विलुप्त होती विधा। सम्भवतः इसे देखने-समझने वाली हमारी पीढ़ी अंतिम है। गांव की गड़ही में रहठा (अरहर का ठूंठ) या सनई कई दिन तक भिगाने के बाद ये पलरा तैयार होता था। पशुओं को भूसा डालने या अनाज आदि इधर से उधर ले जाने में प्रयोग करते थे।
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पहले हमारा खाना कई तरह के अनाज से भरपूर था। हरित क्रांति के दौर में गेहूं की नई किस्में आईं। धीरे-धीरे हमारे पारंपरिक अनाज हम��े दूर हो गए। सुबह से शाम तक सिर्फ मैदा और गेहूँ के आटा ही हमारे खाने में शामिल है।
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इन बच्चों के परिवारों से जुड़कर ही ग्रामांचल बना है। बच्चों को हँसते-खिलखिलाते देखकर खुशी मिलती है। ग्रामांचल के उत्पादों में किसान परिवारों की मेहनत के रंग समाए हुए ह��ं...खुशबू है!! माटी पानी से जुड़िए...! ग्रामांचल से जुड़िए। आप हमारे यहाँ मेहमान बनकर आइए। स्वागत है!!
किसान जो पेस्टिसाइड डालकर उगा रहे हैं, उससे उतना खतरा नहीं है, जितना कि बाजार में हो रही मिलावट से है। इसलिए हम बाजार का हिस्सा नहीं बन सकते हैं। हम जहरमुक्त मिलावटरहित अनाज आप तक पहुँचा रहे हैं। निरंतर नए उत्पाद हम इसमें जोड़ रहे हैं।
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कल की यात्रा में मुलाकात हुई #प्रगतिशील#किसान श्रीमती आसा सोनी जी से । आप 78 वर्ष की उम्र में भी नवयुवकों की प्रेरणा की स्रोत बनी हुई ह���ं । ��पने प्रयासों से पूरी तरह जैविक खेती करवा रही हैं । अपने गाँव के किसानों को भी इसके लिए प्रेरित किया है ।
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ये तस्वीर #शाहजहांपुर स्थित रोजा के निवाजपुर की है। सड़क चौड़ीकरण के लिए पीपल का #पेड़ काट दिया गया। स्थानीय लोगों का दावा है कि पेड़ सौ वर्ष पुराना था। ये बिना हमसे कुछ लिए अनवरत हमें जीवनदायी #ऑक्सीजन दे रहा था। क्या और कोई विकल्प नहीं था...
@pratapsomvanshi