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और फिर एक दिन गुज़र गया और रात करीब आ गई, पर पता है रात की इस घड़ी में जब खिड़की से झांकता चाँद मेरी थकान को सहलाता है, तो मैं अनायास ही तुम्हें सोचने लगता हूँ। ऐसा लगता है मानों आकाश की गहराई तुम्हारी आँखों की नमी से उधार ली गई हो और सितारे तुम्हारे बालों में अटके छोटे-छोटे कण हों, जो बस ज़रा-सा झटके से झरकर मेरी हथेलियों में आ गिरेंगे।
सोच रहा हूँ तुम्हारे बिना ये कमरा कितना खाली है,पर तुम्हारी यादों से इतना भरा हुआ कि कदम रखने की जगह तक नहीं बची। हर दीवार पर तुम्हारी हँसी का रंग चढ़ा है और हर कोने में तुम्हारी आँखों की चमक टंगी है। सच कहूँ तो रात मेरे लिए एक आईना बन जाती है जिसमें तुम्हारा ही चेहरा उभरता है और मैं खुद को उस चेहरे के पीछे खोया हुआ पाता हूँ।
उफ़्फ कितना अजीब हूं न मैं! कैसी कैसी कल्पनाएं करता हूं,पर यकीन मानो तुम्हारी कल्पना मात्र से ही ये अंधेरा उजाला बन पूरे कमरे को महका जाता है। मानों किसी ने स्याही से पूरी रात को रंग दिया हो और उस स्याही में से सिर्फ़ तुम्हारा चेहरा चमक रहा हो।
जानती हो, मैं लिखता हूँ तो लगता है जैसे तुम्हारे गले से लगकर धीमे-धीमे अपनी सारी थकान तुम्हारे कांधे पर रख रहा हूं। और ये शब्द, स्याही, काग़ज़ ये सब तो बस बहाने हैं; मेरे लिए तो ये रात ही "तुम" हो ! ❤️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
कितना भी कर लीजिए, कहीं न कहीं कुछ न कुछ अधूरा रह ही जाता है। मन की पूरी निष्ठा, समय की पूरी ईमानदारी और श्रम की पूरी क्षमता लगा देने के बाद भी जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कोई एक कोना खाली दिख ही जाता है। ये खालीपन कभी हमारे भीतर की अपेक्षाओं से जन्म लेता है, तो कभी दूसरों की निगाहों से। और अक्सर वही खाली कोना सबसे पहले दिखाया भी जाता है।
लोग पूरे प्रयास को नहीं देखते, वे उस छोटी-सी दरार को देखते हैं जहाँ से सवाल उठाया जा सके। ये स्वभाव शायद मनुष्य का ही है, पूरे दीपक की रौशनी छोड़कर उसके नीचे की छाया गिन लेना। आप जितना शांत भाव से अपने कर्तव्य निभाते हैं, उतनी ही आसानी से आपकी कमियाँ गिना दी जाती हैं, मानों वही आपकी पूरी पहचान हों। उस क्षण भीतर कुछ टूटता है, क्योंकि आपने जो दिया था, वो अनदेखा रह गया और जो नहीं दे पाए, वही आपका परिचय बन गया।
कमियाँ जब गिनाई जाती हैं, तो वे केवल शब्द नहीं होतीं। वे सीधे आत्मसम्मान से टकराती हैं। सुनते हुए मन खुद से सवाल करता है क्या सच में मेरा प्रयास इतना कम था? क्या मेरी नीयत में कोई खोट रह गई? और यहीं से अफसोस जन्म लेता है। अफसोस इस बात का नहीं कि गलती हुई, बल्कि इस बात का कि पूरी ईमानदारी के बावजूद केवल गलती ही देखी गई।
सबसे अधिक चोट तो तब लगती है जब कमियाँ उन लोगों की ओर से आती हैं, जिनके लिए आपने स्वयं को पीछे रखा था। जिनकी सुविधा के लिए आपने अपने समय, अपनी इच्छा और अपने सुख को टाल दिया था। तब मन में ये स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि निस्वार्थता भी हमेशा सम्मान नहीं पाती। कई बार तो ऐसा लगता है कि जितना अधिक आप देते हैं, उतनी ही अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं, और अपेक्षाओं के साथ बढ़ती जाती हैं शिकायतें।
यकीन मानिए ये भी एक कड़वा सत्य है कि संसार पूर्णता को नहीं, सुविधा को सराहता है। जब तक आपकी मौजूदगी किसी के लिए सहूलियत बनी रहती है, आप अच्छे हैं। जिस दिन आप अपेक्षा से एक कदम पीछे रह गए, उसी दिन आपकी सारी अच्छाइयाँ भुला दी जाती हैं। तब आपके वर्षों के प्रयास एक पल में हल्के पड़ जाते हैं।
इन क्षणों में सबसे कठिन काम होता है स्वयं को संभालना। मन बार-बार कहता है कि शायद और कर लेना चाहिए था, शायद और सह लेना चाहिए था। लेकिन धीरे-धीरे ये समझ भी उभरती है कि इंसान होना ही अपूर्ण होना है। हर सीमा को लांघ पाना, हर अपेक्षा को पूरा कर पाना, ये किसी के लिए संभव नहीं। कमी रह जाना असफलता नहीं, मानवीय होना है।
जब चोट और अफसोस दोनों साथ होते हैं, तब चुप रह जाना अक्सर मजबूरी बन जाता है। आप सफाई नहीं देते, क्योंकि जानते हैं कि समझने वाला बिना कहे समझ जाएगा और जो नहीं समझना चाहता, उसे शब्द भी नहीं बदल पाएंगे। उस चुप्पी में एक थकी हुई स्वीकृति होती है कि अब हर किसी को खुश करना आपका काम नहीं।
शायद परिपक्वता यहीं से शुरू होती है। जब आप ये स्वीकार कर लेते हैं कि लोग कमियाँ गिनाएँगे, चाहे आप कितना ही कर लें और आप ये भी स्वीकार कर लेते हैं कि हर चोट का जवाब देना आवश्यक नहीं। कुछ अफसोस ऐसे होते हैं, जिन्हें ढोकर ही आगे बढ़ना पड़ता है, बिना किसी शोर के, बिना किसी शिकायत के।
आखिर में यही बचता है कि आप अपने भीतर झाँककर देखें क्या आपने अपनी क्षमता भर ईमानदारी से किया? यदि उत्तर हाँ है, तो दूसरों की गिनती आपको परिभाषित नहीं करती। कमियाँ रहेंगी, गिनाई भी जाएँगी, चोट भी लगेगी, अफसोस भी होगा। लेकिन अगर आत्मा जानती है कि आपने छल नहीं किया, तो वही सच्चा सुकून है। उसी सुकून के सहारे इंसान फिर उठता है, फिर चलता है, और इस बार थोड़ी कम उम्मीदों और थोड़ी अधिक शांति के साथ। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
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एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हूँ। दशकों खून जलाया है तब यहाँ पहुँचा हूँ। एक समय जब कंपनी का रिजल्ट बुरा था तो सोन पापड़ी और चादर मिली थी। उसी कंपनी ने अच्छे समय एलसीडी, आई पैड और अभी फिटनेस रिंग भी यूँ ही दी। सब से बड़ी बात, कोविड काल में भी वेतन और नौकरी बनाए रखी। कृतज्ञता एक परिष्कृत मनुष्य का गुण है। दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते। मैं वेतन के लिए लड़ने का समर्थक हूँ, उपहार का अपमान सिद्ध करता है कि आप जहाँ हैं क्यों हैं।