नॉर्वे की पत्रकार @HelleLyngSvends ने वह साहस दिखाया, जो भारत का बड़ा मीडिया पिछले 13 वर्षों में नहीं कर पाया। सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है, लेकिन भारत में अधिकांश मीडिया ने सवालों की जगह चुप्पी और भक्ति को चुन लिया।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन 1999 में घोषित अंतरराष्ट्रीय दिवस "बुद्ध पूर्णिमा" की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं।
तथागत बुद्ध के प्रज्ञा, शील, करुणा, सत्य, मैत्री, प्रेम, विश्वशांति, बंधुत्व एवं मानव कल्याण के सन्देश से समाज सदैव प्रेरित होता रहेगा।
जय भीम, नमो बुद्धाय।
ओडिशा के क्योंझर जिले में जीतू मुंडा अपनी तीन महीने पहले (26 जनवरी 2026 को) मृत हुई बहन के कंकाल को कब्र से निकालकर ले जा रहे हैं। जिस बहन का पति और इकलौती संतान पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे और अब पूरे परिवार में सिर्फ वही अकेले जीवित बचे हैं।
अपनी बहन के बैंक खाते में जमा 19,300 रुपये निकालने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार (वारिस) प्रमाण पत्र नहीं दिखा पाने के कारण बैंक कर्मचारियों ने ‘नियमों’ का हवाला देते हुए उन्हें कई बार खाली हाथ लौटा दिया।
परेशान होकर वे सीधे श्मशान घाट पहुंचे। अपनी बहन की कब्र खोदी और उनका कंकाल बाहर निकाला। कंकाल को एक कपड़े में लपेटकर, अपने कंधे पर लादे, 5 किमी नंगे पांव चलते हुए वे सीधे बैंक के भीतर जा पहुंचे।
भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बिना चढ़ावे के ये प्रमाण पत्र इतने कम समय में बन पाना किसी के लिए संभव नहीं है। और फिर एक तो वे गरीब, ऊपर से आदिवासी-ऐसे में इन कागजों को तुरंत जुटा पाना उनके लिए असंभव था।
वहीं, इसी बैंकिंग व्यवस्था में उद्योगपतियों के वो 11 लाख करोड़ रुपये के कर्जे चुपचाप माफ़ भी हो जाते हैं, जिससे वे अरबों-खरबों रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं।
ओडिशा की यह घटना व्यवस्था की संवेदनहीनता और असमानता की भयावह सच्चाई को उजागर करती है।
मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय अपनी जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए ऐतिहासिक संघर्ष कर रहा है, लेकिन देश का मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह खामोश है। न कोई ब्रेकिंग न्यूज़, न कोई बहस, क्या आदिवासियों की आवाज़ इतनी कमजोर है या जानबूझकर दबाई जा रही है?
मणिपुर से ओडिशा तक आदिवासी समुदायों पर हो रहे अत्याचार पर मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग जैसी जिम्मेदार संस्थाएं आखिर कब जागेंगी? क्या सत्ता इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि मूलनिवासियों की आवाज ही दबा दी जाए? आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा
जनगणना प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने से विद्यालयों में शिक्षण कार्य बाधित होने के संबंध में महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त महोदय,भारत सरकार को पत्र लिखा।
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पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के मतदाता वोट करने से पहले बीजेपी शासित मध्यप्रदेश की स्थिति देख लें, जहां आदिवासी समुदाय पिछले 15 दिनों से अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
69,000 शिक्षक भर्ती सिर्फ नौकरी का सवाल नहीं, यह उत्तर प्रदेश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक न्याय और आरक्षण के अधिकार पर भाजपा सरकार की नीयत पर बड़ा सवाल है।
वर्षों से भर्ती लटकाकर सरकार ने लाखों युवाओं को बेरोज़गारी, निराशा और सड़कों पर संघर्ष करने को मजबूर कर दिया है। जब स्कूलों में शिक्षक नहीं होंगे, तो बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी और उनका भविष्य कैसे बनेगा?
एक तरफ भाजपा शिक्षा सुधार और रोजगार के बड़े-बड़े दावे करती है, दूसरी तरफ आरक्षण के साथ खिलवाड़ कर पिछड़े, दलित और गरीब युवाओं का हक छीना जा रहा है। यह सिर्फ युवाओं के साथ अन्याय नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और संविधान - दोनों पर चोट है।
स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय … या सरकारी विचारधारा के अड्डे ?
ज़रा देखिए, कैसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों को पढ़ाई की जगह प्रोपेगेंडा का मंच बनाया जा रहा है—
“कॉलेज में RSS के लोग आए हैं…
छात्रों से रैली निकलवाई जा रही है…”
यानी शिक्षा संस्थानों में अब ज्ञान नहीं, राजनीतिक एजेंडा परोसा जा रहा है!
लेकिन इस बार सच छुप नहीं पाया—
छात्रों ने ही कैमरे पर खोल दी भाजपा-RSS की पूरी पोल!
“पढ़ाई के नाम पर प्रोपेगेंडा?”
“कॉलेज में RSS की एंट्री, छात्रों का खुलासा!”
“BJP-RSS की राजनीति का छात्रों ने किया भंडाफोड़!”
अब किताबों की जगह नारे सिखाए जाएंगे?
क्या स्कूल-कॉलेज भी BJP-RSS के प्रचार केंद्र बनेंगे?
डॉ. आंबेडकर RSS की विचारधारा के ख़िलाफ़ खड़े थे।
एक तरफ़ RSS का सबसे बड़ा लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है। वहीं दूसरी तरफ़ डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि “अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है। इस पैमाने पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इण्डिया, पृ.338)।
जिला लखीमपुर खीरी के गोला गोकर्ण थाना क्षेत्र के बांकेगंज में मोतीपुर गांव में भारतीय संविधान के निर्माता, आधुनिक भारत के शिल्पकार एवं शोषितों-वंचितों के मसीहा, महिलाओं के मुक्तिदाता, ज्ञान के प्रतीक, विश्व रत्न ,परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की जयंती की जयंती के दिन हुई घटना केवल एक विवाद नहीं, बल्कि बहुजन समाज की आस्था और सम्मान पर सीधा हमला है।
यहां कई वर्षों से खाली पड़ी बौद्ध विहार की भूमि पर परम पूज्य बाबा साहेब की मूर्ति स्थापित की जानी थी। ग्राम प्रधान भी मौजूद थे, दोपहर के बाद गांव वालों ने मूर्ति स्थापित कर दी। ग्राम समाज की भूमि पर शांतिपूर्ण तरीके से प्रतिमा स्थापना और भंडारे का आयोजन चल रहा था, लेकिन शाम होते-होते सुनियोजित तरीके से माहौल बिगाड़ा गया। परम पूज्य बाबा साहेब की जयंती के दिन ही मूर्ति हटाने की कार्रवाई एक गहरी साजिश को दर्शाती है, और इसी दौरान छीना-झपटी में परम पूज्य बाबा साहेब की प्रतिमा का टूटना पूरे समाज के लिए अत्यंत पीड़ादायक और अस्वीकार्य है।
आरोप है कि पुलिस ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय लाठीचार्ज किया और महिलाओं, बुजुर्गों व बच्चों तक को नहीं बख्शा। हैरानी की बात यह है कि घटना के 24 घंटे बाद भी पुलिस की बर्बरता जारी है ,घर-घर घुसकर मारपीट, तोड़फोड़ और निर्दोष लोगों को डराने-धमकाने का काम किया जा रहा है।निर्दोष लोगों पर झूठे मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजना न्याय नहीं, बल्कि अन्याय की पराकाष्ठा है।
@UPGovt से हमारी मांग हैं कि :इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच हो, दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो और सभी निर्दोष लोगों को तुरंत रिहा किया जाए।
बहुजन समाज अब अन्याय सहने वाला नहीं है यह संघर्ष सम्मान, संविधान और अधिकारों की रक्षा का है।
“बाबा साहेब का अपमान, किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
@CMOfficeUP@myogiadityanath