ब्रिटिश काल में भी गांधीजी को कई बार उनके आंदोलनों और अनशनों के दौरान जबरन गिरफ्तार किया जाता था ताकि जनता के बीच उनकी आवाज को दबाया जा सके। आज आज़ाद भारत में एक शांतिपूर्ण सत्याग्रही को इस तरह बलपूर्वक हटाए जाने की घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज की व्यवस्था में गांधीवादी तरीकों से असहमति जताने के अधिकार को स्वीकार करने का धैर्य खत्म हो रहा है?
बनासकांठा कांग्रेस जिलाध्यक्ष एवं थराद के पूर्व विधायक, संघर्षशील और जनप्रिय नेता आदरणीय श्री गुलाब सिंह जी राजपूत को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।
@GulabsinhRajput
ये चमन यूं ही रहेगा, और हजारों बुलबुलें
अपनी-अपनी बोलियां सब, बोलकर उड़ जाएंगी
बशीर बद्र साहब नहीं रहे। उनका रचा हुआ हमेशा रहेगा। उनकी कुछ पंक्तियां तो इतनी खूबसूरत हैं कि लोगों की जुबान पर ही रहती हैं। ये समय से परे हैं। आने वाली पीढ़ियां भी इन्हें कहेंगी, गुनेंगी और गुनगुनाएंगी। लेखक कभी मरते नहीं हैं। अपने सृजन में जीवित रहते हैं। हमेशा।
अलविदा बशीर साहब
बशीर बद्र साहब का जाना केवल एक शायर का चले जाना नहीं, हिन्दुस्तानी ज़ुबान की एक नरम रूह का बिछड़ना है। उनकी शायरी में शोर नहीं, एक गहरी गूँज थी।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
अलविदा बशीर साहब।
राजस्थान हाई कोर्ट ने सरकार को 31 जुलाई तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के दिए आदेश
लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट है
काका को लगता है जब सरकार चाहेगी तब चुनाव होगा 🙏
मैंने रविंद्र सिंह भाटी को क्यों टोका?
1998 का साल था। तारीख थी 9 नवंबर। राजस्थान विश्वविद्यालय के द्वार पर छात्रों का धरना चल रहा था। चुनाव लेट हो गए थे। कुलपति का चार्ज किसी आईएएस अफसर को दे दिया गया था। नतीजे आए नहीं थे और नया सत्र शुरू हो गया था। इसके अलावा भी छात्रों की बहुत सारी समस्याएं थी।
चुनाव से पहले छात्रों के धरने और प्रदर्शन सामान्य बात हैं। छात्र नेता खुद को आगे लाने के लिए धरने और प्रदर्शन करते ही हैं। समस्याएं हर साल होती हैं। उस साल कुछ ज्यादा थी। धरना प्रदर्शन में ध्यान खींचने वाली कुछ चीज सभी छात्र नेता और दूसरे लोग करते ही हैं। जैसे ही आप कुछ एक्स्ट्राऑर्डिनरी करते हैं तो सरकार, प्रशासन और आम लोगों का ध्यान उधर एकदम से चला जाता है।
छात्रों के उस धरने में भी ऐसी ही कुछ प्लानिंग की गई। निशांत भारद्वाज नाम के एक छात्र को तैयार किया गया कि वह अपने ऊपर पेट्रोल डाल लेगा। उसे आग लगने से पहले ही बचा लिया जाएगा या आग लगाने के बाद बचाया जाएगा, क्या तय हुआ था, इस बारे में मैं ठीक-ठीक कुछ दावा नहीं कर सकता लेकिन बात कुछ ऐसी ही हुई थी।
प्लानिंग के अनुसार निशांत भारद्वाज ने खुद के ऊपर पेट्रोल डाल लिया। आग भी लग गई। निशांत को बचाने के लिए लड़के दौड़े भी लेकिन तब तक आग फैल गई और जब आग फैल जाती है तो वह किसी के भी काबू में नहीं आती और कोई भी उसके पास में आने से डरता ही है। पेट्रोल से भड़की आग ऐसी ही होती है। वह आग नहीं जानती कि आप कोई छात्र नेता हो या नेता हो या कोई गृहिणी हो या कोई आम आदमी हो।
निशांत काफी हद तक जल चुका था। थोड़ी ही देर में पुलिस और एंबुलेंस वगैरह सब आ गई। निशांत को अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे बचाने की खूब कोशिश की लेकिन अंतत: उसे बचाया नहीं जा सका। उस घटना को 28 साल बीत गए। जिनको नेता बनना था वो नेता बन गए। जिनको पढ़ लिख कर कुछ बनना था उन्होंने अपना रास्ता ले लिया। कुछ मेरे जैसे भी थे, जो जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाए होंगे। ख़ैर।
मैंने आज शाम को उस जमाने के छात्रों से बात की और निशांत भारद्वाज के परिवार के बारे में जानने की कोशिश की। ईश्वर की कसम, किसी को पता नहीं है कि उसके बाद निशांत के परिवार का क्या हुआ और उसका परिवार आज किस हाल में है। लोग उस वक्त गुस्सा जताकर और श्रद्धांजलि देकर अपने-अपने घर चले गए। लेकिन किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं होती कि इंसान के जाने के बाद उसके परिवार की देखभाल कोई कर सके।
रविंद्र ने भी सोच समझकर अपने ऊपर पेट्रोल डाला होगा क्योंकि पेट्रोल डालने के लिए पेट्रोल को बोतल में भरकर लाना भी पड़ता है। अचानक से आपके हाथ में पेट्रोल की बोतल नहीं आ जाती। उनका यह एक्ट बहुत खतरनाक था। रविंद्र सिंह भाटी जैसे युवा नेता लाखों में से कोई एक बन पाते हैं। हर किसी को ऐसी लोकप्रियता और सफलता भी नहीं मिल पाती। ऐसे में उनका इस तरह अपने ऊपर पेट्रोल डालना मुझे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगा। मैंने इसे गलत बताया और इसके कारण मैं आज शाम से ही आलोचना झेल रहा हूं। लंबे समय तक आलोचना झेलने के लिए तैयार हूं लेकिन इसके बावजूद में इसे गलत ही कहूंगा। मेरी आलोचना करने वालों, मुझे बिका हुआ बताने वालों से भी मैं कहना चाहता हूं कि मैं रविंद्र सिंह भाटी का शुभचिंतक हूं। यह लड़का मेरे सामने ही बड़ा हुआ है। मैं नहीं चाहता कि किसी छोटी-मोटी गलती के कारण कोई बड़ा नुकसान हो। रविंद्र के आज के एक्ट के लिए जो उनकी तारीफ कर रहे हैं, जो उनको डिफेंड कर रहे हैं, रविंद्र को उनसे दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
भगत सिंह ने कहा था कि "सरकारों को जगाने के लिए धमाके की जरूरत होती हैं!"
प्रदेश में नपुंसक हो चुकी सरकार को जगाने के लिए @RavindraBhati__
जैसे क्रांतिकारी नेताओं को कलेक्ट्रेट पर ही धमाका करना चाहिए खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आप इन हिजड़ों को हंसने का मौका दे रहे हैं!
सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।
सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।
सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।
सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण।
सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।
सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह।
ढ़लते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छाँह।