क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं
कौन सी आँखों में मेरे ख़्वाब रौशन हैं अभी
किस की नींदें हैं जो मेरे रतजगों में क़ैद हैं
"सलीम कौसर"
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उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे
हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे
"अहमद फ़राज़ साहब"
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आज की पंक्तियां निर्मल वर्मा की कहानी 'परिंदे' से ली गयी हैं। यह कहानी कुछ ऐसे लोगों की कहानी है, जो एक-दूसरे के करीब होते हुए भी भीतर से अकेले हैं। उनके मन में इच्छाएँ हैं, स्मृतियाँ हैं और प्रेम की तलाश भी, लेकिन वे अपनी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते।