प्रियतम के सम्मुख आते ही,
चंचल चितवन खिल जाती है,
मन की कलिका भी मचल मचल,
बचपन जैसा मुस्काती है।
रूठे जो ज़रा सी बात पॅ वो
पलभर में माने वो हँसकर।
जैसे सावन की प्रथम बूँद,
धरती हर्षाती हो रिस कर।
कंगन खनके, पायल बोले,
अधरों पर मधु की मृदु मिठास
प्रेमी की एक नज़र पाकर,
उठता है मन में उच्छवास।
नयनों में सपनों की नौका,
हर पल ही तैरा करती है,
पँहुचे जब पास पिया जी के,
धड़कन पर पहरा करती है।
वह लड़कपने का प्रेम-गीत,
चंचलता जिसपर हो निसार
वह जिसमें बसा समर्पण हो
ऐसा ही सिद्ध होता है प्यार
राधा-सी सरल हँसी लेकर,
कान्हा का मन हर लेती है,
हर कलुष मेट उसके उस का
निज प्रीत अमर कर देती है।