उत्तराखंड के अल्मोड़ा निवासी दलित युवा नवप्रवर्तक रवि टम्टा जी का यह नवाचार वास्तव में अद्भुत, प्रेरणादायक और गौरवपूर्ण है। सुदूर पहाड़ में जन्मे रवि टम्टा जी ने साबित कर दिया कि उनके हौसले भी पहाड़ जैसे बुलंद हैं।
रवि टम्टा जी ने HAPIDA SKYNeX उड़ान वाहन (Flying Vehicle) के प्रोटोटाइप का सफल परीक्षण कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वे सुरक्षित एवं विद्युत चालित व्यक्तिगत उड़ान वाहन विकसित करने के उद्देश्य से कार्य कर रहे हैं। वर्षों के शोध, नवाचार और अथक परिश्रम के बाद प्रोटोटाइप की यह सफल उड़ान उनके सपने को साकार करने की दिशा में पहला बड़ा मील का पत्थर है।
यह उपलब्धि केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। ऐसे स्वदेशी नवाचार भारत की वैज्ञानिक क्षमता, युवाओं की प्रतिभा और आत्मनिर्भर भविष्य की मजबूत नींव रखते हैं।
रवि टम्टा जी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत मंगलकामनाएं। हमें विश्वास है कि उनका यह प्रयास भारत को भविष्य की अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
हमें आप पर गर्व है!
"रोड ही नहीं होगी, तो बेटी कैसे पढ़ेगी?"
सुनिए इस छोटी-सी बच्ची को, जो भाजपा के तथाकथित 'विकसित भारत' के दावों की हक़ीक़त बता रही है। उसका सवाल बेहद सीधा है - जब सड़क ही नहीं होगी, तो बेटी स्कूल कैसे जाएगी? पढ़ेगी कैसे? आगे कैसे बढ़ेगी?
और स्कूलों की बात भी कर लीजिए। पिछले 10 वर्षों में देशभर में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश इस सूची में सबसे ऊपर हैं। एक तरफ़ स्कूल बंद किए जा रहे हैं, दूसरी तरफ़ जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए सड़क तक नहीं है।
यही है भाजपा के 'विकसित भारत' की ज़मीनी तस्वीर।
देश का प्रधानमंत्री देश के एक प्रीमियम इंस्टीट्यूट में, जहाँ इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार होते हैं, अंधविश्वास और पाखंड फैलाने वाले बाबा का उदाहरण दे रहा है।
देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा!🤔
एक युवा ICU में है… और कल फिर सरकार से वार्ता है।
उम्मीद करता हूँ कि कल की वार्ता सिर्फ एक और तारीख देकर खत्म नहीं होगी, बल्कि किसी ठोस समाधान की शुरुआत बनेगी।
आंदोलन में बैठे ये बच्चे सरकार के दुश्मन नहीं हैं। ये उसी राज्य के युवा हैं, जो बस इतना चाहते हैं कि उनकी मेहनत, उनकी उम्र और उनके भविष्य के साथ न्याय हो।
संवाद का दरवाज़ा खुला है तो
सरकार भी संवेदनशीलता दिखाए और छात्र भी उम्मीद बनाए रखें।
राहुल जल्द स्वस्थ होकर वापस अपने साथियों के बीच लौटे और कल की वार्ता से ऐसी खबर आए कि किसी दूसरे युवा को अपनी बात सुनाने के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर न लगानी पड़े।
कई बार एक सफल संवाद वर्षों के संघर्ष को एक नई दिशा दे देता है- और झारखंड सरकार अब ये मान ले कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ ये आख़िरी सितम था ।
उम्मीद है, कल का दिन झारखंड के छात्रों के लिए अच्छा हो उनकी माँगें माने सरकार ।
कैसी पत्रकारिता है ये? पहली बात, झारखंड में जो छात्र आंदोलन कर रहे हैं, उनमें ज़्यादातर ग्रेजुएट हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि अगर ज़रा-सी भी बात बिगड़ी, FIR हो गई, तो सरकारी नौकरी का सपना हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। इसलिए उनका संयम उनकी समझदारी भी है और उनकी मजबूरी भी।
दूसरी बात, आप लोग बार-बार जंतर-मंतर और झारखंड की तुलना में ही क्यों उलझे हुए हैं? मान लीजिए जंतर-मंतर का आंदोलन आपको बिल्कुल पसंद नहीं था, बहुत खराब था... उससे क्या बदल जाएगा? असली सवाल तो यह है कि उसका नतीजा क्या निकला- शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा हो गया। उस आंदोलन के बाद संसद में चर्चा हुई, कानून आया, सरकार को जवाब देना पड़ा।
और अगर झारखंड का आंदोलन आपको इतना ही अच्छा लग रहा है, तो स्टूडियो में बैठकर तारीफ करने से क्या होगा? जाइए, सरकार और छात्रों के बीच संवाद कराइए। यही तो पत्रकारिता का काम है- समाधान तक पहुँचने की कोशिश करना।
VIDEO | Parliament Monsoon Session: BJP MP Kangana Ranaut, on RSS chief Mohan Bhagwat's interaction with Gen Z and Gen Alpha, says, "Gen Z is the strength of our country and, in a way, a great asset to our nation. We are very happy that our young people are increasingly emerging as ambassadors of our culture and its identity. We have also had the opportunity to listen to Mohan Bhagwat ji, whom we hold in the highest regard, and benefit from his wisdom and experience. It is a matter of great happiness that the country's youth are connecting with us and embracing our cultural identity."
(Full video available on PTI Videos - https://t.co/bIyFWTfmBd)
ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को सदन में बुलाने के लिए माँग करनी पड़ती है, शोर मचाना पड़ता है. जबकि सदन में मौजूद होना, चर्चा करना उनका काम है - रोजगार है - वही उनकी मुख्य भूमिका और ज़िम्मेदारी है.
यूपी पुलिस को ऑफीशियली भाजपा का कोई प्रकोष्ठ ज्वाइन कर लेना चाहिए…कौन से पुलिस मैनुअल में लिखा है कि पुलिस पुजारी का काम करेगी…कांवड़ियों पर फूल छिड़केगी..सत्ता की गुलामी के आगे वर्दी की गरिमा गिरवी रखी जा चुकी है…
क्या कमाल का नारी शक्ति वंदन अभिनंदन हो रहा है
श्रद्धा सिंह जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में शामिल हुई थीं - तब से ट्रोल्स उनके वीडियो के नीचे 200-300 के रेट लगा रहे हैं
मोदी जी यह cultural shock है - बेटियों के रेट लगाने वाले आपके लोग हैं
सुधांशु त्रिवेदी ने राज्यसभा में दावा किया कि अमेरिका ने गाय के मूत्र का पेटेंट कराया है। आइए, इस दावे की वास्तविकता समझते हैं।
1. जिस अमेरिकी पेटेंट का हवाला दिया जा रहा है, वह किसी अमेरिकी संस्था का नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) द्वारा दायर किया गया था।
2. यह पेटेंट 2020 में मेंटेनेंस (एक्सटेंशन) फीस जमा न होने के कारण समाप्त (Expired) हो गया।
3. यह पेटेंट गाय के मूत्र पर नहीं, बल्कि गाय के मूत्र के डिस्टिलेट (Cow Urine Distillate) के असर का है अर्थात दावा मूत्र पर नहीं, बल्कि उसके आसुत (distilled) अंश के संभावित प्रभाव पर था।
4. स्वयं पेटेंट में यह भी उल्लेख है कि इसी प्रकार का प्रभाव भैंस, ऊँट और हिरण के मूत्र के डिस्टिलेट में भी देखा गया।
डिस्टिलेशन (Distillation) क्या है?
किसी भी मिश्रण में उपस्थित विभिन्न घटकों का वाष्प दाब (Vapor Pressure) और क्वथनांक (Boiling Point) अलग-अलग होता है। इसी सिद्धांत का उपयोग करके डिस्टिलेशन के माध्यम से कुछ वाष्पशील (volatile) घटकों को अलग किया जाता है। यही तकनीक पानी के शुद्धिकरण, समुद्री जल के अलवणीकरण (desalination), रसायन उद्योग और यहाँ तक कि सीवेज के उपचार में भी उपयोग की जाती है। इसलिए किसी पदार्थ का डिस्टिलेट प्राप्त होना अपने-आप में उस मूल पदार्थ के औषधीय या सेवन योग्य होने का प्रमाण नहीं है।
अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। गाय सहित लगभग सभी जानवरों के मूत्र में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव और खरनाक रोगजनक (pathogenic) बैक्टीरिया पाए जाते हैं। यदि मूत्र में इतना शक्तिशाली एंटीमाइक्रोबियल कंपोनेंट होता, तो सबसे पहले उसी में मौजूद बैक्टीरिया नष्ट हो जाने चाहिए थे।
वास्तविकता यह है कि अनेक रसायनों और प्राकृतिक पदार्थों में प्रयोगशाला स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि (antimicrobial activity) पाई जाती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि वे सीधे पीने, खाने या चिकित्सा के लिए सुरक्षित और प्रभावी सिद्ध हो जाते हैं। किसी पदार्थ को दवा मानने के लिए कठोर प्रीक्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षण आवश्यक होते हैं।
भारत जैसे देश में, जहाँ अभी भी वैज्ञानिक साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत करने की आवश्यकता है, संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच से इस प्रकार के अधूरे या भ्रामक दावे करना लोगों में भ्रम और अंधविश्वास को बढ़ावा मिलेगा । सार्वजनिक जीवन में वैज्ञानिक विषयों पर चर्चा हमेशा उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों और तथ्यों के आधार उस विषय के एक्सपर्ट को करनी चाहिए न कि प्रोपेगंडा के लिए भाषण बाजी करना चाहिए।