@chitraaum बिल्कुल ठीक कहा "विचित्रा" जी ....ठीक ऐसे ही जिस पत्रकार ने भाजपाई व्हाट्सएपिया ज्ञान को रिसर्च बता कर बेंचा है, उसकी पत्रकारिता की मान्यता भी रद्द करनी चाहिए
एप्स्टीन ने मोदी से संबंध बताते जो ईमेल की है उसकी कड़ियाँ जोड़िये
जून 2017 में मोदी अमेरिका गए, ट्रम्प से मिले
जुलाई 2017 में इज़राइल जाकर अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नाचे गाये
फिर कुछ काम बन गया
एप्स्टीन जैसे घिनौने आदमी से देश के PM का संबंध क्यों है?
जवाब देना पड़ेगा
मैं जब 2018 से 2020 के आसपास हिंदू सांप्रदायिकता के प्रति तल्ख़ था तब तक मैं मुसलमानों और लिबरल जमात का हीरो था। उस समय हुई 'लिंचिंग' की घटनाओं के प्रति मेरी वैसी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक ही थी। मन में पाप नहीं था। जो दिख रहा था, वह बोल रहा था। इस कारण कमेंट बॉक्स में मुस्लिम-ऑडियंस की सराहना थी। 'जूनियर रवीश' कहा जाता था। यहॉं तक कि ध्रुव राठी ने वली रहमानी के समक्ष 'रवीश ऑफ यूट्यूब' कहा था। तब यह विशेषण गहना था।
ख़ैर, तब तक मैं इस्लाम के वैश्विक नैरेटिव से अनभिज्ञ था। बाबा साहब आंबेडकर की बात इतनी पुख़्ता थी, जिसका मुझे तब अंदाज़ा न था। नूपुर शर्मा का मामला निर्णायक साबित हुआ। मैंने इस मामले में तल्ख़ी से अपनी बात रखी। जिस ऑडियंस के लिए मैं कल तक हीरो था, बस एक ही दिन में बिक गया था, गोदी मीडिया और संघी हो गया था।
सामान्य ऑडियंस तो छोड़ ही दीजिए, जो भी मेरे उदार, देशभक्त, वैज्ञानिक सोच वाले मुस्लमान दोस्त थे, उनमें से एक ने भी मेरे पक्ष में न कोई कमेंट किया, न व्यक्तिगत रूप से कुछ कहा। बल्कि नाराज़ ही हुए।
यहॉं तक कि एक ने तो मुझसे अपनी डोनेट की राशि ही वापस मॉंग ली जो उसने कभी भेजी थी। मैंने तुरंत उसके 1000-1500 रूपए वापस भेज दिए। मेरी उससे तालिबान पर बात हुई थी।
तब से लेकर आजतक मुझे भारत के मुसलमानों ने अपनी वैचारिकी, नैरेटिव और अपनी निष्ठा को लेकर कभी निराश नहीं किया है।
इन दिनों भाई श्याम मीरा सिंह और भाई प्रशांत कनौजिया एक मुफ़्ती की आलोचना कर रहे हैं। इनकी कभी-कभार की गई आलोचनाऍं भी इन्हें एक झटके में 'संघी' घोषित कर रही है। इन्होंने पूरा जीवन संघ और उसके अनुषंगी संगठनों के विरोध में बीता दिया पर इसके बावजूद श्याम और प्रशांत स्वयं को 'संघी' होने से नहीं बचा पाए।
दिलचस्प बात यह है कि सायमा, आरफ़ा, ज़ुबैर या अन्य किसी भी व्यक्ति ने इनके समर्थन में एक शब्द नहीं लिखा है। यहॉं तक कि उस मुफ़्ती की किसी भी विपरीत बात के विरोध में इन कथित लिबरल मुसलमानों ने एक भी टिप्पणी की हो तो बता दें? नहीं मिलेगी।
यही सत्य है। वो अपने उद्देश्य और पहचान से कभी नहीं डिग सकते, चाहे यह पृथ्वी गोल से चपटी हो जाए। वो आपके सेकुलरिज्म के हलफनामे पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे।
This is the mufti's method to make Muslims feel guilty about living in a non-sharia society and not striving to change it.
Maine do kaudi ka bol diya to log bura maan gaye. But an aalim who selects verses to separate a people from the larger society is. https://t.co/OaY9UC1fyo