चाहे प्रशांत किशोर चुनाव जीतें या हारें। लेकिन बिहार की राजनीति में पिछले 3 सालों में जितनी मेहनत उन्होंने की है। वैसी मिसाल आज तक किसी नेता ने नहीं पेश की।
जब उन्होंने पदयात्रा की शुरुआत की थी, तब बहुतों ने इसे असंभव कहा था। लेकिन दिन-रात, गर्मी-बरसात, धूप-धूल और ठंडी हवाओं के बीच पैदल चलते हुए, गली-गली और गांव-गांव जाकर उन्होंने वो कर दिखाया जो आज के बड़े से बड़ा नेता करने की हिम्मत नहीं करता।
जब बाकी नेता चुनाव आने पर ही जनता को याद करते हैं, प्रशांत किशोर ने तीन साल लगातार हर गांव, हर गली, हर घर तक पहुंचकर दिखा दिया कि राजनीति सिर्फ़ मंच से भाषण देने का नाम नहीं है....राजनीति है जनता की ज़िंदगी को समझने का साहस।
3 सालों में PK ने सिर्फ़ मंच से भाषण नहीं दिए बल्कि हर घर जाकर लोगों से मुलाकात की। किसानों की तकलीफें सुनीं, बेरोज़गार युवाओं के साथ बैठकर उनके सपनों की चर्चा की और गांव की महिलाओं से मिलकर उनकी परेशानियों का समाधान ढूंढा।
आज राजनीति का मतलब जहां केवल कुर्सी और सत्ता तक सीमित हो गया है, वहीं PK ने किसानों के खेत में जाकर मिट्टी की गंध महसूस की, युवाओं के साथ बैठकर बेरोज़गारी की पीड़ा सुनी और गांव की औरतों के आंसुओं में छिपे दर्द को महसूस किया। यही है वो राजनीति, जिसे आज लोग मिस कर चुके थे।
इतिहास गवाह है..पद, कुर्सी और सत्ता के लिए बहुत नेता आए और गए लेकिन जनता के लिए इतना पसीना बहाने वाला, इतनी लंबी पदयात्रा करने वाला और इतनी सच्चाई से जनता के बीच खड़ा होने वाला नेता, सिर्फ़ प्रशांत किशोर ही हैं।
इसलिए नतीजा चाहे जो भी हो… आने वाली पीढ़ियां उन्हें हमेशा याद करेंगी। एक ऐसे नेता के तौर पर, जिसने राजनीति को फिर से जनता के दरवाज़े पर लाकर खड़ा कर दिया।
सच यही है कि जंजीर फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के जगह अगर विपुल मिश्रा को ले लिया गया रहता तो आज वह सदी के महानायक होते। लेकिन उन्हें नहीं लिया गया क्योंकि वह एक निडर हिंदू थे। जो किसी भी क़ीमत पर अपने धर्म से समझौता नहीं कर सकते थे।
लेकिन उनके इस त्याग के बदले हिंदू समाज ने उन्हें क्या दिया? कुछ भी नहीं? फिर इस समाज के पतन के लिए मोदी जी कैसे जिम्मेदार है?
जो समाज विपुल मिश्रा जैसे त्यागियों को नहीं पहचानता उसके मंदिर से होने वाली चोरी का हिसाब कैसे पब्लिश होगा?
सादर 🙏🏼
किसी भी कैंपेन का कोर होता है उसका मैसेजिंग। योगी आदित्यनाथ अमित शाह के साथ अपने मीटिंग के बाद UP 2027 कैंपेन की मैसेजिंग शुरू कर दिए हैं जिसमें हार्ड हिंदुत्व के साथ विकास की बाते होंगी + लाभार्थी बेस को सुदृढ़ करने के साथ रेवड़ी बाँटकर उसे और विस्तृत करना होगा।
बिजली पर सरकार बैकफुट पर है और लॉ एंड ऑर्डर पर अभी मिक्स्ड माहौल है लेकिन सपा को इस दोनों फ्रंट पर कोई एज नहीं है।
बीच में सपा के ओर से खबर आई थी कि उनका काम PK की अल्टरनेट कंपनी शोटाइम देख रही है , फिर भी सेंट्रल मैसेजिंग में कोई सुधार नहीं है। बोर्न सोशलिस्ट्स सब का पैशन अन्य जातियों को गलियाना और उसे अपना विचारधारा बताना है। उससे कोई भी एजेंसी अखिलेश को मुक्ति नहीं दिला सकती।
जिस नवीन शर्मा को अखिलेश ने ख़ुद जॉइन कराया था कल उनके एक पोस्टर मात्र से अनिल जादो जैसे कॉक्रोच तिलमिला गये थे कि ऐसे कैसे हमारी सिंक और कचरे वाली लाइन से अपना एक अलग लाइन रख दिया। अगर ऐसा ही रहा तो फिर UP 2027 में भी बिहार रिपीट होगा।
फिर बोर्न सोशलिस्ट्स सब मुँह में पाँच साल PDA लेकर गुलगुलाते रहेंगे और अन्य जातियों को गाली देकर क्रांति करते रहेंगे।
कुछ हो या न हो, बिहार का राजनीतिक चूल्हा कभी ठंडा नहीं पड़ता। बांकीपुर से @PrashantKishor के चुनाव लड़ने की पूरी संभावना बताई जा रही है। @jansuraajonline भी चुनाव लड़ने को तैयार दिख रही है। अब उम्मीदवार तो पार्टी को ही तय करना है।
छह महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव खत्म हुए हैं, दो बार सरकार बन चुकी है। आपराधिक और अमानवीय घटनाएं हर रोज चर्चा में हैं, लोग लाठियां खा रहे हैं, पुल गिर रहे हैं, क्षेत्रवाद और भाषा को लेकर बिहारियों के साथ क्या हुआ उस पर लोग भावुक हैं, और अब तक राज्य में कोई बड़ा निवेश भी नहीं हुआ जिससे रोजगार बढ़े।
लेकिन फिर भी लोगों को इसमें ज्यादा दिलचस्पी है कि बांकीपुर से बीजेपी किस जाति को टिकट देगी, कौन-सा समीकरण बैठेगा, कैसे चुनाव फंसेगा। यह जात, वो जात, ऐसा समीकरण, वैसा समीकरण मतलब अब आपको अचानक से राजनीतिक विशेषज्ञों की बाढ़ दिखने लगेगी, चुनाव होने तक। प्रशांत किशोर को सलाह देने वालों की भी कतार लगा जाएगी।
इसलिए कहता हूं, बिहार की राजनीतिक समझ शून्य के बराबर है। तभी तो राज्य अब तक लगभग 40 मुख्यमंत्री देख चुका है। ढाई साल से ज्यादा राष्ट्रपति शासन भी देख चुका है, और अगर औसत निकाला जाए तो 1952 के बाद एक मुख्यमंत्री के हिस्से दो साल का स्थिर शासन भी ठीक से नहीं आता। 17 नहीं तो कम से कम 10 मुख्यमंत्री का पूर्ण कार्यकाल तो राज्य को देखना ही चाहिए था।
बिहार के लोगों को जाति की समझ अधिक हो सकती है, मगर राजनीति की नहीं। अगर राजनीति की समझ होती तो हालत इतनी खराब नहीं होती।
विडंबना देखिए! लोग परेशान भी हैं, तकलीफ में भी हैं, मगर बदलाव भी नहीं चाहिए। ऐसा नहीं है कि प्रशांत किशोर के आ जाने से सब कुछ रातों-रात बदल जाएगा, मगर कम से कम एक राजनीतिक विकल्प तो खड़ा होता है, जो आपकी आवाज उठा सके। यह अलग बात है कि अगर आपको एक ही पार्टी, एक ही विचार और एक ही व्यवस्था चाहिए, तो फिर व्यवस्था का रोना छोड़ दीजिए।
चुनाव आते-आते जाति इतनी चर्चा में आ जाएगी कि लोग भूल जाएंगे कि बिहार आज भी देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता है। अगर यही स्वीकार कर लिया है, तो फिर जाति-जाति का ही विकास कर लीजिए और करवाइए। क्या पता सौ-दो सौ साल में सामूहिक रूप से बिहार भी विकसित हो जाए।
एक बात याद रखिए, बिहार के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ही बिहार की छवि और धारणा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इन जातीय गणित के विशेषज्ञों ने राज्य का सत्यानाश किया है। राजनीति का नशा इतना है कि राज्य पीछे छूट गया। जिस दिन प्रोग्रेसिव राजनीति की बात होगी, उसी दिन बिहार का भला शुरू होगा।
@PrashantKishor या @jansuraajonline को कोई सलाह नहीं। आप चुनाव लड़िए, और दिल से लड़िए। और जिन्हें सबकुछ परफेक्ट चाहिए, वो खुद मैदान में आ जाएँ,उनका भी स्वागत।
#Bihar
#BiharPolitics
गोदभराई, रिंग सेरेमनी, महिला संगीत,
मेहंदी हल्दी, प्री वेडिंग शूट
ये सब नए चोंचले सीरियल ने शुरू करवाए।
इन सब ढकोसलों ने मिडिल क्लास
फैमिली ही नहीं गरीबो को भी
दीमक की तरह चाटना शुरू कर दिया है।
पहले भी तो शादी इन सबके बिना होती थी!
मैं घर में दही लेकर आता हूँ तो मुझसे दस सवाल किए जाते हैं, कहां से लेकर आया... "जहां से कहा गया था वहीं से लेकर आया न, कहीं और से तो नहीं लाया..." और अगर दही गलत दुकान वाली निकल जाय, तो पूरे दिन ताने सुनो या दही वापस करके आओ ... इतनी चलती है मेरी घर में
और ये BKL चाहते हैं मैं अपने घरवालों को कनविंस करूँ कि... "अमरीका में एक लड़ऊ रहता है, उसने भारत में एक कॉकरोच पार्टी बनाई है ... अगले चुनाव में हमें उसी पार्टी को वोट करना है और उस लड़ऊ को प्रधानमंत्री बनाना है"
ये सुनकर एक आम हिन्दुस्तानी मां बाप अपनी खुद की औलाद के गले पर घुटना रख के कच्च से दबा देंगे ... चाहे वे मां बाप किसी भी पार्टी के समर्थक हों।
@Ayurvedictips_ लालू प्रसाद यादव क्योंकि:
8 बार विधायक रहे
7 बार सांसद रहे
3 बार बिहार के मुख्यमंत्री बने
1 बार रक्षा मंत्री रहे
और 1975 की इमरजेंसी के दौरान जेल भी गए थे।
युवाओं को सिर्फ मंदिर जाने वाला, भजन सुनने वाला या रील देखने वाला समझ लेना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है।
आज का युवा खाटू श्याम भी जाता है और नौकरी की चिंता भी करता है। महाकाल के दर्शन भी करता है और पेपर लीक पर सवाल भी पूछता है।
राम मंदिर पर गर्व भी करता है और महंगी शिक्षा, बेरोजगारी, महंगे किराए और कम अवसरों से भी जूझ रहा है।
आस्था और अधिकार, दोनों साथ साथ चल सकते हैं। किसी युवा की धार्मिक पहचान दिखाकर उसकी आर्थिक परेशानियों को छोटा नहीं किया जा सकता।
और जहां तक अमेरिका में बैठकर” राजनीति करने की बात है, आज की दुनिया डिजिटल है।
अगर विदेश में बैठा कोई व्यक्ति भारत के युवाओं की बात नहीं समझ सकता, तो फिर विदेशों में बैठकर भारत की कंपनियां चलाने वाले CEO, निवेशक और टेक एक्सपर्ट भी भारत पर राय देना बंद कर दें?
असल सवाल यह नहीं है कि कौन कहां बैठा है।
असल सवाल है कि कौन युवाओं की असली समस्याओं पर बात कर रहा है।
रील लाइफ का ताना देने वाले लोग भी आज पूरी राजनीति Instagram Reel, PR वीडियो और ट्रेंडिंग हैशटैग पर ही चला रहे हैं।
युवा अब सिर्फ भीड़ नहीं है। वह सवाल पूछ रहा है, तुलना कर रहा है और अपने भविष्य को लेकर गंभीर है।
और यही बदलाव सबसे ज्यादा डर पैदा कर रहा है।
काश! हमारी पिछली रिपोर्ट्स ,जैसे
•FSSAI के खिलाफ,
•MPLADS में भ्रष्टाचार के खिलाफ,
•जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार के खिलाफ ,
•फर्जी सर्टिफिकेट से UPSC निकालने वालों के खिलाफ
•कई IAS IPS और IRS को एक्पोज करने वाली रिपोर्ट्स पर
•ये ठीक करके दिखाओ कैंपेन के दौरान
•अस्पतालों पर एक्पोज पर
•शिक्षा व्यवस्था पर एक्पोज पर
•अधिकारियों के भ्रष्टाचार एक्पोज पर
मीडिया ने 20 प्रतिशत भी लिखा होता तो सिस्टम में बहुत बड़ा बदलाव आ जाता , खैर, हम लगे हैं लगे रहेंगे,
आगे और बहुत बड़े खुलासे करने है।