मैं जब नहीं होता हूँ
घर में
सफर में
मुसाफिरखाने में
यात्रियों के गठरियों में।
तो होता हूँ मैं
किसी खेत में
गन्ने को घूरते हुए।
― कुन्दन चौधरी
( पूरी कविता नीचे दिए गए लिंक से पढ़ें )
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@kavishala@Kavishala_Hindi
https://t.co/JZ7sfFlyKu
मेरी आत्मा में एक ख़ज़ाना छुपा हुआ है
जिसकी चाभी सिर्फ़ मेरे पास है!
तुम ठीक कहते हो पियक्कड़ शैतान!
मैं जानता हूँ, सत्य शराब में है!
― अलेक्सांद्र ब्लोक
अनुवाद : भारतभूषण अग्रवाल
दुख, दर्द और ग्रोथ का आंतरिक संबंध https://t.co/yK1MnCMiRd
कुछ समय पहले तक मैं भी इसी ग़लतफ़हमी में थी कि ‘ग्रोथ’ का मतलब सिर्फ़ आगे बढ़ना है, एक बेहतर नौकरी, बैंक अकाउंट में ज़्यादा पैसे, थोड़ी और बड़ी पहचान और एक के बाद एक मिलती कामयाबियाँ। आख़िर हमें बचपन से सिखाया भी तो यही जाता है कि ज़िंदगी एक सीढ़ी है, जहाँ हर अगला कदम पिछले से ऊँचा और बेहतर होना चाहिए।
लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि हमारी सबसे ज़रूरी और असली ग्रोथ बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर होती है। यह वह बदलाव है जो किसी रिज़्यूमे में नहीं दिखता, न ही किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर चमकता है। यह तब होती है जब आप चुपचाप अपने किसी पुराने डर से बाहर निकल आते हैं, अपनी किसी पुरानी ज़िद को छोड़ देते हैं, अपनी ही किसी ग़लत बात को पहचानकर मुस्कुरा देते हैं, या फिर अपने भीतर उस इंसान को पनपने की जगह देते हैं जिसे आपने खुद कभी छुपा रखा था।
सच कहूँ तो, यह पूरी प्रक्रिया जितनी ख़ूबसूरत लगती है, भीतर से उतनी ही तकलीफ़देह होती है।
कोरियाई लेखिका हान काँग जब अपनी किताबों में इंसानी दुखों की परतों को खोलती हैं, तो अंदरूनी ग्रोथ का एक बहुत ही आत्मीय रूप सामने आता है। उनके मशहूर उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ (The Vegetarian) की नायिका योंग-हे जब समाज के बनाए तौर-तरीकों को मानने से इनकार कर देती है, तो वह दुनिया की नज़र में अजीब हो सकती है। पर असल में वह उसके भीतर की एक बहुत शांत और गहरी क्रांति है। वह कुछ नया पा नहीं रही, बल्कि खुद को बचाने के लिए बहुत कुछ छोड़ रही है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि ग्रोथ अक्सर कुछ नया जोड़ने से नहीं, बल्कि बहुत कुछ पीछे छोड़ने से आती है। और छोड़ना आसान नहीं होता। आपको कुछ शहर छोड़ने पड़ते हैं, कुछ रास्ते, कुछ लोग, कुछ पुरानी आदतें और बरसों से पाले हुए कुछ विचार। कभी-कभी तो अपने ही बारे में बनाई हुई वह ख़ास छवि भी छोड़नी पड़ती है, जिसे हम न जाने कब से एक भारी बोझ की तरह ढो रहे होते हैं। सबसे ज़्यादा दिल तो तब दुखता है जब जिन चीज़ों, जगहों या लोगों को पीछे छोड़ना पड़ता है, उनसे हमें बेहद मोहब्बत होती है।
यही वजह है कि जब हम भीतर से बड़े हो रहे होते हैं, तो वह हर बार किसी ‘जीत’ या बड़ी achievement जैसा नहीं लगता। कई बार वह एक बहुत निजी और छोटे-से शोक की तरह लगता है, जैसे हमारे भीतर ही कुछ टूटकर पीछे छूट गया हो। हान काँग अपनी किताब ‘ह्यूमन एक्ट्स’ (Human Acts) में लिखती हैं कि बड़े हादसों के बीच जो लोग बच जाते हैं, वे दरअसल अपने भीतर के घावों और यादों के साथ ही जीना सीख लेते हैं। वे घाव ही उनकी आत्मा को बड़ा और गहरा करते हैं।
मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ ओ ऊजड़ गाँवो!
और तुम्हें भी, ओ धरती के शहरों के कुँओ!
ओ आसमान के उजले विस्तार,
ओ दास मज़दूरों की यंत्रणा!
— अलेक्सांद्र ब्लोक
अनुवाद : भारतभूषण अग्रवाल
#कवितांश#कविता#हिंदी
कुछ दिनों पहले एक युवा कवयित्री की कविताएँ जानकी पुल पर लगाई, जिसमें एक कविता थी जिसका भाव यह था कि कवि अपने पूर्व प्रेमी को याद कर रही है, उसको दुआएँ दे रही है। कुछ दिनों बाद उसका मैसेज आया कि मैं उस कविता को हटा दूँ क्योंकि उसको प्रॉब्लम हो रही है। मैंने उससे पूछा- आपने ऐसी कविता ही क्यों लिखी जिससे आपको भागना पड़ रहा है। उसने जवाब दिया- सर आजकल सोशल मीडिया पर ऐसी कविताएँ बहुत कवित्रियाँ लिखती हैं। मैंने सोचा मैं भी लिखूँगी तो लाइक मिलेंगे। मैंने कविता हटा दी लेकिन यह सलाह भी दी कि कविता लाइक के लिये मत लिखिए, जब मन करे तभी लिखिए। कोई पढ़े न पढ़े आपको अच्छा महसूस होगा।
कभी प्रेमिकाओं के क़ाबिल
नहीं होते फूल
कहीं प्रेमिकाएँ नहीं होतीं
फूलों के क़ाबिल
कौन समझे कौन जाने
चुप्पियों का चीत्कार
कि कैसे विवश
अर्पित किए जा रहे फूल
प्रेम की तरह
कितना विवश
बेतहाशा उमड़ता हुआ—
मन।
— आत्मा रंजन
#हिंदी#कविता#कवितांश#कवि
#
क्या अर्थ रखता है दोस्त
कुत्तों के समूह में
एक कुतिया का—
माँ हो जाना
और उस पर यह
कि कुत्तों से हम
वफ़ादारी नहीं
तमीज़ सीख रहे हैं।
— आत्मा रंजन
#हिंदी#कविता#कवितांश
Until then, the U.S. may continue trying to negotiate with India, or apply different kinds of pressure to influence its policies.
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Your POV @aravind
This could be one possible theory, but the Middle East war seems to have influenced decisions under Trump, especially regarding which countries are the biggest consumers of U.S. oil. After developments like control over Venezuela’s oil resources, the focus shifted......
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Countries like India, China, and Russia appear more capable of handling tariffs and economic pressure. As a result, the U.S. has focused more on influencing smaller countries—either through negotiations or political pressure, regime change—to make them larger consumers....
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कितना बहुत है
परंतु अतिरिक्त एक भी नहीं
एक पेड़ में कितनी सारी पत्तियाँ
अतिरिक्त एक पत्ती नहीं
एक कोंपल नहीं अतिरिक्त
— विनोद कुमार शुक्ल
भावपूर्ण श्रद्धांजलि 🙏
#हिंदी#कविता#शब्द#विनोद_कुमार_शुक्ल#विनोद
इतना अच्छा व्यवहार उस लड़की ने मेरे साथ कभी नहीं किया था। फिर दोनों वहां से बाहर आए और मोटरसाइकिल से चले गए। मेरी प्रेमिका उसे कस कर पकड़े हुए थी। मेरी ईर्ष्या चरम पर थी। पर मैं बाजार मे कोई ड्रामा नहीं करना चाहता था तो उन्हें जाने दिया। मैंने कुछ नहीं कहा। ना फोन करके कुछ कहा।
मैं जानता हूँ कि ‘इनकार से भरी हुई एक चीख़’
और ‘एक समझदार चुप’
दोनों का मतलब एक है—
भविष्य गढ़ने में, ’चुप’ और ‘चीख़’
अपनी-अपनी जगह एक ही क़िस्म से
अपना-अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं।
— धूमिल
#हिंदी#कविता#शब्द#कवितांश#कवि
किसने किया ये अत्याचार
प्रकृति निराश लगती है,
मिट्टी उदास दिखती है।
अंतहीन आकाँक्षाओं के वसीभूत
स्वार्थांध मनुज राक्षसों ने
इतने घाव बना डाले हैं,
धरती दिनरात सिसकती है,
मिट्टी उदास दिखती है।
— कलानाथ मिश्र
#हिंदी#कविता#शब्द#कवितांश