-वृक्ष भगवद्गीता में भी वर्णित है।
इस वृक्ष पर स्थित पहला पक्षी जीव है। वह वास्तव में शुद्ध, नित्य और अविनाशी आत्मा ही है, किन्तु अविद्या के कारण स्वयं को शरीर और मन के साथ अभिन्न मान बैठता है। यही तादात्म्य उसे कर्मों का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता बना देता है। वह कभी सुख से प्रसन्न होता है, कभी दुःख से व्यथित; कभी सफलता में गर्व करता है तो कभी असफलता में निराश हो जाता है। उसके समस्त अनुभव कर्मफल के विविध स्वाद मात्र हैं।
उपनिषद् ने इन्हीं अनुभवों को पिप्पल-फल कहा है। यह फल कभी मधुर प्रतीत होता है तो कभी कटु, किन्तु दोनों ही अनित्य हैं। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि संसार के समस्त भोग आत्मा को तृप्त नहीं कर सकते, क्योंकि सीमित वस्तुएँ असीम चेतना की प्यास को कभी नहीं बुझा सकतीं।
दूसरा पक्षी ईश्वर है- परमात्मा, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी और नित्यमुक्त। वह उसी वृक्ष पर स्थित होकर भी किसी कर्मफल का भोक्ता नहीं है। वह केवल साक्षी है। न वह कर्म से स्पर्शित होता है, न सुख-दुःख से विचलित। वह सूर्य के समान सबको प्रकाशित करता है, किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता।
शांकरभाष्य का अत्यन्त सूक्ष्म निष्कर्ष यह है कि जीव और ईश्वर वस्तुतः दो स्वतंत्र परम सत्ताएँ नहीं हैं। यह द्वैत केवल उपाधियों के कारण प्रतीत होता है। जीव अज्ञानोपाधि से सीमित प्रतीत होता है और ईश्वर मायोपाधि से जगत् का अधिष्ठाता। उपाधियों का अतिक्रमण होने पर दोनों में कोई भेद शेष नहीं रहता। वही एक अखण्ड ब्रह्म दोनों का वास्तविक स्वरूप है।
यही अद्वैत वेदान्त का परम सिद्धान्त है। जब तक अज्ञान है, तब तक जीव स्वयं को भोक्ता मानता है; ज्ञान के उदय पर वह जान लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप सदा से शुद्ध साक्षी आत्मा ही था।
इस मन्त्र का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर मानो दो स्तर विद्यमान हैं। एक मन इच्छाओं, स्मृतियों, अपेक्षाओं और अनुभवों में उलझा रहता है; दूसरा भीतर का मौन साक्षी है, जो बिना किसी विकार के सबका अवलोकन करता है। ध्यान, आत्मचिन्तन और विवेक का उद्देश्य इसी साक्षी का बोध कराना है।
जब साधक बार-बार स्वयं को साक्षी के रूप में स्थापित करता है, तब कर्मफल का आकर्षण क्षीण होने लगता है। वह अनुभव करता है कि सुख-दुःख मन की अवस्थाएँ हैं; आत्मा इन सबसे परे है। तब संसार बन्धन न रहकर आत्मबोध का साधन बन जाता है।
भगवत्पादाचार्य के अनुसार मोक्ष कोई नई उपलब्धि नहीं, अपितु अपने वास्तविक स्वरूप का स्मरण है। जैसे बादलों के हटते ही सूर्य स्वयं प्रकट हो जाता है, वैसे ही अविद्या के निवृत्त होते ही आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप प्रकाशित हो उठता है। तब भोक्ता और साक्षी का भेद समाप्त हो जाता है, क्योंकि ज्ञात होता है कि दोनों का आधार वही एक अद्वितीय ब्रह्म है।
अतः यह मन्त्र केवल दो पक्षियों की कथा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का अमर प्रतीक है। एक पक्षी अज्ञानग्रस्त जीव है, दूसरा सर्वज्ञ साक्षी परमात्मा; और आत्मज्ञान का परम क्षण वह है, जब साधक अनुभव करता है कि दोनों कभी वास्तव में पृथक् थे ही नहीं। वही एक शुद्ध, नित्य, मुक्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म सबके भीतर समान रूप से विराजमान है। यही अद्वैत सत्य मानव जीवन का परम पुरुषार्थ, समस्त वेदान्त का चरम निष्कर्ष तथा भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य के शांकरभाष्य का दिव्य सन्देश है।
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Adverse circumstances and the many challenges of life may disturb the mind and create restlessness, yet the inexhaustible source of Truth, Bliss, and Divine Strength resides within our own being. The moment this profound realization dawns, sorrow, fear, and anxiety begin to dissolve. Peace, happiness, and true contentment are not to be sought outside; they are hidden within us. Let us awaken noble thoughts, turn inward, and discover our true, eternal Self.
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दशमहाविद्याओं में माँ भगवती छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यन्त रहस्यमय, उग्र और साथ ही गहन आध्यात्मिक सत्य का उद्घाटक है। वे केवल शक्ति की अभिव्यक्ति ही नहीं, अपितु उस परम तत्त्व का साक्षात् प्रतीक हैं जहाँ साधक अपने अहंकार का पूर्ण विसर्जन कर दिव्य चेतना में प्रतिष्ठित होता है। उनका रूप प्रथम दृष्टि में विस्मयकारी प्रतीत होता है, परन्तु तत्त्वदृष्टि से यह आत्मज्ञान, वैराग्य और जीवन-ऊर्जा के दिव्य रूपान्तरण का महागूढ़ संकेत है।
“श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचन्यै हुं हुं फट् स्वाहा।”
“छिन्नग्रीवां स्वमुण्डं करकमलधृतं रक्तधारात्रिभिर्वा
पायन्तीं स्वां सकामां दिशतु शिरसि मे मातरं छिन्नमस्ताम्।
डाकिनी-वारिणीभ्यां सह रुधिरपानप्रेमयुक्तां प्रसन्नां
ध्यायेद्देवीं महेशीं परमकलितया शक्तिरूपां त्रिनेत्राम्॥”
माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप उस महान् सत्य का उद्घोष करता है कि ‘अहं’ का छेदन ही आत्मबोध का द्वार है। वे स्वयं अपना मस्तक काटकर अपने ही रक्त से अपनी तथा अपनी सहचरिणियों डाकिनी और वारिणी की तृप्ति करती हैं। यह अद्भुत प्रतीक यह सिखाता है कि साधक जब अपने अहंकार, देहाभिमान और स्वार्थ का परित्याग करता है, तभी वह परमात्मा की अनन्त सत्ता में प्रवेश करता है।
उनका नग्न स्वरूप पूर्ण निर्भीकता और सत्य की निस्संकोच अभिव्यक्ति का प्रतीक है, जबकि उनके चरणों के नीचे स्थित काम और रति यह संकेत देते हैं कि जीवन की मूल प्रवृत्तियाँ भी यदि साधित हो जाएँ, तो वे मोक्ष के मार्ग में बाधक नहीं, अपितु साधन बन जाती हैं। इस प्रकार माँ छिन्नमस्ता काम, क्रोध और तृष्णा जैसी वृत्तियों पर विजय की अधिष्ठात्री हैं।
माँ छिन्नमस्ता का यह दिव्य स्वरूप यह भी सिखाता है कि जीवन-ऊर्जा (प्राणशक्ति) का सही उपयोग ही साधना का सार है। जब यह ऊर्जा विषय-भोग में नष्ट न होकर साधना में रूपान्तरित होती है, तब वही शक्ति आत्मबोध का माध्यम बन जाती है। अतः वे केवल उग्रता की देवी नहीं, अपितु उच्चतम आध्यात्मिक जागरण की प्रेरणास्रोत हैं।
तत्त्वतः माँ छिन्नमस्ता ‘त्याग में पूर्णता’ और ‘विनाश में सृजन’ की दिव्य अनुभूति हैं। वे सिखाती हैं कि जो अपने ‘अहं’ का त्याग कर देता है, वही सच्चे अर्थों में अमृतत्व को प्राप्त होता है। उनका स्मरण साधक के भीतर अदम्य साहस, आत्मसंयम, विवेक और दिव्य जागरण का संचार करता है।
अतः माँ भगवती छिन्नमस्ता की उपासना केवल बाह्य उपासना ही नहीं, अपितु गहन आन्तरिक साधना का मार्ग है -जहाँ साधक स्वयं को अर्पित कर, अपने ही अंतस् स्थित परम सत्य का साक्षात्कार करता है।
जय माँ भगवती छिन्नमस्ता।
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आज उत्तर प्रदेश के डासना गाज़ियाबाद कारागार का परिसर एक प्रेरणाप्रद, ऐतिहासिक एवं मानवतावादी क्षण का साक्षी बना, जब “नवग्रह वाटिका” तथा “गाँधी गैलरी” पुस्तकालय का शुभारम्भ श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ, अनन्तश्रीविभूषित, जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के पावन कर-कमलों से सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल किसी परियोजना का औपचारिक उद्घाटन नहीं, अपितु सुधार, संस्कार, आत्मजागरण और पुनर्निर्माण की दिशा में एक अत्यन्त सार्थक एवं संवेदनशील पहल के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
इस पावन अवसर पर अपने प्रेरक उद्बोधन में पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि कारागार मात्र दण्ड का स्थान नहीं, बल्कि आत्ममंथन, आत्मशुद्धि और आत्मपरिवर्तन का केन्द्र भी बन सकता है। मनुष्य परिस्थितियों से बड़ा है; यदि उसे ज्ञान का प्रकाश, सत्संगति का स्पर्श और आध्यात्मिक दृष्टि का आलोक प्राप्त हो जाए, तो उसके भीतर सुप्त पड़ी श्रेष्ठ संभावनाएँ पुनः जागृत हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि “नवग्रह वाटिका” प्रकृति, पर्यावरण और ब्रह्माण्डीय संतुलन का प्रतीक है, वहीं “गाँधी गैलरी” सत्य, अहिंसा, करुणा, नैतिकता और आत्मानुशासन के दिव्य आदर्शों की जीवन्त प्रेरणा प्रदान करेगी।
पूज्य आचार्यश्री जी ने महात्मा गाँधी के जीवन-मूल्यों का स्मरण कराते हुए कहा कि सत्य और अहिंसा केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन को शान्ति, संयम और वास्तविक स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाले शाश्वत पथ हैं। कारागार में स्थापित यह पुस्तकालय बंदियों के लिए आत्मचिन्तन, आत्मशिक्षा और आत्मोन्नति का प्रभावी माध्यम बनेगा तथा उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की नई सम्भावनाओं का द्वार खोलेगा।
इस अवसर पर पूज्य आचार्यश्री जी ने प्रमुख जेल अधीक्षक आदरणीय श्री सीताराम शर्मा जी, जेलर आदरणीय श्री के. के. दीक्षित जी तथा कारागार प्रशासन के इस सराहनीय एवं दूरदर्शी प्रयास की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास और उपक्रम बंदियों के नैतिक, बौद्धिक और मानवीय उत्थान में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। “नवग्रह वाटिका” जहाँ प्रकृति के साथ सामंजस्य और संतुलित जीवन का संदेश देती है, वहीं “गाँधी गैलरी” पुस्तकालय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के जीवन, संघर्ष, विचार और सिद्धान्तों से प्रेरणा ग्रहण करने का शुभ अवसर प्रदान करेगा।
यह आयोजन समाज के समक्ष यह सशक्त संदेश रखता है कि प्रत्येक मनुष्य में सुधार, संवेदनशीलता और पुनर्निर्माण की असीम सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उचित मार्गदर्शन, सकारात्मक वातावरण, सद्विचार और ज्ञान का प्रकाश किसी भी जीवन को नूतन दिशा प्रदान कर सकता है। गाज़ियाबाद कारागार में आरम्भ हुई यह पहल बंदियों के जीवन में परिवर्तन का माध्यम बनने के साथ-साथ समाज में भी करुणा, सहअस्तित्व और सुधारपरक दृष्टि को सुदृढ़ करेगी।
इस गरिमामय अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव आदरणीय श्री अनिल गर्ग जी, महामण्डलेश्वर स्वामी नैसर्गिका गिरि जी, सुप्रसिद्ध उद्योगपति आदरणीय श्री आलोक जी, श्रीमती संगीता नरूला जी, आदरणीय श्री राजीव शर्मा जी, श्री निपुन कथूरिया जी सहित अनेक गणमान्य एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
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चित्तादिसर्वभावेषु ब्रह्मत्वेनैव भावनात्।
निरोधः सर्ववृत्तीनां प्राणायामः स उच्यते।।११८।।
("अपरोक्षानुभूति")
भगवद्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्यकृत अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक योग और वेदान्त के अद्भुत समन्वय का एक अत्यन्त सूक्ष्म, दार्शनिक और अनुभवप्रधान निरूपण प्रस्तुत करता है। सामान्यतः “प्राणायाम” शब्द का अर्थ श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करने की एक योगिक प्रक्रिया के रूप में ग्रहण किया जाता है; किन्तु यहाँ आचार्य शंकर इसे एक ऊर्ध्वतर आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करते हैं। वे संकेत करते हैं कि वास्तविक प्राणायाम केवल प्राणवायु का भौतिक संयमन नहीं, बल्कि चित्त और समस्त अन्तःकरण-वृत्तियों को ब्रह्ममय दृष्टि से आलोकित करके उनकी चंचलता का उपशमन करना है। यही अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से प्राणायाम का परम तात्त्विक अर्थ है।
श्लोक का प्रथम पद- “चित्तादिसर्वभावेषु ब्रह्मत्वेनैव भावनात्” इस शिक्षोपदेश का मूल है। “चित्तादि” का संकेत केवल मन तक सीमित नहीं, अपितु मन, बुद्धि, अहंकार, स्मृति, संकल्प, विकल्प, वासनाएँ, भावनाएँ और समस्त आन्तरिक वृत्तियों तक विस्तृत है। साधारण जीव इन सबको भिन्न-भिन्न मनोविकारों के रूप में अनुभव करता है और उन्हीं के साथ तादात्म्य करके सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, राग-द्वेष और बन्धन का अनुभव करता है। किन्तु अद्वैत वेदान्त कहता है कि इन सबकी सत्ता स्वातन्त्र्य से नहीं है; ये सब उसी एक आत्मचैतन्य के आश्रय में प्रकाशित होते हैं। अतः यदि साधक इन समस्त चित्तवृत्तियों को ब्रह्मरूप, ब्रह्माश्रित, ब्रह्माधिष्ठित समझकर उनका मनन करे, तो धीरे-धीरे वृत्तियों की स्वातन्त्र्यबुद्धि नष्ट होने लगती है।
यही “ब्रह्मत्वेन भावन” है - संसार, मन, विचार, अनुभव, अन्तःकरण, और समस्त भावों को उनके अधिष्ठान से पृथक् न मानना, बल्कि सबको ब्रह्ममय समझना। यह कोई कल्पनात्मक आरोप मात्र नहीं, बल्कि तत्त्वदृष्टि का अभ्यास है। जैसे सुवर्ण से बने कंगन, कुण्डल, हार आदि नामरूप से भिन्न दिखाई पड़ते हुए भी वस्तुतः सुवर्ण ही हैं; जैसे मिट्टी से बने घट, पात्र, मूर्तियाँ आदि अनेक प्रतीतियों के बावजूद मृत्तिका ही हैं; वैसे ही चित्त की विविध वृत्तियाँ अपने स्वरूप से भिन्न सत्ता नहीं रखतीं, वे सब उसी चैतन्य में उदित होकर उसी में लीन होती हैं। जो साधक इस सत्य का निरन्तर मनन करता है, उसकी दृष्टि भेद से अभेद की ओर मुड़ने लगती है।
दूसरी पंक्ति “निरोधः सर्ववृत्तीनां प्राणायामः स उच्यते” इस भावनात्मक तत्त्वचिन्तन का फल प्रकट करती है। यहाँ “निरोध” का अर्थ हिंसक दमन नहीं है। यह वृत्तियों का जबरन दमन नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रकाश में उनका स्वाभाविक उपशम है। भगवद्पाद शंकराचार्य की परम्परा में अविद्या से उत्पन्न वृत्तियाँ ब्रह्मज्ञान से शान्त होती हैं; उन्हें किसी बाहरी बल से नष्ट नहीं किया जाता। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार हट जाता है, वैसे ही ब्रह्मदृष्टि के जागरण पर चित्त की अशान्ति, विक्षेप और विषयासक्ति क्षीण होने लगती है। अतः यहाँ सर्ववृत्तिनिरोध का अर्थ है कि वृत्तियों की मिथ्या स्वातन्त्र्यबुद्धि का लोप और चित्त का अपने मूल आत्मस्वरूप में विश्राम।
यहीं भगवद्पाद प्राणायाम को अद्वैत की अन्तर्धारा से जोड़ते हैं। प्राण की चंचलता और चित्त की चंचलता परस्पर सम्बद्ध मानी गई है; पर वेदान्तकार का आग्रह है कि उनके मूल में स्थित अविद्याजन्य भेदबुद्धि को दूर किए बिना स्थायी शान्ति सम्भव नहीं। यदि श्वास को रोक भी लिया जाए, पर मन विषयों में ही संलग्न रहे, तो वह प्राणायाम साधना की केवल बाह्य अवस्था है। परन्तु जब मन की सभी वृत्तियाँ ब्रह्मदृष्टि से आलोकित होकर आत्मा में शान्त होती हैं, तब वही सच्चा प्राणायाम है। यह प्राण का ही नहीं, प्राण-चालित अन्तःकरण का आत्ममूल में समर्पण है।
शाङ्करभाष्य की शैली में देखें तो यह श्लोक साधना के साधन और साध्य के बीच का अन्तर स्पष्ट करता है। बाह्य योगशास्त्र में प्राणायाम एक क्रिया है; अद्वैत वेदान्त में वही आत्मविवेक से प्रकाशित होकर एक स्थिति बन जाता है। क्रिया का अन्त स्थिति में होना चाहिए। यदि साधक केवल श्वास के आरोह-अवरोह तक ही सीमित रह जाए, तो वह अभी उपासनात्मक स्तर पर है; पर जब वह जान लेता है कि चित्तवृत्तियों का मूल आश्रय ब्रह्म ही है, और उसी तत्त्व में सबका विश्राम है, तब वह प्राणायाम के तात्त्विक अर्थ को ग्रहण करता है। वहाँ प्राण-संयम आत्म-संयम में और आत्म-संयम ब्रह्मनिष्ठा में परिणत हो जाता है।
यहाँ यह भी विचारणीय है कि “चित्तादिसर्वभावेषु” कहकर भगवद्पाद ने साधना को केवल ध्यानकाल तक सीमित नहीं रखा। वे संकेत करते हैं कि जीवन में उदित होने वाले प्रत्येक भाव कामना, स्मृति, क्लेश, आशा, भय, प्रसन्नता, विषाद सभी को ब्रह्मदृष्टि से देखो।
परमार्थ वस्तुतः ब्रह्मस्वरूप की ही सहज अभिव्यक्ति है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार यह समस्त दृश्य जगत् नाम-रूपात्मक उपाधियों से युक्त प्रतीत अवश्य होता है, परन्तु उसका अधिष्ठान एकमेव, निरुपाधिक, निरवच्छिन्न ब्रह्म ही है। वही ब्रह्म, अपनी मायाशक्ति के माध्यम से सृष्टि के विविध तत्त्वों धरती, आकाश, जल, पवन और प्रकाश के रूप में प्रकट होकर लोकव्यवहार में संलग्न प्रतीत होता है। इन तत्त्वों की निःस्वार्थ सेवा, धारण और पोषण की प्रवृत्ति वस्तुतः उस परम सत्य के परमार्थस्वभाव की ही झलक है। इस दृष्टि से परमार्थ कोई बाह्य कर्तव्य मात्र नहीं, अपितु आत्मस्वरूप की पहचान और उसकी अभिव्यक्ति है।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य के भाष्य में ‘लोकसंग्रह’ का विशेष महत्त्व है। ज्ञानी पुरुष, यद्यपि आत्मतत्त्व में स्थित होकर कर्तृत्व-भोक्तृत्व से परे हो जाता है, तथापि जगत् के कल्याणार्थ, लोकव्यवहार में प्रवृत्त होकर परमार्थ की स्थापना करता है। यही तत्त्व भगवान नारायण के "कूर्मावतार" में साकार रूप से दृष्टिगोचर होता है। समुद्र-मंथन के प्रसंग में जब मन्दराचल पर्वत अस्थिर हो गया, तब भगवान ने कच्छप रूप धारण कर उसे अपनी पीठ पर धारण किया। यह लीला केवल पौराणिक कथा नहीं, अपितु एक गहन आध्यात्मिक प्रतीक है- स्थैर्य, धैर्य, सहनशीलता और आधारत्व का। जिस प्रकार कूर्म ने मन्दराचल को स्थिर किया, उसी प्रकार साधक को भी अपने चित्त को धैर्य और विवेक के आधार पर स्थिर करना आवश्यक है, तभी आत्मज्ञान का अमृत प्रकट होता है।
"कूर्मावतार" का यह संकेत भगवत्पाद आदि शंकराचार्य की शिक्षाओं के अनुरूप है, जहाँ वे चित्तवृत्ति-निरोध, अन्तःकरण-शुद्धि और स्थैर्य को ज्ञानप्राप्ति का अनिवार्य साधन बताते हैं। ‘विवेकचूडामणि’ में वर्णित ‘शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान’ ये सभी गुण उसी धैर्य और आधारत्व के रूप हैं, जो साधक को आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अग्रसर करते हैं। अतः कूर्मावतार केवल देवताओं की सहायता नहीं, अपितु प्रत्येक साधक के भीतर आत्मस्थिरता का आह्वान है।
इसी प्रकार "वैशाख पूर्णिमा", जो "बुद्ध पूर्णिमा" के रूप में विख्यात है, आत्मजागरण, करुणा और शान्ति का अद्वितीय पर्व है। भगवान् विष्णु के दशावतार क्रम में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि; अत: भगवान “नारायण” विष्णु के नवम् अवतार “भगवान बुद्ध” का जीवन इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि बाह्य जगत् की अनित्यता का बोध ही वैराग्य को जन्म देता है और वैराग्य ही आत्मबोध का द्वार खोलता है। भगवत्पाद भगवान् श्रीशंकराचार्य जी भी अपने भाष्य में ‘अनित्य वस्तुओं में आसक्ति’ को बन्धन का कारण और ‘नित्य ब्रह्म में स्थित होना’ को मोक्ष का साधन बताते हैं। इस दृष्टि से बुद्ध का मध्यम मार्ग और शंकर का अद्वैत दोनों ही अन्ततः अन्तःकरण की शुद्धि, विवेक और आत्मस्वरूप की पहचान की ओर ही इंगित करते हैं।
"बुद्ध पूर्णिमा" का सन्देश है - स्वयं को जानो, अपने भीतर के अज्ञान को दूर करो और करुणा के माध्यम से समस्त प्राणियों में उसी आत्मा का दर्शन करो। यह करुणा अद्वैत की ही परिणति है, क्योंकि जब ‘अहं’ और ‘त्वं’ का भेद लुप्त हो जाता है, तब समस्त जगत् अपने ही स्वरूप में अनुभव होता है। तब परमार्थ कोई प्रयत्न नहीं, अपितु सहज प्रवाह बन जाता है।
अतः "कूर्मावतार" और "बुद्ध पूर्णिमा", दोनों ही हमें एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं; आत्मस्थिरता और आत्मबोध। एक ओर कूर्मावतार धैर्य, आधार और लोकसंग्रह का प्रतीक है, तो दूसरी ओर बुद्ध पूर्णिमा विवेक, वैराग्य और करुणा का। जब ये दोनों तत्त्व साधक के जीवन में समन्वित होते हैं, तब वह न केवल आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है, अपितु लोककल्याण का भी साधन बन जाता है।
अन्ततः, इस पावन "वैशाख पूर्णिमा" के अवसर पर यह संकल्प करना चाहिए कि हम अपने जीवन में परमार्थ को जागृत करें, धैर्य और स्थैर्य को अपनाएँ, करुणा और शान्ति को विकसित करें तथा आत्मसाक्षात्कार की दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील रहें। यही भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य की शिक्षाओं का सार है, यही भगवान् बुद्ध का सन्देश है और यही "कूर्मावतार" की दिव्य प्रेरणा है।
यह उद्धारक-पर्व समस्त मानवता के जीवन में विवेक, वैराग्य, आत्मजागरण की तत्परता और अखण्ड कल्याण का आलोक प्रकट करे; इसी मंगलकामना के साथ "वैशाख पूर्णिमा" की हार्दिक शुभकामनाएँ !
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निषेधनं प्रपञ्चस्य रेचकाख्यः समीरणः।
ब्रह्मैवास्मीति या वृत्तिः पूरको वायुरीरितः।।११९।।
("अपरोक्षानुभूति")
आदि शंकराचार्यकृत अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक अद्वैत-वेदान्त की विलक्षण पद्धति द्वारा योगशास्त्र की पारिभाषिक संज्ञाओं को आत्मविद्या के आलोक में पुनः अर्थगर्भित करता है। यहाँ आचार्य “रेचक” और “पूरक” जैसे प्राणायाम के प्रसिद्ध शब्दों को लेकर उनके भीतर निहित परम आध्यात्मिक तात्पर्य का उद्घाटन करते हैं। सामान्यतया रेचक का अर्थ बाह्य श्वास-त्याग और पूरक का अर्थ श्वास-ग्रहण माना जाता है; किन्तु शाङ्कर-वेदान्त की दृष्टि में यह बाह्य क्रिया मात्र साधना का प्रारम्भिक रूप है। उसकी चरम परिणति तब होती है जब साधक प्रपञ्च का निषेध कर, “ब्रह्मैवास्मि” मैं ब्रह्म ही हूँ इस अखण्ड वृत्ति में प्रतिष्ठित हो जाता है।
श्लोक का प्रथम पद है - “निषेधनं प्रपञ्चस्य”। अद्वैत वेदान्त के अनुसार यह समस्त दृश्य प्रपञ्च नाम, रूप, गुण, क्रिया, भेद, सम्बन्ध, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख, दुःख, मेरा-तेरा सब परमार्थतः आत्मा से भिन्न नहीं, किन्तु अज्ञानवश भिन्न प्रतीत होते हैं। इस मिथ्या-प्रतीति को सत्य मान लेना ही संसार है। अतः साधना का प्रथम चरण है-प्रपञ्च का निषेध। यहाँ निषेध का अर्थ जगत् का हिंसात्मक त्याग या व्यवहार का विनाश नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्र परमार्थ-सत्ता का अपवाद है। यह वही वेदान्तीय प्रक्रिया है, जिसे “नेति, नेति” के द्वारा उपनिषद् प्रतिपादित करती हैं। साधक विचार करता है - यह देह मैं नहीं, इन्द्रियाँ मैं नहीं, मन मैं नहीं, बुद्धि मैं नहीं, अहंकार मैं नहीं; दृश्य सब अनात्म है, परिवर्तनशील है, अध्यासजन्य है; अतः यह परम सत्य नहीं। यही प्रपञ्च-निषेध है।
भगवद्पाद कहते हैं कि यही रेचक है कि जिस प्रकार बाह्य प्राणायाम में रेचक श्वास को बाहर निकालना है, उसी प्रकार आत्मविद्या में प्रपञ्च के मिथ्यात्व का विवेकपूर्वक निष्कासन ही वास्तविक रेचक है। साधक अपने अन्तःकरण से विश्व के प्रति जड़ आसक्ति, वस्तुओं की स्वतंत्र सत्ता का भ्रम, देहाभिमान, विषयासक्ति और द्वैतबुद्धि इन सबको विवेकपूर्वक बाहर करता है। यह एक अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक उच्छ्वास है, जिसमें अज्ञानजन्य जगत्-आश्रय छूटता है। अतः यहाँ रेचक केवल वायु का परित्याग नहीं, अपितु अविद्या के विस्तार का परित्याग है।
इसके बाद भगवद्पाद कहते हैं कि “ब्रह्मैवास्मिति या वृत्तिः पूरको वायुरीरितः”। यह वाक्य अद्वैत साधना की सकारात्मक परिपूर्णता को प्रकट करता है। केवल निषेध पर्याप्त नहीं; निषेध के पश्चात् सत्य की प्रतिष्ठा आवश्यक है। यदि “यह नहीं, यह नहीं” कहकर साधक रुक जाए, तो उसका चित्त किसी रिक्तता, शुष्क शून्यता अथवा निषेधात्मक बौद्धिकता में अटक सकता है। परन्तु वेदान्त का लक्ष्य शून्यता नहीं, अपितु स्वस्वरूप की पूर्ण प्रतिष्ठा है। अतः प्रपञ्च के निषेध के पश्चात् जो अखण्ड ब्रह्माकार वृत्ति उदित होती है - “ब्रह्मैव अस्मि”, “मैं ब्रह्म ही हूँ”वही पूरक है।
जैसे बाह्य पूरक में श्वास भीतर ग्रहण की जाती है, वैसे ही यहाँ आत्मविद्या के पूरक में साधक अपने चित्त को ब्रह्मभाव से पूर्ण कर लेता है। वह अब अनात्म के रिक्त निषेध में नहीं रहता, बल्कि सत्य के अखण्ड आलोक से अपने अन्तःकरण को परिपूर्ण करता है। यह अहं ब्रह्मास्मि की वही महावाक्यजन्य वृत्ति है, जो जीव और ब्रह्म के मिथ्या भेद को शान्त कर देती है। यहाँ “पूरक” का अर्थ किसी नये पदार्थ को ग्रहण करना नहीं, बल्कि अपने नित्यसिद्ध स्वरूप की पुनः पहचान है। ब्रह्म बाहर से आने वाली कोई वस्तु नहीं; वह तो सदा स्वस्वरूप है। तथापि अज्ञान के आवरण से आच्छादित चित्त में जब ब्रह्माकार-वृत्ति उदित होती है, तब उसे यहाँ पूरक कहा गया है।
इस प्रकार यह श्लोक निषेध और प्रतिष्ठा इन दोनों को एक साथ साधना के अनिवार्य पक्ष के रूप में स्थापित करता है। पहले अनात्म का अपवाद, फिर आत्मतत्त्व की प्रतिष्ठा; पहले मिथ्यात्व का विवेक, फिर सत्य की अनुभूति; पहले जगत् की स्वतंत्र सत्ता का निषेध, फिर ब्रह्मैकत्व की पूर्ण स्वीकृति। यही अद्वैत की पारम्परिक प्रक्रिया है। शंकराचार्य के समस्त भाष्यों में यही पद्धति दृष्टिगोचर होती है - पहले अध्यास का निरसन, फिर अधिष्ठान का प्रकाश। यहाँ उसी को योगशास्त्र की प्राणायाम-संज्ञाओं में रूपान्तरित कर दिया गया है।
इस श्लोक का साहित्यिक सौन्दर्य भी अद्भुत है। सामान्य साधक श्वास के आने-जाने को ही प्राणायाम समझता है; परन्तु आचार्य उसके भीतर छिपी हुई एक उच्चतर साधना का द्वार खोलते हैं। वे मानो कह रहे हों कि जब तक केवल वायु का चलन है, तब तक साधना देहपर्यन्त है; पर जब चित्त मिथ्या-प्रपञ्च को छोड़कर ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित होने लगे, तब प्राणायाम आत्मविद्या में परिणत हो जाता है।
— - - देवर्षि नारद जयन्ती -- - —
“जयति जगति मायां यस्य काया धवस्ते…” यह मंगलाचरण उस दिव्य चेतना को प्रणाम है, जिसकी कृपा से अज्ञानरूपी अंधकार का नाश होकर जीवन में सत्य का उदय होता है। इसी दिव्य परम्परा के अधिष्ठाता, त्रिलोक-विहारिण, भगवद्भक्ति-भगवन्नाम के अमर गायक एवं भक्ति-ज्ञान-कर्म योग के अद्वितीय आद्यआचार्य "देवर्षि नारद" भारतीय सनातन संस्कृति के ऐसे आलोक-स्तम्भ हैं, जिनका व्यक्तित्व केवल पुराणों की कथा नहीं, बल्कि जीवित चेतना का सतत प्रवाह है।
श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के प्रारम्भ में भगवान् महर्षि वाल्मीकि द्वारा देवर्षि नारद से किया गया प्रश्न - “तपः स्वाध्याय निरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्…” यह दर्शाता है कि नारद केवल एक देवदूत नहीं, अपितु तप, स्वाध्याय, वाक्-शक्ति और ब्रह्मज्ञान के मूर्तिमान संगम हैं। वे उस दिव्य प्रेरणा के स्रोत हैं, जिन्होंने स्वयं आदिकवि भगवान् वाल्मीकि को श्रीरामकथा के अमर गायक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
देवर्षि नारद का सम्पूर्ण जीवन लोकमंगल और आत्मोद्धार के लिए समर्पित रहा है। वे ब्रह्माण्ड के विविध लोकों में विचरण करते हुए, जीवों के अंतःकरण में भगवद्भक्ति की ज्योति प्रज्वलित करते हैं। उनका ‘नारायण-नारायण’ का जप केवल नामस्मरण नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक स्पंदन है, जो प्रत्येक जीव को अपने मूल स्वरूप परमात्मा की ओर उन्मुख करता है।
नारदजी की विशेषता यह है कि वे केवल उपदेशक नहीं, जागरण के उत्प्रेरक हैं। वे वहाँ प्रकट होते हैं, जहाँ धर्म और अधर्म के बीच द्वंद्व हो, जहाँ मनुष्य मोह और अज्ञान में उलझा हो। प्रह्लाद को भक्ति का बीज देना हो, ध्रुव को तप के लिए प्रेरित करना हो, या व्यासजी को भागवत की रचना हेतु उद्बुद्ध करना हो - हर स्थान पर नारदजी एक दिव्य प्रेरणा के रूप में प्रकट होते हैं। इस दृष्टि से वे केवल एक देवऋषि ही नहीं, बल्कि ईश्वरीय संकल्प के सजीव माध्यम हैं।
देवर्षि नारद को ‘भक्ति के आचार्य’ के रूप में भी विशेष स्थान प्राप्त है। नारद भक्ति सूत्र में उन्होंने भक्ति को “परम प्रेमरूपा” कहा है, एक ऐसी स्थिति, जहाँ साधक का हृदय पूर्णतः ईश्वर में विलीन हो जाता है। यह भक्ति किसी बंधन या विधि का विषय नहीं, बल्कि आत्मा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। नारदजी का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक जीवन की जटिलताओं में भक्ति ही वह सरल मार्ग है, जो मनुष्य को शान्ति, संतुलन और आत्मिक तृप्ति प्रदान करता है।
"नारद जयन्ती" का यह पावन पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आत्मिक उत्कर्ष और लोकहित है। नारदजी का उपदेश हमें प्रेरित करता है कि ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनों का समन्वय ही जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। उनके इन उपदेशों और शिक्षाओं को आत्मसात् कर हम भी अपने जीवन को ईश्वर-समर्पण, सत्य के अनुसरण और समाज के कल्याण के लिए समर्पित करें, तो यही उनके प्रति सच्चा समर्पण होगा।
अतः इस शुभ अवसर पर हम सब यह संकल्प लें कि अपने जीवन में भक्ति की मधुरता, ज्ञान की स्पष्टता और कर्म की पवित्रता को धारण करेंगे। देवर्षि नारद की कृपा से हमारे अंतःकरण में सद्बुद्धि, विवेक और ईश्वर-प्रेम का दिव्य प्रकाश सदैव प्रज्वलित रहे।
सर्वेभ्यः नारद जयन्त्याः हार्दिकाः शुभाशयाः।
नारायण-नारायण-नारायण-नारायण !
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ततस्तद्वृत्तिनैश्चल्यं कुम्भकः प्राणसंयमः।
अयं चापि प्रबुद्धानामज्ञानां घ्राणपीडनम् ।।१२०।।
("अपरोक्षानुभूति")
भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में योगशास्त्र के “कुम्भक” शब्द को अद्वैत-वेदान्त की परम सूक्ष्म साधना-दृष्टि से विशद करते हैं। सामान्यतः कुम्भक का अर्थ श्वास की गति को रोकना या प्राण का अवरोध करना माना जाता है; किन्तु यहाँ आचार्य का संकेत केवल बाह्य प्राणायाम की प्रक्रिया की ओर नहीं, अपितु अन्तःकरण की उस निश्चल अवस्था की ओर है, जहाँ चित्त ब्रह्माकार-वृत्ति में पूर्णतः स्थित हो जाता है। इसलिए वे कहते हैं कि “ततस्तद्वृत्तिनैश्चल्यं कुम्भकः” अर्थात् पूर्वोक्त ब्रह्मवृत्ति का अचल, अविकम्प और अखण्ड स्थैर्य ही वास्तविक कुम्भक है।
यहाँ “तद्वृत्ति” से अभिप्राय उस ज्ञानमयी वृत्ति से है, जो साधक के अन्तःकरण में महावाक्यजन्य आत्मबोध के रूप में उदित होती है। जब चित्त नाम-रूपात्मक प्रपञ्च, विषय-संकल्पों, देहाभिमान और द्वैत-दर्शन की चञ्चलता से निवृत्त होकर केवल आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब वही नैश्चल्य प्राणसंयम कहलाता है। इस प्रकार प्राण का संयम केवल श्वास की गति को रोकना नहीं, बल्कि चित्त की बहिर्मुख वृत्तियों को विराम देकर उसे आत्मतत्त्व में अवस्थित करना है।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य का यह कथन अत्यन्त गम्भीर है, क्योंकि वे साधक को बाह्य क्रिया से आन्तरिक सत्य की ओर ले जाते हैं। उनके लिए योग का परम प्रयोजन शारीरिक नियंत्रण नहीं, आत्मचैतन्य में विश्रान्ति है। जिस प्रकार तरंगों के शान्त होने पर समुद्र अपनी गम्भीरता में स्थित रहता है, उसी प्रकार वृत्तियों के प्रशमन पर चित्त आत्मस्वरूप की अखण्ड शान्ति में स्थित होता है। वही निश्चलता वेदान्त में कुम्भक की परमार्थ अवस्था है।
श्लोक के उत्तरार्ध में आचार्य अत्यन्त प्रखर शैली में कहते हैं कि “अयं चापि प्रबुद्धानामज्ञानां घ्राणपीडनम्”। अर्थात् प्रबुद्ध पुरुषों की दृष्टि में केवल नासिका को दबाकर, श्वास को रोककर किया जाने वाला अभ्यास यदि आत्मबोध से रहित हो, तो वह वास्तविक कुम्भक नहीं, केवल “घ्राणपीड़न” है। यहाँ आचार्य का अभिप्राय बाह्य प्राणायाम का निरादर करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि आत्मज्ञान के बिना कोई भी क्रिया मोक्ष का साधन नहीं बन सकती। बाह्य अनुशासन उपयोगी हो सकता है, किन्तु उसकी सिद्धि तभी है जब वह अन्ततः आत्मनिष्ठा की ओर ले जाए।
अतः इस श्लोक का सार यही है कि वास्तविक कुम्भक वायु का रोधन नहीं, बल्कि ब्रह्माकार-वृत्ति की निश्चल प्रतिष्ठा है। मोक्ष का कारण नासिका का अवरोध नहीं, अपितु अज्ञान का निरोध है। जब साधक यह जान लेता है कि वह देह, प्राण, मन और वृत्ति से परे नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा है, तब उसकी चित्तवृत्ति उसी सत्य में स्थिर हो जाती है। वही शान्ति, वही आत्मनिष्ठा, वही परमार्थतः कुम्भक है।
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विषयेष्वात्मतां दृष्ट्वा मनसश्चिति मज्जनम्।
प्रत्याहारः स विज्ञेयः अभ्यासनीयः मुमुक्षुभिः।।१२१।।
("अपरोक्षानुभूति")
भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्यकृत "अपरोक्षानुभूति" का यह श्लोक अद्वैत-वेदान्त की साधना-पद्धति में प्रत्याहार के गूढ़, आन्तरिक और परमार्थतत्त्वमय स्वरूप को उद्घाटित करता है। सामान्य योगशास्त्र में प्रत्याहार का अर्थ इन्द्रियों को उनके-उनके विषयों से हटाकर भीतर की ओर लौटा लेना माना जाता है; किन्तु यहाँ आचार्य की दृष्टि केवल इन्द्रियनिग्रह तक सीमित नहीं है। वे साधक को इससे भी सूक्ष्म सत्य की ओर ले जाते हैं। “विषयेष्वात्मतां दृष्ट्वा” - यहाँ तात्पर्य है कि समस्त विषयों में, समस्त दृश्य-जगत् में, पृथक्-पृथक् नामरूपों की सत्ता न देखकर, उसी एक आत्मतत्त्व का दर्शन किया जाए। जब यह ज्ञात होता है कि विषय स्वतंत्र सत्ता नहीं रखते, अपितु चैतन्य के अधिष्ठान पर ही प्रकाशित हैं, तब मन स्वयमेव बाह्यवृत्तियों से निवृत्त होकर अपने मूलस्वरूप, चिति में अवगाहित होने लगता है।
“मनसश्चिति मज्जनम्” - यह पद अत्यन्त मार्मिक है। मन का चिति में मज्जन होना, अर्थात् संकल्प-विकल्पात्मक चञ्चलता का शुद्ध चैतन्य में लीन हो जाना। यह मन का विनाश नहीं, अपितु उसके मिथ्या-स्वातन्त्र्य का उपशमन है। जैसे तरंग समुद्र से भिन्न नहीं, वैसे ही मन भी चैतन्य से भिन्न नहीं; किन्तु अज्ञानवश वही मन जगत्, विषय, कर्तृत्व और भोक्तृत्व का विस्तार रचता है। जब विवेकजन्य ज्ञान से ज्ञात होता है कि विषयों का सत्य आत्मा ही है, तब मन का बहिर्मुख प्रवाह शान्त होकर आत्मचैतन्य में विश्राम पाता है - यही वास्तविक प्रत्याहार है।
अतः आचार्य कहते हैं कि ऐसा प्रत्याहार “विज्ञानेऽभ्यासनीयः मुमुक्षुभिः” मुमुक्षुओं द्वारा ज्ञानपूर्वक, विवेकपूर्वक, निरन्तर अभ्यास किया जाने योग्य है। यहाँ केवल यांत्रिक अभ्यास का निर्देश नहीं है; यहाँ ज्ञानयुक्त साधना की अपेक्षा है। इन्द्रियों को बलात् रोक लेना पर्याप्त नहीं, अपितु विषयों की मिथ्यात्वबुद्धि और आत्मा की सर्वाधिष्ठान-चैतन्यरूप सत्ता का दृढ़ अनुभव आवश्यक है। जब साधक यह देखना सीखता है कि जो कुछ दृश्य है, वह आत्मस्वरूप ब्रह्म की ही आभा है, तब प्रत्याहार दमन नहीं रह जाता, वह सहज आत्मनिष्ठा बन जाता है।
इस प्रकार इस श्लोक में भगवद्पाद प्रत्याहार को बाह्य अनुशासन से उठाकर ब्रह्मविद्या की भूमि पर प्रतिष्ठित करते हैं। इन्द्रियों का हटना उसका आरम्भ हो सकता है, पर उसकी परिपूर्णता तब है, जब मन विषयों में भी आत्मा को ही देखे और अन्ततः चिति में निमग्न हो जाए। यही मुमुक्षु की साधना है, यही अन्तर्मुखता का सत्य रूप है, और यही अद्वैत-वेदान्त का दिव्य उपदेश है।
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यत्र यत्र मनो याति ब्राह्मणस्तत्र दर्शनात्।
मनसो धारणायैव धारणा सा परा माता।।१२२।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य, भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त सूक्ष्म एवं गूढ़ आयाम का उद्घाटन करते हैं। यहाँ “धारणा” का जो स्वरूप निरूपित हुआ है, वह सामान्य योगशास्त्रीय परिभाषा से परे, ब्रह्मविद्या के आलोक में एक नवीन एवं परमार्थपरक अर्थ धारण करता है। साधारणतः धारणा का तात्पर्य मन को किसी एक देश, काल या विषय में स्थिर करना माना जाता है; किन्तु आचार्य यहाँ उस धारणा की पराकाष्ठा का प्रतिपादन करते हैं, जिसमें मन का प्रत्येक गमन स्वयं ब्रह्मदर्शन का ही साधन बन जाता है।
“यत्र यत्र मनो याति” - मन स्वभावतः चञ्चल है, विषयों की ओर प्रवाहित होता रहता है। यह चंचलता साधक के लिए प्रायः बाधक प्रतीत होती है; किन्तु आचार्य का अद्वैत-दृष्टिकोण इस चंचलता को भी साधना का साधन बना देता है। “ब्राह्मणः तत्र दर्शनात्” - यहाँ “ब्राह्मण” शब्द का अभिप्राय ब्रह्मज्ञानी साधक से है, जो सर्वत्र ब्रह्मस्वरूप का ही साक्षात्कार करता है। उसके लिए मन जहाँ भी जाता है, वहाँ कोई द्वैत-वस्तु नहीं, अपितु उसी एक अद्वितीय ब्रह्म का ही दर्शन होता है।
इस प्रकार, मन का विषय-गमन अब विषयासक्ति नहीं रह जाता, अपितु ब्रह्मनिष्ठा का ही विस्तार बन जाता है। घट, पट, गृह, वन, व्यक्ति, परिस्थिति सबमें वह एक ही चैतन्य, एक ही सत्तारूप ब्रह्म का अविच्छिन्न प्रकाश अनुभव करता है। जैसे स्वर्ण से बने विविध आभूषणों में ज्ञानी केवल स्वर्ण का ही अनुभव करता है, वैसे ही यह ब्रह्मनिष्ठ साधक समस्त नाम-रूपों में केवल ब्रह्म का ही दर्शन करता है।
“मनसो धारणायैव” - मन को धारण करना, अर्थात् उसे स्थिर करना यहाँ स्थिरता का अर्थ बाह्य निरोध नहीं, बल्कि दृष्टि की स्थिरता है। जब ज्ञान की दृढ़ता से यह बोध हो जाता है कि “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, तब मन का प्रत्येक व्यापार उसी सत्य में स्थित हो जाता है। इस प्रकार मन का प्रवाह अब बन्धनकारक न होकर, ज्ञान का ही साधन बन जाता है।
“धारणा सा परा माता” - ऐसी धारणा ही परा है, अर्थात् सर्वोच्च है। यह केवल मानसिक अभ्यास नहीं, अपितु आत्मस्वरूप में स्थित रहने की सहज अवस्था है। यह धारणा साधक को समाधि की ओर नहीं ले जाती, अपितु यह स्वयं ही ज्ञानरूप समाधि का प्राकट्य है। इसमें न तो मन का दमन है, न विषयों का त्याग; अपितु सर्वत्र एकरस ब्रह्मदर्शन की अखण्ड वृत्ति है।
अतः, भाष्यकार भगवान् का अभिप्राय यह है कि वास्तविक साधना मन को रोकने में नहीं, बल्कि उसकी प्रत्येक गति को ब्रह्ममय दृष्टि से आलोकित करने में है। जब यह दृष्टि सिद्ध हो जाती है, तब जीवन का प्रत्येक क्षण, प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक दृश्य सब ब्रह्मानुभूति का ही विस्तार बन जाते हैं। यही अद्वैत की चरम साधना है, और यही “परा धारणा” का दिव्य रहस्य है।
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ब्रह्मैवस्मिति सद्वृत्त्या निरालंबतया स्थितिः।
ध्यानशब्देन विख्याता परमानन्ददायिनी।।१२३।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमप्रवर्तक भगवत्पादाचार्य भाष्यकार श्री आदि शंकराचार्य इस श्लोक में “ध्यान” के उस परम, सूक्ष्म और तात्त्विक स्वरूप का उद्घाटन करते हैं, जो सामान्य ध्यान-प्रक्रियाओं से सर्वथा भिन्न और श्रेष्ठ है। यहाँ ध्यान न तो केवल मानसिक एकाग्रता है, न किसी रूप, प्रतीक या देवता का चिन्तन; अपितु यह आत्मस्वरूप में स्थित होने की वह अखण्ड, निरालम्ब अवस्था है, जो “ब्रह्मैव अस्मि” मैं ही ब्रह्म हूँ, इस दृढ़, अविच्छिन्न वृत्ति के रूप में प्रकट होती है।
“ब्रह्मैव अस्मि इति सद्वृत्त्या” - यहाँ “सद्वृत्ति” का अभिप्राय उस अखण्डाकार वृत्ति से है, जो शास्त्र और गुरु के उपदेश से उत्पन्न होकर साधक के अन्तःकरण में दृढ़ता से प्रतिष्ठित हो जाती है। यह कोई साधारण विचार नहीं, अपितु आत्मसाक्षात्कार की परिणति है। जब “अहं देहः”, “अहं मनः”, “अहं कर्ता” इत्यादि अज्ञानजन्य भ्रान्तियाँ निवृत्त हो जाती हैं, तब “अहं ब्रह्मास्मि” का साक्षात्कार उदित होता है। यही वृत्ति यहाँ “सद्वृत्ति” के रूप में निरूपित है
सत्, चित् और आनन्दस्वरूप ब्रह्म के साथ अपनी अभिन्नता का निश्चल बोध।
“निरालंबतया स्थितिः” - ध्यान का यह स्वरूप किसी बाह्य या आन्तरिक आलम्बन पर आश्रित नहीं है। सामान्य ध्यान में साधक किसी देवता, मंत्र, चक्र या बिन्दु को आधार बनाता है; किन्तु यहाँ साधक स्वयं ही अपने आत्मस्वरूप में स्थित है, जो सर्वाधार होकर भी किसी का आश्रित नहीं। यह “निरालम्बता” अद्वैत का हृदय है - जहाँ न ध्याता है, न ध्यान का विषय, न ध्यान की क्रिया; केवल एक अखण्ड, स्वयंप्रकाश चैतन्य ही शेष रहता है।
इस स्थिति को भाष्यकार भगवान् कहते हैं - “ध्यानशब्देन विख्याता” अर्थात् यही वास्तविक ध्यान है। यह परिभाषा ध्यान को उसकी सीमित, साधनात्मक परिधि से उठाकर उसकी परमावस्था में प्रतिष्ठित करती है। यहाँ ध्यान कोई प्रयत्न नहीं, बल्कि स्वाभाविक स्थिति है - स्वरूपावस्थानम्। यह वही अवस्था है, जिसे उपनिषद् “अमृतत्व” और “ब्रह्मनिष्ठा” के रूप में वर्णित करते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह ध्यान “अध्यारोप-अपवाद” की प्रक्रिया का चरम फल है। प्रारम्भ में साधक जगत् को सत्य मानकर विविध साधनाओं में प्रवृत्त होता है; किन्तु ज्ञान के उदय होने पर यह बोध होता है कि समस्त प्रपञ्च केवल नाम-रूपात्मक उपाधि है, जिसका अधिष्ठान एकमात्र ब्रह्म है। जैसे रज्जु में सर्प का भ्रान्ति से आरोप होता है और ज्ञान होने पर केवल रज्जु ही शेष रह जाती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान होने पर समस्त जगत् ब्रह्मस्वरूप में ही लीन हो जाता है। उसी स्थिति में यह “निरालम्ब ध्यान” प्रकट होता है।
यह ध्यान न तो मन का दमन है, न विचारों का निषेध; अपितु यह उस ज्ञान की दृढ़ता है, जिसमें मन का प्रत्येक व्यापार स्वयं ब्रह्मस्वरूप में ही लीन हो जाता है। यहाँ साधक मन को रोकने का प्रयास नहीं करता, बल्कि यह जानता है कि मन, बुद्धि, अहंकार - सब उसी चैतन्य के प्रकाश में प्रकट हो रहे हैं और उसी में लीन हैं।
“परमानन्ददायिनी” इस ध्यान का फल है - परम आनन्द। यह आनन्द किसी विषय से उत्पन्न नहीं, न ही क्षणिक है; यह आत्मस्वरूप का स्वाभाविक, नित्य, निरपेक्ष आनन्द है। जब साधक “मैं ब्रह्म हूँ” इस सत्य में स्थित हो जाता है, तब वह बाह्य सुखों की खोज से मुक्त हो जाता है। उसे न प्राप्त करने का शोक रहता है, न प्राप्त होने पर हर्ष; वह स्वात्मानन्द में स्थित होकर पूर्णता का अनुभव करता है।
यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि यह अवस्था केवल बौद्धिक चिन्तन का परिणाम नहीं है। यह “श्रवण, मनन, निदिध्यासन” की दीर्घ साधना का परिपाक है। जब शास्त्र-वाक्यों का सत्य बार-बार चिन्तन और आत्मनिष्ठ ध्यान के द्वारा अन्तःकरण में दृढ़ हो जाता है, तब यह अखण्ड वृत्ति सहज रूप से प्रवाहित होने लगती है। उसी का नाम यहाँ “सद्वृत्ति” है।
अतः, आचार्य शंकर का यह उपदेश साधना के उस सर्वोच्च शिखर का संकेत करता है, जहाँ ध्यान, ध्याता और ध्येय - इन तीनों का भेद लुप्त हो जाता है। यह अद्वैत की पूर्णता है कि जहाँ साधक स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप बनकर, निरालम्ब, निर्विकल्प और स्वप्रकाश चैतन्य में स्थित रहता है।
निष्कर्षतः, “ब्रह्मैवस्मि” की अखण्ड भावना में निरालम्ब स्थित होना ही वास्तविक ध्यान है, और यही वह अवस्था है, जो साधक को परमानन्द की अनुभूति कराती है। यही अद्वैत वेदान्त का परम लक्ष्य, और यही मानव जीवन की चरम सिद्धि है।
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निर्विकारतया वृत्ति ब्रह्मकारतया पुनः।
वृत्तिविस्मरणं सम्यक् समाधिरज्ञानसंज्ञकः ।।१२४।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में “समाधि” के उस सूक्ष्म, तात्त्विक एवं परमावस्थागत स्वरूप का निरूपण करते हैं, जो सामान्य योगदृष्टि में वर्णित समाधि से भिन्न, अपितु अधिक गम्भीर और ब्रह्मविद्यापरक है। यहाँ समाधि न तो केवल चित्तवृत्ति-निरोध है, न ही किसी विशेष अनुभव की प्राप्ति; बल्कि यह ज्ञान की परिपक्वता का वह चरम रूप है, जहाँ मन की वृत्तियाँ ब्रह्मस्वरूप में पूर्णतया लीन होकर अपने पृथक् अस्तित्व को विस्मृत कर देती हैं।
“निर्विकारतया वृत्ति” यहाँ भगवद्पाद उस वृत्ति का संकेत करते हैं, जो विकाररहित हो गई है। सामान्यतः मन की वृत्तियाँ राग, द्वेष, कामना, स्मृति, संकल्प-विकल्प आदि के रूप में निरन्तर परिवर्तित होती रहती हैं; यही विकार मन को संसार में बाँधते हैं। किन्तु साधना के द्वारा जब अन्तःकरण शुद्ध होता है, तब ये विकार क्रमशः शान्त होने लगते हैं, और वृत्ति अपनी स्वाभाविक निर्मलता को प्राप्त करती है। यह निर्विकारता केवल दमन का परिणाम नहीं, बल्कि विवेक और वैराग्य से उत्पन्न अन्तःकरण-शुद्धि का फल है।
“ब्रह्मकारतया पुनः” किन्तु केवल निर्विकारता ही पर्याप्त नहीं है। वृत्ति को “ब्रह्माकार” होना आवश्यक है, अर्थात् वह ब्रह्मस्वरूप का ही प्रतिबिम्ब बन जाए। यह वही “अखण्डाकार-वृत्ति” है, जिसका उदय श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा होता है। जब साधक “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्यों का अर्थ आत्मसात् कर लेता है, तब मन में एक ऐसी वृत्ति उत्पन्न होती है, जो सम्पूर्ण प्रपञ्च का अपवाद कर केवल ब्रह्मस्वरूप को ही प्रकाशित करती है। यह वृत्ति अन्य सभी वृत्तियों का उपशमन कर देती है, जैसे दीपक का प्रकाश अन्धकार को दूर कर देता है।
“वृत्तिविस्मरणं” इसका अगला चरण है - वृत्ति का ही विस्मरण। यहाँ “विस्मरण” का अभिप्राय अज्ञानजन्य विस्मृति नहीं, अपितु उस स्थिति से है जहाँ वृत्ति अपना साधनत्व पूर्ण कर स्वयं लीन हो जाती है। जैसे काँटे से काँटा निकालकर दोनों को त्याग दिया जाता है, वैसे ही ब्रह्माकार-वृत्ति भी अन्ततः अपने कार्य को पूर्ण कर शान्त हो जाती है। तब न वृत्ति का भान रहता है, न उसके कर्तृत्व का; केवल ब्रह्मस्वरूप चैतन्य ही शेष रहता है।
“सम्यक् समाधिः” यही अवस्था भगवद्पाद के अनुसार “सम्यक् समाधि” है अर्थात् पूर्ण, यथार्थ और परिपूर्ण समाधि। यह समाधि किसी विशेष ध्यानावस्था का क्षणिक अनुभव नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप में स्थित रहने की स्थायी अवस्था है। इसमें साधक और साध्य का भेद लुप्त हो जाता है; न ध्याता रहता है, न ध्यान, न ध्येय केवल एक अद्वितीय, अखण्ड, स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही शेष रहता है।
“अज्ञानसंज्ञकः” यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म एवं गूढ़ बिन्दु निहित है। आचार्य इस समाधि को “अज्ञानसंज्ञक” कहते हैं अर्थात् जिसे अज्ञानी लोग “अज्ञान” समझते हैं; क्योंकि इस अवस्था में कोई मानसिक क्रिया, कोई विचार, कोई अनुभव-विशेष प्रतीत नहीं होता, अतः अज्ञानियों को यह शून्यता या अज्ञान जैसी प्रतीत होती है। किन्तु वस्तुतः यह अज्ञान नहीं, बल्कि अज्ञान का पूर्ण अभाव है। यह वह स्थिति है, जहाँ ज्ञान भी अपने साधनरूप में लीन हो जाता है, और केवल ज्ञानस्वरूप आत्मा ही शेष रहता है।
दार्शनिक दृष्टि से यह वही अवस्था है, जहाँ “अध्यारोप-अपवाद” की प्रक्रिया पूर्ण होती है। प्रारम्भ में जगत् और जीव का आरोप होता है; तत्पश्चात् ज्ञान के द्वारा उनका अपवाद कर दिया जाता है। अन्ततः, यहाँ तक कि ज्ञानरूप वृत्ति का भी अपवाद हो जाता है, और केवल ब्रह्मस्वरूप सत्य ही अवशिष्ट रहता है। यही अद्वैत की पराकाष्ठा है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह अवस्था मन के पूर्ण नाश का नहीं, बल्कि मन के स्वरूप-परिवर्तन का सूचक है। मन ब्रह्मस्वरूप में लीन होकर अपनी पृथक् सत्ता को खो देता है, जैसे लवण जल में घुलकर जलरूप हो जाता है। तब मन का अस्तित्व बाधक नहीं रहता; वह ब्रह्मस्वरूप का ही प्रकाश बन जाता है।
निष्कर्षतः, इस श्लोक में भगवद्पादाचार्य साधना के उस अंतिम चरण का निरूपण करते हैं, जहाँ निर्विकार, ब्रह्माकार वृत्ति भी अन्ततः विलीन हो जाती है, और साधक पूर्णतया ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। यही “सम्यक् समाधि” है - जो अज्ञानियों को शून्यता प्रतीत होती है, किन्तु वस्तुतः वह परम चैतन्य, परम सत्य और परम आनन्द की अखण्ड अनुभूति है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है, और यही जीवन का परम पुरुषार्थ।
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एवं च कृतिमानन्दं तावत् साधु समभ्यसेत् ।
वश्यो यावत् क्षणात् पुंसः प्रयुक्तः स भवेत् स्वयम् ।।१२५।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के अत्यन्त व्यावहारिक, किन्तु सूक्ष्मतम रहस्य का उद्घाटन करते हैं। पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने ध्यान, धारणा और समाधि की परा अवस्थाओं का निरूपण किया; अब वे बताते हैं कि उस परमावस्था की प्राप्ति के लिए साधक को किस प्रकार अभ्यास करना चाहिए। यहाँ “कृतिमानन्द” और “अभ्यास” के माध्यम से वे उस क्रमिक साधना-पथ को स्पष्ट करते हैं, जो अन्ततः सहज ब्रह्मानुभूति में परिणत होता है।
“एवं च कृतिमानन्दं” - यहाँ “कृतिमानन्द” का तात्पर्य उस आनन्द से है, जो प्रारम्भ में साधक के द्वारा अभ्यासपूर्वक, संकल्पपूर्वक उत्पन्न किया जाता है। यह स्वाभाविक आत्मानन्द नहीं, बल्कि “ब्रह्मैव अस्मि” इस भावना का बारम्बार चिन्तन कर मन को उसी में स्थिर करने से उत्पन्न होने वाला अनुभव है। यह एक प्रकार का साधनजन्य आनन्द है, जो अभी पूर्णतः सहज नहीं हुआ है, किन्तु आत्मानुभूति की दिशा में अग्रसर है।
साधक प्रारम्भ में मन को बार-बार विषयों से हटाकर, ब्रह्मभाव में स्थापित करने का प्रयास करता है। जब वह “मैं देह नहीं, मन नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य ब्रह्म हूँ” इस विचार का निरन्तर अभ्यास करता है, तब मन में एक विशेष प्रकार की शान्ति और आनन्द का अनुभव होता है। यही “कृतिमानन्द” है - जो यद्यपि प्रारम्भ में प्रयासजन्य है, किन्तु साधना के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
“तावत् साधु समभ्यसेत्” - भगवद्पाद निर्देश देते हैं कि इस कृतिमानन्द का सतत्, विधिपूर्वक और दृढ़तापूर्वक अभ्यास किया जाए। “साधु” शब्द यहाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है अर्थात् सम्यक् रीति से, निरन्तरता के साथ, श्रद्धा और धैर्यपूर्वक। यह अभ्यास केवल क्षणिक या आकस्मिक न होकर, जीवन का अंग बन जाना चाहिए। यही “अभ्यास” मन को परिष्कृत कर, उसे ब्रह्मस्वरूप के अनुरूप बनाता है।
“वश्यो यावत्” - जब तक मन पूर्णतः वश में न आ जाए, तब तक यह अभ्यास आवश्यक है। मन का स्वभाव चञ्चलता है; वह बार-बार विषयों की ओर प्रवृत्त होता है। अतः साधक को निरन्तर सजग रहकर, उसे पुनः ब्रह्मभाव में स्थापित करना होता है। यह प्रक्रिया प्रारम्भ में कठिन प्रतीत होती है, किन्तु अभ्यास से यह सरल और स्वाभाविक हो जाती है।
“क्षणात् पुंसः प्रयुक्तः” - जब यह अभ्यास परिपक्व हो जाता है, तब मन थोड़े से संकेत या प्रयत्न से ही तुरन्त ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है। जैसे किसी प्रशिक्षित अश्व को हल्के से संकेत देने पर वह नियंत्रित हो जाता है, वैसे ही साधक का मन भी सहज ही वश में आ जाता है। यहाँ “क्षणात्” शब्द उस तात्कालिकता का बोध कराता है, जहाँ साधक को मन को स्थिर करने में कोई विलम्ब या संघर्ष नहीं करना पड़ता।
“स भवेत् स्वयम्” - अन्ततः यह अभ्यास इतना दृढ़ हो जाता है कि मन स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित रहने लगता है। अब कोई बाह्य प्रयत्न आवश्यक नहीं रहता; “कृतिमानन्द” “सहजानन्द” में परिणत हो जाता है। यह वही अवस्था है, जहाँ साधना और साध्य का भेद लुप्त हो जाता है, जहाँ जो पहले प्रयासपूर्वक किया जाता था, वही अब स्वाभाविक स्थिति बन जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक “अभ्यास” और “वैराग्य” के सिद्धान्त का अद्वैत रूप प्रस्तुत करता है। यहाँ अभ्यास का लक्ष्य मन का निरोध नहीं, बल्कि उसकी ब्रह्मनिष्ठा है। बारम्बार ब्रह्मभाव का चिन्तन करते-करते, मन की पुरानी वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं और अन्तःकरण शुद्ध होकर आत्मस्वरूप में ही स्थित हो जाता है।
यह प्रक्रिया उसी प्रकार है, जैसे किसी धारा को बार-बार एक दिशा में मोड़ा जाए तो वह स्थायी रूप से उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है। प्रारम्भ में यह प्रयासपूर्वक होता है, किन्तु कालान्तर में यह स्वाभाविक बन जाता है। इसी प्रकार, “कृतिमानन्द” के अभ्यास से साधक का मन अन्ततः “सहज आनन्द” में स्थित हो जाता है।
अतः भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् का का यह उपदेश अत्यन्त व्यावहारिक और प्रेरणादायक है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मानुभूति कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि निरन्तर अभ्यास का परिणाम है। प्रारम्भ में चाहे वह कृत्रिम प्रतीत हो, किन्तु उसी अभ्यास से अन्ततः सहज ब्रह्मनिष्ठा की प्राप्ति होती है।
निष्कर्षतः, साधक को चाहिए कि वह ब्रह्मभाव से उत्पन्न कृतिमानन्द का निरन्तर अभ्यास करे, जब तक कि मन पूर्णतः वश में होकर स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित न हो जाए। यही अभ्यास अन्ततः उसे उस परम, सहज, अखण्ड आनन्द में प्रतिष्ठित करता है, जो अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है।
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ततः साधननिर्मुक्तः सिद्धो भवति योगिराट् ।
तत्स्वरूपं न कैकस्य विषयः मनसो गिराम् ।।१२६।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना की पराकाष्ठा तथा उसके परम फल का दिव्य निरूपण करते हैं। पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने अभ्यास, ध्यान, धारणा और समाधि के क्रमिक उत्कर्ष को स्पष्ट किया; यहाँ वे उस अन्तिम अवस्था का उद्घाटन करते हैं, जहाँ साधक समस्त साधनों से परे होकर, सिद्धत्व को प्राप्त करता है और आत्मस्वरूप में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो जाता है।
“ततः साधननिर्मुक्तः” - यहाँ “ततः” शब्द उस क्रम का बोध कराता है, जो निरन्तर अभ्यास, ब्रह्मनिष्ठ चिन्तन और अन्तःकरण-शुद्धि के पश्चात् प्राप्त होता है। जब साधक “कृतिमानन्द” से “सहजानन्द” की ओर अग्रसर होकर मन को पूर्णतः वश में कर लेता है, तब वह साधनों की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है। साधन जैसे - ध्यान, जप, उपासना, चिन्तन ये सभी प्रारम्भ में आवश्यक होते हैं; किन्तु जब लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है, तब ये साधन स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। जैसे - नदी समुद्र में मिलकर अपनी पृथक् धारा को खो देती है, वैसे ही साधन आत्मसाक्षात्कार में लीन होकर अपना प्रयोजन पूर्ण कर लेते हैं।
“सिद्धो भवति योगिराट्” - ऐसा साधक “सिद्ध” हो जाता है अर्थात् वह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। यहाँ “योगिराट्” शब्द विशेष महत्त्वपूर्ण है, जो योगियों में श्रेष्ठ, आत्मनिष्ठ, पूर्णतया जागृत पुरुष है। यह सिद्धि कोई अलौकिक चमत्कार या योगसिद्धि नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप में अचल प्रतिष्ठा है। यह वही अवस्था है, जहाँ साधक जान लेता है - “नाहं कर्ता, न भोक्ता, केवलं साक्षी चैतन्यरूपः ब्रह्मास्मि।” इस बोध के साथ वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
“तत्स्वरूपं” - अब भगवद्पादाचार्य उस आत्मस्वरूप की ओर संकेत करते हैं, जो इस सिद्धावस्था में प्रत्यक्ष होता है। यह स्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वप्रकाश चैतन्य है, जो न जन्म लेता है, न नष्ट होता है, न परिवर्तित होता है। यह न तो विषय है, न वस्तु; यह सबका अधिष्ठान, सबका प्रकाशक है।
“न कैकस्य विषयः मनसो गिराम्” - यहाँ भगवत्पाद एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य का उद्घाटन करते हैं। यह आत्मस्वरूप न तो मन का विषय है, न वाणी का। मन, जो संकल्प-विकल्पात्मक है, केवल सीमित वस्तुओं को ही ग्रहण कर सकता है; वाणी भी केवल नाम-रूपों का ही वर्णन कर सकती है। किन्तु आत्मा अनन्त, निराकार और अव्यवहित है। अतः वह न मन द्वारा कल्पित हो सकता है, न वाणी द्वारा व्यक्त।
यह वही तत्त्व है, जिसे उपनिषद् कहते हैं - “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहाँ वाणी और मन दोनों ही पहुँच नहीं पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा अज्ञेय है; अपितु यह कि वह विषय रूप से ज्ञेय नहीं है। वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है जिसके प्रकाश में मन और वाणी कार्य करते हैं। अतः उसे जानना वस्तुतः “स्वयं होना” है, न कि किसी अन्य वस्तु की भाँति उसे जानना।
दार्शनिक दृष्टि से यह अद्वैत का परम निष्कर्ष है। जहाँ द्वैत है, वहाँ विषय-ज्ञान सम्भव है - ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का त्रिपुटी-भेद रहता है। किन्तु जहाँ अद्वैत है, वहाँ यह त्रिपुटी लीन हो जाती है। आत्मा न ज्ञाता है, न ज्ञेय; वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है अखण्ड, निरवच्छिन्न चैतन्य।
इस अवस्था में साधक न तो किसी साधन का आश्रय लेता है, न किसी अनुभव का आग्रह करता है। वह न कुछ प्राप्त करना चाहता है, न कुछ त्यागना; वह पूर्णतः तृप्त, पूर्णतः मुक्त और पूर्णतः शान्त होता है। यही “जीवनमुक्ति” की अवस्था है जहाँ जीवन्मुक्त पुरुष संसार में रहते हुए भी उससे असंग रहता है, जैसे कमलपत्र जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है।
अतः, भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस श्लोक में यह प्रतिपादित करते हैं कि साधना का परम फल है - साधनातीत स्थिति, जहाँ साधक स्वयं ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होकर, मन और वाणी की सीमाओं से परे उस अनिर्वचनीय सत्य का अनुभव करता है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है - जहाँ न कुछ कहना शेष रहता है, न कुछ जानना; केवल होना शुद्ध, स्वप्रकाश, अनन्त ब्रह्मस्वरूप होना।
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सनातन धर्म-संस्कृति, जीवन-मूल्यों और परम् कल्याणकारी अद्वैत वेदान्त के वैश्विक प्रचार-प्रसार हेतु श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर, अनन्तश्रीविभूषित स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” सिडनी, ऑस्ट्रेलिया की अपनी आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण कर आज स्वदेश लौट आए।
“सिडनी” ऑस्ट्रेलिया प्रवास के अनंतर पूज्य आचार्यश्री जी के दर्शन, सत्संग और सान्निध्य हेतु मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट तथा ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न नगरों से प्रवासी भारतीय, भक्तगण, जिज्ञासु, मुमुक्षु और उपासक अपार श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ उपस्थित हुए। सत्संग-संगोष्ठियों में पूज्यश्री ने सनातन धर्म की दिव्य परम्परा, ऋषियों के कल्याणकारी मार्ग, सत्कर्म, नैतिकता, उच्च चरित्र, अनुशासन और जीवन-मूल्यों पर अत्यन्त प्रेरणादायी एवं ओजस्वी उद्बोधन प्रदान किए।
पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि सनातन धर्म का आचरण मनुष्य को अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों की प्राप्ति कराता है। ऋषियों द्वारा प्रदत्त मार्ग पर चलने से जीवन के संदेहों का निवारण होता है, बाधाओं का क्षय होता है तथा उन्नति, प्रगति और आत्मोन्नति के द्वार प्रशस्त होते हैं। उन्होंने सभी भक्तों को सत्कर्म, सदाचार, संयम, सेवा और आत्मकल्याण के पथ पर निरन्तर अग्रसर रहने की प्रेरणा दी।
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समाधौ क्रियमाणे तु विघ्ना आयान्ति वै बलात्।
अनुशासनराहित्यम् आलस्यं भोगलालसम् ।।१२७।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भगवान् श्री आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना-पथ के अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु अनिवार्य पक्ष विघ्नों का विशद विवेचन प्रस्तुत करते हैं। जहाँ पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने ध्यान, धारणा और समाधि की परा अवस्थाओं का निरूपण किया, वहीं यहाँ वे साधक को सावधान करते हैं कि उस उच्चतम स्थिति की ओर अग्रसर होते समय मन और अन्तःकरण में विविध प्रकार के अवरोध स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। यह चेतावनी केवल व्यावहारिक नहीं, अपितु गहन दार्शनिक आधार से युक्त है।
“समाधौ क्रियमाणे तु” - जब साधक समाधि का अभ्यास करता है, अर्थात् चित्तवृत्तियों को ब्रह्माकार बनाकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का प्रयत्न करता है, तब “विघ्नाः आयान्ति वै बलात्” विघ्न बलपूर्वक, तीव्रता से उत्पन्न होते हैं। यह “बलात्” शब्द अत्यन्त अर्थगर्भित है; यह संकेत करता है कि ये विघ्न आकस्मिक या दुर्बल नहीं, बल्कि संस्कारजन्य, दीर्घकालीन वासनाओं के रूप में शक्तिशाली होते हैं, जो साधना को बाधित करने का प्रयास करते हैं।
इन विघ्नों का मूल कारण है - अविद्या और उससे उत्पन्न वासना-समूह। उपनिषद् कहती हैं कि “पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः” इन्द्रियाँ स्वभावतः बहिर्मुख हैं; अतः मन बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त होता है। भगवद्गीता में भी भगवान् ने अर्जुन से कहा - “चञ्चलं हि मनः कृष्ण” मन अत्यन्त चञ्चल और दुष्प्रवृत्त है। अतः जब साधक उसे अन्तर्मुख करने का प्रयास करता है, तो पुरानी प्रवृत्तियाँ विरोध के रूप में उभरती हैं - यही विघ्न हैं।
भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इन विघ्नों को तीन प्रमुख रूपों में निर्दिष्ट करते हैं -
(१) “अनुशासनराहित्यम्” -
यह आत्मनियन्त्रण, नियम और संयम का अभाव है। साधना में नियमितता और व्रतशीलता अत्यन्त आवश्यक हैं। गीता में कहा गया है - “युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु” साधक को अपने आहार, विहार और आचरण में संयम रखना चाहिए। अनुशासन के अभाव में मन स्थिर नहीं हो सकता, और बिना स्थिरता के समाधि असम्भव है। यह विघ्न साधक को अनियमित, असावधान और शिथिल बना देता है।
(२) “आलस्यं” - आलस्य केवल शारीरिक जड़ता नहीं, बल्कि मानसिक प्रमाद है; एक प्रकार की जड़ता, जिसमें साधक साधना के प्रति उत्साह खो देता है। कठोपनिषद् में कहा गया है - “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” यह आत्मा निर्बल, आलसी या प्रमादी के लिए उपलब्ध नहीं होती। आलस्य साधक की प्रगति को भीतर ही भीतर रोक देता है; वह जानता है कि साधना करनी है, किन्तु करने की प्रेरणा नहीं जुटा पाता।
(३) “भोगलालसम्” - यह विषयभोगों के प्रति सूक्ष्म आकर्षण है। बाह्य त्याग के पश्चात् भी अन्तःकरण में वासनाएँ शेष रह सकती हैं। गीता में कहा गया है कि “विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः, रसवर्जं” विषय तो हट जाते हैं, किन्तु उनका “रस”, उनकी सूक्ष्म आसक्ति बनी रहती है। यही भोगलालसा है, जो साधक को पुनः संसार की ओर खींचती है। यह विघ्न अत्यन्त सूक्ष्म और गूढ़ है, क्योंकि यह प्रकट रूप में नहीं, बल्कि अन्तःकरण की गहराई में कार्य करता है।
दार्शनिक दृष्टि से ये तीनों विघ्न अनुशासन का अभाव, आलस्य और भोगलालसा अविद्या के विविध रूप हैं। ये मन को ब्रह्माकार वृत्ति में स्थिर होने से रोकते हैं और साधक को पुनः नाम-रूपात्मक जगत् की ओर प्रवृत्त करते हैं। ब्रह्मसूत्र में भी यह संकेत मिलता है कि बिना अभ्यास और वैराग्य के ज्ञान स्थिर नहीं होता - “अभ्यासोपदेशात्”
इन विघ्नों का निवारण भी भगवद्पाद की शिक्षाओं में निहित है - नियमित अभ्यास, वैराग्य, विवेक और गुरु-शास्त्र के प्रति श्रद्धा। साधक को चाहिए कि वह निरन्तर सजग रहे, अपने अन्तःकरण का निरीक्षण करे, और जैसे ही कोई विघ्न उत्पन्न हो, उसे पहचानकर विवेकपूर्वक उसका निराकरण करे।
अन्ततः, यह श्लोक साधना के मार्ग में एक यथार्थ चेतावनी है कि आत्मसाक्षात्कार की यात्रा केवल उच्च आदर्शों से नहीं, बल्कि सूक्ष्म आत्मसंयम, जागरूकता और निरन्तर अभ्यास से पूर्ण होती है। विघ्नों का आगमन असफलता का संकेत नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि साधक सही दिशा में अग्रसर है। उन्हें पहचानकर, उनसे ऊपर उठकर ही साधक समाधि की स्थिरता और ब्रह्मनिष्ठा की पूर्णता को प्राप्त करता है।
अतः भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य का यह उपदेश साधक को केवल सावधान ही नहीं करता, बल्कि उसे दृढ़ता, सजगता और आन्तरिक अनुशासन की ओर प्रेरित करता है; यही साधना का वास्तविक तप है, और यही आत्मसाक्षात्कार की अनिवार्य सीढ़ी।
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वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषिकाओं से लेकर आधुनिक भारत की सामर्थ्यवान मातृसत्ता तक परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में नारी का योगदान अतुलनीय, अविस्मरणीय और सनातन संस्कृति का जीवनाधार रहा है। भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति को केवल जैविक जननी के रूप में नहीं देखा गया, अपितु उसे सृष्टि की आधारशक्ति, धर्म की संरक्षिका, संस्कारों की जननी तथा लोकमंगल की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वेदों में जहाँ घोषा, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी ऋषिकाएँ ब्रह्मविद्या की परम साधिका बनकर ज्ञान की दिव्य परम्परा को आलोकित करती हैं, वहीं आधुनिक भारत में भी मातृशक्ति अपने धैर्य, तप, त्याग, करुणा और अदम्य संकल्प से राष्ट्रजीवन को दिशा प्रदान कर रही है।
भारतीय दर्शन में परमात्मा के विविध पारमार्थिक-अनुप्रयोग करुणा, कोमलता, वात्सल्य, पवित्रता, क्षमा और औदार्य मातृसत्ता में ही सर्वाधिक मूर्तिमान होकर अभिव्यक्त होते हैं। माँ केवल एक सम्बन्ध नहीं,अपितु वह अनन्त प्रेम का ऐसा दिव्य स्रोत है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि के लिए स्थान है। वह अपने अस्तित्व का प्रत्येक अंश अपने संतानों के कल्याण में अर्पित कर देती है। इसी कारण भारतीय मनीषा ने माता को देवताओं से भी उच्च स्थान प्रदान करते हुए कहा- “मातृदेवो भव” !
नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया॥
अर्थात् माता के समान कोई छाया नहीं, माता के समान कोई आश्रय नहीं, माता के समान कोई रक्षक नहीं और माता के समान कोई प्रिय भी नहीं। यह श्लोक केवल भावनात्मक स्तुति नहीं, बल्कि मानव जीवन के शाश्वत सत्य का उद्घोष है। माँ का वात्सल्य जीवन की प्रथम पाठशाला है। उसके स्नेह में सुरक्षा है, उसकी वाणी में संस्कार हैं और उसके तप में सम्पूर्ण परिवार की मंगलकामना निहित रहती है।
‘माँ’ शब्द स्वयं परमात्मा की भाँति विराट, व्यापक और अनन्त संवेदना का प्रतीक है। जिस प्रकार परमात्मा समस्त जगत् का पालन करते हुए निरन्तर लोकमंगल में रत रहता है, उसी प्रकार माता भी अपने जीवन का प्रत्येक क्षण दूसरों के सुख, संरक्षण और उत्थान के लिए समर्पित कर देती है। वह स्वयं कष्ट सहकर भी परिवार को सुख देती है, स्वयं तपकर भी संतानों के जीवन में प्रकाश भरती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को भी “धरणी माता”, गंगा को “गंगा माता”, गौ को “गौ माता” और वेदभूमि भारत 🇮🇳 को “भारत माता” कहकर संबोधित किया गया है। मातृत्व यहाँ केवल सम्बन्ध नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व का आध्यात्मिक अनुभव है।
वैदिक ऋषियों ने नारी को सृष्टि की मूल चेतना माना है। देवीसूक्त में ऋषिका कहती हैं- “अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्” अर्थात् मैं राष्ट्र को धारण करने वाली शक्ति हूँ। यह उद्घोष दर्शाता है कि राष्ट्र निर्माण का मूल आधार मातृशक्ति ही है। किसी भी समाज की संस्कृति, नैतिकता, संवेदना और आध्यात्मिक चेतना का निर्माण माँ की गोद में ही होता है। यदि मातृशक्ति संस्कारित, जागृत और सशक्त है, तो राष्ट्र स्वतः समृद्ध, सभ्य और प्रकाशमान बन जाता है।
आज के युग में जब भौतिकता, प्रतिस्पर्धा और आत्मकेन्द्रित प्रवृत्तियाँ जीवन-मूल्यों को चुनौती दे रही हैं, तब मातृत्व की करुणा, त्याग और सहिष्णुता सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। माँ केवल अपने परिवार का पालन नहीं करती, वह समाज में संवेदना, संयम और सहअस्तित्व के संस्कार भी स्थापित करती है। उसका मौन तप ही सभ्यता की निरन्तरता का आधार है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, अपितु समस्त मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और वंदन का पावन अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि हमारे जीवन की प्रत्येक उपलब्धि, प्रत्येक संस्कार और प्रत्येक सफलता के मूल में किसी माँ का मौन त्याग, निस्वार्थ प्रेम और अनन्त आशीर्वाद निहित है। विधाता को अपने उदर में पोषित करने वाली, प्राणी मात्र के कल्याण हेतु अपना सर्वस्व आहूत कर देने वाली समस्त मातृसत्ता को कोटिशः नमन। मातृत्व मानवता की वह दिव्य धारा है जो इस सृष्टि को करुणा, प्रेम और जीवन से सिंचित करती रहती है।अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
Motherhood is the purest manifestation of unconditional love, compassion, sacrifice and divine grace. A mother nurtures life with boundless affection, strength and selflessness, and her presence illuminates the path of humanity with tenderness and wisdom. May this sacred occasion inspire all to honour, respect and cherish the eternal greatness of motherhood.
Heartiest greetings and best wishes on the occasion of International Mother’s Day.
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