‘नानक शाह फ़क़ीर’ फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मुझे लखपत (कच्छ, गुजरात) में पंडित मूलचंद जी के 600 साल पुराने घर के दर्शन का सौभाग्य मिला। आज यही घर ऐतिहासिक गुरुद्वारा है, जहाँ गुरु नानक जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र बाबा श्रीचंद जी की दुर्लभ खड़ाऊँ सुरक्षित हैं।
मौजूदा गुरुद्वारा भवन उन्नीसवीं सदी के आरंभ का है। इस पवित्र घर ने 1819 का महाभूकंप और 2001 का भुज भूकंप झेला, फिर भी अडिग खड़ा रहा। UNESCO ने 2004 में, इसे “Award of Distinction” से सम्मानित किया। यह स्थान उदासी परंपरा की जीती-जागती धरोहर है।
दुर्भाग्य से अकाल तख़्त, SGPC और हमारे तथाकथित सिख नेतृत्व ने कच्छ के ऐतिहासिक गुरुद्वारा लखपत साहिब और उससे जुड़ी इस विलक्षण विरासत को व्यापक समाज के सामने लाने का प्रयास भी नहीं किया।
लखपत साहिब के उस कक्ष में जो शांति और आध्यात्मिक स्पंदन मैंने महसूस किया, उसे शब्दों में बाँधना कठिन है। यह सिर्फ़ एक गुरुद्वारा नहीं, गुरु नानक जी की यात्राओं, बाबा श्रीचंद जी की उदासी परंपरा और भारत की साझा आध्यात्मिक विरासत का एक जीवंत अध्याय है।
History will remember Dr. Manmohan Singh ji as one of India's most consequential and honest Prime Ministers.
Smt. Sonia Gandhi's article in The Indian Express speaks the truth that many chose to ignore: Dr. Manmohan Singh ji's integrity has now been fully vindicated by the Supreme Court's judgment in the coal block case.
For over a decade, a coordinated campaign was run to malign a man of the highest probity, while the BJP's own record on transparency and accountability tells a very different story.
Dr. Singh ji's legacy speaks for itself: the RTI Act that empowered citizens, MGNREGA that guaranteed the right to work, the Right to Education Act, the National Food Security Act, and the Indo-US nuclear deal that ended decades of discrimination against India on the global stage.
‘प्रियंका की पाठशाला’
ये OTS का सुझाव फ़्री है। कोई भी चैनल इस्तेमाल कर सकते हैं।
सच में विपक्षी पार्टी काँग्रेस की सांसद @priyankagandhi ने क्या क्लास लगा दी! सुनिए
🚨 #ExpressInvestigation | The Union Minister of State for Agriculture Bhagirath Choudhary received a ₹99.03 lakh subsidy for a commercial cucumber farming project under a scheme run by the ministry he serves in.
While the final approval was granted by an NHB project approval committee that does not include the minister, Choudhary is the ex-officio Vice-President of the NHB board that oversees its functioning.
The project, worth ₹1.99 crore, was among 467 approved under the scheme in 2025.
Express Investigation by: Harikishan Sharma
ग़रीबों के लिए 5 किलो वाले LPG गैस सिलिंडर पर सरकार तो चंद सौ रुपये की सब्सिडी देती नहीं और देखिए
केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री को कृषि मंत्रालय से अपनी ककुंबर फ़ार्मिंग के लिए 99.03 लाख रूपए की सब्सिडी मिल गई! Indian Express की रिपोर्ट में तो यही छपा है
क्या ही विवेक शून्य फ़ॉलोवरशिप है। भाजपा नेता मेलोडी बांट रहे हैं, अध्यक्ष खा रहे हैं।
पेट्रोल बचाने के आह्वान पर तीन दिन ऑटो, साइकिल पर दफ्तर गए और फोटो खिंचवाए समझ आता है।
मेलोडी कौनसे आह्वान या विदेश नीति की किस जीत का प्रतीक है?
एक मोमेंट था बस दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच का। प्रधानमंत्री जी ख़ुद इसे देख कर सोच में पड़ गए होंगे कि ये हो क्या रहा है।
#Melodi #rajasthan
डॉ राजकुमार भाटी के बयान के बाद खड़े हुए विवाद पर तो मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता लेकिन मेरी परवरिश ठेठ गांव देहात की है, इसलिए लोक और समाज में ऐसी कहावत और लोकोक्तियों के वजूद को बहुत अच्छे से महसूस किया है।
हमारा लोक इतना सहिष्णु है कि किसी कालखंड में समाज द्वारा गढ़ी गई इन कहावतों को बहुत आसानी से स्वीकार करके आनन्द लेता है। तिस पर भी ढूंढ़ाड देस को ऐसी हंसी ठिठोलियों के मामले में सहिष्णु होने का वरदान प्राप्त है।
हां ये तो एकदम सच है कि ऐसी कहावतें जाति को लेकर खूब बनाई गई हैं। लेकिन लोक और हमारी संस्कृति में वे बिना लाग - लपेट के कही जाती हैं और मैंने तो अपने गांव - देहात में इन कहावतों पर कभी विवाद या वैमनस्य होते हुए देखा नहीं।
मैं स्वयं जिस जाति से हूँ उसे लेकर भी कहावतें हैं। जैसे हमे भी बचपन में स्कूल या गांव गुवाड़ में हमउम्र साथियों द्वारा इन्हीं कहावतों को इंगित करके चिढ़ाया जाता था।
ढूंढ़ाड के समाज में एक कहावत है -
"ठाकर बेचे ठीकरी ठुकराणी बेचे हींग
एक जिंदावर इस्यो देखो कूल्हा पाछे सींग"
इसका अर्थ क्या होता है मुझे अब तक भी नहीं मालूम लेकिन हमको ये कहावत सुनाकर खूब चिढ़ाया जाता था। लोक की अच्छी बात ये है कि कोई जाति इन कहावतों से निरपेक्ष नहीं हैं। ब्राह्मण समाज अभी राजकुमार भाटी ने जो कहावत सुनाई उसे लेकर उद्वेलित है। लिहाजा हमारे ढूंढ़ाड में भी एक कहावत का वजूद है जो ब्राह्मण जाति को टारगेट करती है।
"खाती बामण कूकरो, देख सके नै दूसरो"
जो ढूंढ़ाडी है वो जरूर ही इस कहावत का मर्म समझता होगा और उसने जरूर ये कहावत झेली या कही होगी।
गूजर जाति को लेकर ढूंढ़ाड में एक मजेदार कहावत है जिसे हम गूजर मित्रों को चिढ़ाने के लिए बोला करते थे -
गूजर मांगे राबड़ी, रांड़ कुआ में जा पड़ी
इस कहावत का मर्म ये है कि गूजर जाति को खाने में दूध राबड़ी सबसे ज्यादा पसंद है। कभी सदियों पहले एक गूजर ने गूजरी से कलेवा में दूध राबड़ी मांगी लेकिन गूजरी राबड़ी बनाना भूल गई। इस बात पर गूजर - गूजरी में लड़ाई हो गई और गूजरी की गूजर ने पिटाई कर दी। गुस्से में गूजरी कुएं में गिर गई। इस घटना को समाज आजतक याद करता है और कहावत में बोल - बोल कर सुनाता है।
राजकुमार भाटी ने जिस कहावत का जिक्र किया है - "गुजर अहीर कंजर, कुत्ता बिल्ली बंदर" ये कहावत भी हमारे समाज में है लेकिन अहीर की जगह हमारे यहां मीणा जाति ने ले ली है और कहावत इस तरह है -
मीणा गूजर कंजर, कुत्ता बिल्ली बंदर
जै छै जात ना होती तो खोल किवाड़ी सोती
इसलिए मेरा मानना है कि इन सच्चाइयों से मुंह नहीं फेरना चाहिए। सब किसी न किसी सच्चाई और घटना से जुड़ी हैं, जो समाज की सच्चाई की परतों को उधेड़ती हैं।
मैं जिस परिवार से आता हूं उसी में मुझ से ठीक आठ पीढ़ी पहले मेरे पुरखे हुए उदय सिंह। राज ने उनकी जमीन छीन ली और दंडित किया। गुजारे के लिए जब कुछ नहीं बचा तो लूट - खसोट करना शुरू कर दिया। राज अपने तरीके से दंड देता है लेकिन समाज जब दंड देता है तो वह सदियों तक नहीं भुलाया जा सकता। उदय सिंह की लूट - खसोट से तंग होकर समाज ने जब दंडित किया तो ऐसी ही एक कहावत गढ़ दी और उदय सिंह को इंगित करके कहा -
"हांडी में रांदयो पाळी में खायो
भागो लुगाया उदय सिंह आयो"
अब यह कहावत तो जाति से भी इतर अधिक व्यक्तिगत है और मेरे परिवार पर है। जिसे हमारे सगे - संबंधी और भाई - बांधवों के द्वारा ही हंसी ठिठोली में हमे सुनाया जाता है। लेकिन हम हमारे ही ऊपर की गई इस टिपण्णी को लेकर अत्यधिक सहिष्णु है। यह कहावत भले नकारात्मक है लेकिन उदय सिंह को हमारा गांव - देहात नकारात्मक तौर पर याद नहीं करता। आगे की कहानी ये भी है कि उदय सिंह ने लूट और दुराचार का रास्ता छोड़कर बाद में सद्मार्ग अपनाया। संतो की सेवा की और धर्म का पालन किया। उनकी संत संगति के कारण हमारा गांव अनेक संतों की तपोभूमि बना। ये कहानी इसलिए बताई है कि राज का दंड सीमित होता है लेकिन समाज का दंड पीढ़ियों तक चलता है। एक कहावत ने उदय सिंह को दुराचार का मार्ग छोड़ने के लिए प्रेरित कर दिया तो फिर समाज की इससे बड़ी ताकत क्या होगी ? हम आज भी इस बात पर गर्व करते हैं कि हमारे एक पुरखे को समाज अब तक याद तो कर रहा है।
इसलिए भौंहे तानने से बेहतर है कि अपना अतीत देखें और लोक की ताकत का सम्मान करें। हम सबको जाति, नस्ल या फिर किसी न किसी आधार पर समाज ने कभी न कभी दंडित किया है या अच्छे काम पर सम्मानित किया है।
राम राम सा
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रदेश के स्कूलों में राजस्थानी भाषा को अनिवार्य करने का निर्णय ऐतिहासिक है एवं स्वागत योग्य है।
मुझे गर्व है कि हमारी कांग्रेस सरकार ने 25 अगस्त 2003 को विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, बृज, वागड़ी, मालवी और शेखावाटी जैसी समृद्ध बोलियों सहित 'राजस्थानी भाषा' को संवैधानिक दर्जा दिलाने की जो मुहिम शुरू की थी, आज उसे बड़ी मजबूती मिली है।
मातृभाषा में शिक्षा मिलने से प्रदेश के बच्चों का अपनी जड़ों से जुड़ाव और गहरा होगा। अब केंद्र सरकार को भी बिना देरी किए राजस्थानी को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
12 साल सत्ता में रहने के बाद अगर प्रधानमंत्री जनता से यह कहने लगें कि सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाने-पीने की चीज़ें कम इस्तेमाल करो तो यह किसी दूरदर्शी नेतृत्व का संदेश नहीं, बल्कि आर्थिक विफलता का सार्वजनिक स्वीकार है।
जिस सरकार ने “अच्छे दिन” का सपना दिखाया था, आज वही सरकार लोगों को अपनी ज़रूरतें सीमित करने की सलाह दे रही है। महंगाई पर नियंत्रण नहीं, रोजगार का भरोसा नहीं, किसानों को राहत नहीं, मध्यम वर्ग को सुरक्षा नहीं और ऊपर से त्याग का प्रवचन।
हर संकट में सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए जिम्मेदारी जनता पर डाल देती है। कभी कम खर्च करो, कभी कम यात्रा करो, कभी कम उपभोग करो। सवाल यह है कि आखिर सरकार की जवाबदेही क्या है?
देश ऐसे नहीं चलता। देश जनता की उम्मीदों पर चलता है, डर और समझौतों पर नहीं। अब देश को भाषणों और इवेंट मैनेजमेंट नहीं, बल्कि ईमानदार नेतृत्व, ठोस आर्थिक नीति और जवाबदेही की जरूरत है।
#PMIsCompromised
@aishwaryam99 भाई, धीरेंद्र शास्त्री भी तो नकली कॉपी हैं, या यूँ कह लो — चंद्रास्वामी की एडवांस कॉपी। उसका ये मिनी वर्जन है। शास्त्री भी पहले ऐसा था, पुराने वीडियो देखो। लड़का तरक्की कर रहा है, करने दो। OBC है तो क्या हुआ?
नर्मदा की गोद में मां का आखिरी आलिंगन
यह तसवीर देखकर मैं भीतर से सुबक पड़ा। क्योंकि यह तस्वीर केवल एक हादसे की तस्वीर नहीं है; यह मनुष्य की सभ्यता पर रखा हुआ वह नम, कांपता हुआ प्रश्न है, जिसका उत्तर कोई मुआवजा, कोई जांच-समिति और कोई सरकारी शोक-संदेश नहीं दे सकता।
जबलपुर के बरगी डैम में मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग का क्रूज अचानक तूफ़ान और तेज हवाओं के बीच पलट गया था। नौ लोगों की मौत हो चुकी है। कुछ बचाए गए और तलाश अब भी है। लेकिन इन संख्याओं के बीच जो सबसे बड़ा दर्द है, वह इस मां की बंद आंखों में साफ़ दिख रहा है।
एक मां, जिसने डूबती हुई नर्मदा में भी अपने बच्चे को खुद से अलग नहीं होने दिया। बेटा या बेटी कितनी भी दूर हो। माँ उसे कभी अलग नहीं होने देती। वह खाने की थाली सामने रखती है तो हजार कोस दूर बैठे बेटे या बेटी को याद करके ही पहला कौर मुंह की ओर बढ़ाती है। एक बार मैंने चूरू में बहुत ठंड के समय अरविंद चोटिया की माँ के फोन की बात सुनी थी। जयपुर में गरमी थी और चूरू में भयानक ठंड तो माँ ने चूरू से बेटे को ठंड से बचने की सलाह दी थी कि ओढ़ पहन के रखना। अभी मेरा बेटा अंडमान में था और दूसरा गुड़गांव में तो मैं जाने कब से देखता हूँ कि उनकी माँ अपने खाने की थाली से पहले उन्हें ज़रूर याद करती है। अब तो वह बेटी को भी याद करती है। आपके भी घर में ऐसा ही होगा। कई बार माँ चली जाती है तो वह बच्चों को कहते हैं कि आसमान से भी देखना नहीं भूलती।
आप देखिए इस तस्वीर को। पानी काला है। हवा की हिंसा अब शांत हो चुकी है। फूलों और कचरे के बीच जीवन की अंतिम थरथराहट जम गई है। मां के चेहरे पर मृत्यु का भय नहीं, एक अजीब-सी थकी हुई शांति है; जैसे उसने आखिरी क्षण तक अपने बेटे से कहा हो, “डरना मत, मैं हूं।” बच्चा मां की छाती से बहुत आत्मविश्वास से लगा हुआ है। जैसे उसे लगे कि अब वह एकदम सुरक्षित है। इसीलिए संवेदनशील सभ्यताएँ अपने देश को मातृभूमि और असभ्य मुल्क उसे पितृभूमि मानते हैं।
दुनिया की सारी सुरक्षा-व्यवस्थाएं, सारे प्रोटोकॉल, सारी लाइफ जैकेटें, सारे नियम उस छोटे-से शरीर के सामने विफल हैं। मां और उसके चार साल के बेटे के शव एक-दूसरे से लिपटे हैं। पिता और बेटी बच गए, मगर मां-बेटा लौटकर नहीं आए। यह तस्वीर हमें रुलाती ही नहीं, शर्मिंदा भी करती है। क्योंकि हर हादसा केवल मौसम से नहीं होता; कई हादसे लापरवाही, चेतावनी की अनदेखी, अधूरी तैयारी और पर्यटन को तमाशा समझ लेने से होते हैं।
अगर सचमुच लाइफ़ जैकेट देर से दी गईं, अगर चेतावनी अनसुनी हुई, अगर सुरक्षा प्रोटोकॉल काग़ज़ पर रह गए तो यह दुर्घटना नहीं, व्यवस्था की नैतिक डूब है।
नर्मदा ने कल की शाम एक मां और बेटे को नहीं छीना; उसने हमसे पूछा है : क्या हमारी यात्राएं सुरक्षित हैं? क्या हमारी सरकारें सजग हैं? क्या हमारी संवेदनाएं जीवित हैं? इस तस्वीर को देखते हुए आंखें इसलिए छलछला आती हैं कि मृत्यु में भी मां ने मातृत्व नहीं छोड़ा। वह चली गई; लेकिन अपने बच्चे को अंतिम क्षण तक सीने से लगाए रही। मानो कह रही हो, “मेरी सांस भले डूब जाए, मेरा प्यार नहीं डूबेगा!”
मैं इस माँ को प्रणाम करता हूँ।