भोर का परिवेश हो और खुश मेरा ये देश हो
जिस तरफ़ जाए जहाँ तक अब नज़र मेरी यहाँ
जिस तरह इस देश में हैं मुस्कुराते राजनेता
मैं चाहता हूँ उस दिशा में खिलखिलाता देश का मेरे कृषक हो
शिवम अन्तापुरिया
_घनघोर अँधियारा जब इस धरा पर छा गया_
_धर-धरा पर मोहिनी रूप ईश्वर धरा पर आ गया_
_अब तक धरा विचलित हुई जिन पाप-अत्याचारों से_
_करने उन्हीं का संहार मेरा कृष्णा धरा पर आ गया_
_शिवम यादव अन्तापुरिया_