एकमेव
पन्थ अछि अनन्त,गन्तव्य धाम एक विविध मतहु रहितहु,मन्तव्य नाम एक पद-पदार्थ लक्ष,रसक लक्ष्य अन्तिमे एक,द्रव्य द्रवित ज्योति गतिक, शक्ति अन्त एक। दर्शन ओ दृश्य एक,दर्शक समतूल स्पर्शन ओ स्पृश्य एक,स्पर्शक अनुकूल हरिजन ओ हर जन जत जनक-जन्ध मूल चाहिअ सौजन्य धन्य जन्म कर्म तूल।।
व्यक्ति ओ समाज मे न द्वन्द्व भावना
लोकतन्त्र, व्यक्ति-यन्त्र ऐक्य साधना
समष्टि व्यप्टिवाद एतै एक - प्राणता
भेद मे अभेद, अभेदो क भिन्नता।5।
बिन्दु संयुता एतै तरगिणी स्वयं
सिन्धु संगता एतै पयस्विनी स्वयं
मेघ बिन्दु, अद्रि रेणु, कीर्णता स्वयं
व्यष���टि मे समष्टि केर पूर्णता स्वयं।6।