कविता घर (@kavitaaGhar ) की एक नई पहल। आज कल साहित्य प्रेमी भी हैं और उनकी किताबें भी। उन्हीं किताबों को पाठकों तक पहुंचाने की एक पहल है किताब घर।
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एक बहुत अच्छे दिन
मैं बेहद गहरी नींद से उठूँगा
और तुम्हारा शहर
खिड़की के बाहर होगा।
मुझे ज़िन्दगी एक रात
इतनी तसल्ली की गहरी नींद जरूर देगी।।
(फ़ोटो:चश्मे बद्दूर, 1981)
तुम अपना समझना,
और वह सब कहने का
प्रयत्न करना,
जो तुम कह नहीं पाए कभी
मैं सब सुनूंगी,
तुम सब कुछ कहते रहना,
तुम रोने से भयमुक्त होना ।
मैं तुम्हारे साथ रो��ंगी
तुम सब कुछ कहते जाना,
मैं सिर्फ तुम को संभाले रखूंगी,
तुम अपना डर, चिंता- नि:संकोच देना,
साहस में दूंगी तुमको,
कि मैं साथ निभाऊंगी हमेशा तेरा ,
मेरा साथ सुहावना लगे तुझे,
ऐसा तुझे बनाऊंगी।
तू सब कुछ कहते जाना,
मैं सिर्फ तुझको संभाले रखूंगी।
~ @Himalaya_range
‘कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा’
मंगलेश डबराल की इस पंक्ति के साथ यह भी कहना इन दिनों ज़रूरी है कि प्रकाशकों में भी बचा रहे थोड़ा धैर्य―बनी रहे थोड़ी शर्म।
(https://t.co/8PcLvqhAGS)
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भूलने के लिए
बस भूलने की कोशिश से बाज़ आना चाहिए
भूलने में कुछ भी नाटकीय नहीं है
सिवा भूल जाने की अकस्मात् याद आ जाने के
- आशुतोष दुबे
वाया @seenubanarsi
कभी धूप हूं,कभी छांव हूँ ,
हा मैं ही तुम्हारा गांव हूं।
जीवन के तमाम झंझावातों से
पार लगाया जिसने मैं वही नाव हूं,
हां मैं ही तुम्हारा गांव हूं।
शहरों की कोयल सी लगने व���ली छलावा जिंदगी तो नहीं ,
गांव के कौवों का प्यारा सा लगने वाला कांव कांव हूँ,
हां मैं ही तुम्हारा गांव हूँ।
आधुनिक युग में मोटर,
रेलगाड़ी ,जहाज की भागा भागी के बावजूद,
जिसने तुम को पहुंचाया मंजिल तक
मैं तुम्हारी वही बैलगाड़ी
और तुम्हारा अपना वहीं पांव हूं,
हां मैं ही तुम्हारा गांव हूं।
प्रतिस्पर्धा की इस रेस में
मानवता इंसानियत सब गए थे भूल हम,
हमारी हर प्रतिस्पर्धा पर जो पड़ा सबसे भारी,
मैं प्रकृति का वही धोबी पछाड़ दांव हूँ
हां मैं ही तुम्हारा गांव हूं
हां मैं ही तुम्हारा गांव हूं।
~ @IGOVINDCHAUHAN_
गर जो इजाजत हो तुम्हारी तो
तुम्हारे सीने में धड़कन बन,
ताउम्र धड़कना चाहती हूं मैं,
एक आवारा भंवरे की गुंजन सी,
सिर्फ तुम में ही चह��ना चाहती हूं मैं...!
- गुंजन शिशिर @GunjanA91754583