Congress should introspect on why its Jharkhand Rajya Sabha candidate lost instead of targeting our MLAs, who voted for the Congress candidate in good faith as part of the INDIA alliance and in line with our consistent struggle against corporate-BJP politics.
— Dipankar Bhattacharya, General Secretary, CPI(ML)
Rahul Gandhi has rightly said that he "cannot and will not" hug the ex-CM of Kerala because he has "an on-going political fight with him."
The reason he hugged PM Modi in July 2018 was because he did not have any ongoing political fight with him.
Nobody is asking Rahul Gandhi to hug Pinarayi Vijayan. On the contrary all that we are asking is that he stop being a facilitator for the ED and the Modi government by demanding the arrest of Pinarayi Vijayan and other opposition leaders. That is not the job of the Leader of the Opposition.
Many senior journalists have fallen into the trap of assuming that what is happening to the TMC has always happened in Bengal.
This is patently untrue.
Firstly, Congress leaders and workers stayed with the party throughout the long 34-year tenure of the Left Front.
After the Left Front lost in 2011, it remained largely intact as a political entity despite the campaign of terror unleashed on its cadre in rural Bengal. Even in 2014, the Left Front got a 30% vote-share — a larger number of marginal voters switched, but the core remained with the LF.
In fact, in the 2016 assembly elections the Left and Congress 'Mahajot' retained their aggregate vote share at 39% — roughly the same as what they had got in 2014, when they fought in opposing camps.
The violent ouster of the Left cadre from rural Bengal accelerated after this, peaking during the 2018 Panchayat elections. After that the Left's core base switched en masse to the BJP, instead of joining or backing Mamata Banerjee.
The Left's cadre needed a 'shelter' against the TMC's terror tactics in rural Bengal, and they found it in the BJP, which was in power at the centre.
Not only do voting patterns after 2016 confirm this, but researchers who have worked in rural Bengal have reported this shift as well.
What is happening now to the TMC is an entirely novel process. It is taking place because the TMC sustained itself around a personality cult of sorts. When the leader fell, everyone began deserting the ship.
There is no previous parallel to this in West Bengal's political history.
Strongly condemn the Enforcement Directorate raids directed against former Kerala Chief Minister Com. @pinarayivijayan.
Such actions once again raise serious concerns over the growing pattern of central agencies being weaponised against Opposition leaders.
Incidentally, this also exposes the hollowness of the reckless allegations made by some Congress leaders who repeatedly questioned why Pinarayi Vijayan had “not yet been targeted by the BJP”!
#EDraids
"Writing obits for the Left is much too glib and unfair."
wrote a piece in @IndianExpress about the undue haste of political specialists writing the obituary of Left politics in India.
#leftpolitics#indianleft
While Mumbai slept, a community's 80-year legacy was bulldozed into dust at 3:30 AM under a cold, calculated ambush by Mumbai Port Authority and police. Families locked in their homes, no notice, no mercy—excavators crushed sewing machines that fed children, suitcases now scattered like trash.
Women denied bathrooms, kids baked in blistering sun for hours, water and power cut off. This is your "women's empowerment" in action? Hypocrisy screams from every rubble pile while politicians play deaf.
Who greenlit this midnight raid on the poor? Opposition cries foul, government preaches dignity—yet citizens get erased as "encroachments." Mumbai's spirit? A sick mask for state cruelty.
https://t.co/xf8GDTadNq
जो बोया वो काटा :-
ममता बनर्जी ने क़रीब 29 स��ल पहले 1997 में कांग्रेस तोड़ कर मुकुल राॅय के साथ मिल कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई तो उन्��ोंने CPM CPI और कांग्रेस को खत्म करने के लिए भाजपा की पश्चिम बंगाल में इंट्री कराई....
मुकुल रॉय बाद में भारतीय जनता पार्टी में चले गए।
1999 में ममता बनर्जी भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार में शामिल हो गईं और रेल मंत्री बन गईं।
2001 की शुरुआत में जब आपरेशन वेस्ट एंड के ज़रिए रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी का बड़ा मामला उजागर हुआ तो ममता एनडीए की सरकार से अलग हो गईं।
अगस्त 2001 में बीबीसी के एक इंटरव्यू में जब ममता से पूछा गया कि क्या उन की पार्टी के एनडीए में लौटने की कोई संभावना है तो उन्होंने जवाब दिया हां, टीएमसी के घोषणापत्र के मुताबिक भाजपा हमारी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ है।
2003 में ममता फिर एनडीए की सरकार में शामिल हो गई, मगर कई महीने बिना विभाग की मंत्री रहीं।
2003 में ममता ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय की कम्युनिस्ट आतंकवाद पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन समारोह में शिरकत की। तरुण विजय ने ‘बंगाल की दुर्गा’ कह कर उन का स्वागत किया।
भाजपा के राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने सदन में बोलते हुए ममता के लिए कहा कि ‘हमारी प्या���ी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं।’ पुंज का अभी पंद्रह दिन पहले निधन हुआ है।
आरएसएस ने भी ममता को ‘बंगाल की दुर्गा’ बताया और वामपंथियों के ख़िलाफ़ उन की लड़ाई के पक्ष में ‘ठोस समर्थन’ जताया।
ममता ने अपने एक भाषण में आरएसएस के मोहन भागवत, शेषाद्रि चारी और मदन दास देवी का ज़िक्र करत�� हुए कहा कि ‘मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बहुत ज़्यादा नेताओं को तो नहीं जानती हूं, मगर उन में से कुछ से व्यक्तिगत तौर पर मिली हूं। आप लोग सच्चे देशभक्त हैं। मुझे मालूम है कि आप अपने देश से सच्चा प्यार करते हैं।’
2012 में आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता बनर्जी की सादगीपूर्ण जीवनशैली की तारीफ़ करते हुए लेख लिखा। कहा कि ‘ममता उन बिरले राजनीतिकों में हैं, जिन्होंने राजनीति का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया। काश कि देश को ऐसे ज़्यादा-से-ज़्यादा राजनीतिक मिलें।’
2019 में ममता ने एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ बहुत-से आंदोलन किए। मगर जब सीएए पर संसद में मतदान हुआ तो टीएमसी के आठ सांसद रहस्यमयी तरीके से ग़ैरहाज़िर रहे और इस वज़ह से विधेयक पारित हो गया। ममता ने इन सांसदों को माफ़ी बख़्श दी। उन के खि़लाफऋ कोई कार्रवाई नहीं की।
27 जनवरी 2020 को जब भाजपा सरकार के तत्कालीन वित ��ाज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने अपने भाषण में ‘गोली मारो सालों को’ के नारे लगवाए तो टीएमसी के नेता शेख आलम ने सीएए का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर मुर्शिदाबाद में गोलियां चला दीं।
2017 में भाजपा में चले गए मुकुल राॅय 2021 के विधानसभा चुनावों के पहले टीएमसी में वापस आ गए और ममता ने उन्हें खुशी-खुशी शामिल कर लिया। चुनावों के दौरान मुकुल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि बीजेपी इज इक्वल टु टीएमसी।
जुलाई 2022 में टीएमसी ने उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का साथ देने से इनकार कर दिया। बाद में टीएमसी के सांसदों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। एब्सटेन किया। जगदीप धनखड़ जीत गए। ममता ने उन धनखड़ की मदद की, जिन्होंने बंगाल का राज्यपाल रहते हुए उन का जीना हराम कर रखा था।
अभी सितंबर 2022 में ममता ने आरएसएस की दिल खोल कर प्रशंसा की। कहा कि संघ में बहुत-से बड़े अच्छे लोग हैं। संघ अच्छा संगठन है।
और इस तरह BJD , BSP , SS , JDU, TRS , YSR , PDP के बाद TMC को वही अजगर खा गया.....
ममता बनर्जी जो बोईं वहीं काट रहीं हैं, इंडिया गठबंधन तोड़ कर उन्होंने जो बोया वही काट रहीं हैं। अब उनकी पार्टी के सांसदों का राघव चड्ढा होना तय है......
-Mohd Zahid
गुरगाव, नोएडा मधील झालेल्या कामगारांच्या आंदोलनाच्या निमित्ताने…
कोणत्याही कुटुंबाचे राहणीमान दोन गोष्टींमुळे निर्णयीत होते : त्या कुटुंबांची आमदनी आणि त्या कुटुंबांना करावे लागणारे खर्च!
देशातील कामगारांचे वेतनमान वाढवण्याची गरज आहेच, पण शिक्षण, आरोग्यासारख्या क्षेत्राच्या खाजगीकरणामुळे त्यांच्या कुटुंबांचे जे अत्यावश्यक खर्च वाढत आहेत…ती आर्थिक धोरणे पुन्हा एकदा सार्वजनिक क्षेत्र केंद्री, जनस्नेही करण्याची देखील गरज आहे.
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काही दिवसांपूर्वी दिल्ली जवळील गुरगाव/ नोएडा आणि परिसरात तेथील उद्योगांमध्ये काम करणारे हजारो कामगार रस्त्यावर उतरले. हिंसक आंदोलन झाले.
काय मागण्या होत्या त्यांच्या? आमचे वेतनमान वाढवून द्या!
हरयाणा आणि उत्तरप्रदेश सरकारांनी तातडीने हालचाली करून किमान वेतनमान वाढविण्यासाठी अध्यादेश काढले. सध्या तरी आंदोलन थंडावले आहे.
सर्वप्रथम हे लक्षात घ्यावयास हवे की ज्यावेळी सामान्य नागरिक/ काम���ार/ कष्टकरी/ शेतकरी/ आदिवासी…मोठ्या संख्येने सहभागी होऊन अचानक आंदोलन करतात तो प्रश्न त्याआधी अनेक वर्षे जळत असतो. तक्रारी केल्या जातात. त्यांची दखल घेतली जात नाही. सहनशक्तीचा कडेलोट होतो आणि अचानक आंदोलन पेटते. इथे देखील तेच घडले आहे.
उदा. उत्तरप्रदेशने आता जे किमान वेतन वाढवले ते तब्बल चौदा वर्षांनी आणि हरयाणा सरकारने तब्बल दहा वर्षांनी…काय ही सरकारे हिंसक आंदोलन होण्यासाठी थांबली होती असे म्हणायचे?
नॅशनल कॅपिटल रिजन मधील आंदोलन थंडावले असले तरी अशी आंदोलने देशांत भविष्यात इतरत्र उभी राहू शकतात. कारण गुरगाव, नोएडा मधील कामगारांमध्ये ज्या कारणांमुळे अनेक वर्षे असंतोष साचत गेला ती कारणे देशांत अनेक ठिकाणी कार्यरत आहेत..
ती कारणे अशी
कमी वेतन, वाट्टेल तेव्हढे कामाचे तास, ओव्हरटाईमसाठी जास्त मो��दला न मिळणे, अनेक ठिकाणी कंत्राटदार मार्फत नोकरी मिळणे आणि कंत्राटदाराने कंपनीकडून मिळणाऱ्या वेतनातील मोठा वाटा स्वतःच्या खिशात टाकणं, नोकरीची अनिश्चितता, कामाच्या ठिकाणी किमान सुविधा नसणे, जीवावरचे काम, कामावर जायबंदी झाल्यास पुरेशी वैद्यकीय मदत, उपचार न मिळणे, नोकरी जाण्याची भीती, कारण दुसरा कोणी तरी काम करायला गेट बाहेर उपलब्ध असणे, तु��्छतेची वागणूक, आत्मसन्मान आणि म्हणून आत्मविश्वास गमावणे…. इत्यादी.
देशातील शहरी भागातील अनेक छोट्या मोठ्या उद्योगात काम करणारे कुशल, अर्धकुशल, अकुशल कामगार स्थलांतरित आहेत. त्यांना घरांच्या सोयी नाहीत. दाटीवाटीने भाड्याच्या घरांत राहतात. त्यांना गावाकडे नियमित पैसे पाठवावेच लागतात. उरलेल्या पैशात शहरात रहावे लागते. अर्धे चित्त गावाकडील आईवडील, बायको, लहान मुलांकडे असते. अशी कोणती��ी व्यक्ती भावनिक ताणतणावात असते.
कोविड काळात इ श्रम पोर्टल केंद्र शासनाच्या श्रम मंत्रालयाने सुरू केले. त्यावर ३१ कोटी श्रमिकांचे रजिस्ट्रेशन झाले आहे. या पोर्टलनुसार यातील ९४ टक्के श्रमिकांचे मासिक वेतन १०,००० रुपये किंवा कमी आहे. (कुमकुम दासगुप्ता, इकॉनॉमिक टाईम्स, एप्रिल १७, २०२६, पान क्रमांक सहा)..... ही स्टोरी आहे आपल्या देशातील वेतनमानाची.
कोट्यावधी श्रमिकांना वेतनमान कमी पडते. म्हणजे शुद्ध आकडा कमी आहेच, पण तो काट्यासारखा आतपर्यंत रक्तबंबाळ का करू लागतो? तर त्यांच्या कुटुंबांचे किमान राहणीमान राखण्यासाठी आवश्यक असणाऱ्या अत्यावश्यक खर्चात सतत वाढ होत आली आहे म्हणून.
घरे, सर्व प्रकारचे इंधन, शिक्षण, आरोग्य…काहीही घ्या. त्यांच्या पाच, दहा वर्षाचा ग्राफ काढला तर तो सतत वर जात आहे. कारण या सेवा आता नफा केंद्री खाजगी कॉर्पोरेट क्षेत्र पुरवू लागले आहे.
आमदनीपेक्षा खर्च जास्त झाल्यामुळे नागरिक कर्ज काढू लागले आहेत. त्यांचे हप्ते, ईएमआय यासाठी त्यांच्या अमदानीचा मोठा हिस्सा जाऊ लागला आहे.
देशातील किमान वेतनावर चर्चा होऊ लागल्या आहेत हे चांगलेच आहे. पण अत्यावश्यक सेवांचे सतत वाढणारे खर्च आणि न झेपणारा कर्जबाजारीपणा यावर सार्वजनिक व्यासपीठांवर चर्चा होत ��ाहीत. दाबून टाकल्या जातात.
मित्रांनो, देशातील ८० टक्के नागरिकांच्या प्रश्नांकडे मानवतावा��ी एलिटिस्ट दृष्टिकोनातून पाहणे थांबवा. त्याचा सबंध त्यांच्या क्रयशक्तीशी म्हणून देशाच्या मॅक्रो अर्थव्यवस्थेशी आहे. त्यांचा संबंध तुमच्या आमच्या सुरक्षतेतीशी आहे.
संजीव चांदोरकर (१८ एप्रिल २०२६)
आशा जी ने अक्सर हमा���े उन भावों, कामनाओं, और कल्पनाओं को आवाज़ दी जो खुले में नहीं बोली जातीं। उनके गाये बहुत से गीत उन जगहों (बार, नाइट क्लब, विलेन के अड्डे, सड़क किनारे के बेघर बंजारे) और उन किरदारों पर फ़िल्माए गए जो संभ्रांत लोगों के लिए दूर की दुनिया थे। लेकिन उनकी आवाज़ अपनी मस्ती और शरारत के साथ साथ बेहद रूहानी और आलौकिक भी थी।
आशा जी की आवाज़ इन दो अलग जहानों के बीच की डोर बनी। पाप और पुण्य, वासना और प्रेम, बुरा और भला के बीच का रिश्ता। उमराव जान में जब एक outcaste, ‘अपवित्र’ नायिका दुनिया भर से हार के अपने घर की चौखट पर लौट कर आती है तो उसके आँसुओं से सराबोर भाव ‘बुला रहा है कौन मुझ को चिलमनों के उस तरफ़’ आशा जी की आवाज़ में एक ख़ंजर बनकर इन दो जहानों के बीच का पर्दा फाड़ देता है।
सैकड़ों गीतों में आशा जी ने ये पुल बनाया - ना सिर्फ़ पर्दे से यथार्थ तक का, बल्कि नैतिकता से उसके रोज़ बदलते मापदण्डों तक का भी।
धन्यवाद इस रास्ते पर चलने के लिए आशा जी। आपने दिखाये तो हमने भी देख लिए कितने सारे रंग।
#AshaForever
https://t.co/VFrGDcRid0
Kerala is India’s standout State by every indicator of social progress and human development. Dr V. K. Ramachandran, economist and Vice-Chairperson of the Kerala State Planning Board, shows how it presents to the country and the world “a democratic, socially inclusive, participatory, high-growth, and sustainable alternative development policy” — and, I would add, model — over the past decade.
Stop spreading lies! CPI(M), formed in 1964, carries forward the glorious legacy of the freedom struggle. We have been raising people's issues in Parliament and on the streets through our struggles. We don't require certificates from betrayers of the freedom struggle, who are today destroying the basic tenets of the Indian Constitution.