रात को ग्रामीण क्षेत्र सिकंदरा राऊ (हाथरस ) में अघोषित बिजली कटौती क्यों हो रहीं हैं। क्या 20 घंटे लाइट ग्रामीण क्षेत्र में सुचारू रूप दी जा रहीं हैं @aksharmaBharat मंत्री जी बताने की कृपा करे।
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तहसील सिकंदरा राऊ के देहात में कितने घंटे लाइट दी जा रहीं हैं, अघोषित कटौती से देहात के लोग परेशान हैं सरकार का आदेश है ग्रामीण क्षेत्र में 20 घंटे लाइट का।
क्या 20 घंटे लाइट ग्रामीण क्षेत्र में मिल रहीं हैं?
बताने की कृपा करे @aksharmaBharat@dvvnlhq@MDDVVNL@dvvnlhathras
उप्र भाजपा सरकार द्वारा एक तरफ़ झूठी तारीफ़ के प्रायोजित कार्यक्रम लगातार करवाये जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार ने ये कहकर रंग मे भंग कर दिया कि ‘कार्यकाल ख़त्म होने के बावजूद ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का यूपी सरकार का फ़ैसला असंवैधानिक है’। जनता पूछ रही है कि ‘असंवैधानिक’ काम करने की सज़ा क्या होती है?’
अब यही ग्राम प्रधान भाजपाइयों को इसलिए गाँवों में घुसने नहीं देंगे क्योंकि भाजपा सरकार द्वारा उन्हें प्रशासक बनाने के आदेश ने, उनमें कुछ नये काम करने की उम्मीद जगाई थी, जिसका वादा वो जनता से कर चुके थे, अब जनता तो तकनीकी पक्ष समझती नहीं है कि क्या हुआ, वो तो यही मानेगी कि प्रधान जी ने अपना वादा पूरा नहीं किया और सारा फ़ंड-बजट-पैसा डबल इंजन के साथ मिल-बाँटकर खा गये। प्रधानों में इस बात का भी डर है कि कहीं ‘इन बीच के दिनों’ के ख़र्चे का ख़ामियाज़ा उनको अपनी जेब से न भरना पड़े। हो सकता है कल को ‘पैसा वापसी’ का आदेश भी आ जाए। जब कार्यकाल गलत साबित हो गया है, तो उस समय में खर्च हुआ पैसा भी तो क़ानूनी रूप से गलत माना जाएगा। भाजपा ने प्रधानों को बहुत बुरा फँसा दिया है। वहीं प्रधानों ने जिन ठेकेदारों को काम दिया था, वो भी ‘इन बीच के दिनों’ के बिलों का भुगतान करवाने के लिए प्रधानों का दरवाज़ा खटखटाएँगे। इसीलिए प्रधान अब भाजपाइयों और उनके संगी-साथियों की गाँव-गाँव में नाकाबंदी कर देंगे।
भाजपा बनने चली थी सयानी
निपट गई उसकी ही कहानी।
भाजपा किसी घाट की नहीं रही।
विशेष: पंचायती राज मंत्री तो घर से ही नहीं निकल पाएंगे, गाँव पहुँचना तो दूर की बात है।
स्मार्ट मीटर के नाम पर चल रही बिजली की ठगी के ख़िलाफ़ उप्र की जनता के गुस्से का मीटर हाई है क्योंकि उसे पता चल गया है कि बेवजह ज़रूरत से ज़्यादा मीटर रीडिंग आने और बिजली का खर्चा बेतहाशा बढ़ने का असली कारण भाजपा का भ्रष्टाचार है। जनता समझ गयी है कि भाजपाई ठेके देने से पहले ही मीटर-बिजली कंपनी से एडंवास कमीशन वसूल लेते हैं, जिसकी वसूली बिजली कंपनियाँ मीटरों को पहले से तेज दौड़ने के लिए सेट करके करती हैं।
भाजपा के बिजली मीटर भी, ईवीएम मशीन की तरह हेराफेरी करते हैं।
भाजपाई जनता के गुस्से के करंट से दूर ही रहें। महंगे सिलेंडर और महंगी बिजली के बिल ही भाजपा का कनेक्श सत्ता से काट देंगे।
बिजली उपभोक्ता कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!
#बुरे_दिन_जानेवाले_है
अब जब अवैध खनन के साक्षात सबूत के वीडियो देखेंगे तो माननीय फिर कहेंगे ये तो ‘एआई जनरेटेड’ है।
लगता है इस मामले में दिल्ली-लखनऊ की मिलीभगत है तभी न दिल्ली के ड्रोन को ये दिनदहाड़े का अवैध खनन दिखाई दे रहा है और न ही दूरबीन को… और रही बात लखनऊवालों की तो उन्होंने तो पहले ही बहाने की तरह काला चश्मा लगा लिया है, जिससे न दिखेगा अपराध, न करनी पड़ेगी कार्रवाई, घर तक अपने आप पहुँच जाएगी हिस्से-बाँट की मलाई।
आशा है : पर्यावरण को बचाने की अपनी लड़ाई में लगी ऐसी साहसी पत्रकारिता अवैध खनन को पूरी तरह ख़त्म करके ही दम लेगी।
आँख और मुँह कितने सेंटीमीटर खुल सकते हैं, ये शर्त भी रख देते…
किसी को ‘हाता नहीं भाता’, इसीलिए वो ‘शर्तों’ का है अंबार लगाता।
भाजपाई सनातन का सम्मान नहीं कर सकते हैं तो भले न करें परंतु अपमान भी न करें। उप्र की अहंकारी सरकार जिस समाज विशेष के मान की बाँह मरोड़ रही है, वो बात उस समझदार समाज को समझ आ रही है। यहाँ तक कि उस समाज के जो लोग भाजपा सरकार में मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद या कहें किसी और तरह के जनप्रतिनिधि हैं, वो भी इस मामले में अपने समाज से मुँह छिपा रहे हैं लेकिन भाजपा की भट्टी पर अपने स्वार्थ की रोटी सेंकनेवाले ऐसे भाजपाई जनप्रतिनिधि, अपने ही समाज में सम्मान खो चुके हैं। जनता अगले चुनाव में उनको सबक सिखाएगी। इन जनप्रतिनिधियों में से जो कुछ लोग अपने समाज के सच्चे शुभचिंतक हैं वो उन अन्य दलों के संपर्क में हैं जो सदैव सनातन और इस समाज का सम्मान भी करते रहे हैं और जिन्होंने उन्हें सदैव यथोचित मान-स्थान भी दिया है।
और हाँ… ‘कोविड-19’ अभी भी चल रहा है क्या? अगर ये सच है तो सरकार की अपनी किस मीटिंग या भाजपा के किस आयोजन में इसका आख़िरी बार अनुपालन हुआ, उसका प्रमाण दिया जाए। भाजपाई और उनके संगी-साथियों की भूमिगत बैठकों में क्या ये लागू होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी कारण ‘बाटी-चोखा’ वाली बैठक पर पाबंदी लगाई गयी थी।
अतार्किक बंदिशें लगाना कमज़ोर सत्ता की पहचान होती है।
निंदनीय!
घोर आपत्तिजनक!!
विनाशकाले विपरीत बुद्धि!!!
रेलवे स्टेशन अगसौली गेट संख्या 270 सी पर अंडर पास का निर्माण कार्य चल रहा है। जो रास्ता था उस रास्ते पर ठेकादार के द्वारा बालू रेत डालने के कारण हादसे होते रहते हैं दर्जनों वाहनों का आवागमन रहता है बच्चे भी स्कूल जाते है कृपा संज्ञान ले @AshwiniVaishnaw@RailMinIndia@drm_drmizn
आज से गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे का नाम हुआ : OXPRESSWAY
पता नहीं जनता ये क्यों कह रही है कि सच तो ये है कि अगर इन्हें चढ़ने ही नहीं दिया होता तो इन्हें उतारने-हटाने के लिए इतनी मेहनत-मशक़्क़त नहीं करनी पड़ती।
“ये हम नहीं हमारी लाशें खड़ी हैं।” भाजपा की सरकार के ख़िलाफ़ दिया गया एक व्यापारी के परिवार का ये आक्रोशित कथन, भाजपा के लिए डूब मरने से कम नहीं है।
दरअसल अब समाज का हर वर्ग ये समझने लगा है कि भाजपा केवल चंद अरबपतियों और विशाल कारपोरेट की ही हितैषी है और छोटे कारोबारियों को ख़त्म कर देना चाहती है। भाजपा इसके लिए बहाना ये बनाती है कि छोटे व्यापारी या दुकानदार टैक्स चोरी करते हैं। आज देशभर के व्यापारी संघ भाजपा से एक सवाल कर रहे हैं कि ‘जब देश और दुनियाभर के ये बड़े-बड़े व्यापारी नहीं थे तो क्या देश को टैक्स नहीं मिलता था?’
सच सिर्फ़ इतना है कि भ्रष्ट भाजपाई सारा व्यापार कुछ ‘महा-मुनाफ़ाख़ोरों’ के हाथों में दे देना चाहते हैं, जिससे उन्हें अरबों का राजनीतिक और व्यक्तिगत चंदा एक मुश्त मिल सके और वो इस ‘महा-भ्रष्टाचार’ के सहारे पैसा बाँटकर सरकार बनाते रहें लेकिन अब ये ‘कुटिल भाजपाई चाल’ हर व्यापारी और उनके परिवार के लोग समझ गये हैं क्योंकि काम-कारोबार ख़त्म होने से उनके पालन-पोषण, जीवन-यापन का सवाल खड़ा हो गया है। जिनके परिवार हैं वो ही ये दर्द समझ सकते हैं कि परिवार की भूख, घर के बड़े-बुजुर्गों की दवाई-देखभाल, बच्चों की पढ़ाई और घरवालों की छोटी-छोटी इच्छाओं की पूर्ति न कर पाने का दुख-दर्द क्या होता है। जिनके परिवार नहीं हैं वो अपने से आगे की कभी सोचते ही नहीं हैं।
भाजपाई की यही कमीशनख़ोरी और महा-मुनाफ़ाख़ोरों को दी गई खुली छूट ही हर चीज़ के दाम बढ़ने-महंगाई का कारण है। इससे माँग भी घटती जा रही है, क्योंकि भाजपाई की कारोबार और नौकरी विरोधी गलत नीतियों की वजह से फैली बेकारी-बेरोज़गारी के कारण बाज़ार में मंदी आ गयी है और ट्रेड डील के बाद तो बंदी आ ही जाएगी। इसीलिए अब से हर चुनाव में भाजपा को सबसे बड़ा झटका सड़कों पर जूझ रहे रेहड़ी-पटरी और ठेलेवालों से लेकर छोटे दुकानदारों, कारोबारियों, छोटे-बड़े कल-कारखानों और स्थानीय उद्यमियों और उद्योगपतियों से ही मिलेगा।
भाजपा राज में ‘मंदी’ और ‘बंदी’ के सिवा देश के कारोबार को कुछ और हासिल नहीं हुआ है।
भाजपा हटाओ, व्यापार बचाओ!
खेती की लागत ढाई गुनी हुई भाव हुआ आधा
क्या हुआ किसान की ‘दोगुनी आय का वादा’
सवाल ये नहीं है कि कोई है या नहीं, असल सवाल तो ये है कि ‘किसान-किसानी’ रहेगी या नहीं?
आज़ादी से पहले के अपने समुद्र किनारे के साम्राज्यवादी आकाओं की ‘बाँटो और राज करो’ की नीति को ये विघटनकारी मानसिकता के नकारात्मक लोग हर स्तर पर लागू करते हैं। भाजपा किसी की सगी नहीं है, भाजपाइयों का बस चले तो एक शरीर के दो हाथों को भी मिलने न दे।
छल से अर्जित सत्ता, हमेशा एकता से डरती है, अन्याय उसकी पहचान होती है और अत्याचार उसका हथियार।
समुद्र किनारे के आज के साम्राज्यवादी विचारवंशी भी ‘भेद’ को ही अपनी कूटनीति मानते हैं।