*आर्य युवा अधिवेशन'---प्रतिभागियों की टिप्पणियों का सारांश*
१.अधिकांश प्रतिभागियों ने अधिवेशन को बेहतरीन अनुभव बताया।२- प्रतिभागियों ने कहा कि उन्हें अपनी संस्कृति, वेद और आर्यसमाज के बारे में नई जानकारी मिली। "संस्कार ही संसार को बदलते हैं", "अपनी संस्कृति के बारे में ज्ञान मिला
भावार्थ :-
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यो ! जैसे परमेश्वर ने अपनी दया से सब पदार्थों को उत्पन्न कर और जीवों के लिए समर्पण करके जगत् की वृद्धि की है, वैसे विद्या, विनय, सत्सङ्ग, पुरुषार्थ और धर्म के अनुष्ठानों से राज्य को बढ़ाओ ।
भावार्थ :-
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यो ! तुमको जैसे वनस्पति पुष्कल जल के नीचे पृथिवी से आकर्षण करके वायु और मेघमण्डलों में फैला के सब घास आदि की रक्षा करते और जैसे
भावार्थ :- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पढ़ने, उपदेश करने और परीक्षा लेनेवाले स्त्री-पुरुष प्रजाओं में विद्या और श्रेष्ठ उपदेशों का प्रचार करें, वैसे राजा इनकी यथावत् रक्षा करे, इस प्रकार राजपुरुष और प्रजापुरुष आपस में प्रसन्न हुए सब ओर से वृद्धि को प्राप्त हुआकरें
भावार्थ :-
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पढ़ने और उपदेश करनेहारे विद्यार्थी और शिष्यों को तथा माता-पिता सन्तानों को बढ़ाते हैं, वैसे विद्वान् स्त्री, पुरुष वेदविद्या से सबको बढ़ावें ।
भावार्थ :-
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि में छोड़ी हुई आहुति मेघमण्डल को प्राप्त हो फिर आकर शुद्ध किये हुए जल से सब जगत् को पुष्ट करती है, वैसे विद्या के ग्रहण और दान से सबको पुष्ट किया करो ।
भावार्थ :-
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पढ़ाने और उपदेश करनेवाली स्त्रियाँ अपने सन्तानों अन्य कन्याओं वा स्त्रियों को विद्या तथा शिक्षा से बढ़ाती हैं, वैसे स्त्री-पुरुष परमप्रीति से विद्या के विचार के साथ अपने सन्तानों को बढ़ावें और आप बढ़ें ।