#जातिवाद#हिंदूधर्म
My take on hindu dharm .
मेरा नाम लोकेंद्र है। मैं चारण जाति से बिलॉन्ग करता हूं (obc category)। मैं पिछले 6 साल से हिन्दू समाज व जातियों के ऊपर अध्ययन कर रहा हूं। मेरे अनुसार हिंदू कोई धर्म नहीं है बस जातियों का एक संगठन है।
ईश्वर: भ्रम है या भरोसा?
मैं खुद को न पूरी तरह आस्तिक मानता हूं, न नास्तिक। क्योंकि हर चीज़ को न तो सिर्फ बुद्धि से समझा जा सकता है और ईश्वर जैसी अदृश्य शक्ति ही सब कुछ चला रही है, सिर्फ ऐसा मानना भी मुश्किल है।
अब ईश्वर के सवाल पर आते हैं। देखिए, अगर मैं कहूं कि इस कमरे में कोई है जो हर वक्त आपको देख रहा है, इसलिए संभलकर रहना, तो आप फ़ौरन पूछेंगे कि कौन है। आपके पूछने पर मुझे बताना ही होगा कि कौन देख रहा है... मैं सिर्फ़ 'कोई देख रहा है' की बात बोलकर बच नहीं सकता।
इसी तरह आप कहें कि कोई है जो दुनिया के 7 अरब लोगों को सुबह-शाम देख रहा है, उनके अच्छे-बुरे का हिसाब रख रहा है, तो क्या तब आपकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि बताएं कौन देख रहा है, क्यूं देख रहा है। तब क्या सिर्फ़ ये कहकर बचा जा सकता है कि नहीं, मैंने कह दिया तो आप भरोसा कीजिए।
रिचर्ड डॉकिन्स ने अपनी मशहूर किताब The God Delusion में कहा था कि आप किसी चीज़ पर विश्वास कर रहे हैं लेकिन उसको परखने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, तो वो आपका निजी विश्वास तो हो सकता है लेकिन उसे सार्वभौमिक सत्य बताकर दुनिया पर आप उसे थोप नहीं सकते। सच वो होता है जहां कुछ सबूतों के आधार पर बार-बार एक जैसे निष्कर्ष निकाले जा सकें।
अगर आप पुलिस थाने में जाकर कहें कि फलाने ने मेरे मेरे झूठे साइन करके मेरे अकाउंट से 5 लाख निकाल लिए, तो आपको पाँच लाख की चोरी का सबूत देना होगा। आपको बैंक स्टेटमेंट दिखानी होगी। आप वहां ये नहीं कह सकते कि मैं सबूत तो नहीं दे सकता, आप मुझ पर भरोसा कर लीजिए।
डॉक्टर की किसी बड़ी सर्जरी से पहले टेस्ट करके बीमारी के सबूत जुटाता है। वो अपने भरोसे पर आपका ऑपरेशन नहीं कर देता। कर रहा है, तो वो झोलाछाप डॉक्टर होगा। तो सवाल ये है कि हम अपने ईश्वर को झोलाछाप साबित करने पर क्यों तुले हुए हैं।
जब सबूत मांगे जाते हैं, तो आप कहते हैं कि इतनी बड़ी कायनात है तो कोई बनाने वाला तो होगा ही। तो फिर सवाल पैदा होता है कि उस बनाने वाले को किसने बनाया?
आप कहते हैं कि बनाने वाले को किसी ने नहीं बनाया, वो तो पहले से मौजूद था। ऐसा है तो कायनात को किसी ने बनाया हो, ये ही क्यों ज़रूरी है। वो भी तो स्वयंभू या खुद-ब-खुद हो सकती है।
ये सच है कि हमें जीवन की मिस्ट्री, उसकी जटिलता बार-बार हैरान करती है। लेकिन जैसा कि Ayn Rand ने कहा कि अज्ञानता (ignorance) इस बात का लाइसेंस नहीं हो सकती कि हम चीज़ें गढ़ लें। Philosophy of Science में इसे God of Gaps भी कहते हैं। मतलब जो चीज़ आपको समझ नहीं आ रही, उसे आप ईश्वर से नहीं भर सकते।
जब विज्ञान का जन्म नहीं हुआ था तब आंधी-तूफ़ान या किसी प्राकृतिक आपदा को ईश्वर का क्रोध माना जाता था। भगवान से रहम करने को कहा जाता था। छोटी-छोटी बीमारियों से लोग मर जाते थे, इसे भी ईश्वर या अल्लाह की मर्ज़ी कहा जाता था। मतलब जब तक विज्ञान नहीं था, तब तक हर हैरतअंग्रेज़ चीज़ के पीछे अदृश्य शक्ति को वजह मानकर तसल्ली कर ली जाती थी।
लेकिन इसी बिंदु पर 16वीं–17वीं शताब्दी आते-आते पूर्व और पश्चिम के रास्ते अलग-अलग हो गए। कहने में कोई हर्ज़ नहीं है कि पश्चिम आज जो भी तरक्की और आधुनिकता दिखती है, उसकी सीधी वजह ये है कि वहां के विचारकों ने जीवन की ये ज़िम्मेदारी किसी अज्ञात ईश्वर के बजाय इंसान पर डाली। इसके लिए उन्होंने गालियां खाईं, धर्म से निष्कासित हुए, देश छोड़ना पड़ा, लेकिन वहां ये पुनर्जागरण हुआ।
डच फिलोस्फ़र स्पिनोज़ा इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। आप यकीन कर सकते हैं कि आज से तकरीबन साढ़े तीन सौ साल पहले, 1677 में, एथिक्स नाम की किताब लिखकर तब की स्थापित ईश्वर की अवधारणा को चुनौती दे दी थी।
स्पिनोज़ा ने उस वक्त लिखा था कि ईश्वर और प्रकृति अलग-अलग नहीं हैं। ईश्वर अलग से कोई शख़्सियत नहीं है। वो कहीं तुम्हारे पुण्य और पापों का हिसाब नहीं रख रहा। वो न तुम पर कोई ज़ुल्म कर रहा है। वो न तुम्हारी रक्षा करने आ रहा है। वो न कोई प्राकृतिक आपदा पैदा कर रहा है। न कोई चमत्कार कर रहा है।
इसलिए किसी प्राकृतिक आपदा के समय ईश्वर से अपने लिए रहम की भीख मांगने के बजाय ये पता लगाओ कि ये प्राकृतिक आपदा आती कैसी है। इस कायनात को कुदरत मानकर हैरान होते रहने के बजाय ये पता लगाओ कि ये कायनात काम कैसे करती है।
उनके ये विचार उस वक्त इतने क्रांतिकारी थे कि उन्हें यहूदी समुदाय से बाहर निकाल दिया गया। किताब छपी भी तो उनके मरने के बाद। उस वक्त उनके काम को किसी ने याद नहीं रखा। लेकिन बाद में उनके ये विचार ही हेगल, मार्क्स और नीत्शे जैसे बाकी विचारकों के लिए प्रेरणा भी बने।
भारत में तो बहुत पहले चार्वाक दर्शन भी इस तरह के क्रांतिकारी विचार रख चुका था, लेकिन उसके साथ क्या हुआ ये अलग चर्चा का विषय है।
लेकिन पश्चिम ने चर्च को ईश्वर को अंतिम सत्ता मानने से इंकार कर दिया और कायनात के रहस्य जानने में लग गया।
तभी तो सिर्फ ईश्वरवादी जहां सिर्फ इस बहस में उलझकर रह गए कि कायनात को ईश्वर ने बनाया है। विज्ञान ने आगे चलकर बिग बैंग थ्योरी के ज़रिए ये बताया कि ये कायनात वजूद में आई कैसे!
ईश्वरवादी इस कायनात की खूबसूरती को देखकर हैरान होता रहा, लेकिन विज्ञान ने सामाजिक विज्ञान और जीव विज्ञान के ज़रिए कुदरत की खूबसूरती और रहस्य को डिकोड करना शुरू कर दिया।
आप हिंदी फिल्मों में क्या देखते हैं कि बारिश नहीं आती तो हम काले मेघा–काले मेघा गाकर ईश्वर से पानी बरसाने की दुआ मांगते हैं। फिर विज्ञान ने एक दिन बताया कि क्लाउड सीडिंग करके आप चाहें तो बारिश खुद कर सकते हैं।
हम अचानक आई तेज़ बारिश और तूफ़ान को ईश्वर का प्रकोप मानकर उससे माफ़ी मांगते रहे। इस साल ख़बर आई कि एआई टेक्निक के वजह से मौसम की जो भविष्यवाणी की जा सकी है, उसके चलते इस साल हज़ारों करोड़ की फसल चौपट होने से बचाई जा सकी।
तूफ़ान और सुनामी तो सृष्टि बनने के बाद से ही आ रहे हैं। इसमें लोगों ने लाखों जानें भी गंवाई हैं। ऐसी हर मौत को हम ईश्वर से जोड़कर इस पर संतोष भी करते रहे। फिर विज्ञान ने सुनामी वार्निंग को भी संभव बना दिया। आज इसके चलते लाखों जानें बच पा रही हैं।
यही विज्ञान का काम है। वो जैसे-जैसे कायनात के काम करने के तरीके को समझता जाता है, उससे जुड़ी अनिश्चितता ख़त्म होती जाती है। वो अनिश्चितता या अज्ञानता, जिसे हम अपनी समझ के खालीपन से
भगवान से भरते आए हैं, जिसको ऊपर हमने God of Gaps कहा है।
तभी आप देखिए, जिन-जिन समाजों में व्यवस्था जितनी कमज़ोर होती है, वो समाज उतने भाग्यवादी, ईश्वरवादी होते हैं। वहां माफिया, फ़र्ज़ी बाबा उतने हावी होते हैं। कारण, जब आपको व्यवस्था से न्याय नहीं मिलता तो आपको लगता है कि ईश्वर मेरे साथ न्याय करेंगे, बाबा जी राह दिखाएंगे। ये माफिया हमारे इलाके का भला कर देगा।
और जिन समाजों में व्यवस्था जितनी ईमानदार होती है, जहां कॉज़ और इफ़ेक्ट जितना साफ़ होता है, वो समाज उतना ज़्यादा कर्मशील होता है। मतलब हम सही काम करेंगे तो उसका सही नतीजा मिलेगा। और कुछ ग़लत किया तो जेल होगी।
धर्म और नैतिकता
अब दूसरी बात जो शमादल नदवी ने कही कि अगर ईश्वर नहीं होगा तो हमारी नैतिकता कैसे तय होगी। और ये तर्क बहुत सारे लोग देते हैं। अगर रिलीजन नहीं होगा या ईश्वर का वजूद नहीं होगा तो इंसान हैवान बन जाएगा। मगर इतिहास बताता है कि ये बात भी नहीं है। नैतिकता तो तब भी थी जब धर्म नहीं था।
दरअसल नैतिकता का जन्म या अच्छे या बुरे की समझ तो इंसान को हज़ारों सालों के अपने सामाजिक अनुभवों से आई है। इंसान जब आदिवासी था और झुंड में रहता था। तब उसने देखा, जो झुंड साथ रहे वो बच पाए। उन्होंने अपना शिकार बांटकर खाया। बच्चों की रक्षा की। कमज़ोरों का ख्याल रखा। और जिन लोगों ने ऐसा नहीं किया, वो नहीं बचे।
बाद में जब धर्म बना तो उन धर्मों ने समाज के इन्हीं अनुभवों के आधार पर उस नैतिकता को अपनी शिक्षा में शामिल किया। तभी आप देखिए, हो सकता है छुआछूत को लेकर, जाति को लेकर, धर्म को लेकर, शादी को लेकर धर्मों की राय अलग-अलग हो, लेकिन सच बोलना चाहिए, चोरी नहीं करनी चाहिए, धोखा नहीं देना चाहिए—ये सब बातें तो सभी धार्मिक ग्रंथों में एक जैसी लिखी हैं।
इसलिए ये कहना कि जहां धर्म नहीं होगा वहां नैतिकता खतरे में पड़ जाएगी, ये ठीक नहीं है। सच तो ये है कि जो भी समाज धर्म की बताई नैतिकता के परे स्वतंत्र चिंतन और मानवीय समझ के आधार पर अपना व्यवहार तय करता है, वो ज़्यादा मानवीय होता है।
आप पश्चिम को देख लीजिए। उस समाज की अपनी चुनौतियां हैं, लेकिन जहां तक निजी ईमानदारी की बात है, सह-अस्तित्व की बात है, सामान्य शिष्टाचार की बात है, वो कथित धार्मिक समाजों से मीलों आगे हैं। क्योंकि जिस समाज में भी स्वतंत्र चिंतन होता है, वहां धीरे-धीरे बुराइयां अपने आप ख़त्म या कम होने लगती हैं।
जैसे दुनिया से दास प्रथा ख़त्म हुई, सती प्रथा ख़त्म हुई, रंगभेद को लेकर नज़रिया बदला। लेकिन डॉकिन्स के मुताबिक दिक्कत वहां आती है, जो आज सौ साल बाद भी हम देख रहे हैं—जब धर्मों में बताई अनैतिक बातों को भी पवित्र मानकर खुशी-खुशी वो अपराध करने लगते हैं।
हो सकता है सारी दुनिया को लगे कि आप बड़े अपराधी हैं, लेकिन अगर आप उसमें मज़हबी पाकीज़गी या धार्मिक पवित्रता देख रहे हैं तो आपको वो पाप करने से कोई नहीं रोक सकता।
इसलिए आप ये मत कहिए कि मेरी धार्मिक किताब में ये लिखा है, हमारे धर्म में ये लिखा है—देखो हम कितने महान हैं। किसी भी समाज का मूल्यांकन वहां के लोगों की ज़िंदगी और उनकी नैतिकता को देखकर होता है, न कि उनकी किताब के नैतिक दावों से।
अगर दक्षिण एशिया के इस हिस्से में इतनी धार्मिकता है, तो क्या वजह है कि दुनिया का यही हिस्सा सबसे भ्रष्ट, सबसे गंदा, सबसे अनैतिक है। मतलब साफ़ है कि हमारी नैतिकता के दावों और हमारी असल ज़िंदगी में विरोधाभास है।
एक बच्चा कितना होशियार है, इसका निर्धारण इस बात से नहीं होता कि उसने अपने टाइम टेबल में लिखा है कि वो रोज़ आठ घंटे पढ़ेगा, सुबह-शाम पूजा करेगा और रात को अनजाने में हुई गलती के लिए माफ़ी मांग कर सो जाएगा। वो नालायक है या होशियार, इसका पता उसकी मार्कशीट से चलेगा।
दिक्कत ये है कि हम स्टडी टेबल पर लगे हमारे टाइमटेबल से खुद को होशियार मान रहे हैं, जबकि हकीकत में हम ग्रेस मार्क्स देकर भी पास नहीं हो रहे।
तो क्या ईश्वर नहीं है?
ईश्वर के होना या न होने में मैं काफ़ी हद तक स्पिनोज़ा की ही थ्योरी से सहमत हूं और कुछ हद तक रजनीश ने भी ऐसी ही बात कही है।
रजनीश कहते हैं कि भगवान को अगर आप किसी दो हाथ, दो पांव और एक चेहरे वाले शख़्स में ढूंढने निकले हैं तो आप कभी नहीं ढूंढ पाएंगे। वो भगवान के बजाय भगवत्ता शब्द पर ज़ोर देते हैं।
रजनीश के मुताबिक इस प्रकृति में मौजूद जो इनर इंटेलिजेंस है, इसके अंदर मौजूद जो बुद्धिमत्ता है, वही ईश्वर है। वो बुद्धिमत्ता जिससे पेड़-पौधे बड़े होते हैं। फल देते हैं। जिससे मौसम बनते हैं। सबसे बड़ी बात जिससे हमारे शरीर के ऑर्गन काम करते हैं।
अगर हम इंसान की बायोलॉजी को भी समझें और देखें कि हमारे शरीर के सारे अंग कैसे कोऑर्डिनेशन में काम करते हैं। कैसे दिमाग आपातकालीन सिग्नल पकड़कर अंगों को काम पर लगाता है। ये सब इतना मेसमराइजिंग है, इतना इंटेलिजेंट है कि आप उसकी सुंदरता को ईश्वर का नाम दे सकते हैं।
अब यही बुद्धिमत्ता जो प्रकृति में है, वो हम सबमें है। तभी कहा जाता है कि हम सब ईश्वर का अंश हैं। इसीलिए भारतीय दर्शन में अहं ब्रह्मास्मि की बात की गई। मेरी आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। इसीलिए विवेकानंद जी ने कहा था कि नास्तिक वो नहीं है जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, नास्तिक वो है जो खुद में विश्वास नहीं करता।
अगर आप सिर्फ़ पिछले 100 सालों की वैज्ञानिक तरक्की पर गौर करें और उसके चमत्कारों को देखें, तो वो किसी ईश्वरीय चमत्कार से कम नहीं हैं। ये चमत्कार उन चमत्कारों से भी बड़े हैं, जिनका ज़िक्र दुनिया की किसी भी धार्मिक किताब में बताए चमत्कारों से ज़्यादा बड़ा है।
अब धार्मिक किताबों में बताए चमत्कारों के पीछे अगर कोई ईश्वर है, तो इन चमत्कारों के पीछे भी हम सबके भीतर मौजूद ईश्वर का वो अंश है। वो अंश जिसे हम बुद्धिमत्ता कहते हैं।
अब जैसे टेक्नोलॉजी के मामले में आप कोई पुराना मोबाइल या लैपटॉप नहीं लेते, तो ईश्वरी चमत्कारों के मामले में भी आपको सबसे बेहतरीन टेक्नोलॉजी से लैस आज के ईश्वर यानी आज के इंसान को सबसे ऊपर रखना होगा। है वो भी ईश्वर ही, लेकिन लेटेस्ट ईश्वर।
लेकिन अगर आप ये ज़िद पाल लें कि नहीं, आज के ईश्वर की नैतिकता और जीवन-मूल्य हज़ारों साल पुराने ईश्वर तय करेंगे, तो मैं इससे सहमत नहीं हो सकता।
और पूर्व और पश्चिम की सोच में भी यही सबसे बड़ा फर्क है। हम किसी तर्क-वितर्क में किसी बड़े आदमी का नाम लेकर उसे चुप करा देते हैं, किसी बहस में धार्मिक किताब से कोई लाइन कोट कर अपने तर्क को पवित्र बताने की कोशिश करते हैं, लेकिन पश्चिम में मोटे तौर पर ऐसा नहीं है, वहां इसे बुरा माना जाता है।
अरस्तु, प्लेटो के चेले थे। लेकिन उन्होंने प्लेटो की ही Theory of Forms को खारिज किया। प्लेटो मानते थे कि असली सत्य आदर्श समाज में आ सकता है। अरस्तु ने कहा नहीं कि जो भी सत्य है वो इसी भौतिक दुनिया में है।
मशहूर मनोवैज्ञानिक फ्रायड मानते थे कि आदमी का व्यवहार यौन इच्छाओं से संचालित होता है। बाद में उन्हीं के चेले युंग ने कहा कि हर चीज़ को सेक्स से नहीं जोड़ सकते, इंसान के अंदर एक psychic energy भी होती है।
ऐसे एक नहीं, दर्जनों उदाहरण हैं, जहां नए लोगों ने पुराने लोगों के विचारों को आगे बढ़ाया या अपने शोध से उसे खारिज किया। लेकिन इससे उन समाजों में हलचल नहीं मची। ये नहीं कहा गया कि तुमने इसको खारिज क्यों कर दिया, बल्कि इसे सत्य तक पहुंचने की बौद्धिक ईमानदारी के तौर पर देखा गया।
ये बौद्धिक ईमानदारी ही सबसे बड़ी और अंतिम बात है। जो भी समाज ये सोचकर चिंतन-मनन करता है कि तर्क-वितर्क, शोध-अनुसंधान से चीज़ों को समझा जाए, वहां इस बात का डर नहीं होता कि इसके निष्कर्षों से कोई नाराज़ तो नहीं हो जाएगा। किसी की भावनाएं आहत तो नहीं हो जाएंगी। वहां लोगों की इकलौती प्रतिबद्धता सच जानने के लिए होती है।
दुनिया में जो भी बौद्धिक तौर पर इतना ईमानदार हुआ, आप देखिए वो कहां पहुंच गया और जिन समाजों में रेडीमेड सच लादा गया, वो कहां रह गए।
कैसे आएगा सुधार?
अब सवाल पैदा होता है कि हम अपने वैचारिक संस्कारों की गुलामी से कैसे बाहर आएं। मतलब जिस मज़हब या जाति में हम पैदा हुए, वहां सालों से कुछ चीज़ों को पवित्र और अंतिम सत्य माना जाता है, वहां लोगों की हिम्मत नहीं होती कि उसके खिलाफ़ चले जाएं। लेकिन समाज को आगे बढ़ना है, तो लोगों को नई वैचारिक लकीरें भी खींचनी होंगी।
जैसे अल्बर्ट कामू ने कहा था और आइंस्टीन ने भी ऐसी ही बात की थी कि देश या सोसाइटी अपने आप में कुछ नहीं होते, हर समाज में कुछ व्यक्ति होते हैं जो सोसाइटी को दिशा देते हैं। मुझे भी यही लगता है कि कोई भी समाज कितना आगे जाएगा, ये इस बात पर तय करता है कि वो समाज अपने उन स्वतंत्र विचारकों को कितना स्पेस देता है। नए विचारों को कितनी जगह देता है।
लेकिन जो समाज मज़हबी तौर पर जितना जड़ या रूढ़िवादी होता है, वहां ये स्पेस उतना ही कम होता है। अगर इंसान कुछ नया सोचना भी चाहे, तो उसके अंदर फ़ौरन आत्मग्लानि घर कर जाती है। और कट्टर समाज आपकी इसी गिल्ट से खेलता है। डरा-धमकाकर वो आपको ऐसा भेड़ बना देता है कि आप भेड़ बनने में ही गर्व महसूस करते हैं।
आदमी को लगता है कि देखो, इस रास्ते पर मैं अकेला नहीं हूं और लाखों लोग मेरे साथ हैं। सामूहिकता इंसान को राहत देती है। आपको दिमाग नहीं लगाना पड़ता। कहीं खो जाने का डर नहीं होता, क्योंकि आगे-पीछे आपको बाकी भेड़ें दिखती रहती हैं।
कट्टरपंथी लगातार आपको हांक रहे होते हैं। रास्ते में पत्थर चुभ रहे हैं, कांटे गढ़ रहे हैं, लेकिन वो हरी घास के इंतज़ार में आगे बढ़ती जाती है। जन्नत के हसीन सपनों के साथ यही दिक्कत है। वो सपने कितने सच्चे हैं ये जानने के लिए इंसान को मरना पड़ता है। मरा हुआ इंसान गवाही देने ज़मीन पर नहीं आ सकता। इसलिए ये कभी पता नहीं लग पाएगा कि वो सपने सच्चे थे या झूठे। एक भी मुर्दा अगर बोल पाता तो पहली बगावत मज़हब के खिलाफ होती।
एक अंतिम बात, टाइटेनिक के 25 साल पूरे होने पर जेम्स कैमरून से किसी ने पूछा कि आज आप पीछे मुड़कर जब उस फ़िल्म को देखते हैं, तो आपको ऐसा कुछ लगता है जो बदला जा सकता था या गलत था। तो इस पर कैमरून ने जो सीधा सा जवाब दिया—अगर वो समझ जाएं, तो सब कुछ बदल सकता है।
उनका कहना था कि देखिए, मैं फ़िल्मों को ऐसे देखता ही नहीं हूं। मेरा मानना है कि उस वक्त ज़िंदगी को लेकर, क्राफ़्ट को लेकर मेरी एक समझ थी, संवेदनशीलता थी, मैंने उसी हिसाब से उस वक्त ये फ़िल्म बनाई। आज अगर उसमें कोई बुराई भी है, तो मैं उस पर शर्मिंदा नहीं होता। बल्कि उस वक्त की मेरी नासमझी मानकर आगे बढ़ जाता हूं।
दोस्तों, यही अंतिम बात है। अगर दुनिया के इतिहास का महानतम डायरेक्टर सिर्फ़ 25 साल पुरानी अपनी समझ को अपनी आज की शख़्सियत नहीं मानता, अपने जीवन का आज का सच नहीं मानता, तो क्या मजबूरी है कि हम सैकड़ों-हज़ारों साल पहले कही-लिखी सभी बातों को आज भी अपने जीवन का अंतिम सच मानें। ज़िंदगी जीने का इकलौता तरीके समझें।
ईश्वर को ज़रूर मानें, लेकिन अपने भीतर मौजूद उस ईश्वर को, जो उसका सबसे नवीनतम संस्करण है…ईश्वर का प्रो मैक्स वर्ज़न…नीत्शे के शब्दों में आपके अदर छिपा Übermensch (ऊबरमेंश)…मानव से आगे का महा मानव!
-Neeraj Badhwar
@niharika_times Suresh jogesh MD ka addict tha. Jis bande ne car accident Kiya tha vo nashe me dhut tha us time. Ye aaankho dekhi ghatna hai. Isi same bande ne chohtan me panch sat din phle ek luhar ko hit kiya tha chohtan me. Kuchh to sharm kr
@KraantiKumar@Gaurav05121 Appko apni beti ke sath porn dekhte hue video upload karni chahiye pata chalega kitne bde sexologist ho . Bate sirf likhne me achi lgti h apni family' PE aaply karke dekh lena. Sirf sex sex likhne se amerika or china tecnology me aage nahi badhe h .
The moral conscience of an avg Indian is truly pathetic. How can it be called bhakti when you seek darshan of our deities by causing harm to others? Our pilgrimage sites have turned into tourist traps, and as a Hindu, I’m ashamed.