20 जुलाई को दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे 19 साल के साहिल के चेहरे पर दिल्ली पुलिस ने पेलेट गन से हमला किया।
साहिल दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र है मगर परिवार को सहारा देने के लिए वो पार्ट-टाइम कार भी चलाता है। वो खुद 2025 के SSC दिल्ली कॉन्स्टेबल पेपर लीक का शिकार है। अब उसे डर है कि SSC ने फिर से उसी एजेंसी को ठेका दिया है और फिर से पेपर लीक हो जाएगा।
इंसाफ़ और बेहतर भविष्य की मांग के साथ वह प्रदर्शन में शामिल हुआ था। आज हालत ये है कि उसकी एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए जाने का खतरा है।
ये सज़ा मिलती है हमारे छात्रों को सवाल पूछने और जवाबदेही मांगने की।
हम साहिल के साथ हैं। हम जवाबदेही मांग रहे हर छात्र के साथ हैं।
मोदी जी, देश के बच्चों से अपने इस गुनाह की माफ़ी मांगिए, इसके दोषियों पर कड़ी कार्रवाई कीजिए और धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत बर्खास्त कीजिए।
सूचना!!!
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बिहार में मौसम सुहावना होने के उपलक्ष्य में आज 100-50 फालोबैक दिए जाएंगे।
लंबे समय से मुन्तजिर फॉलोबैकार्थी, इस ट्वीट को रीट्वीट करें। तत्पश्चात कमेंट में #चौचोहै लिखकर ध्यानाकर्षण कर सकते हैं।
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नोट- जिन्हें चौचोहै का मतलब नही पता, वे ध्यानाकर्षण न करें।
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@flipkartsupport hello my account is blocked without given an explanation by your side , i contact you but didn't given any solution till.. please unblockmy account or give any solution
May he see the light of a free sun and feel the free winds soon again.
This video is so pristinely beautiful and leaves a lump in the throat with the feeling of a stabbing hurt.
Remain Brave and Hang On.
India failed you brother & I’m sorry that we couldn’t do anything for you.🙏
@UmarKhalidJNU
#FreeUmarKhalid
#FreeAllPoliticalPrisoners
Finally a trend winner 🔥🔥🙏
Natak nautanki chaaplusi to koi bhi kar sakta hai..desh ke asli muddo par baat karne ke liye dum chahiye...
Kudos to these creators... 🔥
#Dhurandhar
इस्लाम के अनुसार ये कायनात अल्लाह ने बनाई है,
ईसाई धर्म के अनुसार ये काम गॉड ने किया है,
हिन्दुओं के अनुसार ये सब करने वाले ब्रह्मा हैं,
लेकिन इन ईश्वर, अल्लाह या गॉड का निर्माण करने वाला कौन है? क्या ये स्वयंभू हैं?
इस सवाल का जवाब तो अब तक की पंक्तियों में दिया ही जा चुका है, शायद आप उसे देख सकें।
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इस धरती पर एक कोशिका वाले जीव अमीबा से लेकर एक बेहद जटिल दिमाग वाले विकसित(❓) जीव इंसान तक की यात्रा को तो कुदरत ने अंजाम दिया (सनद रहे हमने नहीं दिया)। रफ्ता-रफ्ता जीवन अपनी रफ़्तार से विकसित होता रहा, लेकिन जब आज के इंसान (होमो सेपियन) की विकास यात्रा इस धरती पर शुरू हुई तब उसने जीवन की इस रफ़्तार को अपने हाथों में ले लिया। उसने तय कर लिया कि ये धरती मेरे लिए ही बनाई गई है और मैं ही इसका एकमात्र स्वामी हूँ। वो अलग बात है कि जिस दिन कुदरत को ये लगेगा कि अब ये इंसान नाम का वायरस उसे ज़रूरत से ज़्यादा परेशान कर रहा है तो वो बस एक छींक मारेगी और इंसान का नामो-निशान मिट जाएगा, पर तब तक के लिए हम इस खुशफ़हमी में जी लेते हैं कि इस कायनात का निर्माण हमारे लिए ही किया गया है।
इंसान को ये खुशफ़हमी भी है कि क्यूंकि ये ब्रह्माण्ड उसी के लिए बनाया गया है तो विशाल ग्रह भी उसके जीवन पर असर डालते हैं। गुरु उसकी शादी नहीं होने देता और शनि उसकी नौकरी नहीं लगने देता, चांद ने उसका स्वास्थ्य बिगाड़ रखा है और सूर्य ने उसका घर। ये इंसान का अहम है जिसकी वजह से उसको अपनी कीड़े जैसी औकात में भी ये भ्रम है कि सूर्य जैसा विशाल गर्म गोला सिर्फ़ उसकी ज़िन्दगी को अच्छा या बुरा बनाने के लिए चमक रहा है।
बहुत पुरानी बात नहीं है, वैसे भी इंसान के विकास यात्रा में पांच सौ साल कोई बहुत ज़्यादा नहीं होते कि तब तक हर सभ्यता के बड़े-बड़े विद्वान् और ताकतवर लोग यही मानते थे कि पृथ्वी इस ब्रह्माण्ड का केंद्र है और समूची कायनात पृथ्वी के चारों तरफ़ चक्कर लगा रही है। ये मानने की वजह भी इंसान का अहम ही था कि जिस जगह पर वो खुद मौजूद है, उसे तो ब्रह्माण्ड का केंद्र होना ही चाहिए। वो अलग बात है कि अब तीसरी कक्षा के बच्चे भी अपने ज़माने के विद्वानों की इस राय पर हंसा करते हैं। हो सकता है कि अब से पांच सौ साल बाद एक दिन ऐसा भी आये कि पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चे हम पर हँसे कि ये लोग सोचा करते थे कि इस कायनात का निर्माण इन्हीं के दिमाग से उपजे काल्पनिक चरित्रों ने किया है।
हो सकता है ना❓ऐसा होना भी चाहिए, इसी को विकास कहते हैं। अगर पांच सौ साल बाद बच्चे हम पर हँसे तो ये हमारे सम्मान (अगर वो तब तक बाकी बचा रहे तो) के लिए तो बिल्कुल ठीक नहीं, पर इंसानी दिमाग के विकास के लिए बेहद ज़रूरी है।
क्या होता है कि इंसान अपने युग को हमेशा आधुनिक मानता रहा है। उसे लगता है कि अब तक वो जो जानता रहा है वो ना पिछड़ी बातें हैं और ना ही पिछड़ा ज़माना है। इसी लकीर पर चलते हुए हमने भी इतिहास को प्राचीन, मध्य और आधुनिक काल में बाँट रखा है। हम आज खुद को आधुनिक कहते हैं और मुग़ल काल को मध्य काल कहते हैं, पर हो सकता है कि अब से पांच सौ साल बाद काल निर्धारण हो तो हम भी मध्ययुगीय ही कहलायें, क्यूंकि ये तो सच है कि कई सारे अंधविश्वासों को लेकर हमारी सोच अब भी काफी हद तक मध्य युग की ही है।
पर सवाल ये है कि ये सब अंधविश्वास, ये धारणाएं हैं क्यूँ? क्या वजह है कि इंसान ऐसी बेसिरपैर की बातों में यकीन रखता है? क्यूँ उसने अपने दिमाग का एक बहुत बड़ा हिस्सा गिरवी रखा हुआ है? कोई तो वजह होगी। कोई तो बात होगी कि इतिहास में बार-बार वही गलतियाँ दोहराने के बावजूद इंसान नहीं सीखता।
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इन सबके पीछे हमारा समाज, हमारी राजनीति और हमारी शिक्षा व्यवस्था है जो बचपन से ही ऐसे नागरिक तैयार करती है जो फ़ॉलोवर हों, ना कि वो जो लीड कर सकें।
हम बिना जाने समझे एक अज्ञानी और धूर्त आदमी के फ़ॉलोवर बस इसलिए बन जाते हैं क्यूंकि उसने किसी ख़ास धर्म का चोगा पहना हुआ है। हम कभी सवाल नहीं करते कि क्या ये इंसान खुद के धर्म को समझता भी है या नहीं? क्या ये धर्म की जो व्याख्या कर रहा है वो सही भी है या नहीं?
सवाल इंसान को खूबसूरत बनाते हैं, और हम उन्हीं से भागते हैं।
एक अभिनेता किसी भी किरदार में उतरने से पहले दर्जनो सवाल करता है, खुद से भी और किरदार के लिखने वाले से भी। किरदार बोलता कैसे है, चलता कैसे है, किन बातों पर नाराज़ होता है और किन पर हँसता है, वो जैसा है वैसा क्यूँ है, उसकी ज़िन्दगी के दुःख क्या हैं, उसे कौनसी बातें ख़ुशी देती हैं, वो कहाँ का है, उसके जीवन का मक़सद क्या है? जितने ज़्यादा सवाल करेगा, अभिनेता उतनी ही गहराई में उतरेगा और जितनी गहराई में उतरेगा उतना ही न्याय कर पायेगा वो अपने किरदार के साथ। अभिनेता को अपने किरदार से न्याय करने के लिए सवाल उठाना बेहद ज़रूरी है। सवालों का अंजाम न्याय पर जाकर होता है।
एक राजनीतिज्ञ बेवजह जनता को ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों से उद्वेलित करने की जगह जनता को मजबूर करता है कि वो पूछे कि आखिर “कौन है भारत माता?”। जिस राजनीतिज्ञ ने जनता के मन में इस सवाल को पैदा किया उसका नाम तो आप सबको जानना ही चाहिए, मुझे बताने की ज़रूरत नहीं है।
साथ में ये भी सोचिये कि जब वो जनता के भीतर ये सवाल पैदा कर रहा है तो वो जनता को खुद पर सवाल उठाने के लिए काबिल बनाने की कोशिश कर रहा है।
एक अध्यापक का सबसे महत्वपूर्ण काम ही ये है कि वो अपने नन्हें विद्यार्थियों के मन में जिज्ञासा पैदा कर दे। एक बार अगर बच्चे सवाल पूछने लग गए तो वो निर्माण के अलावा कुछ नहीं करेंगे। आप ही सोचिये कि क्यूँ हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था के निकले छात्रों की दुनिया में छवि ये है कि ये किसी चलते हुए काम को तो बहुत अच्छा संभाल सकते हैं लेकिन कोई नया विचार इनके मन में पैदा नहीं होता। हम बचपन से ही बच्चों के सवालों को कुचलना शुरू कर देते हैं।
हमारी जो भी धारणाएं हैं वो इसीलिए कायम है कि हम उन पर सवाल नहीं उठाते। हम नहीं पूछते कि ऐसा क्यूँ है? एक बच्चे को उसके जन्म से बता दिया गया कि वो हिन्दू है, या मुसलमान है या सिख है तो वो अपने माता-पिता से ये नहीं पूछता कि क्यूँ? क्यूँ मैं हिन्दू घर में जन्म लेकर हिन्दू ही रहूँ? क्यूँ मुझे अल्लाह के अलावा किसी और के आगे झुकने से इनकार हो? वो सवाल नहीं करता। वो अपने माता-पिता से ये सवाल नहीं करता कि क्यूँ मैं तुम्हारी आस्था के आगे सर झुकाऊं? क्यूँ ना मैं किसी को भी न मानूं और स्वतंत्र हो जाऊं?
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मैंने पहली ही पंक्तियों में पूछा था कि वो कौन है जिसने ईश्वर, अल्लाह या गॉड को पैदा किया? क्या ये स्वयंभू हैं?
नहीं, कोई भी चीज़ स्वयंभू नहीं हो सकती। जो कुछ भी है अपने पहले से घट रही भौतिक, रासायनिक, जैविक, राजनैतिक, सामाजिक या आर्थिक घटनाओं का परिणाम है।
तो फिर किसने ईश्वर, अल्लाह या गॉड को पैदा किया?
जवाब है, एक सवाल ने, एक प्रश्न ने, एक जिज्ञासा ने, एक ? ने।
इस दुनिया में इंसान ने जो भी विकास अपने दम पर किया है उसके पीछे हमेशा एक सवाल रहा है। वो सवाल, जिसने इंसानी सभ्यता में आगे बढ़ने की ऊर्जा भरी और आगे भी भरते रहेंगे।
आपको लगता है अल्लाह स्वयंभू है, नहीं, वो हो नहीं सकता। अल्लाह मुहम्मद के भीतर उमड़ रहे सवालों का जवाब है।
आपको लगता है कि गॉड खुद से उपजा है, नहीं, वो हो नहीं सकता। वो ईसा मसीह के “आँख के बदले आँख, कान के बदले कान” के बर्बर विचार के खिलाफ़ उठ रहे सवालों का जवाब है। ईसा यूँ ही नहीं कहते कि “अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो.....”, ये कहन उनके भीतर तभी आया, जब उनके मन मस्तिष्क में सवाल उमड़े।
हिन्दू धर्म में तो उपनिषद सवालों की खान हैं। एक के बाद एक उमड़ रहे सवालों के जवाब में उपनिषदों का निर्माण होता रहा है।
जब ईश्वर का निर्माण ही सवालों से हुआ है तो हम सवाल को ईश्वर के ऊपर क्यूँ नहीं रखते?
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इस मानव सभ्यता को अगर कोई चला रहा है तो वो मानव मस्तिष्क के भीतर उमड़ रहे सवाल हैं। अगर आप सवाल नहीं कर रहे हैं तो आप मर चुके हैं।
सवालों के दायरे से बाहर कोई नहीं है, ना माँ-बाप, ना गुरु, ना समाज, ना सरकार, ना देश और ना ही ईश्वर। अगर कोई आपसे कह रहा है कि जैसा मैं कहता हूँ बस वही मानो, सवाल मत करो तो वो आपको बर्बाद कर रहा है। उस विचार से, उस सरकार से, उस धर्म से किनारा कर लो।
अगर कोई सवालों से भाग रहा है, घबरा रहा है या चिढ़ रहा है तो समझ लीजिये वो सच्चा आदमी नहीं है।
फिर चाहे वो आपका पड़ोसी हो, माता-पिता हों, प्रेमी हो, अध्यापक हो, धर्मगुरु हो या खुद प्रधानमंत्री ही क्यूँ ना हो,
सवालों से भागने वाला आदमी एक कायर और झूठा आदमी होता है, इसके सिवा और कुछ नहीं।
(ये शानदार और जरूरी आर्टिकल अनुरोध शर्मा ने लिखा है)
Love the conviction with which this Rajasthani girl Jigisha Joshi ji is defending the honour of the #aravallihills.
‘खड़ा रहना हमने हमारे पहाड़ों से ही सीखा है’
#SaveAravalli.
2010 में अशोक गहलोत वाली कांग्रेस सरकार अरावली खोदना चाहती थी तब भाजपा विरोध में थी ,
आज भजन लाल शर्मा वाली बीजेपी सरकार अरावली खोदना चाहती है तो कांग्रेस विरोध में है ,
असल में इन सत्तालोभी गिद्धों को हमारे हितों की चिंता नहीं है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों की चिंता है , सतर्क रहें सचेत रहें, अपने हितों पर लगातार आवाज उठाते रहें।
#SaveAravalli
जयमाला पर यह ज्ञान दिया जा रहा है यह यही कथावाचक ज्ञान दे रहा है जिसने खुद अपनी शादी में जयमाला डाली।
इसीलिए कहता हूं इन कथा वाचकों की बात को...See more
For 90 years not a single Divine Intervention came to save US...
But now every other Street has a God-Man.
If that's not Development,what else can be??
By 2047, every other household will have one🙏
#ViksitBharat2047