''चीनी खूब महंगी हो जाए, ये सेहत के लिए नुकसानदायक है''
- ये बात BJP के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कही है
अपनी सरकार की नाकामियों पर उल-जलूल दलीलें देकर पर्दा डालना, BJP नेताओं की बुरी आदत बन गई है।
कभी निर्मला सीतारमण 'पेपर लीक' का फायदा बताती हैं, तो कभी BJP के मुख्यमंत्री जलभराव की तुलना वेनिस और कैलिफोर्निया से करते हैं।
लेकिन... जनता कुछ भूलने वाली नहीं है। समय आने पर करारा जवाब देगी।
इतना डर, इतना ख़ौफ़?
छह साल के बच्चे को पुलिस ले जा रही है क्योंकि उसने प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने वाला पोस्टर पकड़ा हुआ था।
इस तरह का भय अक्सर सरकारों की विदाई का संकेत होता है या फिर इमर्जेंसी राज का।
धर्म के नाम पर जनता को खून-खून करवाते हैं,
खुद देश की प्रॉपर्टी बेच कर अम्बानी-अडानी जैसा बना रहे हैं।
मंदिर दिखाओ, मस्जिद दिखाओ, फ्लैग दिखाओ…
लेकिन रेलवे, बीएसएनएल, एयर इंडिया, पीएसयू सब बेच दो।
ये चंदा चोर, वोट चोर मंडली वाले... जनता को धर्म का नशा प��ला कर देश का माल खा जाते हैं।
ये पूरे देश के गद्दार हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा घोषित विश्व आदिवासी दिवस की आप सभी को अग्रिम शुभकामनाएं।
आइए, इस विश्व आदिवासी दिवस पर अपनी संस्कृति, पहचान और अधिकारों के संरक्षण का संकल्प लें। शांतिपूर्ण एवं एकजुट होकर जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को और मजबूत करें।
बारिश की हर बूँद स्वीकार है, मगर मासूमों पर अन्याय स्वीकार नहीं, जिन्होंने अन्याय किया वो कितने ही ताकतवर क्यों ना हो, उनके पीछे कितनी बड़ी शक्ति क्यों ना हो, लेकिन जवाब देना ही होगा।
महापुरुषों के विचार ही मेरे संघर्ष की ताक़त हैं। जय भीम, जय भारत।
यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो दीवारों पर लिखी हिदायतें हमारी बुरी आदतों का आईना हैं।
कल्पना करें तो शायद हम समझ पाएंगे कि अपने सपनों के घर की खूबसूरत दीवार पर तारकोल से ‘गधे के पूत, यहाँ मत मूत’ लिखनेवाला आदमी कि�� हद तक परेशान हुआ होगा। यत्र-तत्र-सर्वत्र मूत्रत्याग करने वाले निष्ठावान नागरिकों को रोकने की दिशा में पट्ट-लेखकों ने काफी विकास किया है। ‘देखो गधा पेशाब कर रहा है’; ‘यहाँ मूतने वाले तेरी माँ की.....’ और ‘यह मंदिर की दीवार है कृपया यहाँ मूत्रत्याग न करें’ जैसे बहुभाषी ग्रंथों से मूत्रसाधकों को सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका तब ‘एक चित्र सौ शब्दों के समान होता है’ का अनुसरण करते हुए हमने मूत्रनीय दीवारों पर ईश्वर के विराट रूप की छोटी-छोटी टाइल्स लगवा दीं। किन्तु इतने पर भी मूत्रत्यागकर्ताओं ने हार न मानी और वे अपने पूज्य देव को बचाकर अन्य दीवारों पर कार्य निष्पादन करते रहे। साईं बाबा के भक्त को हिंदू देवताओं की तस्वीर न रोक सकी और घोर रामभक्त ने साईं बाबा की परवाह नहीं की। वैष्णव, शाक्त, शैव और न जाने क्या-क्या बहाने बनाकर साधकों ने भक्तिप्रवाह का उपाय खोज ही लिया। अंततः सभी देवताओं ने मीटिंग करके एक साथ एक ही दीवार पर चिपकना स्वीकार किया तब कहीं कुछेक दीवारों के भूमिगत जल में मूत्र संवर्द्धन बन्द हुआ।
विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का दावा करनेवाले हम लोग कितने सभ्य रहे होंगे इसके प्रमाण-पत्र पूरे देश में हिदायती सूच��ा-पट्टों पर शान से चिपके हुए हैं। कितने फख्र की बात है कि हमें डायरेक्टली ‘बेहया’ कहनेवाले वाक्य भी अपनी विनम्रता नहीं छोड़ते और सम्मानपूर्वक हमें लताड़ते हुए लिखते हैं- ‘कृपया पान की पीक यहाँ न थूकें।’ हम इस सम्मान से गद्गद हो उठते हैं और आभार ज्ञापन करते हुए उस इबारत पर अपने ��ुखारविंद से पीक अर्पण कर आगे बढ़ जाते हैं।
रेल के टॉयलेट में मग्गे से बंधी ज़ंजीर हमारी आदतों के गले में पहनाई गई स्वर्णकड़ी जैसी भूमिका निभाती है।
आज्ञाकारी हम इतने हैं कि हर बात बोर्ड पर लिखकर समझाई जाती है। ‘कृपया यहाँ न थूकें’ और ‘गंदगी न फैलाएँ’ जैसे सूचना पट्ट हमारी आदतों के गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाते हैं। ‘कूड़ा कूड़ेदान में ही डालें’, ‘फाटक बंद हो तो लाइन पार न करें’, ‘ट्रांसफ���र्मर के आसपास पेशाब करना जानलेवा हो सकता है’ और ‘कृपया लाइन न तोड़ें’ जैसे प्रशासनिक वाक्यों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र में भी सूचनाओं का विपुल भंडार है। ‘जगह मिलने पर साइड दी जाएगी’, ‘जिनको जल्दी थी वो चले गए’, ‘उड़ के जावेगा के’, ‘कुत्ता भी बिना वजह नहीं भौंकता’ और ‘सड़क तेरे बाप की है क्या बे’ -जैसे ��ाक्य हमारे ट्रैफिक सेंस की गौरवगाथा के स्वर्णिम अध्याय हैं।
‘मतदान अवश्य करें’, ‘राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान न पहुँचाएँ’, ‘बस की सीट न फाड़ें’, ‘सीढ़ियों पर न बैठें’, ‘रिश्वत न लें, न दें’, ‘दलालों से सावधान’, ‘जेबकतरों से सावधान’ या ‘लेडीज सीट पर न बैठें’ और ‘बंदरों को न छेड़ें’ जैसे वाक्यों में सजा भारतीय लोकतंत्र पूरी दुनिया की चित्र प्रदर्शनियों में दमकता है, तो हमारा गौरवशाली इतिहा�� और भी प्रखर हो उठता है।
‘कृपया अस्पताल में शोर न करें’ और ‘एम्बुलेंस को रास्ता दें’ जैसे लौकिक मानवीय आदेशों से लेकर ‘जलती चिता में कचरा न डालें’ जैसे पारलौकिक सूचना पट्टों ने हमारी संवेदनाओं की हकीकत चेहरे पर जो श्रृंगार किया है उसे धोने के लिए पानी नहीं आँसुओं की ज़रूरत है।
✍️ चिराग़ जैन
जब आदिवासी, दलित, महिलाओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन ��ोता है और महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं होती, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग आखिर किसके लिए हैं?
अजीत विहात पुत्र मगनलाल विहात निवासी बोखलापाल, जिला डूंगरपुर को JEE Advanced में ऑल इंडिया ST कैटेगरी में 48वीं रैंक प्राप्त करने पर खूब-खूब बधाई।
अजीत विहात के पिता मगनलाल विहात ने मजदूरी करके अपने बेटे को पढ़ाया। अजीत ने 12वीं (CBSE) में 93.06% अंक प्राप्त कर पूरे राज��्थान में सेकंड रेंक हासिल की थी। पुनः अजीत विहात को हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं।