Journalist of media. small town girl lost in a big city, movie buff, loves nothing better than a good song. Tweeting in personal capacity.#journalist@New Delhi
बेजुबान पत्थर पे लदे है
करोडो के गहने मंदिरो में,
उसी दहलीज पे
एक रूपये को तरसते
नन्हे हाथो को देखा है।।
😩😩😩
सजे थे छप्पन भोग
और मेवे मूरत के आगे,
बाहर एक फ़कीर को
भूख से तड़प के मरते देखा है।।
😘😘😘
लदी हुई है रेशमी चादरों से
वो हरी मजार,
🏑🏑🪁🏑🏑
*कन्हैया..... 🏏*
खेलत वन में लाल कन्हाई
भरी दोपहरी बड़ की छैंया
संग सखा सब बैठै जिमाई
चखत छाक हैं सबके घर की
खावत जेवत करत बड़��ई
बहु भांत पकवान स्वाद के
अति रसीली मधुर मिठाई
मधुमंगल की बासी छाछ
सकुचावै मन का कहुं आज
उत्तम भोग ही लाल को भावै
छाछ पुरानी कैसे पावै
*मेरे ही भीतर हो आप !!*अगर मुझसे
पूछें आप,कितनी बार ख़्यालों में आए आप !!
कहूंगी मैं सिर्फ़ एक बार,क्योंकि बाद उसके
आपको मैंने जाने ही नहीं दिया !!
ऐसे बसे हो ज़हन में कि जैसे कोई नग़मा अधूरा,
जो ख़ामोशी में भी सुनाई देता है !!ग़र करें आप साथ की बात वो तो है इतना गहरा...!
हमारी चाहत शजर-ए-नसब है
पीढ़ियों से दिलों ने सीखी
एक दूजे से मोहब्बत
मौसम बदले ज़माने बदले
मगर अपनी ये जड़ें न हिलीं
शजर ये हमेशा हरा रहा
मिली दुआओं की जो रहमत
चले ज�� रहे हैं साथ-साथ
उम्र की इस हसीन सांझ में
मुकम्मल सा लगता है हर सफ़र
जब पास हो तुम्हारी चाहत🌹
आरंभ नहीं मै��� तेरे प्रेम का अंत बनू
और फिर अंत नहीं, तेरे हृदय में बसने वाली अनंत बनू ... 💜
🖤 ─━─━─⨳☬❖☬⨳─━─━─
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स्त्रियाँ, कुछ भी बेकार नहीं जाने देतीं।
वो सहेजती हैं।
संभालती हैं।
ढकती हैं।
बाँधती हैं।
उम्मीद के आख़िरी छोर तक।
कभी तुरपाई कर के।
कभी टाँका लगा के।
कभी धूप दिखा के।
कभी ���वा झला के।
कभी छाँटकर।
कभी बीनकर।
कभी तोड़कर।
कभी जोड़कर।
देखा होगा ना ?
@thread
स्त्रियाँ, कुछ भी बेकार नहीं जाने देतीं।
वो सहेजती हैं।
संभालती हैं।
ढकती हैं।
बाँधती हैं।
उम्मीद के आख़िरी छोर तक।
कभी तुरपाई कर के।
कभी टाँका लगा के।
कभी धूप दिखा के।
कभी ���वा झला के।
कभी छाँटकर।
कभी बीनकर।
कभी तोड़कर।
कभी जोड़कर।
देखा होगा ना ?
@thread
स्त्रियाँ, कुछ भी बेकार नहीं जाने देतीं।
वो सहेजती हैं।
संभालती हैं।
ढकती हैं।
बाँधती हैं।
उम्मीद के आख़िरी छोर तक।
कभी तुरपाई कर के।
कभी टाँका लगा के।
कभी धूप दिखा के।
कभी ���वा झला के।
कभी छाँटकर।
कभी बीनकर।
कभी तोड़कर।
कभी जोड़कर।
देखा होगा ना ?
@thread
स्त्रियाँ, कुछ भी बेकार नहीं जाने देतीं।
वो सहेजती हैं।
संभालती हैं।
ढकती हैं।
बाँधती हैं।
उम्मीद के आख़िरी छोर तक।
कभी तुरपाई कर के।
कभी टाँका लगा के।
कभी धूप दिखा के।
कभी ���वा झला के।
कभी छाँटकर।
कभी बीनकर।
कभी तोड़कर।
कभी जोड़कर।
देखा होगा ना ?
@thread
@thread सीले हुए पापड़ हों।
घुन लगी दाल हो।
गला हुआ फल हो।
मुरझाई हुई सब्जी हो।
या फिर
तकलीफ़ देता "रिश्ता"
वो सहेजती हैं।
संभालती हैं।
ढकती हैं।
बाँधती हैं।
उम्मीद के आख़िरी छोर तक...
पर,
याद रखना
वो जिस दिन मुँह मोड़ेंगी
तुम बर्बादी देखोगे।
........ ✍️
स्त्रियाँ, कुछ भी बेकार नहीं जाने देतीं।
वो सहेजती हैं।
संभालती हैं।
ढकती हैं।
बाँधती हैं।
उम्मीद के आख़िरी छोर तक।
कभी तुरपाई कर के।
कभी टाँका लगा के।
कभी धूप दिखा के।
कभी हवा झला के।
कभी छाँटकर।
कभी बीनकर।
कभी तोड़कर।
कभी जोड़कर।
देखा होगा ना ?
@thread
@thread अपने ही घर में उन्हें
खाली डिब्बे जोड़ते हुए।
बची थैलियाँ मोड़ते हुए।
सबेरे की रोटी शाम को खाते हुए।
बासी सब्जी में तड़का लगाते हुए।
दीवारों की सीलन तस्वीरों से छुपाते हुए।
बचे हुए से अपनी थाली सजाते हुए।
फ़टे हुए कपड़े हों।
टूटा हुआ बटन हो।
फंफून्दी लगा अचार हो।