वैसे राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी पर किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए!!
आख़िर जो “राम को लाए हैं”, वो राम को लाने का “किराया” वसूल रहे हैं तो इसमें ग़लत क्या है?
सोचिए, जब मोदी जी विदेश यात्रा पर जाते हैं, तो उनके आने जाने, रहने, खाने का खर्चा सैकड़ों करोड़ का होता है।
और यहाँ तो "राम को लाने" वाले उन्हें “त्रेता युग” से लाए हैं, तो इतनी दूर से आने का किराया-भाड़ा हज़ारों करोड़ से कम क्या होगा?
ऐसे में भक्तों, अपना आशीर्वाद बनाए रखिए, और ख़ूब दिल खोल कर भगवान राम के मंदिर में दान कीजिए,
और ये समझ कर दान करिए कि आपका योगदान, राम को लाने में हुए ख़र्चे का "रीइंबर्समेंट" है…
जय सियाराम…
यदि नीचे लिखी बातों को पढ़ने के बाद भी इन चूतिया 52 महाराज को सच समझ में नहीं आता है तो समझना कि " ये चूतियां 52 महाराज दिमाग से भी सुदामा है!
नहीं, डॉ. भीमराव अंबेडकर भारत की आजादी के विरोधी नहीं थे।
वे स्वतंत्रता के समर्थक थे, लेकिन उनका फोकस मुख्य रूप से दलितों और शोषित वर्गों की सामाजिक-आर्थिक आजादी पर था। उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व वाले आंदोलन की आलोचना की क्योंकि उसमें अछूतों/दलितों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं थी। उनका मानना था कि ब्रिटिश राज से मुक्ति के बिना सामाजिक न्याय सुनिश्चित किए, आजादी सिर्फ ऊपरी वर्गों के लिए फायदेमंद होगी, न कि पूरे समाज के लिए।
मुख्य तथ्य:
उन्होंने राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में भाग लिया और दलितों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की (पूना पैक्ट)।
वे भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के विरोधी थे, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे अराजकता फैलेगी और जापान जैसे दुश्मन का फायदा हो सकता है। लेकिन यह पूर्ण स्वतंत्रता का विरोध नहीं था।
स्वतंत्रता के बाद वे स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बने और भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में ऐतिहासिक योगदान दिया।
उन्होंने हमेशा कहा कि सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है।
कुछ लोग उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर "विरोधी" बताते हैं, लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्य साफ हैं — वे राष्ट्रीय एकता और समानता आधारित आजाद भारत चाहते थे, न कि ब्रिटिश राज का समर्थन। वे राष्ट्रवाद से ऊपर मानववाद को रखते थे l
संक्षेप में: नहीं, वे विरोधी नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने राजनीतिक आजादी के साथ सामाजिक क्रांति भी मांगी।
@JaipurDialogues चूतियां 52 महाराज...
अच्छा पूरी मूवी में रंगा बिल्ला नाम है ?
जब आरोपियों के नाम भी रियल नहीं, स्टोरी भी फिक्शन है मिक्स करके बनायी है। तो तुझे सिर्फ इंस्पेक्टर के नाम में एससी नाम देख कर कलेजे पर बिच्छू क्यों लोट गए ?
@UnreservedMERIT EWS आरक्षण से (-13) अंक से सरकारी नौकरी की चोरी करने वाले चूतियां 52 महाराज मार्कशीट की बात कर रहा है... ओर जिसे सही से मार्कशीट लिखना नहीं आता है.. ये चूतियां मार्कशीट दिखाने की बात कर रहा है... है ना ये अक्ल से सुदामा...
ये अंग्रेज सरकार में ICS अधिकारी था ओर इसने हर अंग्रेज सरकार के गलत आदेशों की पालना कराने में पूर्ण निष्ठा से सहयोग किया था ओर इसी से खुश हो कर अंग्रेज सरकार ने इसे अपने दारा नॉमिनी करने पर जज भी बनाया था l लेकिन इसके जाति भाई इसे बेवजह संविधान निर्माता बोलते हैं और इसे देश भक्त भी बोलते हैं l अब आप लोग ही तह करे कि ये किस आधार पर देश भक्त हैं?
नोट:- ये अधिकारी हर महीने अंग्रेज सरकार से बड़ा वेतन भी लेता था l
EWS और UPSC स्कैम।
UPSC 2025 में 104 कैंडिडेट EWS कोटा से चुने गए!
उनमे से 67 ऐसे कोचिंग से पढ़े जिसकी फीस लाखों में थी।
14 कैंडिडेट IIT से ग्रेजुएट थे।
28 के माता-पिता का बिजनेस है।
10 MNCs में नौकरी करते थे।
ग़ज़ब खेल चल रहा है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर साइमन कमीशन (Indian Statutory Commission, 1927-28) के सामने मुख्य रूप से दलित वर्गों (Depressed Classes) के राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा तथा उनके उन्नयन के उद्देश्य से पेश हुए थे।
मुख्य संदर्भ और पृष्ठभूमि:
साइमन कमीशन ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए गठित किया गया था (सभी सदस्य ब्रिटिश थे, कोई भारतीय नहीं)।
कांग्रेस और कई राष्ट्रवादी दलों ने इसका बहिष्कार किया, लेकिन डॉ. अंबेडकर (बंबई विधान परिषद के सदस्य के रूप में) और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की ओर से सहयोग किया। उन्होंने 23 अक्टूबर 1928 को पूना में कमीशन के सामने साक्ष्य दिए और memorandum पेश किया।
प्रमुख उद्देश्य और मांगें:
दलितों/अछूतों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व:
संयुक्त निर्वाचन (Joint Electorates) के साथ आरक्षित सीटें (Reserved Seats) की मांग।
बंबई विधान परिषद में दलितों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व (लगभग 22 सीटें प्रस्तावित)।
उन्हें अलग अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता और राजनीतिक अधिकार।
वयस्क मताधिकार (Adult Suffrage):
साक्षरता या संपत्ति की बजाय उम्र को आधार बनाकर सभी वयस्कों को मताधिकार देने की वकालत। उन्होंने तर्क दिया कि अशिक्षा का दोष सरकार का है, इसलिए अशिक्षितों को मताधिकार से वंचित करना अन्याय है।
शिक्षा और आर्थिक उन्नयन:
दलित वर्गों की शिक्षा को प्रांतीय राजस्व का प्रथम दायित्व (First Charge on Revenues) बनाना।
उनकी गरीबी, सामाजिक और राजनीतिक दशा को दूर करने के लिए विशेष प्रावधान।
नौकरियों और सुरक्षा में अवसर:
सेना, नौसेना और पुलिस में भर्ती का अधिकार।
सामाजिक भेदभाव (छुआछूत) से मुक्ति और सुरक्षा।
संवैधानिक सुधार:
प्रांतीय स्वायत्तता, केंद्र में डायार्की (Dyarchy) आदि पर अपने विचार रखे।
उन्होंने बंबई प्रेसिडेंसी के पुनर्गठन और सामान्य राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ावा देने वाले विचार भी व्यक्त किए।
उनका दृष्टिकोण:
अंबेडकर का मानना था कि कांग्रेस जैसे संगठनों के संविधान प्रस्तावों में दलितों के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं थी। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश कमीशन का उपयोग दलितों की आवाज़ पहुंचाने के लिए किया। उनका उद्देश्य सामाजिक न्याय और राजनीतिक सशक्तिकरण था, न कि ब्रिटिश शासन का समर्थन। यह बाद में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस और पूना पैक्ट (1932) में भी प्रतिबिंबित हुआ।
नोट: उनके साइमन कमीशन संबंधी विस्तृत साक्ष्य और रिपोर्ट "Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches" (BAWS, Volume 2) में उपलब्ध हैं।
ये प्रयास दलितों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने और स्वतंत्र भारत के संविधान में उनके अधिकारों की नींव रखने में महत्वपूर्ण साबित हुए।
@Shubhamshuklamp चूतियां 52 महाराज की एक समस्या है कि" जाति है की जाती नहीं है l"
एक अपराधी जो पुलिस अधिकारियों के सामने बंदूक तान रहा है...उसकी जाति देख कर चूतिया 52 समाज इसका बचाव कर रहा है l
शर्म आनी चाहिए इन लोगो को...
@UnreservedMERIT इन दोनों UPSC Topper में एक बहुत बड़ा अंतर है:-
टीना डाबी ने पहले अटेम्प्ट में UPSC Topper बनी थी l
ओर शक्ति दुबे 5 अटेम्प्ट में UPSC Topper बनी है l
नोट:- ये ही अंतर अर्जुन ओर एकलव्य में था l
@talk2anuradha अच्छा पूरी मूवी में रंगा बिल्ला नाम है ?
जब आरोपियों के नाम भी रियल नहीं, स्टोरी भी फिक्शन है मिक्स करके बनायी है। तो तुझे सिर्फ इंस्पेक्टर के नाम में एससी नाम देख कर कलेजे पर बिच्छू क्यों लोट गए ?
ये अंग्रेज सरकार में ICS अधिकारी था ओर इसने हर अंग्रेज सरकार के गलत आदेशों की पालना कराने में पूर्ण निष्ठा से सहयोग किया था ओर इसी से खुश हो कर अंग्रेज सरकार ने इसे अपने दारा नॉमिनी करने पर जज भी बनाया था l लेकिन इसके जाति भाई इसे बेवजह संविधान निर्माता बोलते हैं और इसे देश भक्त भी बोलते हैं l अब आप लोग ही तह करे कि ये किस आधार पर देश भक्त हैं?
हाल ही रिलीज हुई बेव सीरीज़ “राख़” में अभिनेता अली फैज़ल इंस्पेक्टर “जयप्रकाश जाटव” का मुख्य किरदार निभा रहे हैं।
अभी तक फ़िल्मों में भी दलितों को सिर्फ़ पीड़ित या कमज़ोर दिखया जाता था लेकिन अब बदलाव हो चुका हैं इसलिए अब दलितों में “जाटव” को मुख्य किरदार एवं उनके संघर्ष के बलबूते पर हर क्षेत्र दे रहे योगदान को भी दिखाया जा रहा हैं।
बाकी आप इस वेब सीरीज़ को देखिए बहुत ही शानदार सीरिज है।
बिल्कुल चूतियां महाराज तू सच बोल रहा है...8 लाख कमाने वाला सवर्ण गरीब कैसे हो सकता है? आज कल के सवर्ण समाज में बच्चे दिमाग से सुदामा पैदा हो रहे हैं l तभी तो ews आरक्षण मिलने के बाद भी (-13) नंबर ला कर सरकारी नौकरी हासिल कर रहे हैं l अब मैरिट जाति देख कर पैदा नहीं होती है l मैरिटधारी जीव हर समाज, जाति ओर वर्ग में पैदा हो रहे हैं, लेकिन दिमाग से सुदामा सिर्फ ओर सिर्फ सवर्ण समाज में पैदा हो रहे हैं l ये एक चिंता का विषय है l
"ये (पीएम मोदी) नेहरू को कैसे पछाड़ सकते हैं? नेहरू ने तो इतनी किताबें लिखी, इतने ज्ञानी थे। देश के नींव रखी, नेहरू 17 साल पीएम रहे, जबकि मोदी को अभी 12 साल हुए हैं"
-प्रोफेसर राम पुनियानी (लेखक)
@rpuni