अभी तक तो करांची लाहोर हमने
जीत भी लिया होता स्टूडियो में
बैठे-बैठे यहां मुंह पर ताले लग गए
अमरीका है तो! संदीप चौधरी।😳
जवाब सुनिए! जहां जब प्लेटफॉर्म
सही मिलेगा पूरा माकूल जवाब
दीया जाएगा!🙇🫣
Thx Sabyasachi & ur whole team for introducing me to the Met Gala. It’s not my ‘space’ but u made me feel so comfortable…becos u, like me, believe…Style & Fashion…is just being who you are. And all of u made me feel like a ‘K’!
नामुरादों! जाति न तो 'उन्होंने' बनाई और न वे पूछते. जाति जिन्होंने बनाई है, वे अपने देश में आज भी पूछते हैं, हर क़दम पर. इसलिए ताकि जाति पूछकर अपनी वाली मुट्ठी भर जाति का भला कर सकें, बाक़ी का नुक़सान कर दें. जाति इसलिए पूछते हैं ताकि अपनी श्रेष्ठता बरकरार रहे. क़ब्ज़ा क़ायम रहे, सत्ता संसाधन और सम्मान पर. जाति तुम पूछते हो, ताकि भेदभाव कर सको. पूछने वालों में भी तुम मुट्ठी भर लोग ही हो.
BJP और संघी एक साथ दो मोर्चों पर लड़ रहे हैं. एक तरफ़ वे पूरी एक क़ौम को अब आतंक से जोड़ कर नफ़रत फैला रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ़ इस देश में सामाजिक न्याय पर चल रहे बहुजन आंदोलन को भी नकारते हुए उसे धर्म की पहचान में हिंदू बनाकर मुट्ठी भर लोगों का वर्चस्व क़ायम रखना चाहते हैं. ये भयानक राष्ट्रद्रोही लोग हैं. अमानवीय हैं. ये जाति ख़त्म करने के आंदोलन के विरोधी हैं. ये जाति जनगणना के विरोधी हैं.
मुट्ठी भर दस फ़ीसदी लोगों की भाषा देखिए, नफ़रत का एजेंडा देखिए. वहीं मज़हब के नाम पर आज नफ़रत पड़ोस रहा है, जो भीतर से जातिवादी भी है. जातिवाद और मज़हब के नाम पर नफ़रत एक कम्बो है. एक के साथ दूसरा मिलेगा ही. इंसानियत के लिए जिस देश में बुद्ध, आजीवक, कबीर, रैदास, नानक, बुल्लेशाह, फ़रीद, नारायण गुरु, फुले, शाहू, आंबेडकर, पेरियार, लोहिया, मंडल के विचार हों, वहाँ ऐसी जहालत.
हम आज भी कहेंगे, आतंकियों का कोई धर्म नहीं. आतंकियों पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई हो. ताकि अगली बार कोई सोच भी न सके बेगुनाहों का लहू बनाने को. जो भी हथियार हाथ में लेकर लड़ रहा, वह मानवता विरोधी है. हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं. हम हथियार वाले हाथों में क़लम देखना चाहते हैं. हथियारों ने दुनिया का बहुत नुक़सान किया. इस नुक़सान को समय रहते रोकना होगा. तभी इंसानियत बचेगी.
ऐसे पोस्टर बनाने वालों और सोच रखने वालों! आपदा में अवसर मत तलाशो. पकड़े जाते हो. कोई फ़ायदा नहीं. ईमानदारी से पहले बीमारी क़बूल करो, फिर इलाज करो. इंसान बनो.
महात्मा फुले पर बनी फ़िल्म उनकी जयंती के दिन यानी 11 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली थी. मगर कुछ जातिवादी संगठनों ने विरोध किया कि-
फुले दंपत्ति पर हमला करने वालों और उनकी जाति को मत दिखाओ.
3000 साल के शोषण को बदल कर कई सालों से शोषण कर दो.
माँग और महार शब्दों का इस्तेमाल मत करो. इससे जातिवाद बढ़ जाएगा.
ऐसे कई कट लगाए हैं सेंसर बोर्ड ने. मगर सिनेमा जगत में कौन बोला??
@anuragkashyap72 ने हिम्मत करते हुए इस सेंसरशिप पर कड़ी आपत्ति जताई.
काश! हीरो और महानायकों में भी रीढ़ बची हुई होती तो असली सिनेमा का पक्ष लेते.
काश! फुले को मानने वाले बहुजन समाज के लोग जागे होते, तो ये न होने देते.
बीजेपी दलितों को मंदिर में नहीं जाने देती है, और अगर कोई चला जाए तो वे मंदिर को धुलवाते हैं – ये हमारा धर्म नहीं है।
हमारा धर्म वो है जो सबको इज़्ज़त देता है, हर व्यक्ति का आदर करता है।
कांग्रेस और बीजेपी में यही फर्क है – हमारे दिलों में सबके लिए मोहब्बत और इज़्ज़त है, जबकि उनके दिलों में सिर्फ नफ़रत।
हम इस देश को नफ़रत का बाज़ार नहीं बनने देंगे - मोहब्बत की दुकान खोल कर न्याय का हिंदुस्तान बनाएंगे।
- नेता प्रतिपक्ष लोकसभा श्री @RahulGandhi जी
@INCIndia@INCRajasthan
ये शिवम सोनकर है। 8 बार NET क्वालीफाई कर चुका है। BHU में पीएचडी प्रवेश परीक्षा में सामान्य वर्ग में दूसरा स्थान प्राप्त कर चुका है। BHU में इसे प्रवेश से वंचित कर दिया गया और प्रशासन द्वारा कहा जाता है कि "जाकर जूता साफ करने का काम करो", केवल इसलिए क्योंकि वह एक दलित समुदाय से आता है। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है कि एक मेधावी छात्र, जिसने अपनी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया, आज विश्वविद्यालय के द्वार पर खुले आसमान के नीचे अन्याय के खिलाफ बैठने को मजबूर है।