चिन्मयानंद के साथ खड़े इन लोगों को देखें,थोड़ी कद काठी में अंतर है और क्या? वही मिट्टी,वही पानी,वही हवा जिसमें स्वामी चिन्मयानंद पलकर बढ़े हुए उसी में दूसरे लोग भी पलकर रहे हैं।एक जैसा भोजन,एक भाषा,रंग रूप भी एक जैसा ही है,परंतु एक खास मत पंथ के कारण चिन्मयानंद का शोषण हो रहा है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन शास्त्रों ,परम्पराओं की रोशनी में व आपतिकाल में सन्तान की इच्छा होने शास्त्रोक्त नियमों, सीमाओं में रखकर ऋषि दयानन्द ने नियोग की आज्ञा दी है जिसमें मेरे विचार से किसी को कोई बाधा नहीं होनी चाहिए ।
प्रश्न - एक तथाकथित व स्वयंभू संत रामपाल सत्यार्थप्रकाश वर्णित नियोग व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है । कृपया इस विषय की वास्तविकता से परिचित कराएं ?
उत्तर - बहुत से लोग सत्यार्थप्रकाश में वर्णित नियोग के विषय पर सवाल उठाते हैं जो कि पूर्णतया मिथ्या व निराधार हैं व शास्त्रज्ञान का
अन्य पुरुष द्वारा दिया गया शुक्राणु इस्तेमाल किया जाता है।
Egg donation: इसमें किसी अन्य महिला द्वारा दिया गया अंडाणु इस्तेमाल किया जाता है।
जब स्पर्म व एग पति व पत्नी से अतिरिक्त किसी तीसरे पुरुष या स्त्री के हुए तो हुई न यह भी नियोग व्यवस्था , बस नाम व रुप ही अलग हैं ।
आजकल IVF के रुप में प्रचलित है जिसके तहत पूरे देश व विदेशों में निसन्तान को सन्तान दिलाने के सेंटर खुले हुए हैं जिनको सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है ।
इसमें स्पर्म या एग डोनेशन में दाता (donor) आम तौर पर उस दम्पति के बाहर का व्यक्ति होता है।
Sperm donation: इसमें किसी
शुक्राणु इस्तेमाल हो सकता है।
यदि इच्छित माता अपने अण्डाणु का प्रयोग नहीं कर सकती, तो donor egg इस्तेमाल किया जा सकता है।
इच्छित पिता की समस्या होने पर donor sperm का भी उपयोग हो सकता है।
इस प्रकार यह भी नियोग व्यवस्था का आधुनिक रुप ही है ।
इसी प्रकार की एक अन्य व्यवस्था
प्रचलित है जिसके तहत परस्त्री किसी अन्य पुरुष की सन्तान को 9 मास गर्भ में रखती है तत्पश्चात् उसे उसी पुरुष को सौंप देती है जिसकी वह थी व वही पुरुष उस सन्तान का असली पिता कहलाता है परन्तु जिसने जन्म दिया वह मां मां नहीं कहलाती ।
इसमें इच्छित माता का अण्डाणु + इच्छित पिता का
है जिन नियमों व सीमाओं का मनुस्मृति आदि शास्त्रों में विस्तार से वर्णन मिलता है ।
आधुनिक युग में प्रचलित नियोग व्यवस्थाएं -
आजकल भी हमारे समाज में ऐसी व्यवस्थाएं प्रचलित हैं जिनको सरकार द्वारा भी मान्यता प्राप्त है ।
इस प्रकार की एक व्यवस्था महाराष्ट्र में "सरोगेसी' नाम से
तत्पश्चात् उस नियुक्त पुरुष व स्त्री का कोई सम्बन्ध नहीं रहता व नियोग से उत्पन्न सन्तान नियोग करवाने वाले पति-पत्नी की मानी जाती है ।
यह पूर्णतया ऐच्छिक है यह नियोग करने वाले या करवाने वाले की इच्छा पर निर्भर है कि वह इसे करे या न करे। इसे पूर्णतया नियमबद्ध ,सीमाबद्ध किया गया
व विदुर की उत्पति की थी । इसी प्रकार के अन्य उदाहरण भी हमारे इतिहास में उपलब्ध होते हैं।
नियोग व्यवस्था क्या ?
यह एक आपातकालीन व्यवस्था है जिसके तहत पति से अन्य पुरुष आपत्तिकाल में निसन्तान स्त्री को सन्तान दिलवाने के लिए केवल सन्तानोत्पति की दृष्टि से नियोग करता है
थी हालांकि अलग नाम व रुप के साथ यह व्गवस्था आज भी प्रचलित है। जिसका विचार हम इसी लेख में आगे करेगें।
तीसरा - नियोग जैसी व्यवस्था को वेदव्यास आदि ऋषियों ने सही माना है इसलिए उन्होने पति के सन्तनोत्पति में अशक्त होने पर अम्बा,अम्बालिका व दासी से नियोग करके पाण्डु,धृतराष्ट्र
रुप में लागू हो सकें जैसी कि प्राचीन काल में थी ।
जैसे नियोग व्यवस्था को ही लें तो आज के समय में लोगों की असंयमित जीवन शैली व शासन-प्रशासन व समाज व्यवस्था के प्राचीन काल जैसी न होने के कारण आज के समय में नियोग व्यवस्था का उस रुप में होना सम्भव नहीं है जैसी की यह प्राचीन काल
व स्वामी दयानन्द जी ने नियोग के विषय को वहीं से लेकर लिखा है ।
दूसरा - स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में प्राचीन ग्रंथों के आधार पर प्राचीन वैदिक व्यवस्था का अनुकरणीय आदर्श हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है इसलिए यह आवश्यक नहीं कि वे सभी व्यवस्थाएं ज्यों कि त्यों आज भी उसी
ग्रंथों के आधार पर जगह-जगह उनके प्रमाणों के साथ लिखा है इसलिए हमें ऋषि दयानन्द पर आरोप लगाने से पहले इन ग्रन्थों का निरीक्षण कर लेना चाहिए जिनके आधार पर उन्होनें यह लिखा है ।
यदि हम नियोग के विषय को ही देखें तो इसके नियमों का वर्णन महर्षि मनु ने मनुस्मृति में विस्तार से लिखा
अभाव होने , विषय को भलीभांति न समझने के कारण है ।
इस विषय को समझने के पहले हमें निम्नलिखित बातों को समझना आवश्यक है -
पहला - ऋषि दयानन्द ने नियोग या अन्य विषयों के बारे में अपने सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में जो भी लिखा है वह वेद,वेदांग,,दर्शनों, उपनिषदों व मनुस्मृति आदि